Movie Review

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adminDecember 22, 20181min100

1 जनवरी 2018 को ज़ीरो का पहला टीज़र आया था. तबसे फिल्म का इंतज़ार था. यानी 11 महीने 20 दिन का इंतज़ार. इस इंतज़ार का क्या सिला मिला आइए जानते हैं.

2018 में सलमान ने ‘रेस-3’ से और आमिर ने ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान’ से हाज़िरी लगाई. इन दोनों ही फिल्मों के हिस्से तारीफ़ बेहद कम और आलोचना बहुत ज़्यादा आई. लोगों ने जमकर बखिए उधेड़े. साल के आखिर में किंग खान कहलाने वाले शाहरुख ‘ज़ीरो’ लेकर आए हैं. साथ में हैं अनुष्का और कटरीना जैसी इंडस्ट्री की टॉप की हीरोइन्स. ज़ीशान और तिग्मांशु धुलिया जैसे टैलेंटेड सह-कलाकार. आनंद एल राय जैसा तगड़ा डायरेक्टर. बावजूद इसके कुछ ख़ास पल्ले नहीं पड़ता.

 

मैं शाहरुख खान का बहुत बड़ा फैन रहा हूं. मैंने उनकी ‘गूड्डू, और ‘ज़माना दीवाना’ जैसी फ़िल्में तक देख रखी है. किसी फिल्म को रिव्यू करते वक़्त एक बेसिक ईमानदारी सबसे ज़रूरी चीज़ होती है. मेरे अंदर का शाहरुख़ फैन कितना ही बायस्ड होने की कोशिश करे, ‘ज़ीरो’ के बारे में ये कहने से खुद को नहीं रोक पाएगा कि ये फिल्म एक निराश करने वाला अनुभव है. एटलीस्ट मेरे लिए. ज़्यादा लंबा फैलाने का मन नहीं है तो जल्दी से अच्छे-बुरे पहलूओं पर नज़र दौड़ा लेते हैं.

 

क्या है जो देखा जा सकता है?

शाहरुख खान. इस आदमी का एनर्जी लेवल किसी दूसरे ही प्लैनेट की चीज़ है बॉस! फर्स्ट हाफ में तो उनसे नज़रें नहीं हटतीं. बऊआ सिंह, जो है तो एक बौना आदमी लेकिन अपनी शारीरिक दुर्बलता की वजह से किसी हीन भावना से ग्रस्त नहीं हुआ है. बल्कि वो उसे सेलिब्रेट करता है. ‘दुनिया मेरे ठेंगे’ से टाइप रवैया रखता है. एक्ट्रेस बबिता कुमारी के लिए पागल है. वहीं साइंटिस्ट आफिया युसुफ़ज़ई को इम्प्रेस करने के लिए लिटरली तारे तोड़कर दिखाता है.

फिल्म में जो कुछ अच्छा है, सब फर्स्ट हाफ में ही है. जैसे बेइंतेहा खूबसूरती से फिल्माया गया गाना ‘मेरे नाम तू’. ये इतना शानदार बन पड़ा है कि मन ही नहीं करता ख़त्म हो. इस गाने में नाइंटीज़ और उसके बाद के कुछ सालों के उस शाहरुख की झलक मिलती है, जिसकी फैली हुई बांहों में दुनिया समा जाती थी और गालों के डिम्पल्स में कायनात गर्क हुआ करती थी.

 

इरशाद कामिल ने बढ़िया गीत लिखे हैं. अजय-अतुल का म्यूज़िक है जो उनके स्टैण्डर्ड से काफी कमतर है. एक-दो गाने ही उम्दा बन पड़े हैं. फर्स्ट हाफ में मुहम्मद ज़ीशान अय्यूब भी कमाल का सपोर्टिंग एक्ट निभाते हैं. कुछेक बेहतरीन पंच लाइंस आईं हैं उनके हिस्से. मेरठ का लहजा वो कामयाबी से पकड़ते हैं. कुल मिलाकर फर्स्ट हाफ बढ़िया कहा सकता है.

 

क्रैश लैंडिंग

गड़बड़ सेकंड हाफ में है और तगड़ी वाली है. यूं जैसे फर्राटे से उड़ते किसी स्पेस क्राफ्ट की क्रैश लैंडिंग हो जाए. इस हाफ में ऐसा कुछ होता है कि टाइटैनिक से आइसबर्ग टकरा जाता है और जहाज़, अपनी पूरी ख़ूबसूरती को लिए-दिए डूब जाता है. मेरठ की कहानी मुंबई तक तो बर्दाश्त हो जाती है लेकिन यूएस आते-आते आप चीटेड महसूस करने लगते हैं. एक के बाद एक इतने अतार्किक सीन्स घटने लगते हैं कि एक वक़्त के बाद आप दिमाग लगाना बंद कर देते हैं. बस चाहते हैं कि जो भी परदे पर हो रहा है वो जल्दी से ख़त्म हो, ताकि आप घर जा सकें. यूं लगता है एक ही टिकट में आपने दो फ़िल्में देख ली हो. इंटरवल से पहले कोई और. इंटरवल के बाद कोई और.

 

 
 

किसी प्योर बॉलीवुड एंटरटेनर से आप महान फिल्म होने की उम्मीद तो नहीं कर सकते लेकिन ‘ज़ीरो’ जितने बड़े प्रोजेक्ट से आप थोड़ी सी तार्किकता की उम्मीद तो करते ही हैं. मैं यहां कई सीन्स का उदाहरण देकर अपनी बात समझा सकता हूं लेकिन वो सब के सब स्पॉइलर्स में आएंगे. इसलिए खुद जाकर देखिए.

एक्टिंग के फ्रंट पर शाहरुख़ ही सबसे ज़्यादा मार्क्स ले जाते हैं. कटरीना भी ठीक-ठाक हैं. ज़ीशान शानदार तो अनुष्का सबसे कमज़ोर कड़ी. तिग्मांशु पता नहीं फिल्म में क्यों थे?

कुल मिलाकर ‘ज़ीरो’ को ऐसे ही समराइज़ किया जा सकता है कि इससे बच्चे खुश होंगे और डाई हार्ड शाहरुख़ फैंस झेल जाएंगे. बाकी आप खुद देखकर तय करिए.

कसम से जियरा चकनाचूर!

 

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adminOctober 26, 20181min60

फिल्म का नाम : बाजार

डायरेक्टर: गौरव के चावला

स्टार कास्ट: सैफ अली खान, चित्रांगदा सिंह, रोहन मेहरा, राधिका आप्टे

अवधि: 2 घंटा 20  मिनट

सर्टिफिकेट: U/A

रेटिंग:  3.5 स्टार

गौरव के चावला का नाम विज्ञापन की इंडस्ट्री में  प्रसिद्ध है लेकिन पहली बार उन्होंने फिल्म डायरेक्शन में कदम रखा है. शेयर मार्केट के उतार-चढ़ाव और उस दुनिया के इर्द-गिर्द होने वाली बातों को बाजार फिल्म के जरिए गौरव ने दर्शाने की कोशिश की है, आइए जानते हैं आखिरकार कैसी बनी है यह फिल्म.

