सक्सेस स्टोरी

Capture.PNG2_.png

adminFebruary 13, 20191min40

क्या आप सोच सकते हैं कि एक छोटे से गांव से ताल्लुक रखने वाली 12वीं पास महिला, बिना किसी भारी निवेश के करोड़ों का बिज़नेस खड़ा कर सकती है? जी हां, तमिलनाडु की अरुलमोझी सर्वानन ने यह कारनामा कर दिखाया है और उनकी सफलता की कहानी का पूरा देश गवाह बन चुका है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मासिक तौर पर प्रसारित होने वाले अपने कार्यक्रम ‘मन की बात’ में 2017 में पहली बार अरुलमोझी की कहानी देश के साथ साझा की थी और सभी महिलाओं को उनसे प्रेरणा लेने का संदेश दिया था। इसके बाद भी कई बार प्रधानमंत्री मोदी अरुलमोझी की मिसाल दे चुके हैं।

अरुलमोझी तमिलनाडु के मदुरै ज़िले में स्थित उसिलामपट्टी कस्बे के पास एक गांव में पली-बढ़ीं। 12वीं कक्षा के बाद वह अपनी पढ़ाई जारी नहीं रख सकीं क्योंकि उनके परिवार की आर्थिक स्थिति इस बात की इजाज़त नहीं देती थी। एक साल घर पर ही बिताने के बाद 19 साल की उम्र में उनकी शादी कर दी गई।

जल्द ही, वह एक बच्चे की मां बन गईं और परिवार के साथ मदुरै में ही रहने लगीं। दो साल बाद, उनके घर एक बच्ची का जन्म हुआ और इसके बाद उन्होंने एक ट्रेनिंग कोर्स में दाखिला ले लिया। ट्रेनिंग पूरी होने के बाद भी उन्होंने नौकरी तलाश नहीं की क्योंकि उनका मानना था कि ऐसा करके वह अपने बच्चों के साथ अन्याय करेंगी और उन्हें पूरा वक़्त नहीं दे पाएंगी।

अरुलमोझी बताती हैं, “मैं ऐसे किसी काम की तलाश में थी, जिसके माध्यम से मेरे परिवार को आर्थिक रूप से सहयोग मिल जाए और मुझे काम के लिए बाहर भी न जाना पड़े। इस दौरान ही मैंने सरकार द्वारा संचालित ई-मार्केटप्लेस (GeM) के बारे में सुना। इस मार्केटप्लेस पर आमतौर पर उपयोग में आने वाले सामान और सुविधाएं मौजूद रहती हैं। मैंने ऑफ़िस प्रोडक्ट्स की सप्लाई के लिए इस प्लेटफ़ॉर्म पर रजिस्ट्रेशन कराया। मैंने अपने जे़वरों को गिरवी रखकर 40 हज़ार रुपए जुटाए और धीरे-धीरे सामान ख़रीदना शुरू कर दिया।” वह बताती हैं कि जीईएम पर रजिस्ट्रेशन तो बस पहला कदम था। इसके बाद जो इंतज़ार था, वह अरुलमोझी के काफ़ी चुनौतीपूर्ण साबित हुआ। करीब दो महीनों तक उन्हें एक भी ऑर्डर नहीं मिला, लेकिन उन्होंने धैर्य नहीं छोड़ा। इसका फल अरुलमोझी को मिला और उन्हें पहला ऑर्डर 10 स्टैंप पैड्स का मिला, जिसकी क़ीमत 243 रुपए थी।

शुरुआती तौर पर मिले ऑर्डरों और मुनाफ़े से उनकी हिम्मत में इज़ाफ़ा हुआ और उन्होंने अपने पोर्टफ़ोलियो में उत्पाद बढ़ाने पर विचार शुरू किया। इसके लिए उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा संचालित मुद्रा योजना का लाभ उठाते हुए बैंक से 50 हज़ार रुपए का लोन लिया। पैसे मिलने के बाद उन्होंने थोक बाज़ार से सामान ख़रीदना शुरू कर दिया। ऑफ़िस प्रोडक्ट्स के चुनाव के विषय में जानकारी देते हुए अरुलमोझी ने बताया कि इन उत्पादों में जोख़िम कम रहता है और इसलिए ही उन्होंने इन उत्पादों के साथ काम शुरू किया। अरुलमोझी अपने इस काम में अपने परिवार के 5 सदस्यों की मदद लेती हैं।

वह बताती हैं कि उन्होंने डिलिवरी के लिए इंडिया पोस्ट सर्विस का चुनाव किया क्योंकि यह सुविधा बेहद किफ़ायती होती है और साथ ही, देश के हर कोने तक इन पहुंच होती है। अरुलमोझी ने जानकारी दी कि उन्होंने हाल ही में लेह तक भी अपने सामान की डिलिवरी की है।

कुछ समय पहले उनके पास प्रधानमंत्री कार्यालय से 1,600 रुपए के एक थर्मस फ्लास्क का ऑर्डर आया। उन्होंने प्रधानमंत्री को धन्यवाद देते हुए एक पत्र लिखा और साथ में ऑर्डर भी भेजा। अपने पत्र में उन्होंने ज़िक्र किया कि किस तरह सरकार की योजनाओं ने उनकी मदद की और उनकी ज़िंदगी को बदलकर रख दिया। इसके बाद प्रधानमंत्री ने 2017 में मासिक रूप से प्रसारित होने वाले अपने कार्यक्रम मन की बात में अरुलमोझी और उनकी प्रेरणाप्रद कहानी का ज़िक्र किया। प्रधानमंत्री कार्यालय से जानकारी लेने के लिए उनके पास कॉल आया था और इस समय तक भी उन्हें इस बारे में कोई अंदाज़ा नहीं था। बाद में उन्होंने तमिल अख़बारों में इस बारे में पढ़ा और उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा

2017 के बाद से कई बार प्रधानमंत्री मोदी अरुलमोझी का जिक़्र कर चुके हैं। वह अक्सर महिला सशक्तिकरण की मिसाल के तौर पर अरुलमोझी का नाम लेते रहते हैं। अरुलमोझी की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक़, उनके एंटरप्राइज़ ने हालिया वित्तीय वर्ष में 1 करोड़ रुपए से भी अधिक का टर्नओवर कर लिया। छोटे-छोटे ऑर्डर से शुरू हुई यात्रा, अब लाखों रुपए के प्रोडक्ट्स की मांग तक पहुंच चुकी है। अरुलमोझी अपने व्यवसाय को इसी तरह से जारी रखना चाहती हैं और जल्द ही ऑफ़िस प्रोडक्ट्स के लिए एक मैनुफ़ैक्चरिंग यूनिट की भी शुरूआत करने की योजना बना रही हैं।

वह कहती हैं, “अगर आपके पास एक अच्छा बिज़नेस आइडिया है, लेकिन उसे शुरू करने के लिए आपके पास पर्याप्त पैसा नहीं है तो आपको हताश नहीं होना चाहिए। सरकार द्वारा कई अच्छी योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनके अंतर्गत बेहद सहजता के साथ आप लोन ले सकते हैं। अगर आपके अंदर अपने लक्ष्य को लेकर पूरी निष्ठा है और आप कड़ी मेहनत के लिए तैयार हैं तो आपको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता।”


best_android_apps-1280x720.jpg

adminFebruary 13, 20191min60

सीबी इनसाइट नाम की एक फर्म है जो दुनियाभर के स्टार्टअप्स को ट्रैक करती है। इस फर्म ने कई सारे डेटा का अध्ययन करते हुए 50 स्टार्टअप्स की एक लिस्ट तैयार की है जो आने वाले समय में बड़ा नाम बन सकते हैं और दुनिया के बड़े स्टार्टअप्स में शुमार हो सकते हैं। 

एयरवैलेक्स (Airwallex)

हॉन्गकॉन्ग का यह एक ऐसा स्टार्टअप है जो बिजनेस करने वाले लोगों को दुनियाभर में पैसा भेजने और इकट्ठा करने की सुविधा प्रदान करवाता है।

ऑल्टो फार्मेसी (Alto Pharmacy)

सैन फ्रांसिस्को का यह स्टार्टअप एक ऑनलाइन फार्मेसी है जहां ऑनलाइन दवाओं की खरीद फरोख्त की जा सकती है।

एम्प्लीट्यूड (Amplitude)

