सक्सेस स्टोरी

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adminApril 8, 20191min00

2018 में संयुक्त राष्ट्र की इंटरगवर्नमेंटल पैनल क्लाइमेट चेंज की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक तापमान को नियंत्रित करने के लिए हमारे पास केवल 12 साल हैं। यदि हम ऐसा करने में विफल रहते हैं तो परिणाम भयावह होंगे, क्योंकि उच्च तापमान से अत्यधिक गर्मी, समुद्र का जल स्तर बढ़ना, अकाल और बाढ़ जैसी स्थिति का सामना करना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में धरती पर हम इंसानों का अस्तित्व बचा रह पाएगा, इस पर संदेह है। एक तरह से कहें तो अगर हम समय पर नहीं चेते तो हमारा विनाश तय है।

इस पृथ्वी को बचाने के लिए भारत सहित दुनिया के कई राष्ट्रों ने स्वच्छ ऊर्जा को अपनाने के साथ-साथ हरित आवरण को बढ़ाकर अपने कार्बन उत्सर्जन में कटौती करने के लक्ष्य निर्धारित किए हैं। वर्तमान में भारत में कुल 24.4 प्रतिशत का हरित आवरण है, और इसे बढ़ाकर 33 प्रतिशत करने की योजना है। सरकार के अलावा, कई एनजीओ और व्यक्ति भी इसमें योगदान देने के लिए आगे आए हैं। इनमें 48 वर्षीय राधाकृष्णन नायर भी शामिल हैं जिन्होंने अब तक छह लाख से अधिक पेड़ लगाए हैं। खास बात यह है कि उन्होंने ये सारा काम अपने बूते किया है।

राधाकृष्णन गुजरात में उमरगाम अपैरल वेलफेयर एसोसिएशन के संस्थापक अध्यक्ष हैं। उन्होंने 2017 में महाराष्ट्र सरकार द्वारा वसुंधरा पुरस्कार जैसे कई प्रशंसा और पुरस्कार अर्जित किए। उन्होंने राजस्थान, गुजरात, बंगाल और छत्तीसगढ़ सहित सात राज्यों में 40 के जंगलों को संवारा है। तो यह सब कैसे शुरू हुआ? राधाकृष्णन शुरू से ही पर्यावरण को बचाने के लिए इतने गंभीर नहीं थे। शुरू में वे बस अपना बिजनेस चलाते थे और आदिवासी समुदाय के उत्थान के लिए काम करते थे। राधाकृष्णन श्री पूर्णिका एक्सपोर्ट नाम से कंपनी चलाते हैं।

पेड़ों के साथ राधाकृष्णन की कोशिश छह साल पहले शुरू हुई जब उन्होंने देखा कि गुजरात में एक सड़क परियोजना के लिए लगभग 175 पेड़ काटे जा रहे हैं। उन्होंने द न्यूज मिनट को बताया, ‘मैंने एक पार्टनर के साथ जमीन का एक टुकड़ा खरीदा और हमने वहां 1,500 पेड़ लगाने के लिए अकीरा मियावाकी की जापानी पद्धति का उपयोग करने का फैसला किया। अकीरा एक जापानी वनस्पतिशास्त्री हैं जो बंजर जमीनन पर देशी जंगलों को बहाल करने के अपने तरीकों के लिए जाने जाते हैं।

अकीरा के तरीके को जानने के लिए राधाकृष्ण और उनके साथी ने जापानी टीम संपर्क किया जो उन्हें इस विधि को बताने के लिए भारत आई। राधाकृष्णन ने अपना पहला जंगल उम्बरगाँव, गुजरात में एक एकड़ भूमि पर लगाया। यह जंगल जल्द ही फलने लगा इससे महाराष्ट्र के कुछ अधिकारी प्रभावित हुए और उन्होंने राधाकृष्णन से अपने यहां भी ऐसे ही पौधे लगाने के लिए कहा। उन्होंने 2016 में 38 किस्मों के 32,000 पौधे लगाए। मातृभूमि के अनुसार, महात्मा गांधी ऑक्सीज़ोन के नाम पर, राधाकृष्णन ने पंडरीपानी, और जुरीदा गाँव, छत्तीसगढ़ में सात एकड़ भूमि पर एक लाख से अधिक पेड़ लगाए। इसके अतिरिक्त, जंगल के बीच में ढाई एकड़ जमीन पर एक कृत्रिम झील भी बनाई गई थी।