 

कहानी:

फिल्म की कहानी मुंबई के उद्योगपति शकुन कोठारी (सैफ अली खान) से शुरू होती है जो खुद को शेयर बाजार का किंग मानता है. शकुन की बीवी मंदिरा कोठारी (चित्रांगदा सिंह) है. शकुन के साथ के व्यापारी उससे इसलिए जलते हैं क्योंकि उसके काम करने का तरीका सबसे अलग है. इसी बीच इलाहाबाद शहर से ट्रेडिंग करने वाले रिजवान अहमद (रोहन मेहरा ) की एंट्री मुंबई में होती है. उसका एक ही सपना होता है, शकुन कोठारी से एक बार मिलना. इस दौरान रिजवान की मुलाकात प्रिया (राधिका आप्टे) से होती है, जो कि एक ट्रेडिंग कंपनी में काम करती है. रिजवान का शकुन से मिलना और मिलने से पहले और उसके बाद में तरह-तरह की घटनाओं का घटना भी एक दिलचस्प वाकये है. अंत में कहानी अलग मुकाम पर पहुंच जाती है, जिसे जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी.

 

फिल्म को क्यों देख सकते हैं:

फिल्म की कहानी बड़ी दिलचस्प है और खासतौर से इसका स्क्रीनप्ले कमाल का है. फिल्म देखते हुए इंटरवल कब आ जाता है पता ही नहीं चलता. फिल्म के संवाद भी काफी दिलचस्प है, जिसकी वजह से असीम अरोड़ा, निखिल आडवाणी ,और परवेज शेख की तारीफ जरूर होती है. फिल्में कथानक जिस तरीके से आगे बढ़ता है वह काफी दिलचस्प है.

हम कह सकते हैं कि पहली बार फिल्म का डायरेक्शन कर रहे गौरव के चावला बधाई के पात्र हैं बहुत ही अच्छा डायरेक्शन किया है. शेयर बाजार की रिसर्च भी काबिले तारीफ है. जिस इंसान को शेयर मार्केट के बारे में बिल्कुल नहीं पता उसके लिए भी यह फिल्म देखनी आसान हो जाती है. फिल्म को दर्शाने का एक अलग तरह का अंदाज है. जो कि काफी स्टाइलिश भी है और उसे आप थिएटर तक जा कर ही फील कर पाएंगे.

 

कैसी है किरदारों की अदाकारी:

सैफ अली खान ने कई सालों के बाद ओमकारा वाले लंगड़ा त्यागी के बराबर की परफॉर्मेंस दी है. बहुत ही बेहतरीन अभिनय करते हुए नजर आते हैं. इसके साथ ही अपने जमाने की मशहूर अभिनेता विनोद मेहरा के बेटे रोहन मेहरा भी इस फिल्म के साथ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कदम रख रहे हैं. लेकिन उन्हें देखकर बिल्कुल नहीं लगता कि यह उनकी पहली फिल्म है. बहुत ही उम्दा अभिनय करते हुए नजर आए हैं. राधिका आप्टे ने एक बार फिर से बता दिया है कि उन्हें बेहतरीन अदाकारा क्यों कहा जाता है. राध‍िका प्रिया राय के रोल में बखूब नजर आती है. लेकिन चित्रांगदा सिंह के काम में ज्यादा दम नहीं है वो और बेहतर काम कर सकती थी. फिल्म के बाकी किरदारों ने भी सहज अभिनय किया है.

 

कमजोर कड़ियां:

फिल्म की कमजोर कड़ी इसका इंटरवल के बाद का हिस्सा है जो थोड़ा कहानी को स्लो करता है. एक  तरीके से यदि फिल्म को 5- 7 मिनट कम किया जाता तो और भी ज्यादा क्रिस्प हो जाती. फिल्म रिलीज से पहले इसका कोई ऐसा गाना नहीं है जो कि बहुत बड़ा हिट हुआ हो और शायद यही कारण है कि बाजार में इस बाजार की गर्माहट कम है.

 

बॉक्स ऑफिस:

ट्रेड पंडितों की मानें तो फिल्म का बजट लगभग 40 करोड़ है और इसे 1500 से ज्यादा स्क्रीन्स में रिलीज किया जाएगा. सैफ अली खान के फैंस तो इसे जरूर देखेंगे और वर्ड ऑफ माउथ इस फिल्म को अच्छी ओपनिंग दिला पाने में जरूर कामयाब रहेगा.

 

 
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adminOctober 13, 20181min190

रिया चक्रबर्ती की फिल्म जलेबी मॉर्डन टी-20 मोहब्बत के दौर में सच्ची मोहब्बत की कहानी है. जानिए क्या है इस फिल्म में खास और किस दर्शक वर्क के लोग इसे देखने जा सकते हैं.

 

फिल्म का नाम: जलेबी : दी एवरलास्टिंग टेस्ट ऑफ़ लव

डायरेक्टर: पुष्पदीप भरद्वाज

स्टार कास्ट: रिया चक्रबर्ती, वरुण मित्रा,  दिगांगना सूर्यवंशी

अवधि: 1 घंटा 53 मिनट

सर्टिफिकेट: U/A

रेटिंग: 2.5 स्टार

सोनाली केबल में अभनेत्री रिया चक्रबर्ती दिखाई दी थी, उसके बाद उन्होंने हाफ गर्लफ्रेंड, दोबारा, और बैंक चोर जैसी फिल्में की, और अब डेब्यू डायरेक्टर पुष्पदीप भारद्वाज की फिल्म जलेबी में वो अहम् भूमिका में नजर आ रही हैं. महेश भट्ट के प्रोडक्शन हाउस की यह फिल्म रिलीज हो चुकी है, आइए जानते हैं कैसी बनी है यह फिल्म –

 

कहानी :-

यह फिल्म मुंबई से दिल्ली तक के सफर पर आधारित है, जहां राइटर आयशा (रिया चक्रबर्ती) अपनी किताब के बुक रीडिंग सेशन के लिए जाती है, लेकिन ट्रेन में उसकी मुलाक़ात अनु (दिगांगना सूर्यवंशी) से होती है, जो की आयशा के पुराने प्यार देव माथुर (वरुण मित्रा) की पत्नी हैं. अनु के साथ उसकी बेटी पुल्टी (अनन्या दुरेजा) भी होती हैं. कहानी फ्लैशबैक और प्रेजेंट डे से होते हुए, अंततः रिजल्ट तक पहुँचती है. इश्क मोहब्बत प्यार के बीते दिनों की यादें भी चलती रहती हैं, ट्रेन में सिंगर अर्जुन (अर्जुन कानूनगो) की मौजूदगी भी होती है. आखिरकार क्या होता है, ये जानने के लिए आपको फिल्म देखनी होगी.

 

जानिए फिल्म क्यों देख सकते हैं?