सैन फ्रांसिस्को का यह स्टार्टअप डिजिटल क्षेत्र में बिजनेस करने वाली कंपनियों के लिए ऐनालिटिक्स टूल डेवलप करता है।

बेइसेन (Beisen)

चीन की राजधानी बीजिंग से चलने वाला यह स्टार्टअप टैलेंट मैनेजमेंट और माप करने वाले टूल तैयार करता है।

बेंचलिंग (Benchling)

सैन फ्रैंसिस्को स्थित यह स्टार्टअप लाइफ साइंस रिसर्चर्स और कंपनियों के लिए सॉफ्टवेयर तैयार करता है।

बेटरक्लाउड (BetterCloud)

न्यू यॉर्क स्थित यह स्टार्टअप विभिन्न कंपनियों को साइबर सिक्यॉरिटी और क्लाउड सॉफ्टवेयर की सुविधाएं मुहैया करवाता है।

ब्लेंड (Blend)

गिरवी या लोन देने के लिए ऋणदाताओं के लिए कंज्यूमर लोन ऐप्लिकेशन सॉफ्टवेयर तैयार करता है।

ब्रेज (Braze)

न्यू यॉर्क का यह स्टार्टअप मोबाइल मार्केटिंग सॉफ्टवेयर तैयार करता है।

सी2एफओ (C2FO)

अमेरिका के लीवुड कनास इलाके में स्थित यह स्टार्टअप एक तरह का फाइनैंशियल सर्विस प्लेटफॉर्म है जो तमाम कंपनियों को पूंजी तक पहुंच संभव कराता है।

कारदेखो ग्रुप (CarDekho Group)

यह भारतीय स्टार्टअप राजस्थान की राजधानी जयपुर से संचालित होता है। यह ऑटो इंडस्ट्री से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराने के साथ-साथ ऑनलाइन सेल्स, फाइनैंसिंग, इंश्योरेंस जैसी सर्विस प्रदान करता है।

कारगोएक्स (CargoX)

ट्रांसपोर्टिंग कंपनियों को काम में सहूलियत के लिए ब्राजील का यह स्टार्टअप कई तरह की तकनीकें उपलब्ध करवाता है।

कार्टा (Carta)

सैनफ्रैंसिस्को स्थित यह स्टार्टअप इन्वेस्टर्स, फाउंडर्स और कर्मचारियों के लिए इक्विटी मैनेजमेंट की सर्विस उपलब्ध करवाता है।

चेकर (Checkr)

सैनफ्रैंसिस्को का यह स्टार्टअप कंपनियों को किसी भी कर्मचारी के लिए सारी जानकारी मुहैया करा के देता है।

सिटीमैपर (Citymapper)

लंदन का यह स्टार्टअप शहरों में ट्रांजिट और नेविगेशन ऐप की सर्विस देता है।

क्लियरटैक्स (ClearTax)

भारत में स्टार्टअप का गढ़ कहे जाने वाले बेंगलुरु की यह कंपनी टैक्स फाइल करने और इन्वेस्टमेंट को मैनेज करने से जुड़ी सारी जानकारी उपलब्ध कराती है। 

कॉन्टेंटफुल (Contentful)

बर्लिन का यह स्टार्टअप डिजिटल कॉन्टेंट तैयार करने के लिए सॉफ्टवेयर बनाता है।

डेलीहंट (DailyHunt)

बेंगलुरु से ही चलने वाला यह स्टार्टअप पहले न्यूजहंट के नाम से शुरू हुआ था। समाचारों और मनोरंजन की सुविधा उपलब्ध कराता है।

डेट्रियम (Datrium)

सनीवेल कैलिफॉर्निया में स्थित यह स्टार्टअप क्लाउड स्टोरेज की सुविधा उपलब्ध कराता है।

डीपमैप (DeepMap)

पेलो ऑल्टो कैलिफॉर्निया स्थित यह स्टार्टअप ऑटोनोमस गाड़ियों के लिए मैपिंग तकनीक विकसित करता है।

डेप्युटी (Deputy)

ऑस्ट्रेलिया की सिडनी में स्थित यह स्टार्टअप कंपनियों के लिए कार्यक्रम और टाइमशीट्स तैयार करने वाले सॉफ्टवेयर बनाता है।

डोमिनो डेटा लैब (Domino Data Lab)

कैलिफॉर्निया का यह स्टार्टअप डेटा का प्रबंध करने के लिए सॉफ्टवेयर बनाता है।

ईयरइन (Earnin)

पेलो कैलिफॉर्निया का यह स्टार्टअप छोटी अवधि के लिए लोन प्रोवाइड करवाता है।

एम्बार्क ट्रक्स (Embark Trucks)

सैन फ्रैंसिस्को का यह स्टार्टअप सेल्फ ड्राइविंग सेमी ट्रक्स बनाता है।

एक्सपेन्स (Expanse)

कैलिफॉर्निया का यह स्टार्टअप बड़े संस्थानों को इंटरनेट कनेक्टेड डिवाइसों के लिए सुरक्षा मुहैया करवाता है।

फेयरे (Faire)

सैनफ्रैंसिस्को का यह स्टार्टअप बुटीक और छोटे वेंडर्स के लिए व्होलसेल मार्केटप्लेस का काम करता है। 

फार्मर्स बिजनेस नेटवर्क (Farmers Business Network)

सैन कार्लोस कैलिफॉर्निया का यह एक ऐसा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म है जो किसानों को उपज बेचने की सुविधा देता है और साथ ही साथ डेटा एनालाइज करता है।

फ्लाइवायर (Flywire)

बोस्टन स्थित यह स्टार्टअप वैश्विक लेनदेन के लिए भुगतान सॉफ्टवेयर बनाता है।

फ्रंट (Front)

सैन फ्रैंसिस्को का यह स्टार्टअप ईमेल कॉलैबरेशन सॉफ्टवेयर बनाता है।

ग्लोसियर (Glossier)

न्यूयॉर्क का स्टार्टअप जो स्किन केयर और ब्यूटी प्रॉडक्ट तैयार करता है।

ग्रो मोबिलिटी (Grow Mobility)

मेक्सिको सिटी और साओ पाउलो ब्राजील का या स्टार्टअप डॉकलेस बाइक और स्कूटर सर्विस प्रोवाइड कराता है।

हैकरवन (HackerOne)

सैनफैंसिस्को का यह स्टार्टअप सॉफ्टवेयर की दिक्कतों को दूर करता है।

केआरवाई (KRY)

स्टॉकहोम, स्वीडन का यह स्टार्टअप मरीजों रो डॉक्टरों से सीधे सलाह देने की सुविधा उपलब्ध कराता है।

मैपबॉक्स (MapBox)

वॉशिंगटन और सैनफ्रैंसिस्को में स्थित यह स्टार्टअप भी मैपिंग टेक्नॉलजी से जुड़ा हुआ है।

मार्केटा (Marqeta)

ऑकलैंड कैलिफॉर्निया का यह स्टार्टअप भौतिक, आभासी या टोकन भुगतान कार्ड जारी करने के लिए भुगतान की बुनियादी सुविधाएं प्रदान करता है।

मेडबैंक्स नेटवर्क टेक्नॉलजी (Medbanks Network Technology)

बीजिंग का यह स्टार्टअप ट्यूमर के इलाज के लिए प्रणाली विकसित करता है।

मिआशोऊ डॉक्टर (Miaoshou Doctor)

गुआंगझाउ चीन का यह स्टार्टअप डॉक्टरों और मरीजों के बीच संवाद स्थापित करने में सहायता प्रदान करता है।

ऑनशेप (Onshape)

कैंब्रिज स्थित यह स्टार्अप मैन्युफैक्चरिंग के लिए क्लाउड बेस्ड डिजाइन और टूल्स विकसित करता है।

आउटरीच (Outreach)

सिएटल का यह स्टार्टअप सेल्स एंगेजमेंट प्लेटफॉर्म है।

प्रैक्टो (Practo Technologies)

बेंगलुरु स्थित यह स्टार्टअप भी मरीजों और डॉक्टरों के बीच संवाद स्थापित करने का काम करता है।

क्विंटोऐंडर (QuintoAndar)

ब्राजील के साओ पोलो का एक रिएल एस्टेट रेंटल प्लेटफॉर्म है।

रेजरपे (Razorpay)