अब राधाकृष्णन ने पुलवामा हमले के शहीदों के नाम पर जंगल लगाने की योजना बनाई है। जंगल का नाम ‘पुलवामा शाहिद वन’ होगा, और इसमें 40 किस्मों के 40,000 पेड़ होंगे। हरियाली के प्रति अपने प्रेम के अलावा, राधाकृष्णन गुजरात और महाराष्ट्र में तीन प्रशिक्षण केंद्र भी संचालित करते हैं। यहां, उन्होंने गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले 10,000 से अधिक व्यक्तियों को प्रशिक्षित किया है ताकि वे बेहतर जीवन यापन कर सकें।


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adminApril 1, 20191min00

जब साल 2014 में पीएम मोदी ने स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की थी। उस समय उनका लक्ष्य भारत को कचरा मुक्त साफ देश बनाने में योगदान देने के लिए हर नागरिक को प्रेरित करना था। उनकी इस मुहिम को कई लोगों ने समझा और कई लोग, संगठन और संस्थाएं कचरे को समाप्त करने के नए-नए आइडिया के साथ आए। इनमें अंगराज स्वामी, उत्सव गोयल, गौरव संघाई और नितिन सागर भी हैं। इन चारों ने साथ मिलकर कचरे के ठीक से निस्तारण और पुर्नपयोग के उद्देश्य से इकोरैप (Ecowrap) की स्थापना की।

इकोरैप का पूरा नाम इको, वेस्ट ऐंड रिसोर्सेज ऐक्शन प्रोग्राम है। जयपुर आधारित यह स्टार्टअप लोगों में कचरा या अवशिष्ट पदार्थों का पृथ्कीकरण (अलग-अलग) करने, उनको रीसाइकल करके नए उत्पाद बनाने के बारे में जागरुकता पैदा करता है। इसके अलावा यह डिजाइनिंग के छात्रों और स्थानीय शिल्पकारों को रोजगार भी प्रदान करता है। यकीन नहीं हो रहा ना? हालांकि यह सच और अच्छा है। यह मई 2017 में लोगों के बीच कचरे के प्रबंधन को लेकर जागरुकता फैलाने शुरू किया गया था। अब इकोरैप उन जगहों पर काम कर रहा है जहां अधिक मात्रा में कचरा उत्पादन है। इस समय यह जयपुर की लगभग 40 Oyo प्रॉपर्टियों के साथ काम करा है। ओयो के अलावा यह बार्बिक्यू, बीकानेर वाला और कबाब ऐंड करीज जैसे बड़े नामों के साथ मिलकर काम कर रहा है।

बीकानेर वाला के मैनेजर आनंद उपाध्याय ने बताया, ‘हम इकोरैप के साथ 4 महीने से अधिक समय से काम कर रहे हैं। वे हमें कचरे के प्रबंधन, पृथ्कीकरण से लेकर रीसाइकलिंग की मात्रा बढ़ाने के अवसरों को लेकर सलाह देते रहते हैं।’ इकोरैप ने लोगों में डस्टबिन के उपयोग की आदत को बढ़ावा देने के साथ-साथ पृथ्कीकरण के बारे में जागरुकता फैलाने के लिए शुरुआत में लोगों को डस्टबिन बांटे। लोगों में इस आदत को बढ़ावा देने के लिए इकोरैप ने वेस्ट मोनेटाइजेशन स्कीम (यानी खराब कचरे के बदले पैसे का भुगतान योजना) शुरू की। इकोरौप के को फाउंडर अंगराज के मुताबिक, ‘हम इनऑर्गेनिक कचरे (ग्लास, पेपर, प्लास्टिक और धातु) के लिए लोगों को भुगतान करते हैं और ऑर्गनिक कचरे के लिए लोगों से पैसे लेते हैं।’

यह नया स्टार्टअप 1 किलो ग्लास के कचरे के लिए 4 रुपये, 1 किलो प्लास्टिक कचरे के लिए 10 रुपये और 1 किलो पेपर के कचरे के लिए 11 रुपये का भुगतान करता है। इसके अलावा ऑर्गेनिक कचरा देने पर यह स्टार्टअप लोगों से 3 रुपये/किलो के हिसाब से शुल्क लेता है। साथ ही यह ऐल्युमिनियम फॉइल और मेटल कचरा देने पर 40 रुपये प्रति किलो और बियर व सॉफ्ट ड्रिंक कैन देने पर 60 रुपये प्रति किलो के हिसाब भुगतान करता है। यह शहर की ऑटोमोबाइल्स दुकानों से खराब टायर भी इकठ्ठे करता है। इकोरैप के पास अपना खुद का लॉजिस्टिक सिस्टम है। इसमें 4 छोटे ट्रक शामिल हैं जिनमें ये शहर से कचरा इकठ्ठा करते हैं।