फिल्म की ज्यादातर कहानी पहले से ही ट्रेलर में बताई जा चुकी है, लेकिन जिस तरह से डायरेक्टर पुष्पदीप भारद्वाज ने फिल्मांकन किया है, वो काबिल-ऐ-तारीफ़ है. संवाद, लोकेशन और दर्शाने का ढंग अच्छा है. कई बार इमोशनल पल आते हैं तो वहीं दूसरी तरफ पारिवारिक रिश्तों के ताने बाने को भी अच्छी तरह दिखाया गया है. दिल्ली की लोकेशन, और खास तौर पर नेताजी की बाड़ी को बढ़िया शूट किया गया है. वरुण मित्रा ने फिल्म में अच्छा काम किया है ,और उनकी आवाज कई दिलों को छू सकती है. उनका अभिनय बढ़िया है, वहीं रिया चक्रबर्ती ने उम्दा काम किया है, उन्हें जरूर इस फिल्म से फायदा होगा.

 

क्या हैं कमज़ोर कड़ियां?

फिल्म की कमजोर कड़ी शायद इसका स्क्रीनप्ले है, जो हर वर्ग को पसंद नहीं आएगा, ख़ास तौर पर युवा वर्ग इससे कनेक्ट नहीं कर पायेगा. 20-20 के जमाने में टेस्ट मैच जैसा स्क्रीनप्ले लगता है. साथ ही एक गाने के अलावा बाकी गाने रिलीज से पहले हिट भी नहीं हो पाए. कहा जा रहा है यह बंगाली फिल्म प्रकटन से प्रेरित है, मैंने वो फिल्म भी देखी है, लेकिन यह फिल्म प्रकटन की पूरी खुशबू समाहित नहीं कर पायी है. युवावर्ग के मद्देनजर बेहतर स्क्रीनप्ले हो सकता था.

 

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adminOctober 5, 20181min100

फिल्म : अंधाधुन

निर्देशक : श्रीराम राघवन

कलाकार : आयुष्मान खुराना, तब्बू, राधिका आप्टे, अनिल धवन

समय अवधि : 2 घंटे 20 मिनट

सर्टिफिकेट : UA

स्टार्स : 4

श्रीराम राघवन एक अलग तरह का सिनेमा बनाने के लिए जाने जाते हैं. यही कारण है कि उन्होंने अब तक सिर्फ पांच फिल्में निर्देशित की हैं. जिनमें बदलापुर, एक हसीना थी, एजेंट विनोद और अब “अंधाधुन” नाम की थ्रिलर फिल्म. श्रीराम हमेशा से ही बढ़िया कहानी सुनाने के लिए जाने जाते हैं. इस बार भी जबसे अंधाधुन का ट्रेलर आया है, ऐसी फिल्म देखने वाले दर्शकों के दिल में अलग ही उत्साह है. वो इसे देखने के लिए आतुर भी हैं. फिल्म की कहानी क्या है, फिल्म बनी किस तरह से है, आइए समीक्षा करते हैं….

 

क्या है फिल्म की कहानी :

फिल्म की कहानी एक पियानो प्लेयर (आयुष्मान खुराना) की है, जो अंधा है. वो अपनी गर्लफ्रेंड राधिका आप्टे के रेस्टोरेंट में पियानो बजाकर गुजारा करता है. वहीं, दूसरी तरफ तब्बू हैं जिनको अमीर बनने के लिए एक सितारे (अनिल धवन) से शादी करनी पड़ती है. बाद में वो एक अमीर पत्नी भी कहलाई जाती हैं. सबकुछ ठीक चल रहा होता है, इसी बीच एक दिन अचानक से अनिल धवन की मौत हो जाती है. अनिल की मौत एक मर्डर मिस्ट्री बन जाती है. आक्षेप आयुष्मान खुराना पर भी लगता है. हालांकि वो अंधा है. तो उसने कैसे ये मर्डर देखा होगा, या अंधेपन की वजह से उसका चश्मदीद नहीं हो सकता है. यहीं से कहानी एक अलग मोड़ लेने लगती है. बहुत सारे ट्विस्ट और टर्न्स आते हैं. आखिरकार क्या होता है, क़त्ल किसने किया है और कौन है सबसे बड़ा दोषी, ये सबकुछ जानने के लिए फिल्म देखनी पड़ेगी.

 

क्यों देखें फिल्म ?

श्रीराम राघवन का नाम आते ही दर्शक एक अलग तरह की फिल्म का हिस्सा बन जाते हैं. ऐसी फिल्म जिसमें हर एक पल कुछ नया होने वाला है. अंधाधुन  में भी ऐसा ही है. बहुत सारे ट्विस्ट और टर्न्स आते हैं. 10 वें मिनट में आप जो सोच रहे होते हो वो नहीं होता, कुछ अलग ही हो जाता है. स्क्रीन प्ले दमदार है. कहानी बहुत ही दमदार है. जिस तरीके से श्रीराम ने इसे सुनाया है वो फ्लेवर बहुत ही अलग और उम्दा हैं. कहा जा सकाता है कि ये इस साल की सर्वश्रेष्ठ थ्रिलर फिल्म है. इसे भारत के हिंदी सिनेमा के इतिहास में बने थ्रिलर फिल्मों में सबसे अलग मां सकते हैं.

आयुष्मान इस फिल्म के साथ एक बार फिर बिल्कुल अलग भूमिका में दिख रहे हैं. फिल्म में उन्होंने अपना सर्वोत्तम किया है. श्रीराम राघवन ने उनसे बेहतरीन काम निकलवाया है. दूसरी तरफ कई सालों के बाद फ़िल्मी पर्दे पर वरुण धवन के चाचा अनिल धवन नजर आए हैं. जिन्हें आपने “हवस” जैसी बहुत सारी फिल्मों में देखा होगा. वो भी उम्दा काम करते दिखते हैं. तब्बू का एक अलग रोल है और राधिका ने भी सहज ही अभिनय किया है.

कलाकारों का अभिनय सर्वश्रेष्ठ है. ये कहानी पियानो प्लेयर की है. आयुष्मान ने प्रोफेशन पियानो प्लेयर का किरदार बखूबी निभाया है. उनको देखकर लगता है कि एक दिव्यांग पियानो प्लेयर कैसा हो सकता है. फ़िल्म के ट्विस्ट टर्न्स इसकी खासियत हैं. कथानक कहीं भी रुकता नहीं है, हालांकि सेकेंड हाफ की शुरुआत में कहानी थोड़ी सी डगमगाती है, लेकिन ओवरऑल फिल्म बहुत ही उम्दा है. इस विधा की फिल्मों को पसंद करने वाले ये फिल्में जरूर देखेंगे.