ऑनलाइन मर्चेंट्स के लिए पेमेंट गेटवे की तरह काम करता है।

रिगअप (RigUp)

ऑस्टिन, टेक्सस में ऊर्जा के क्षेत्र में नौकरी खोजने वाले लोगों के लिए काम उपलब्ध करवाता है।

सेल्सलॉफ्ट (SalesLoft)

अटलांटा स्थित यह स्टार्टअप कंपनियों की सेल्स बढ़ाने का काम करता है।

सेगमेंट (Segment)

सैनफ्रैंसिस्को स्थित यह स्टार्टअप डेटा प्रबंधन करने में सहायता करता है।

सिसेन्स (SiSense)

न्यू यॉर्क स्थित यह स्टार्टअप डेटा से जुड़े सॉफ्टवेयर तैयार करता है।

सोन्डर (Sonder)

सैनफ्रैंसिस्को का यह स्टार्टअप अपार्टमेंट जैसे होटल की सुविधा खोजने में मदद करता है।

स्टैंडर्ड कॉग्निशन (Standard Cognition)

सैनफ्रैंसिस्को स्थित यह स्टार्टअप स्टोर्स के लिए आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस की सुविधा मुहैया कराता है।

अपग्रेड (Upgrade)

सैनफ्रैंसिस्को का यह स्टार्टअप भी लोन देने का काम करता है।

शिआंगवुशुओ (Xiangwushuo)

शंघाई में पुरानी चीजों को बेचने का एक प्लेटफॉर्म

जोला (Zola)

न्यू यॉर्क में शादी विवाह की योजना बनाने वाली कंपनी।


663.jpg

adminFebruary 6, 20191min160

कहते हैं कि जो वक्त के साथ कदम नहीं मिला पाता वो पीछे छूट जाता है। आज के दौर में यह बात हर किसी पर सटीक बैठती है। जिस तरह से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग जैसी चीजों का दौर आ रहा है उसे देखते हुए यही कहा जा सकता है कि दुनिया तेजी से बदलने वाली है। इस तेजी से बदलती दुनिया में बिजनेस की संभावनाएं भी बढ़ रही हैं और नए द्वार भी खुल रहे हैं। विजय राम कुमार ने तकनीक की मदद से ऐसा बिजनेस शुरू किया कि आज उनका टर्नओवर 25 करोड़ रुपये पहुंच गया है।

विजय ने 2012 में बेंगलुरु में ही डिजिटल एडवर्टाइजिंग के क्षेत्र में कदम रखा था। उनका मकसद अपने स्टार्टअप ‘ऑटोमेटेड’ की मदद से ई-कॉमर्स वेबसाइट्स समेत कंटेंट पब्लिशर्स की आमदनी बढ़ाने का था। यह आइडिया कुछ ऐसा था जिसमें सभी को फायदा होने वाला था। कंटेंट पब्लिशर्स वेबसाइट को ई-कॉमर्स वेबसाइट की मदद से पैसे कमाने और ट्रैफिक बढ़ाने का का मौका मिला। विजय की दस लोगों की टीम ने ऐसी तकनीक विकसित की जिसकी मदद से किसी वेबसाइट पर दिखने वाला सामान से मिलता जुलता सामान ई-कॉमर्स साइट प्लेटफॉर्म पर भी मिले। 

हालांकि विजय कहते हैं कि उन्होंने तकनीक तो बना ली थी, लेकिन अभी मार्केट उस हिसाब से तैयार नहीं हुआ था। उस वक्त पब्लिशर्स केवल एडवर्टाइजमेंट पर ही निर्भर रहते थे, इसलिए विजय का आइडिया उनके काम नहीं आया। उस वक्त विजय के पास 12 लाख रुपये थे। 2017 में वे न्यू यॉर्क चले गए। वे बताते हैं, ‘हमारा आइडिया प्रोग्रामेटिक एडवर्टाइजिंग में सेलेक्ट हुआ था। इसके बाद हमने आगे सोचना शुरू किया और डिजिटल मीडिया में ऐसे प्रॉडक्ट बनाने की कोशिश की जिससे कंटेंट पब्लिशिंग कंपनियां अपनी वेबसाइट की जगह को बेच सकें।’

 

ऑटोमेटेड कंपनी क्या करती है?

विजय की कंपनी ऑटोमेटेड तमाम वेबसाइट्स के साथ साझेदारी करती है और उनकी वेबसाइट की जगह के बदले अच्छा मुनाफा कमाने का जरिया प्रदान करती है। वेबसाइट की दुनिया में कई ऐसे टूल्स होते हैं जिनसे वेबसाइट पर क्लिक और इंप्रेशन पर असर पड़चा है। इन्हीं सब टूल्स पर ऑटोमेटेड काम करती है। विजय कहते हैं, ‘हमने एक फुल स्टैक एंटरप्राइज ग्रेड का सॉफ्टवेयर सॉल्यूशन बनाया है जिसे ऐड सर्वर में लगा दिया जाता है और फिर पब्लिशर्स के माध्यम से उसे ऑप्टिमाइज कर दिया जाता है। इससे वेबसाइट का ट्रैफिक बढ़ जाता है।’

अब चूंकि वेबसाइट्स के वैरिएबल बदलते रहते हैं इसलिए हर तीन महीने में नई जरूरतें सामने आती रहती हैं इसलिए हर पब्लिशसर्स को ऑटोमेटेड जैसी कंपनियों की जरूरत पड़ती है ताकि उनका सॉफ्टवेयर सही से मेनटेन रहे। ऑटोमेटेड के प्लेटफॉर्म की मदद से पब्लिशर्स की वेबसाइट अपना व्यापार और अच्छे से बढ़ा सकती है।

 

बाजार का दायरा

ईमार्केटर की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक प्राइवेट सेटअप्स की मदद से वेबसाइट के जरिए अच्छे पैसे कमाए जा सकते हैं। 2018 में अमेरिका में 46 बिलियन डॉलर बनाए गए जो कि पिछले साल की तुलना में 10 बिलियन डॉलर अधिक है। इसका मतलब अमेरिका में 82.5 प्रतिशत डिजिटल डिस्प्ले ऑटोमेटेड चैनल की मदद से चलता है। हालांकि भारत में डिजिटल एडवर्टाइजिंग का कारोबार सिर्फ 1 बिलियन डॉलर का है।

बीते पांच सालों में विजय की कंपनी ने कई सारे प्रॉडक्ट्स विकसित किए हैं जो कि 100 से अधिक कंटेंट पब्लिशर्स के लिए उपयोगी साबित हो रहे हैं। इनमें भारत के अलावा अमेरिका और यूके, स्वीडन के भी कंटेंट पब्लिशर्स शामिल हैं। ऑटोमेटेड ने 16 ग्लोबल एडवर्टाइजिंग एजेंसी के साथ टाइ अप किया है। सबसे खास बात ये है कि विजय की कंपनी शुरू से ही मुनाफा कमा रही है इसलिए उन्हें कभी किसी बाहरी स्रोत से फंड जुटाने की जरूरत नहीं पड़ी। 

हालांकि विजय कहते हैं कि फंड्स की मदद से वे अच्छे लोगों को टीम में शामिल कर सकते हैं। वे यह भी मानते हैं कि खुद के पैसों से स्टार्टअप खड़ा करने में काफी धैर्य और मेहनत की जरूरत पड़ती है, खासकर शुरुआती दिनों में। विजय कहते हैं कि मुनाफा कमाने और लंबे समय के लिए बिजनेस चलाने में किसी एक चुनना काफी कठिन फैसला है। वे यह भी मानते हैं कि तकनीक कभी भी बदल सकती है और हो सकता है कि एक ही महीने में उनका काम बर्बाद हो जाए।

बिजनेस इनसाइडर के मुताबिक फेसबुक और गूगल जैसी कंपनियां दुनिया भर का 62 फीसदी डिजिटल एडवर्टाइजिंग पर कब्जा रखती हैं। ऑटोमेटेड का रियल टाइम एडववर्टाइजिंग सिस्टम किसी भी पब्लिशर्स के साथ काम कर सकता है। इसकी तकनीक पूरे दुनिया में फैले पब्लिशर्स के साथ काम करती है। विजय कहते हैं, ‘हमारे पास ऐसा सिस्टम है जो कि सेकेंड्स भर के भीतर किसी भी वैरिएशन्स को कंट्रोल कर सकती है। हमारा डेटा एनालिटिक्स और रिपोर्टिंग सिस्टम पब्लिशर्स के रेवेन्यू को सही से मापता है।’