इकठ्ठा करने के बाद ये कचरे को रीसाइकलिंग के लिए प्लान्ट में लेकर जाते हैं। कचरे को दो भागों में बांटा जाता है। मेटल, पेपर और प्लास्टिक को रीसाइकल करने के लिए जयपुर में इकोरैप ने जयपुर में कुछ कंपनियों से साझेदारी की है। वहीं, टायर और ग्लास के कचरे को भांकरोटा स्थित इकोरैप के खुद के रीसाइकल प्लांट ले जाया जाता है। अंगराज ने बताया कि टायर के लिए वे 6 रुपये प्रति किलो के हिसाब से शुल्क लेते हैं। आमतौर पर टायर्स से सोफा और कुर्सियों के लिए सीट बनाई जाती हैं। ग्लास के कचरे से लैंप बनाए जाते हैं।

फर्नीचर और लैंप के डिजाइन बनाने के लिए इकोरैप स्थानीय शिल्पकार और इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ क्राफ्ट डिजाइनिंग से छात्रों को इंटर्नशिप के लिए भर्ती करते हैं। अंगराज ने बताया कि कई बार अगर ग्राहक की इच्छा होती है तो वे ग्राहकों को कचरे के बदले कैश की बजाय रीसाइकल प्रॉडक्ट देते हैं। इकोरैप के ग्राहकों में मल्टिनेशनल प्रॉफेशनल सर्विस फर्म अर्नेस्ट ऐंड यंग (EY) भी शामिल है। अंगराज ने बताया कि ईवाई ने हाल ही में उनसे 4 पुनर्निमित (दोबारा बनाए गए) सोफे खरीदे हैं। साथ ही इकोरैप ने शहर के कुछ सरकारी स्कूलों में टायर के कचरे से बने स्विंग (झूले) भी लगाए हैं। 27 साल के अंगराज ने दिल्ली विश्वविद्यालय से फिजिक्स की डिग्री हासिल की है। इसके अलावा दिल्ली में उनका खुद का एक पेपर बनाने का प्लांट है। वह कहते हैं, ‘रोज काम से लौटते वक्त मैं दिल्ली में स्थित मुकरबा चौक (कचरे का मैदान) को देखकर सोचता था कि मैं इसे बदलने के लिए क्या करूं?’

वह अपने होमटाउन (गृहनगर) लौटे। वहां उनकी मुलाकात प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के ग्रैजुएट छात्र नितिन (30) और गौरव (25) से हुई। दोनों ने इकोरैप शुरू करने के लिए कॉलेज छोड़ने का प्लान बना लिया था। वहीं, उत्सव (जो कि मणिपाल यूनिवर्सिटी का एक छात्र था) इकोरैप के साथ में शुरुआती इंटर्न था। अंगराज ने कहा कि हम उसकी (उत्सव की) क्षमताओं को पहचान गए थे और हमने उसे एक को फाउंडर के तौर पर इकोरैप से जुड़ने के लिए कहा।

इस समय रीसाइकलिंग प्लान्ट पर टीम में ड्राइवर, कार्यकर्ताओं सहित कुल 12 सदस्य हैं। अंगराज ने कहा कि हमने जयपुर से बाहर काम करने के बारे में सोचा था क्योंकि मेट्रो शहरों में काम शुरू करना काफी मुश्किल और महंगा होता है। देखा जाए तो जयपुर का जनसंख्या घनत्व कम है और जयपुर में कचरे को नियंत्रित करना बाकी मेट्रो शहरों की तुलना में आसान है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में एक साल में 62 मिलियन टन यानी 6 करोड़ 20 लाख टन कचरा पैदा होता है और यह आंकड़ा हर साल लगभग 4 फीसदी के हिसाब से बढ़ रहा है। कंपनी के फाउंडर ने बताया, साहस, जीरो वेस्ट, नमो ई-वेस्ट और हसीरू डाला जैसे स्टार्टअप्स कचरा प्रबंधन क्षेत्र में काम कर रहे हैं। इकोरैप का सर्कुलर इकनॉमी मॉडल ही कंपनी को बाकियों से अलग बनाता है। साथ ही अंगराज ने कहा कि औसत के तौर पर देखा जाए तो हर रोज इकोरैप हर ओयो प्रॉपर्टी से 150 किलो कचरा इकठ्ठा करता है। वहीं बार्बिक्यू से हर तीन दिन में अधिकतर मेटल वाला लगभग 60 किलो कचरा इकठ्ठा करते हैं।