 

कमजोर कड़ी

फिल्म का कोई भी गीत रिलीज से पहले हिट नहीं हुआ था. हालांकि वो इस कथानक को परेशान नहीं करता, लेकिन फिर भी गाने अच्छे होते तो दर्शकों में एक अलग तरह का उत्साह होता. दूसरी तरफ मर्डर मिस्ट्री और थ्रिलर फिल्में देखने वाली ख़ास तरह की ऑडियंस है. शायद हर तबके के दर्शकों को फिल्म पसंद न आए. फिल्म का प्रचार भी बहुत ज्यादा नहीं हुआ तो शायद कुछ दर्शकों को फिल्म के बारे में पता नहीं हो. फिल्म का प्रमोशन और भी दमदार किया जा सकता था.

 

बॉक्स ऑफिस

फिल्म का बजट काफी कम है और वायकॉम की तरफ से इसे अच्छी रिलीज मिलने वाली है. वर्ड ऑफ़ माउथ पहले से ही काफी तगड़ा है. इसकी वजह से ओपनिंग तो कम होगी, लेकिन अंधाधुन का ओपनिंग वीकेंड काफी बड़ा हो सकता है. वर्ड ऑफ़ माउथ इसे काफी फायदा पहुंचा सकता है.

 

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adminSeptember 21, 20181min120

फिल्म का नाम : बत्ती गुल मीटर चालू

डायरेक्टर: श्री नारायण सिंह  

स्टार कास्ट: शाहिद कपूर, श्रद्धा कपूर, दिव्येंदु शर्मा, यामी गौतम

अवधि: 2 घंटा 55 मिनट

सर्टिफिकेट: U/A

रेटिंग: 2.5 स्टार

श्री नारायण सिंह के निर्देशन में बनी फिल्म “टॉयलेट- एक प्रेम कथा” को काफी सराहा गया था. फिल्म को तमाम अवॉर्ड्स के साथ-साथ नेशनल अवॉर्ड भी दिया गया. अब श्री नारायण ने बिजली बिल के गंभीर मुद्दे पर आधारित फिल्म “बत्ती गुल मीटर चालू” बनाई है. ये फिल्म शूटिंग के दौरान से ही बहुत सारे विवादों में फंसी हुई थी. अंततः ये रिलीज हो गई है. आइए जानते हैं आखिरकार कैसी बनी है यह फिल्म…

 

कहानी क्या है?

फिल्म की कहानी उत्तराखंड के टिहरी जिले की है. कहानी तीन दोस्तों सुशील कुमार पंत (शाहिद कपूर), ललिता नौटियाल (श्रद्धा कपूर) और सुंदर मोहन त्रिपाठी (दिव्येंदु शर्मा) की है. ये एक-दूसरे के जिगरी यार हैं. सुशील कुमार ने वकालत की है, वहीं ललिता डिजाइनर हैं और सुंदर ने एक प्रिंटिंग प्रेस का धंधा शुरू किया है. उत्तराखंड में बिजली की समस्या काफी गंभीर है और ज्यादातर बिजली कटी हुई ही रहती है. सुंदर की फक्ट्री के बिजली का बिल हमेशा ज्यादा आता है और एक बार तो 54 लाख रुपये तक का बिल आ जाता है. इस वजह से वो शिकायत तो दर्ज करता है, लेकिन उसकी बात सुनी नहीं जाती. एक ऐसा दौर आता है जब वह बेबसी में आत्महत्या कर लेता है. इस वजह से सुशील और ललिता शॉक हो जाते हैं. सुशील अपने दोस्त के इस केस को लड़ने का फैसला करता है. कोर्टरूम में उसकी जिरह वकील गुलनार (यामी गौतम) से होती है. अंततः एक फैसला आता है, जिसे जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी.

 

जानिए आखिर को क्यों देख सकते हैं फिल्म?

फिल्म में एक बड़े अहम मुद्दे की तरफ ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की गई है. बिजली बिल से जुड़ी इस तरह की कहानियों से हम दो-चार होते रहते हैं. इसकी वजह से कई लोग असल जिंदगी में बेहद मुश्किलों से गुजरते हैं. फिल्म में उत्तराखंड की लोकेशन अच्छी तरह से दिखाई गई है. कोर्टरूम के कुछ सीन्स बहुत अच्छे बने हैं. वहीं शाहिद कपूर, श्रद्धा कपूर और दिव्येंदु की बॉन्डिंग अच्छी दिखाई गई है. तीनो एक्टर्स ने किरदार के हिसाब से खुद को ढाला है, जो की पर्दे पर नजर भी आता है. बाकी सह कलाकारों का काम भी बढ़िया है. फिल्म में देखते-देखते वाला गीत बहुत अच्छा है.

 

कमजोर कड़ियां

फिल्म की कमजोर कड़ी इसका स्क्रीनप्ले, निर्देशन और एडिटिंग है. तीन घंटे की फिल्म है, जिसे कम से कम 50 मिनट छोटा किया जाना चाहिए था. फिल्म में कई बेवजह के सीक्वेंस हैं जो इसे जबरदस्ती लंबा बना देते हैं. साथ ही जिस तरह से अहम मुद्दे के बारे में बात करने की कोशिश की गई है वो फिल्मांकन के दौरान कहीं न कहीं खोता नजर आता है. संवादों में बार-बार ‘बल’ और ‘ठहरा’ शब्दों का प्रयोग किया गया है. जिसकी वजह से किरदारों के संवाद कानो में चुभते हैं. फिल्म को पूरे भारत के लिए बनाया गया है, लेकिन फ्लेवर सिर्फ एक ही शहर का है. लेखन में लिबर्टी लेकर संवादों को सामान्य किया जा सकता था. एक बहुत अच्छी फिल्म बन सकती थी, लेकिन औसत रह गई.

 

बॉक्स ऑफिस

फिल्म का बजट करीब 40 करोड़ बताया जा रहा है. इसे बड़े पैमाने पर रिलीज किए जाने की बात सामने आ रही है. देखना दिलचस्प होगा कि आखिर शाहिद कपूर और श्रद्धा कपूर की मौजूदगी से फिल्म को कितना फायदा मिलता है.

 

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adminSeptember 13, 20181min180

नाम : मित्रों

डायरेक्टर: नितिन कक्कड़

स्टार कास्ट: जैकी भगनानी, कृतिका कामरा, प्रतीक गांधी, नीरज सूद, शिवम पारेख

अवधि: 1 घंटा 59  मिनट

सर्टिफिकेट: U/A

रेटिंग:  3.5 स्टार

डायरेक्टर नितिन कक्कड़ ने साल 2012 में फिल्म फिल्मि‍स्तान डायरेक्ट की, जिसे बहुत सराहा गया. फिल्म को बेस्ट फीचर फिल्म के नेशनल अवार्ड से भी सम्मानित किया गया. इसके बाद  नितिन ने कुछ और फिल्में डायरेक्ट की, जिनका नाम रामसिंह चार्ली और मित्रों है. मित्रों साल 2016 में आई तेलुगु फिल्म पेली छुपूलू का हिंदी वर्जन है. फिल्म के ट्रेलर को काफी सराहा गया है. पढ़‍िए समीक्षा.