कंपनी के प्रतिद्वंद्वियों में BounceX, StackAdapt, Convertro, Segment, LiveRamp और Outreach जैसी कंपनियां शामिल हैं। हालांकि कंपनी ने अपने क्लाइंट्स के बारे में किसी भी जानकारी को साझा करने से इनकार कर दिया लेकिन उनका कहना है कि वे मार्केटके सबसे बड़े खिलाड़ियों के साथ काम करते हैं। विजय कहते हैं कि बीते चार साल से इस फील्ड में काम करने की वजह से उनके पास देश की सबसे बड़ी मीडिया कंपनियां जुड़ी हुई हैं। अब विजय भारत के बाहर भी अपना विस्तार करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। विजय ने बताया कि इस साल उनका रेवेन्यू 25 करोड़ पहुंचने वाला है।


amar1549344352894.jpg

adminFebruary 6, 20191min40

आज के जमाने में तकनीक इतनी विकसित हो गई है कि परीक्षाओं की तैयारी के लिए इंटरनेट एक अच्छा जरिया बन गया है। यूट्यूब पर ऐसे हजारों चैनल्स मिल जाएंगे जहां पर अलग-अलग विषयों के अध्यापकों के लेक्चर उपलब्ध हो जाते हैं। हालांकि हम आपको जिस अध्यापक की कहानी बताने जा रहे हैं वह 13 साल की उम्र में ही यूपीएससी की तैयारी करने वाले छात्रों को कोचिंग दे रहा है। 

तेलंगाना के एक छोटे से कस्बे मन्छेरियल के रहने वाले अमर सात्विक तोगिट्टी यूट्यूब पर ‘लर्न विद अमर’ (Learn with Amar) नाम से चैनल चलाते हैं और वहां वे सिविल सर्विस एग्जाम की तैयारी करवाते हैं। 13 साल के अमर ने आज से तीन साल पहले 2016 में इस चैनल की शुरुआत की थी। आज उनके चैनल पर 2 लाख से भी अधिक सब्सक्राइबर्स हैं।

अमर के पिता भी एक टीचर हैं और सरकारी स्कूल में पढ़ाते हैं। 9वीं क्लास में पढ़ने वाले अमर ने बताया कि उन्होंने अपने पिता से ही ये सारी ट्रिक सीखी हैं। इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए अमर ने कहा, ‘जब मैं पांचवी क्लास में था तभी से मुझे एटलस से खेलना अच्छा लगने लगा था। पापा ने मेरी रुचि देखते हुए मुझे भूगोल पढ़ाना शुरू कर दिया। एक बार मैं भूगोल को समझाने की कोशिश कर रहा था और मेरी मां ने उसका वीडियो रिकॉर्ड कर लिया। हमने उसे यूट्यूब पर अपलोड किया तो हमें काफी अच्छे रिस्पॉन्स मिले। उसके बाद से हमने नियमित तौर पर वीडियो बनाने शुरू किये।’

अमर ने भूगोल के कुछ मुद्दों पर वीडियो बनाए हैं जिनमें वे देशों, नदियों और पहाड़ों के नाम अच्छी तरह से याद रखने की ट्रिक भी समझाते हैं। अब वे अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान जैसे विषयों पर वीडियो बनाने की सोच रहे हैं। अमर कहते हैं कि किसी भी विषय को समझने और उस पर रिसर्च करने में दो सप्ताह लग जाते हैं और इसके बाद प्रैक्टिस करने के बाद ही वे इसे शूट करते हैं। अमर आगे चलकर यूपीएससी की परीक्षा पास करना चाहते हैं और देश को भ्रष्टाचार मुक्त बनाना चाहते हैं।  


paranarayan1549205451376.jpg.png

adminFebruary 5, 20191min60

जिंदगी में कितनी भी मुश्किलें आ जाएं, इच्छाशक्ति और कड़ी मेहनत करने वाले हमेशा विजय हासिल कर लेते हैं। 27 वर्षीय भारतीय पैरा एथलीट नारायण ठाकुर की जिंदगी किसी मिसाल से कम नहीं है। नारायण ने बीते साल 2018 में इंडोनेशिया में हुए पैरा एथलीट खेलों में भारत के लिए पहली बार स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। जन्म से ही शरीर के एक तरफ पक्षाघात से पीड़ित नारायण ने टी-35 वर्ग में होने वाली 100 मीटर रेस में स्वर्ण पदक जीता था।

नारायण ने यह रेस रिकॉर्ड 13.50 सेकेंड्स में पूरी की और एशिया में पहला स्थान प्राप्त किया। बिहार के रहने वाले नारायण की कहानी जितनी संघर्षपूर्ण है उतनी ही दिलचस्प भी है। बेहद गरीब परिवार से आने वाले नारायण जब 8 साल के थे तभी उनके पिता का देहांत हो गया था। इसके बाद उनका जीवन एक अनाथालय में बीता। बचपन से ही शरीर की नि:शक्तता से पीड़ित नारायण का हर वक्त मजाक उड़ाया जाता था। 

बीते दिनों को याद करते हुए वे कहते हैं,

‘स्कूल में सुबह जब बाकी बच्चों को प्रतियोगिता में पदक जीतने पर सम्मानित किया जाता था तो मेरे मन में भी कुछ करने की इच्छा उठती।’

 

नारायण देश के लिए पदक जीतने का सपना देखा करते। लेकिन शरीर की अक्षमता के कारण उनका यह सपना नहीं पूरा हो पा रहा था। उधर घर की हालत भी ठीक नहीं थी, इसलिए वे पान की दुकान चलाने लगे। पान की दुकान पर उन्हें रोज सुबह 5 बजे से लेकर रात 10 बजे तक काम करना पड़ता।

घर और अपना गुजारा चलाने के लिए नारायण को कई सारे काम करने पड़े। उन्होंने डीटीसी की बसों में क्लीनर से लेकर पेट्रोल पंप और होटल में वेटर के तौर पर भी काम किया। इतनी कड़ी मेहनत के बावजूद नारायण को ठीक पैसे नहीं मिलते थे। इसी दौरान एक मित्र की सलाह पर नारायण दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम जा पहुंचे। स्टेडियम तक पहुंचने में उन्हें तीन बसें बदलनी पड़ती थीं और चार घंटे सफर करना पड़ता था, लेकिन नारायण ने कभी हिम्मत से हार नहीं मानी।

2015 से लगातार वे दौड़ने का अभ्यास करते रहे। उन्होंने राज्यस्तरीय खेलों में 100 मीटर और 200 मीटर शॉटपुट प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल जीता। उन्होंने 2015 में ही नेशनल चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता। 2016 में उन्होंने T-37 वर्ग में नेशनल गेम्स में स्वर्ण पदक जीता और 2017 में चीन में होने वाली वर्ल्ड चैंपियनशिप के लिए भी क्वॉलिफाई किया। लेकिन चीन जाने से एक दिन पहले ही उन्हें मालूम चला कि इस सफर का सारा खर्च उन्हें खुद से उठाना पड़ेगा। उन्हें लगभग 1.5 लाख रुपयों की जरूरत थी।

नारायण ने अपने दोस्त और कोच की सहायता से किसी तरह 12 घंटे में 1.5 लाख रुपये इकट्ठा किए और चीन जा पहुंचे। लेकिन कुछ दिक्कतों की वजह से उन्हें भारत वापस लौटना पड़ा। इसके बाद 2018 में उन्होंने पैरा एशियन गेम्स के लिए क्वॉलिफाई किया और स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। उन्हें सरकार की तरफ से 1 करोड़ के पुरस्कार की घोषणा हुई। लेकिन इसी दौरान उनके पास एक मुसीबत आन पड़ी। 

एशियाड गेम्स के पहले नारायण गांधीनगर गए हुए थे जहां उनकी तबीयत खराब हो गई थी। उन्होंने कैंप के डॉक्टर से कुछ दवाएं लीं। उन्होंने डॉक्टर को बताया भी कि उन्हें कोई ऐसी दवाएं न दें जो नाडा या वाडा द्वारा प्रतिबंधित हों। नारायण ने कफ सिरप लिया था और अगले ही दिन उन्हें यूरिन सैंपल दिया। एशियाड गेम्स में पदक जीतने के एक ही दिन बाद नारायण को नाडा से ईमेल मिला कि उनका सैंपल डोप टेस्ट में पॉजिटिव आया है। इसके बाद उनको मिलने वाला अवॉर्ड होल्ड पर रख दिया गया।

नारायण हैरान रह गए थे क्योंकि उन्होंने डॉक्टर को पहले ही बताया था कि कोई प्रतिबंधित दवा न दें। इसके बाद नारायण से यह खिताब छिन जाने का खतरा मंडराने लगा। नारायण तुरंत गांधीनगर पहुंचे और उन्होंने डॉक्टर से लिखित में प्रूफ लिया और वापस दिल्ली आकर सारे दस्तावेजों को सबमिट किया। आखिरकार नारायण को सारे आरोपों से मुक्त किया गया। नारायण मानते हैं कि बाकी खेलों की तुलना में पैराएथलीट पर कम ध्यान दिया जाता है। वे चाहते हैं कि सरकार को इस पर ध्यान देने की जरूरत है। नारायण अब 2020 में टोक्यो में होने वाले ओलंपिक पर ध्यान दे रहे हैं।


prakashrao1548663651870.jpg.png

adminFebruary 1, 20191min50

वैसे तो दूसरों की मदद करने या समाज के लिए कुछ अच्छा करने की तमन्ना तो हर किसी के दिल में होती है। लेकिन अधिकतर लोग लायक बनने का इंतजार करते हैं। जैसे कुछ लोग सोचते हैं कि वे समाज सेवा तो करेंगे लेकिन नौकरी मिल जाने के बाद, करियर सेटल हो जाने के बाद, चिंतामुक्त हो जाने के बाद, इत्यादि। लेकिन सच्चाई यही है कि ऐसे लोग सिर्फ मौके के इंतजार में सारी जिंदगी गुजार देते हैं और जिन्हें समाज सेवा करनी होती है वो बिना संसाधनों के बल पर ही सब कर जाते हैं। ऐसे ही हैं ओडिशा के देवरापल्ली प्रकाश राव जिन्हें हाल ही में पद्मश्री अवॉर्ड से नवाजा गया। 

ओडिशा के कटक में बख्शीबाजार इलाके में चाय की दुकान चलाने वाले प्रकाश राव की कहानी बेहद दिलचस्प है। उम्र के 60वें पड़ाव पर पहुंच चुके प्रकाश अपनी छोटी सी चाय की दुकान से थोड़ी बहुत जो कमाई करते हैं उसे गरीब बच्चों की पढ़ाई में लगा देते हैं। वे अपनी आय से 80 बच्चों की मदद कर रहे हैं। इस उम्र में मदद का इतना बड़ा जज्बा रखने वाले प्रकाश हर रोज सुबह 4 बजे उठते हैं और दुकान के लिए सारी तैयारी करते हैं। वे रात 10 बजे तक दुकान पर ही रहते हैं।

प्रकाश गरीब बच्चों के लिए एक छोटा सा स्कूल चलाते हैं। उनकी दिलचस्पी हमेशा पढ़ने लिखने में ही रही लेकिन हालात की वजह से उन्हें चाय की दुकान खोलनी पड़ी। उनके पिता चाहते थे कि वह स्कूल जाने की बजाय खेती में उनकी मदद करें। इसलिए प्रकाश को दसवीं के बाद स्कूल छोड़ना पड़ा। इससे उन्हें अफसोस हुआ और आज वे गरीब बच्चों को पढ़ाकर अपने सपने को पूरे कोशिश कर रहे हैं।

पिता के देहांत के बाद प्रकाश को चाय की दुकान संभालनी पड़ी। उन्होंने कई सपने देखे थे जिन्हें उस मौके पर भूल जाना बेहतर लगा। लेकिन उनके भीतर हमेशा एक आग जलती रही। आखिरकार सन 2000 में उन्होंने अपने सपने को पूरा करने की ठानी और एक छोटा सा स्कूल खोला जिसका नाम रखा, ‘आशा ओ आश्वासन’, इस स्कूल में स्लम इलाके के बच्चों को प्रवेश मिला। इस स्कूल में बच्चों को सिर्फ तीसरी कक्षा तक पढ़ाया जाता है। इसके बाद उन्हें सरकारी स्कूल में दाखिल कर दिया जाता है।

इतना ही नहीं सात साल की उम्र से काम कर रहे राव बीमारी से पीड़ित होने के बावजूद भी किसी भी तरह की मदद के लिए कभी पीछे नहीं हटते। उन्होंने 1978 से करीब दो सौ बार रक्तदान किया और सात बार प्लेटलेट्स दान किए। इन्हीं सब वजहों से उन्हें बीते 25 जनवरी को देश के तीसरे सबसे बडे़ पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया। प्रधानमंत्री ने अपने मन की बात में भी प्रकाश की प्रशंशा की थी।


10-1.png

adminJanuary 29, 20191min40

एक बिजनेस प्लान, समय लेती फंडिंग, ग्राहकों से अकल्पनीय प्रतिक्रिया, और एक केन्द्रबिन्दु – ये पेपरफ्राई (Pepperfry) की आठ साल की यात्रा को परिभाषित करते हैं। आप में से बहुत से लोग यह नहीं जानते होंगे कि – ऑनलाइन फर्नीचर क्षेत्र में अग्रणी पेपरफ्राई (Pepperfry) ने फैशन और लाइफ स्टाइल पर ध्यान केंद्रित करते हुए ऑनलाइन मार्केटप्लेस के रूप में शुरुआत की थी। यह वह समय था जब अमेजॉन भारत में मौजूद नहीं था, और फ्लिपकार्ट को अपनी पकड़ बनाना बाकी था। ईबे (eBay) इंडिया में फिलीपींस, भारत, और मलेशिया के लिए बतौर कंट्री मैनेजर के रूप में एक दशक के अनुभव के साथ, बिक्री और संचालन की कमान संभाल रहे अंबरीश मूर्ति और आशीष शाह ने 2011 की शुरुआत में स्टार्टअप शुरू करने का फैसला किया था। दोनों के बीच व्यक्तिगत समझदारी काफी थी। 

शुरुआत में कई सारे लोग शामिल थे, जिसमें मार्केटिंग, तकनीक, फाइनेंस और एडमिन से जुड़े कुछ पूर्व सहयोगी थे। शुरू करने के एक सप्ताह के भीतर, उनके पास अपना काम स्थापित करने के लिए वरिष्ठ पेशेवरों सहित छह लोगों की एक टीम थी! हालांकि आशीष और अंबरीश ने शुरुआत में कुछ वीसी (Venture capital) से 5 मिलियन डॉलर के निवेश की मौखिक बात कर रखी थी। लेकिन, जल्द ही उन्हें महसूस होने लगा कि पूंजी (कैपिटल) के बिना कुछ भी संभव नहीं है। आशीष कहते हैं, “उसी साल अगस्त तक, हम बिना किसी ब्रांड नाम के 25 लोगों की टीम बन चुके थे।” हालांकि तब उनके पास निवेशकों से पैसे नहीं थे क्योंकि वीसी प्रक्रिया में समय लगता है। उस समय, आशीष और अंबरीश के पास केवल टर्म शीट थी, और उनकी लाइफ-सेविंग पहले से ही वे अपने उद्यम में निवेश कर चुके थे। 

तब इस उद्यमी-जोड़ी ने कुछ ऐसा किया, जिसके बारे में किसी ने सोचा भी नहीं होगा: वे अपनी पूरी टीम को गोवा के लिए छुट्टी पर ले गए। आशीष एक मुस्कान के साथ याद दिलाता हैं, ‘जून-अगस्त में सैलरी देने के बाद हमारे पास मुश्किल से 10 लाख रुपये बचे थे। इसलिए, हमने इस ट्रिप में सभी 25 लोगों को साथ ले लिया। भले ही हम पैसे खो रहे थे, लेकिन हम फन के लिए उस आखिरी मौके पर समझौता नहीं करना चाहते थे। वैसे भी आप और क्या कर सकते हो?”