कहानी:

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फिल्म की कहानी  गुजरात के रहने वाले जय (जैकी भगनानी) की है, इसने इंजीनियरिंग की है, लेकिन पूरे दिन घर में बैठकर अजीब हरकतें करता है, जिसकी वजह से जय के घरवालों को लगता है कि जब उसकी शादी हो जाएगी तो वह जिम्मेदारियों पर ध्यान देने लगेगा और इसी चक्कर में जय के घरवाले अवनी (कृतिका कामरा) से उसकी शादी की बात करते हैं. रिश्ता लेकर उनके घर पहुंच जाते हैं. जय के साथ उसके दोनों दोस्त (प्रतीक गांधी और शिवम पारेख) हमेशा उसके साथ रहते हैं. अवनी के साथ मुलाकात के बाद कहानी में बहुत सारे मोड़ आते हैं और अंततः एक रिजल्ट आता है जिसे जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी.

क्यों देख सकते हैं:

फिल्म की कहानी अच्छी है और स्क्रीनप्ले भी बढ़िया लिखा गया है. खास तौर पर फिल्म का फर्स्ट हाफ काफी दिलचस्प है और सेकंड हाफ में कहानी में थोड़ा ठहराव आता है. फिल्मी गुजरात के फ्लेवर और वहां की जगहों को बड़े अच्छे तरीके से डायरेक्टर नितिन कक्कड़ ने दर्शाया है जिसकी वजह से विजुअल ट्रीट बढ़िया है. फिल्म का कोई भी किरदार लाउड नहीं है जो कि अच्छी बात है. फिल्म का संवाद, डायरेक्शन, सिनेमेटोग्राफी अच्छा है. कई सारे ऐसे पल भी आते हैं जिनसे एक आम इंसान और मिडिल क्लास फैमिली कनेक्ट कर सकती है. जैकी भगनानी एक तरह से अपने सर्वश्रेष्ठ अभिनय में दिखाई देते हैं वही फिल्मों में डेब्यू करती हुई कृतिका कामरा ने किरदार के हिसाब से बढ़िया काम किया है. नीरज सूद, प्रतीक गांधी, शिवम पारेख और बाकी किरदारों का काम सहज है. फिल्म के गाने कहानी के साथ-साथ चलते हैं और बैकग्राउंड स्कोर भी बढ़िया है. आतिफ असलम का गाया हुआ गाना चलते चलते और सोनू निगम का गाना भी कर्णप्रिय है, वह रिलीज से पहले कमरिया वाला गीत ट्रेंड में है जो कि देखने में भी अच्छा लगता है. एक तरह से फिल्में कहानी के साथ-साथ ड्रामा इमोशन गाने और हंसी मजाक का फ्लेवर है जो इसे संपूर्ण फिल्म बनाता है.

कमज़ोर कड़ियां:

फिल्म की कमजोर कड़ी इसका सेकंड हाफ है जो कि थोड़ा धीमे चलता है इसे दुरुस्त किया जाता तो फिल्म और भी क्रिस्प हो सकती थी. कुछ ऐसी भी जगह है जहां कॉमेडी पंच बहुत जल्दी से आते हैं और निकल जाते हैं जिसकी वजह से शायद वह हंसी का पल हर एक दर्शक को समझ में भी ना आए.

बॉक्स ऑफिस :

फिल्म की अच्छी बात यह है कि इस का बजट कम है और इसे रिलीज भी अच्छे पैमाने पर किया जा रहा है. ट्रेलर से जिन्होंने इस फिल्म को देखने का मन बना रखा है वह बिल्कुल भी निराश नहीं होंगे और वर्ड ऑफ माउथ से यह फिल्म अच्छा मकाम हासिल कर सकती है.

 

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adminSeptember 10, 20182min430

किसी अरब देश में एक लड़का-लड़की को प्यार हुआ. और ऐसा हुआ कि आज यानी हज़ारों साल बाद भी याद किया जा रहा है. लड़की का नाम लैला था. लड़के का कैस. लेकिन वो लड़की के प्यार में इतना डूब गया कि कभी निकल ही नहीं पाया. इसके बाद उसे लोग ‘मजनू’ बुलाने लगे, जिसे हिंदी में पागल और अंग्रेज़ी में क्रेज़ी कहते हैं. तब से इस जोड़ी को लैला-मजनू के नाम से बुलाया जाने लगा. हालांकि ये एक ट्रेजिक लव स्टोरी थी. अब इस प्रेम कहानी पर इम्तियाज़ अली ने फिल्म लिखी है. और डायरेक्ट की है, उनके भाई साजिद अली ने. ये सोचकर कि अगर उन लैला-मजनू की प्रेम कहानी आज के समय में घटती तो कैसी होती.

बहुत से लोगों को लैला-मजनू की प्रेम कहानी बस इतनी पता है कि वो कभी पूरी नहीं हुई. लेकिन साजिद की ये फिल्म उस जोड़े की इस पूरी जर्नी को रिक्रिएट करती है. ये आज भी महान प्रेम कहानियों में क्यों गिनी जाती है, वो इस फिल्म को देखकर पता चलेगा.

इस फिल्म की सबसे अच्छी बात इसकी कहानी है. जो मेकर्स के पास पहले से उपलब्ध थी. लेकिन उसको दोबारा से ट्रेस करके लिखना इतना भी आसान नहीं था. अगर ये सही से हो गया तो बाकी सब हो गया. तो ‘लैला मजनू’ में ये सही से हो गया है. फिल्म की शुरुआत में ही बैकग्राउंड से एक डायलॉग आता है, जिसमें ये कहा जाता है कि ‘हमारी कहानी लिखी हुई. इसे दुनिया क्या, दुनिया वाले क्या, हम खुद नहीं बदल सकते.’ फिल्म का प्लॉट कुछ ऐसा है कि कश्मीर में रहने वाले दो परिवारों के बीच भारी दुश्मनी है. लेकिन उनके बच्चे प्यार में पड़ जाते हैं. लेकिन उनकी शादी एक दूसरे से नहीं होती. अब दोनों ही अपनी लाइफ से खुश नहीं है. मिलने की कोशिश होती है लेकिन कभी मिल नहीं पाते. कितनी घिसी हुई कहानी लग रही है सुनकर. लेकिन इसे देखने में रोएं खड़े हो जाते हैं, ऐसे बनाया गया है इसे.

 

अविनाश इससे पहले 2017 में आई फिल्म ‘तू मेरा संडे’ में काम कर चुके हैं.