चमकी किस्मत

जैसा कि किस्मत को मंजूर था, कुछ हफ्तों के भीतर, चीजों ने काम किया और पेपरफ्राई ने सीरीज-ए में 5 मिलियन डॉलर जुटाए। डेडिकेटेड और एक्टिव होकर, टीम वापस काम पर लग गई, और शुरूआत में उन्होंने सप्लाई बिल्ड करने पर ज्यादा ध्यान किया; जिसके बाद एक टीम पहले सोर्सिंग और कैटेगरी मैनजमेंट के लिए बनाई गई। मार्केटिंग की टीम छह महीने बाद बनी क्योंकि वह आपनी दुकान को पहले माल से भर लेना चाहते थे तभी वह प्रासंगिक होती। एक साल तक बैकएंड प्रोसेस के निर्माण के बाद, अगस्त 2012 में, पेपरफ्राई को अंततः ग्राहकों के लिए लॉन्च किया गया। 

आशीष को एक दिन पहले मिले सरप्राइज की याद आती है। वे कहते हैं, ‘थैंक्स टू एफिलिएटेड-बेस्ड प्रमोशन, हमें कुछ घंटों में ही 1,400 ऑर्डर मिल गए। हम इसकी बिल्कुल भी उम्मीद नहीं कर रहे थे; हमारी योजना छह महीने में प्रति दिन 40-50 ऑर्डर प्राप्त करने की थी! लेकिन लॉन्च के दिन, देर रात तक, हमारी वेबसाइट हाई ट्रैफिक के कारण क्रैश हो गई! पूरी पेपरफ्राई टीम को अपने सभी ग्राहकों को फोन करना पड़ा और उन्हें आश्वस्त करना पड़ा कि हमें उनका भुगतान मिल गया है और उनके ऑर्डर भेज दिए जाएंगे। हमारी आकांक्षाएं एक दिन में बदल गईं!’

 

पहले साल के लिए, टीम ने पोवाई (मुंबई) के रेनाइसेन्स (Renaissance) होटल में एक बिजनेस सेंटर खोला, जिसकी लागत प्रति दिन 4,500 रुपये थी। (को-वर्किंग स्पेस तब बहुत आम नहीं था।) हंसते हुए अंबरीश कहते हैं, “हायरिंग के लिए हमनें लोगों का इंटरव्यू कैफेटेरिया या होटल के लाउंज में किया था। एक बड़े होटल में लोगों को बुलाकर इंटरव्यू करने से हमें एक बड़ी कंपनी की छवि मिली।”

पेपरफ्राई का पहला फॉर्मल ऑफिस 2012 में कोहिनूर कॉमर्शियल कॉम्पलैक्स खोला गया। ये एक 25-सीटर था। आशीष याद करते हैं, “अधिकांश लोग उस समय स्टार्टअप को लेकर उलझन में थे और जोखिम लेने के लिए तैयार नहीं थे, हालांकि हमने जल्दी डिपोजिट करने का वादा किया था। हम तेजी से बढ़ रहे थे, और पांच महीनों के भीतर, हम उस ऑफिस के बगल में भी स्पेस किराए पर लेने में सक्षम थे जोकि हमारे लिए जरूरी भी था। सच कहें तो, हमने पूरा ऑफिस एक करने के लिए बीच में बनी दीवार को तोड़ दिया और ग्राफिक पेंटिंग का रूप देने के लिए हमने इसे अधूरा ही छोड़ दिया।” पेपरफ्राई अभी भी उस स्पेस का मालिक है।

 

दोबारा शुरूआत

2013 की शुरुआत में, आशीष और अंबरीश ने फर्नीचर और होम की दुनिया में कदम रखा। क्योंकि होरिजेंटल एक्सपेरीमेंट से लाभ नहीं मिल रहा था। दूसरी ओर, फर्नीचर कैटेगरी से काफी हद तक लाभ मिल रहा था – इसमें लगभग 45 प्रतिशत मार्जिन मिलता है और ग्राहक छूट भी ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं होती। अंबरीश ने स्वीकार किया कि “बतौर उद्यमी उनके लिए यह एक बड़ी कॉल थी।” शुरुआत में पेपरफ्राई ने एक दिन में अपने बिजनेस का 35 प्रतिशत तक मुनाफा छोड़ा। वे कहते हैं, “हमने विक्रेताओं से बात की और जो भी पैसा उनका हम पर था, हमने उन्हें दे दिया। हमने ग्राहकों को ट्रांसफॉर्मेशन के बारे में भी ईमेल किए। हमारे टार्गेट बदल गए, हमारी विकास दर बदल गई; लेकिन हमारे निवेशकों ने हमारे फैसले का समर्थन किया और ग्राहकों ने भी हमें बहुत अच्छी प्रतिक्रिया दी।”

बेशक, वे ऑनलाइन फर्नीचर बिजनेस के शुरुआती दिन थे। ग्राहक अक्सर शिकायत करते थे कि उन्हें सेकेंड हैंड पीस मिलता है, और टीम को यह समझाने में काफी दिक्कत आती थी कि यह एक विंटेज कलेक्शन होता है। आशीष का कहना है कि उन्होंने इस पर खुद ग्राहकों से बात की है। वे कहते हैं, “मैंने एक ग्राहक को समझाया कि हम वास्तव में आइटम को धूप में रखते हैं और फर्नीचर पर सही लुक पाने के लिए पेंट को छीलते हैं। इसके बाद भी, वे चाहें तो इसे रिजेक्ट या रिटर्न कर सकते हैं। कुल मिलाकर, हमें अपने ग्राहकों को एजुकेट करना था, उन्हें यह समझाना था कि जो आप हमारी वेबसाइट पर देखते हैं वही प्रोडक्ट हम आपको देते हैं।”

टीम के लिए डिलीवरी एक और समस्या थी। वे कहते हैं, “कूरियर पार्टनर हमारी डिलीवरी को ग्राहक के टॉप फ्लोर पर नहीं ले जाते; वे इसे बिल्डिंग के बेसमेंट में ही छोड़ देते थे। इससे फर्नीचर को नुकसान भी हो सकता है। इसलिए, अप्रैल 2013 में, हमने अपने फर्नीचर डिलीवरी एक्सपीरेंस को कंट्रोल करने के लिए 10 ट्रक लिए। अब हमारे पास लगभग 400 ट्रक हैं। इससे फायदा ये हुआ कि हमें अब एक प्रतिशत से भी कम नुकसान होता है।

 

eBay से मिला सबक

चाहे वह एक ऑपरेटिंग रिदम हासिल करना हो या एचआर आस्पेक्ट को बिल्ड करना, ईबे ने इन दोनों को बहुत कुछ सिखाया। शुरुआती दिनों से, उन्होंने पेपरफ्राई की वीकली प्रोग्रेस को ध्यान से देखा, बाधाओं और उनके समाधानों का पता लगाया और शुक्रवार को हर टीम से वीकली प्लान लेते थे। सीएक्सओ हर 15 दिनों में मीटिंग करते थे। वे कहते हैं, “यह सब कंपनी को चलाने के लिए एक स्ट्रक्चर तैयार करने में मदद करता है। हमारे यहां कल्चर इन्टेंसिटी और अनुशासन का था जिसे हमने बहुराष्ट्रीय कंपनियों से सीखा था। हम मीटिंग कभी नहीं छोड़ते। हम हमेशा अपनी टीम को प्रेरित करने के लिए उत्सुक थे, और यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि वे क्या कर रहे हैं।” 2013 में एक समय, उनकी फंडिंग खत्म सी हो गई थी। अंबरीश याद करते हैं कि कैसे टॉप मैनेजमेंट में शामिल 15 लोगों ने अपनी सैलरी का 50 प्रतिशत हिस्सा अनिश्चित काल के लिए कटौती करने का फैसला किया ताकि उन्हें जूनियर स्तर पर लोगों को छोड़ना न पड़े। वे सभी 15 लोग अभी भी पेपरफ्राई के साथ हैं।

यह स्टार्टअप पिछले आठ वर्षों में लगभग 200 मिलियन डॉलर कमाने में कामयाब रहा है। पेपरफ्राई के संस्थापकों का मानना है कि अगर आपको लगता है कि आपके पास सही रणनीति है, तो आपको इसे नहीं बदलना चाहिए। अंबरीश कहते हैं, “नाम, कैटलॉग और बिजनेस मॉडल पर सभी का अपना प्वाइंट ऑफ व्यू होता है। लेकिन आप खुद अपने बिजनेस के सबसे करीब हैं।” फिलहाल आठ साल बाद भी पेपरफ्राई टीम – जो अब 500 लोगों की हो गई है – हर अगस्त में गोवा की ट्रिप करती है। अंबरीश और आशीष के लिए, यह पेपरफ्राई फैमिली की संस्कृति को परिभाषित करता है।


Xelp-21548572319686.png

adminJanuary 28, 20191min80

एंड-टू-एंड टेक्नोलॉजी सॉल्यूशंस और सपोर्ट प्रोवाइडर Xelpmoc Design and Tech Limited ने 23 जनवरी को अपना इनिशियल पब्लिक ऑफरिंग (IPO) खोला और 25 जनवरी को बंद कर दिया। इसका मूल्य दायरा 62-66 रुपये तय किया गया। इसके जरिए कंपनी ने 10 रुपये के फेस वैल्यू पर 23 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा। योरस्टोरी के साथ बातचीत में, Xelpmoc Design and Tech Limited के सह-संस्थापक, संदीपन चट्टोपाध्याय ने कहा कि फंड की बढ़ोत्तरी पर्याप्त बुनियादी ढाँचे की स्थापना में इस्तेमाल होगी, हैदराबाद में कंपनी को अपनी पकड़ बनाने में मदद करेगा, और इससे कोलकाता में उनके पास जो कुछ भी है उसे बढ़ाएँगे। 

उन्होंने कहा, “हम कुछ वर्किंग कैपिटल और कुछ जनरल मैनेजमेंट पार्ट के लिए भी फंड का उपयोग करेंगे।” Xelpmoc के प्रमुख निवेशक काफी सॉलिड हैं जिनमें वाशिंगटन यूनिवर्सिटी चाणक्य कैपिटल पार्टनर्स और नोट्रे डेम डीयू एलएसी विश्वविद्यालय शामिल हैं। संदीपन कहते हैं, “ये दीर्घकालिक, ठोस फंड हैं और हमको खुशी है कि उनकी रुचि हममें है।”

कंपनी की रणनीति और विजन के बारे में बात करते हुए, संदीपन कहते हैं, “हम कॉर्पोरेट, सरकार और स्टार्टअप्स के स्पेक्ट्रम में इनोवेशन को बढ़ावा देने के व्यवसाय में हैं। अब जबकि स्टार्टअप्स के साथ काम सबसे अधिक दिखाई देता है इसलिए हम मानते हैं कि सरकार और कॉरपोरेट्स भविष्य में हमारे लिए एक मजबूत प्ले के तौर पर होंगे और साथ ही हम ऐसे बाजारों में भी काम करेंगे जो अपने समाधान के लिए नई तकनीक पर भरोसा कर रहे हैं।” उन्होंने कहा कि उनके लिए बाजार क्षमता बहुत बड़ी है।

Xelpmoc के इक्विटी शेयर मुख्य BSE बोर्ड और NSE पर सूचीबद्ध हैं। तीन साल पुरानी बूटस्ट्रैप तकनीक कंपनी के लिए यह वास्तव में खुशी का पल है। संदीपन कहते हैं, “हम क्लासिकल, प्रोफिट स्टोरी नहीं हैं जो पब्लिक में जा रहे हैं।” उन्हें उम्मीद है कि इससे कंपनी को बूस्ट मिलेगा और पूरे स्टार्टअप इकोसिस्टम को उत्प्रेरित करेगा। हालांकि उन्हें लगता है कि वे अपने मूल्यांकन से बड़ा लाभ उठाएंगे। उनका मानना है कि यह उनके लिए भविष्य में आगे बढ़ने का एक तरीका है। वे कहते हैं, “वर्तमान में, आईपीओ के लिए जाना स्टार्टअप्स के फंडिंग मॉडल से पूरी तरह बाहर है। हम स्टार्टअप्स के साथ काम करते हैं। हालांकि एक बार इस तरह के बिजनेस मॉडल के अस्तित्व में आने के बाद, स्टार्टअप के विदेशी विचारों पर निर्भरता को चुनौती दी जाएगी।”

ऐसा नहीं है कि वीसी फंड्स की जरूरत नहीं है, है लेकिन अब यह जरूरत 100 प्रतिशत नहीं हो सकती। उन्होंने कहा, “बहुत सारे घरेलू आइडियाज को फंडिंग की कमी के कारण सपोर्ट नहीं मिलता है। जबकि यह प्रौद्योगिकी के लिए आवश्यक और महत्वपूर्ण लागत है।” उनका मानना है कि उनका व्यवसाय मॉडल उस प्रकार (घरेलू) के व्यवसायों में मदद करने की कोशिश करता है। संदीपन आगे कहते हैं, “इस प्रकार, जब हम उन व्यवसायों की मदद करने वाले सार्वजनिक बाजार में होते हैं, तो वे अप्रत्यक्ष रूप से बाजार से समर्थन प्राप्त करना शुरू कर देते हैं। एक अच्छी स्टोरी और एक अच्छा व्यवसाय मॉडल होने पर मार्केट में पर्याप्त अवसर हैं।”

जैसा कि कहा जाता है कि वीसी स्टार्टअप स्टोरी को कंट्रोल नहीं कर सकते, संदीपन कहते हैं कि वे सर्वश्रेष्ठ बुनियादी ढांचे के समर्थन में हैं। वे कहते हैं, “एक स्थिर स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र में, केवल 15 प्रतिशत स्टार्टअप को वीसी फंडिंग होनी चाहिए। लोग केवल आंकड़ों के दूसरे पक्ष को देखते हैं कि 11 प्रतिशत कंपनियां ही सीरीज बी से आगे निकलती हैं, लेकिन वे दूसरी तरफ नहीं देखते हैं कि यदि आप सफलता को चार-पांच तिमाहियों के लिए इबिटा (EBITA) पोजटिव मानते हैं, तो लगभग 15 प्रतिशत कंपनियों ही हैं जो फंडेड हैं। बाकी 85 प्रतिशत वे हैं जो खुद से विकसित हुई हैं।”

Xelpmoc अब अगले 500 मिलियन भारतीयों के लिए समाधान पर ध्यान केंद्रित कर रही है। संदीपन कहते हैं, “हम मानते हैं कि लंबे समय तक टेक और नॉनटेक के रूप में विभाजित कंपनियों का अस्तित्व नहीं होगा। हर कंपनी के पास एक मूलभूत स्तंभ के रूप में तकनीक होगी और आप तकनीक का कितना लाभ उठाने में सक्षम हैं, यह निर्धारित करेगा कि कंपनी लाभदायक होगी या नहीं।”


girls-in-the-classroom1547979961464.png

adminJanuary 21, 20191min70

हरियाणा में निजी स्कूलों की ओर भागते बच्चों को वापस सरकारी स्कूलों की तरफ मोड़ने की शिक्षा विभाग की मुहिम तो रंग दिखा ही रही है, इसमें शोभा कंवर और रेहाना चिश्ती जैसी दो शिक्षिकाओं की पहल भी मिसाल बन रही है, जिनका दावा है कि वह बच्चों को सिर्फ पढ़ाती ही नहीं, गणित और पेंटिंग के नवाचार से नन्हे-नन्हे छात्रों सरलता से पढ़ना सिखाती भी हैं। अब अगले महीने इन दोनों महिला टीचरों का कुरुक्षेत्र में सम्मान होने जा रहा है। 

राज्य में पिछले पांच वर्षों में करीब 5.94 लाख बच्चों ने सरकारी स्कूलों से मुंह मोड़ लिया था। इसके तहत वर्ष 2012-13 में जहां सरकारी स्कूलों में पहली से बारहवीं कक्षा तक कुल 27.29 लाख बच्चे थे, वहीं यह आंकड़ा 2016-17 में 21.34 लाख पर सिमट गया। अकेले वर्ष 2015-16 में ही पौने चार लाख से अधिक बच्चे सरकारी स्कूलों को अलविदा कर गए। बच्चों का पलायन रोकने के लिए शिक्षा विभाग ने सर्व शिक्षा अभियान, एसएसए और राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के सहयोग से प्लान तैयार किया। स्मार्ट क्लास, ज्वायफुल डे, अंग्रेजी मीडियम से पढ़ाई, लर्निंग लेवल टेस्ट सहित कई कदम उठाए गए। 