इस फिल्म में नए एक्टर्स काम कर रहे हैं. पहले उन्हें छुपाकर रखा जा रहा था. क्योंकि इम्तियाज़ का ये मानना था कि वो अपने एक्टर्स को दुनिया से सीधे लैला-मजनू के किरदार में ही मिलवाना चाहते थे. ये एक्टर्स हैं अविनाश तिवारी और तृप्ति डिमरी. फिल्म में एक सीन है, जहां लैला और उसके पति के बीच लड़ाई हो रही होती है. इस सीन को देखकर आप इस बात पर शर्त लगा सकते हैं कि ये तृप्ति की पहली फिल्म नहीं है. मजनू के किरदार में अविनाश ने पूरा सेकंड हाफ हथिया लिया है. क्योंकि उस दौरान स्क्रीन पर सिर्फ वही दिखते हैं और आपको किसी और को देखने का मन भी नहीं करता है. फिल्म में एक और एक्टर हैं, जो बहुत इंप्रेस करते हैं. सुमित कौल. इन्होंने लैला के पति इब्बन का रोल किया है. इनका कश्मीरी लहज़े में बात करना बहुत अच्छा लगता है लेकिन इस कैरेक्टर से पूरी फिल्म में एक खुन्नस सी बनी रहती है.

 

तृप्ति की ये पहली फिल्म है. दूसरी बार ऑडिशन लेकर उन्हें फिल्म में लिया गया है.

इस कहानी में कुछ बहुत अलग नहीं है. बस ट्रीटमेंट का कमाल है सब. ये फिल्म अपने किरदारों की वजह से पसंद आती है. उनके पागलपन की वजह से पसंद आती है. जो पागलपन ‘गीत’ में था, ‘जॉर्डन’ में था, ‘वेरॉनिका’ में था, ‘वेद’ में था, वही पागलपन ‘कैस’ में दिखता है. और उसका पागलपन आप थोड़ा आगे तक देखना चाहते हैं. फिल्म खत्म होने के बाद कैस का क्या होता है. वो कहां जाता है? क्या करता है? जिंदा भी है कि नहीं? लेकिन फिर आप अपनी लैला को ढूंढ़ने में लग जाते हैं और कैस पीछे छूट जाता है.

फिल्म में एक सीन है जहां दीवाना कैस अपनी माशूक से बात कर रहा होता है. बगल में लोग नमाज़ अदा कर रहे होते हैं. कैस के बोलने से उनके नमाज़ में बार-बार खलल पड़ती है. वो उठकर चिक्खम-चिल्ली मचाते हैं और फिर कैस को पत्थर से मार देते हैं. वो समझ नहीं पाता कि उसे मारा क्यों गया? वो तो अपनी माशूक से बात कर रहा था, वो खोया हुआ था. फिर इन लोगों का ध्यान उस पर कैसे चला गया? वो भी अपने खुदा से बात कर रहे थे. फिल्म की एक अच्छी आदत है, वो बिना कहे बहुत कुछ कहती है. और आपको सुनकर सहमत होना पड़ता है.

 

इस फिल्म की कास्टिंग के दौरान शुरुआत में ही अविनाश को शॉर्टलिस्ट कर लिया गया था लेकिन उनके बाद भी कई लोगों का ऑडिशन हुआ लेकिन फिर अविनाश ही फाइनल कर लिए गए.

एक लड़की आकर कैसे लड़के की फ्लैट चल रही ज़िंदगी को सर के बल कर देती आपको यहां देखने को मिलता है. जैसे हीर ने ‘जनार्दन जाखड़’ को जेजे बना दिया, वैसे ही इस फिल्म की लैला, कैस को मजनू बना देती है. पागल कर देती है और बदले में बस फलक की ओर देखने को कहती है. उसे पता नहीं कि यही तो कैस को खल रहा है. उसे खुशी चाहिए लेकिन वो इंतज़ार कर रहा है. जब उसका सब्र जवाब दे देता है, तो निकल जाता है खुश होने. अकेले. अब उसे लैला से प्यार करने के लिए लैला की ही जरूरत नहीं है. कैस और लैला का सफर साथ शुरू हुआ था लेकिन कैस अब आगे निकल गया है. वो वहां से लौट भी नहीं सकता और आगे भी नहीं जा सकता. फिल्म में एक सीन है जहां दीवाना हो चुकी कैस से मिलने लैला आती है. उस समय वो बताता है कि उसे हर जगह क्या दिखता है. और वो अपने अंदर की सारी ऊर्जा लगाकर ये नाम लेता है- ‘लायला लायला’. ये फिल्म के उन सीन्स में से एक है, जहां अविनाश इतने तेज चमकने लगते हैं कि बाकी सब चीज़ें फीकी हो जाती हैं. और पूरी फिल्म में ये चीज़ आप कई जगह एक्सपीरियंस करते हैं. और उसके पीछे डायलॉग्स का बहुत बड़ा हाथ है. फिल्म के डायलॉग वैसे तो काफी रियल हैं लेकिन सुनने में इतने मीठे हैं कि शायरी जैसे लगते हैं.

 

इस फिल्म से पहले साजिद जॉन अब्राहम प्रोडक्शन के लिए ‘बनाना’ नाम की एक फिल्म डायरेक्ट कर चुके हैं लेकिन वो किसी वजह से रिलीज़ नहीं हो पा रही.

फिल्म में डायलॉग से ज़्यादा कुछ कहने या करने की कोशिश ही नहीं की गई है. फोटो वाली कहानी टाइप लगती है ये फिल्म. कश्मीर के कभी हरे-भरे तो कभी बर्फ से ढंके पहाड़. नीली झील. घने जंगल. इस माहौल में घट रही ये कहानी बहुत सूफी सी हो जाती है. नॉर्मल रफ्तार से शुरू हुई ये फिल्म हर बढ़ते सीन के साथ तेज होती जाती है. और खत्म ऐसे होती है जैसे इसे कोई रेस जीतनी हो. ‘आहिस्ता’ और ‘हाफिज़ हाफिज़’ गाने के बीच जो कुछ घटता है उससे आप एक पल को नज़र नहीं हटा सकते. अगर ऐसा हुआ तो आप सेकंड भर में काफी कुछ मिस कर जाएंगे. सामने अविनाश परफॉर्म कर रहे होते हैं पीछे से मोहित चौहान अपना जादू बिखेर रहे होते हैं. ये फिल्म का सबसे खूबसूरत हिस्सा है. इस फिल्म के लिए गाने नीलाद्री कुमार और जॉय बरुआ ने बनाएं हैं. फिल्म में ‘सरफिरी’ गाने का प्लेसमेंट थोड़ा अजीब लगता है. क्योंकि ये एक सीन के बीच नेपथ्य से आकर सामने खड़ा हो जाता है, जबकि आप वो सीन देखने में इंट्रेस्टेड हैं. वो गाना आप यहां देख सकते हैं:

 

 

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adminAugust 31, 20181min140

फिल्म: यमला पगला दीवाना फिर से

डायरेक्टर: नवनैत सिंह

स्टार कास्ट: धर्मेंद्र, सनी देओल, बॉबी देओल, कृति खरबंदा, शत्रुघ्न सिन्हा, असरानी

अवधि: 2 घंटा 28 मिनट

सर्टिफिकेट: U/A

रेटिंग: 1.5 स्टार

 

साल 2011 में जब फिल्म यमला पगला दीवाना आई, तो उसने दर्शकों को धर्मेंद्र और उनके बेटों के साथ हंसी मजाक का नया फ्लेवर दिया. लेकिन 2013 में रिलीज हुआ दूसरा पार्ट बॉक्स ऑफिस पर धमाल नहीं मचा सका. पहले पार्ट को समीर कार्णिक ने और दूसरे को संगीत सिवान ने डायरेक्ट किया था. अब लगभग 5 साल के बाद इसी सीरीज की तीसरी फिल्म यमला पगला दीवाना फिर से रिलीज हुई है. क्या यह फिल्म दर्शकों को हंसाने में कामयाब होगी. आइए जानते हैं आखिरकार कैसी बनी है यह फिल्म.

 

कहानी

फिल्म की कहानी पंजाब से शुरू होती है जहां वैद्य पूरन सिंह (सनी देओल) अपने भाई काला (बॉबी देओल) और दो बच्चों के साथ रहता है. पूरन सिंह का एक किराएदार भी है जिसका नाम जयवंत परमार (धर्मेंद्र) है. जो पेशे से वकील भी है. पूरन सिंह के पास वज्र कवच नामक आयुर्वेदिक दवा बनाने का फार्मूला है, जिसका काम कई पीढ़ियों से चलता आ रहा है. उस फार्मूले के पीछे मशहूर बिजनेसमैन माफतिया लग जाता है. कहानी में चीकू (कृति खरबंदा) की एंट्री होती है जो कि एक डेंटिस्ट है और सिलसिलेवार घटनाओं में उसकी मुलाकात पूरन सिंह और काला से होती है. कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब बिजनेसमैन माफिया अपनी तरफ से पूरण सिंह के ऊपर दवा का फॉर्मूला चोरी करने का केस करता है और कहानी पंजाब से गुजरात पहुंच जाती है. अंततः क्या होता है यह जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी.

 

 

कमजोर कड़ियां

फिल्म की कमजोर कड़ी इसकी कहानी है जो काफी आउटडेटेड सी नज़र आती है और बांध पाने में असमर्थ दिखाई देती है. सनी देओल-बॉबी देओल और धर्मेंद्र जैसे बड़े-बड़े कलाकार की अदाकारी कहानी की वजह से फीकी पड़ जाती है. डायरेक्शन भी काफी हिला डुला है. कहानी सुनाने का ढंग भी काफी डगमगाया सा है. इसकी रफ्तार धीमी है जो दुरुस्त की जा सकती थी. इसके अलावा फिल्म के गाने रिलीज से पहले हिट नहीं हो पाए हैं. फिल्म में और मसाला भरा जा सकता था. लेकिन ऐसा नहीं हो पाया.

 

जानिए आखिर फिल्म को क्यों देख सकते हैं

धरम पाजी, सनी देओल और बॉबी देओल, तीनों अभिनेताओं ने बढ़िया काम किया है. इसके साथ ही अभिनेत्री कृति खरबंदा ने भी कहानी के मुताबिक ही अभिनय किया है. फिल्म की सबसे बढ़िया बात इसके आखिर में आने वाले गीत में दिखाई देती है जब सलमान खान, रेखा, सोनाक्षी सिन्हा एक साथ धर्मेंद्र के गाने रफ्ता-रफ्ता पर थिरकते हुए नजर आते हैं. लेकिन कहानी कमजोर होने की वजह से हर एक परफॉर्मेंस काफी निराशाजनक दिखाई देती है.

 

बॉक्स ऑफिस

फिल्म का बजट लगभग 40 करोड़ रुपए बताया जा रहा है. इसे लगभग 2000 से ज्यादा स्क्रीन्स पर रिलीज किया जा रहा है. इसी के साथ फिल्म स्त्री भी रिलीज हो रही है. अब देओल परिवार के फैंस ही इस फिल्म को आगे ले जा सकते हैं.

 

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adminAugust 10, 20181min170

‘विश्वरूपम 2’. हिन्दी में पढ़ें तो ‘म’ हटालें. लिखने में फील नहीं आ रहा. इसके राइटर और डायरेक्टर दोनों ही कमल हासन हैं. इसका पहला पार्ट 2013 में आया था. लेकिन उसका फ्लैशबैक 2018 में भी चलता है. आपके दिमाग में भी और स्क्रीन पर भी. ये फिल्म देखते वक्त आप ये सोचते हैं कि कुछ चीज़ों को पहली ही छोड़ देनी चाहिए. क्योंकि जो दूसरी कमल हासन ने बनाई है, वो खुद में इतनी उलझी हुई है कि आपको कहीं लेकर नहीं जाती. इसे पिछली फिल्म का प्रीक्वल और सीक्वल दोनों कहा जा रहा है. इनकी कृपा और कहानी दोनों यहीं रुकी हुई है. ‘विश्वरूपम’ का पहला पार्ट काफी विवादों में रहा था. उसे कई देशों और अपने यहां कई राज्यों में नहीं लगने दिया गया था. कमल हासन के मुताबिक उन्हें उस फिल्म से तकरीबन 60 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था. अब इसी चक्कर में उन्होंने अपनी ‘टाइगर ज़िंदा है’ बना दी.

‘विश्वरूपम’ की एक कहानी के अंदर इतने सारे सब प्लॉट्स हैं कि मेन प्लॉट का ख्याल ही नहीं आता. लेकिन फिल्म में उसे बीच-बीच में लाकर आपको याद दिलाया जाता है. विसाम (कमल हासन) का मकसद पिछली फिल्म से लेकर अब तक बदला ही नहीं है. अब एक ही विलेन मारने के लिए आप दो फिल्म थोड़ी बना देंगे! वो भी एक ऐसे विलेन को मारने के लिए, जो कुछ दिनों में अपने आप ही मरने वाला है. ओमर (राहुल बोस) और विसाम के बीच, जो सीन्स अफगानिस्तान में घटते हैं, वो थोड़े पावरफुल हैं. क्योंकि उसमें वहां के माहौल में बढ़ रहे बच्चों का ज़िक्र आता है. उनकी मांओं का ज़िक्र आता है. वहां की महिलाओं का ज़िक्र आता है.

 

अल-कायदा का आतंकी ओमर अपने बेटे को भी जिहादी बनाना चाहते है, जबकि वो डॉक्टर बनना चाहता है.

 

फिल्म में कई सारे लूपहोल्स हैं, जो आसानी से आपकी नज़र में आ जाते हैं. जैसे फिल्म में एक सीन है, जहां शेखर कपूर का किरदार विसाम से कोड लैंग्वेज में बात कर रहा होता है. इसमें वो कोड-वोड को साइड कर एक इमोशनल सा डायलॉग मार देते हैं. ये उस समय तो बहुत चौंकाता है क्योंकि ये शेखर कपूर कर रहे होते हैं. फिर आपको याद आता है इनकी आखिरी फिल्म हिमेश रेशमिया की ‘तेरा सुरूर’ थी. फिर आप खुद को इस फिल्म के लिए तैयार कर लेते हैं. फिल्म में कहीं ऐसा नहीं होता कि आप अपने कुर्सी से बिलकुल चिपक गए हों या फिल्म में बिलकुल खो गए हों. क्योंकि ये किसी चीज़ को स्थापित करने में बहुत समय लेती है. विसाम और उसकी मां के बीच फिल्म में एक ही सीन है और वो तकरीबन पंद्रह मिनट लंबा है. लेकिन आप उस सीन में कुछ फील नहीं कर पाते. इन्हीं चक्करों में फिल्म की रफ्तार बहुत धीमी है.