इसके बाद बीते सत्र में प्राथमिक स्कूलों में जहां आठ हजार बच्चे अधिक आए, वहीं नौवीं से बारहवीं तक 18 हजार अधिक बच्चों ने सरकारी स्कूलों में दाखिला लिया। हालांकि छठी से आठवीं तक के करीब बीस हजार बच्चे सरकारी स्कूल छोड़ भी गए। इस तरह बीते सत्र में 6250 अधिक बच्चों ने सरकारी स्कूलों में दाखिला लिया। चालू शिक्षा सत्र में भी बच्चों की संख्या में इजाफा होता जा रहा है।

हरियाणा के बरूंधन सीनियर सैकंडरी स्कूल की शिक्षिका शोभा कंवर का स्लोगन है-मैं बच्चों को पढ़ाती नहीं, सिखाती हूं। उनके बनाए गणित के मॉडल डाइट में गणित लेब रखे, जो भावी शिक्षकों पढ़ाने के काम आ रहे हैं। उन्होंने 33 जिलों के नाम को चुटकियों में याद करने की कला विकसित की है। सात साल पहले उन्होंने लेपटॉप से पढ़ाना प्रारंभ कर दिया था। गीतों के माध्यम से गिनती-पहाड़े-गणित के कठिन सवालों को चुटकियों में हल करना बच्चों को सिखाती हैं। उनके द्वारा गठित मीना मंच की छात्राओं ने विधानसभा चुनाव में 1135 लोगों को जागरूक कर मतदान कराया। कक्षा में बोलती तस्वीर बनाई, जिससे देखकर बच्चे सहज ही पशु पक्षियों व जानवरों के नाम याद कर सकते हैं। बच्चों को खेल-खेल में सिखाना इनकी खूबी बन चुकी है।

इसी तरह धनवा मिडिल स्कूल की शिक्षिका रेहाना चिश्ती नवाचार की पॉजिटिव ऊर्जा फैला रही है। ब्लैक बोर्ड पर प्रतिदिन प्रेरणादायक चित्र और नया संदेश बच्चों में पढ़ाई में नई ऊर्जा भर देता है। बचपन के पेंटिग के शौक को 1997 में सरकारी सेवा में आने के बाद शिक्षा देने में पूरा किया। पिछले तीन साल से उनके द्वारा एन ए का टाइम टेबल बनाया जा रहा है, जो पूरे प्रदेश में उपयोग लिया जा रहा है। ड्राइंग और पिक्चर स्टोरी के माध्यम से बच्चों को शिक्षा से अनवरत जोड़ने का कार्य किया जा रहा है। बच्चों को पेंटिंग, गीत-संगीत और कविताओं के माध्यम से शिक्षा में नवाचार किया जा रहा है। पेंटिग के माध्यम से पढ़ाना सोशल मीडिया पर चर्चा में रहा, जिससे प्रेरणा लेकर हरियाणा, दिल्ली के शिक्षक उपयोग में ले रहे हैं।

सरकारी स्कूलों में शिक्षा में नए प्रयोग करने में सीनियर सैकंडरी स्कूल बरूंधन की शिक्षिका शोभा कंवर और मिडिल स्कूल की शिक्षिका रेहाना चिश्ती आगे रही हैं। शिक्षिका शोभा को शिक्षा में नवाचार के लिए स्टेट मोटिवेटर व शिक्षिका रेहाना को नेशनल मोटिवेटर बनाया है। निजी स्कूलों से बेहतर शिक्षा सरकारी स्कूल में मिले, इसके लिए वे नए प्रयोग करती रही हैं। ये दोनों देश-प्रदेश के लोगों को नवाचार के लिए प्रशिक्षित करेंगी। स्कूल में बच्चों को अपनी कक्षा में खुशनुमा माहौल देकर पढ़ाने की मिसाल बनीं दोनों शिक्षिकाएं हरियाणा के कुरुक्षेत्र में दो और तीन फरवरी को सम्मानित की जाएंगी। सरकारी स्कूलों की शिक्षा को एकमात्र सर्वोत्तम विकल्प के रूप में स्थापित करने के लिए नवोदय क्रांति परिवार यह समारोह कर रहा है। इसमें दोनों शिक्षिकाएं 15 राज्यों से आने वाले शिक्षकों के बीच अपने पढ़ाने के तरीकों को साझा करेंगी।

शिक्षा मंत्री रामबिलास शर्मा का कहना है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षा के स्तर में सुधार और सुविधाओं में इजाफे से बच्चों की संख्या फिर से बढऩे लगी है। पिछले कुछ वर्षों में छात्र संख्या में गिरावट की वजह ऑनलाइन सिस्टम है जिससे फर्जी एडमिशन बंद हो गए। एक ही बच्चे का सरकारी और प्राइवेट दोनों स्कूलों में दाखिले का फर्जीवाड़ा हमने बंद किया है। पिछले पौने चार साल में सरकारी स्कूलों की स्थिति में तेजी से सुधार हुआ है।


ewaste1547449671567.png

adminJanuary 15, 20191min60

भारत में इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों की पहुंच घर-घर तक हो गई है। लेकिन तकनीक हमेशा दोधारी होती है और वह अपने साथ कोई मुश्किल जरूर छिपाए होती है। आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों के साथ भी ऐसा ही है। जब तक ये हमारे घरों में रहते हैं हमें लगता है कि जिंदगी कितनी आसान हो गई है, लेकिन जैसे ही ये खराब होते हैं और काम करना बंद कर देते हैं, इन्हें हम उठाकर कबाड़ वाले के हाथ में दे देते हैं। क्या कभी आपने सोचा है कि इन खराब उपकरणों का क्या होता होगा? 

इस कबाड़ को अंग्रेजी में ई-वेस्ट कहते हैं। ई-वेस्ट का पर्यावरण पर काफी बुरा प्रभाव पड़ता है। सबसे ज्यादा नुकसान उनको पहुंचता है जो इस ई-वेस्ट को छांटने का काम करते हैं। हरियाणा के उद्यमी राज कुमार जब आईटी सेक्टर में काम कर रहे थे तो उनकी नजर में ई-वेस्ट की समस्या आई। वे कहते हैं, ‘2018 में भारत में ई-वेस्ट का आंकडा तीस लाख मीट्रिक टन का था और देश में सिर्फ 5 फीसदी ई-वेस्ट को रिसाइकिल करने की क्षमता है।’

इस समस्या को देखते हुए राजकुमार (38) के मन में एक आइडिया आया। उन्होंने सोचा कि क्यों न एक रिसाइकिल यूनिट शुरू किया जाए जहां ई-वेस्ट का कोई उपाय किया जा सके। वे कहते हैं, ‘मैं अपने समाज और पर्यावरण के लिए काम करना चाहता था। इसलिए मैंने 2013 में राजस्थान के खुशखेड़ा में देशवाल ई-वेस्ट रिसाइक्लर नाम से एक कंपनी शुरू की।’ केंद्र सरकार ने 2010 में ई-वेस्ट को लेकर एक नीति तैयार की थी उससे भी राज कुमार को काफी प्रेरणा मिली। उन्होंने कंपनी में खुद के पैसे लगाए। 

राजकुमार ने मानेसर में बड़े पैमाने पर रिसाइक्लिंग यूनिट स्थापित की। दोनों यूनिटों में प्लास्टिक, बैट्री, और भी कई प्रकार के ई वेस्ट को रिसाइक्लिंग करने का काम शुरू हो गया। तब से लेकर अब तक राज कुमार अपनी कंपनी में 15 करोड़ रुपये का निवेश कर चुके हैं। 2018-19 का उनका टर्नओवर करीब 23 करोड़ होने की उम्मीद है। उनकी कंपनी ने अब तक लगभग 1,000 मीट्रिक टन ई-वेस्ट को रिसाइकिल कर चुकी है और 2019 से हर साल 500 मीट्रिक टन ई-वेस्ट को रिसाइकिल करने का लक्ष्य रखा गया है। राज कुमार बताते हैं कि उनकी कंपनी स्वच्छ भारत अभियान के सपने को साकार कर रही है। 

 
दुनिया में कम ही लोग कुछ मज़ेदार पढ़ने के शौक़ीन हैं। आप भी पढ़ें। हमारे Facebook Page को Like करें – www.facebook.com/iamfeedy


Contact

CONTACT US


Social Contacts



Newsletter