फिल्म के जोक्स और डायलॉग्स अभी भी 2013 में ही हैं. बदला है तो बस कमल हासन का लुक. इस बार वो पूरी फिल्म में गाल पर बैंडेज चिपकाए दिखाई देते हैं. अगर अब तक वो ठीक नहीं हुआ, तो उन्हें एक बार डॉक्टर को दिखा लेना चाहिए. फिल्म में एक चीज़ बहुत सही है. वो है कैरेक्टर्स के लुक. वो पिछली फिल्म के पहले वाली कहानी (कमल हासन के फ्लैशबैक वाले हिस्सों में) में भी बिलकुल उस लुक में दिखाई देते हैं. इसकी एक वजह ये भी हो सकती है, इसकी शूटिंग पिछली फिल्म के दौरान ही कर ली गई थी. लेकिन ऐसी संभावनाएं कम ही होती हैं. ऐसे में बिलकुल सेम लुक देखने पर आपको कहानी में भटकाव नहीं लगता. इस चीज़ की तारीफ की जानी चाहिए.

 

फिल्म में रॉ एजेंट विजाम अहमद कश्मीरी के रोल में दिखाई देंगे कमल हासन.

 

फिल्म में दो महिलाएं हैं, जिन्हें ‘सशक्त’ दिखाया गया है. लेकिन वो अभी भी पति के पानी का गिलास पकड़कर खड़ी रहती हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि इन्हें सिर्फ सशक्त ‘दिखाने’ की कोशिश की गई है. ये महिलाएं हैं पूजा कुमार यानी विसाम की पत्नी निरुपमा और दूसरी उनकी साथी एजेंट अस्मिता सुब्रमण्यम यानी एंड्रिया जेरेमी. फिल्म में कमल हासन ने इतना एक्शन किया है कि देखकर सलमान खान को रश्क हो जाए. लेकिन इस उम्र में उन्हें इस तरह का एक्शन करते देखना कहीं भी खलता नहीं है. कमल हासन अपने किसी भी सीन में भारी नहीं लगते. इस फिल्म में कोई कैरेक्टर ऐसा किरदार निकलकर नहीं आता, जो आपको लंबे समय तक याद रहे. विसाम का किरदार आपको पहली फिल्म के चलते याद है.

 

फिल्म के एक सीन में कमल हासन और उनकी पत्नी निरुपमा का किरदार निभा रहीं पूजा कुमार.

 

फिल्म में बहुत सारे किरदार हैं, लेकिन उनके करने के लिए कुछ नहीं है. पिछली बार के ओमर और उसका सिपहसालार सलीम (जयदीप अहलावत) भी बिलकुल बेअसर रहते हैं. क्योंकि उनके किरदार भी इन्हीं सब-प्लॉट्स में उलझ जाते हैं. उन्हें कुछ नहीं करने के लिए आखिरी 10-15 मिनट मिलते हैं. फिल्म की एक समस्या ये भी है कि अगर किसी ने इसका पहला पार्ट नहीं देखा है, वो बिलकुल ही कंफ्यूज़ रहता है. क्योंकि विसाम का मिशन पिछली फिल्म का. फिल्म का विलेन पिछली फिल्म का. सारे किरदार पिछली फिल्म के. ऐसे में आदमी कंफ्यूज़ के अलावा और क्या हो सकता है.

पिछले दिनों एक अखबार में छपा था कि कमल हासन ने कहा है कि वो जल्दी ही एक्टिंग छोड़ देंगे. हमारी ओर से सर को गुज़ारिश है कि राइटिंग और डायरेक्शन के बारे में भी एक बार विचार कर लें. जोक्स अपार्ट (ऐसा बोलना पड़ता है), फिल्म में म्यूज़िक भी है और ठीक-ठाक है. एक गाना पूरी तरह से कृष्ण जी को समर्पित है, जो एक बेडसीन के दौरान बज रहा होता है. बाकी आपको याद नहीं रहते. सब मिलाकर बात ये है कि ‘विश्वरूपम 2’ निराश करती है. क्योंकि इससे उम्मीद थी.

 

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adminAugust 2, 20181min430

ऋषि कपूर और तापसी पन्नू स्टारर ‘मुल्क’ की कहानी सच्ची घटनाओं से प्रेरित है. रिलीज से पहले ही ये फिल्म चर्चाओं में आ गई थी.

फिल्म का नाम : मुल्क

डायरेक्टर: अनुभव सिन्हा

स्टार कास्ट: ऋषि कपूर, तापसी पन्नू, प्रतीक बब्बर, मनोज पाहवा, आशुतोष राणा, नीना गुप्ता, कुमुद मिश्रा, रजत कपूर

अवधि: 2 घंटा 20 मिनट

सर्टिफिकेट: U/A

रेटिंग:  4 स्टार

तुम बिन, रा-1, दस और तथास्तु जैसी फिल्में बना चुके निर्देशक अनुभव सिन्हा इस बार असल जिंदगी की कहानी पर आधारित फिल्म ‘मुल्क’ ले कर के आए हैं. ट्रेलर आने के साथ ही फिल्म का बज काफी बढ़ गया था. आइए जानते हैं आखिर कैसी बनी है यह फिल्म.

कहानी :

फिल्म की कहानी उत्तर प्रदेश के बनारस में रहने वाली एक मुस्लिम परिवार की है जिसके मुखिया मुराद अली मोहम्मद (ऋषि कपूर) हैं. कुछ ऐसी परिस्थितियां आती हैं जिसमें उनका बेटा शाहिद मोहम्मद (प्रतीक बब्बर) आतंकी गतिविधियों में लिप्त पाया जाता है. इसकी वजह से पूरे परिवार को समाज हेय दृष्टि से देखने लगता है. इस गलत व्यवहार की वजह से मुराद अली की बहू आरती मल्होत्रा (तापसी पन्नू), जिनका विवाह शाहिद के बड़े भाई से किया जाता है, वह परिवार के सम्मान के लिए कोर्ट में केस लड़ती हैं.

कोर्ट में आरती का सामना मशहूर वकील संतोष आनंद (आशुतोष राणा) से होता है. कहानी में बहुत सारे उतार-चढ़ाव आते हैं और अंततः एक ऐसे नोट पर वह खत्म होती है जो कि काफी दिलचस्प है. वह बिंदु क्या है इसका पता आपको फिल्म देख कर ही चल पाएगा.

 

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