रेवेन्यू की बात करें तो हमारा स्टार्टअप मेटल के कचरे को ऑटोमोबाइल और बाकी कंपनियों को बेचकर, कचरे को रीसाइकल करने वालों को बेचकर रीसाइकल प्रॉडक्ट्स को बेचकर आय कमाता है। इस साल फरवरी के महीने में हमारा स्टार्टअप अपने प्राथमिक चरण से बाहर निकलकर अब कमर्शियल स्केल पर आ गया है। अंगराज के मुताबिक, पिछले 11 महीनों में कंपनी ने 45 लाख रुपये की आय अर्जित की है। वहीं अभी तक फाउंडर्स ने स्टार्टअप में 11 लाख रुपये निवेश किए हैं।

इसके अलावा इकोरैप को हाल ही में राजस्थान सरकार की ओर से 10 लाख रुपये के लोन की स्वीकृति भी मिल गई है। स्टार्टअप अभी अपने कामों में तकनीक इस्तेमाल के बढ़ावा देने पर काम कर रहा है। अंगराज ने बताया कि उन्हें स्मार्ट सिटी प्रॉजेक्ट में शामिल होने के लिए भी निवेदन आ रहे हैं। इसके अलावा सूरत स्मार्ट सिटी प्रॉजेक्ट के लिए सूरत म्युनसिपल कॉर्पोरेशन से उनकी बातचीत अंतिम दौर में है। इसके अलावा इकोरैप चंडीगढ़, गुवाहाटी और भुवनेश्वर की नगर निकाय संस्थाओं से भी बातचीत जारी है। अंगराज ने कहा, हम जयपुर को आने वाले 10 सालों में कचरा मुक्त शहर बनाने के मिशन पर काम कर रहे हैं।


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adminMarch 29, 20191min00

क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ कि आप किसी फ़ाइन डाइनिंग रेस्तरां में गए हों या गई हों और रेस्तरां के लंबे-चौड़े मेन्यू कार्ड में से कई डिशेज़ के नाम पढ़ने के बाद आपका दिमाग़ चक्कर खा गया हो? या फिर आपने नाम पढ़कर कोई डिश ऑर्डर की हो और फिर बाद में उसके ज़ायके ने आपको निराश किया हो। आमतौर पर ऐसा लोगों के साथ होता रहता है, लेकिन कोई इसे एक ऐसी समस्या के तौर पर समझने की कोशिश नहीं करता, जो सिर्फ़ आपके ही नहीं बल्कि कई लोगों के घटती रहती हो। मीडिया हाउस एनडीटीवी के पूर्व कर्मचारियों ने इस समस्या का हल खोज निकाला है और अब आपको पेपर मेन्यू पर सिर्फ़ डिशेज़ के बारे में पढ़ने की नहीं बल्कि उनके फ़ोटोज़ और विडियोज़ भी देखने को मिलेंगे।

एनडीटीवी के पूर्व कर्मचारी मोनिका नरूला, गुंजन मेहरिश और नूपुर तिवारी ने पेपर मेन्यू की जगह विडियो मेन्यू का कॉन्सेप्ट शुरू किया और इसके साथ ही डैश.मेन्यू (Dash.menu) लॉन्च किया। डैश.मैन्यू एक फ़ूड टेक स्टार्टअप आइडिया चक्की प्राइवेट लि. का ही एक प्रोडक्ट है, जो ग्राहकों को छोटे-छोटे विडियोज़ के माध्यम से रेस्तरां आदि के मेन्यू के बारे में जानकारी देता है।

स्टार्टअप की को-फ़ाउंडर गुंजन कहती हैं कि ग्राहकों की नए तरह के डिशेज़ और ड्रिंक्स इत्यादि में लगातार रुचि बढ़ रही है और वे हमेशा ही कुछ नया ट्राई करना चाहते हैं और इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए ही उनके ज़हन में डैश-मेन्यू का आइडिया आया।

डैश के आइडिया पर काम तो 2015 में ही शुरू कर दिया गया था, लेकिन उद्योगपति रतन टाटा द्वारा सीड फ़ंडिंग का सहयोग मिलने के बाद इसे नई दिल्ली के आईटीसी मौर्य शेरटन से इसे लॉन्च किया गया।

डैश की को-फ़ाउंडर मोनिका कहती हैं कि कोई भी चीज़ ख़रीदने से पहले हम उसका सैंपल देखना चाहते हैं और ठीक इसी तर्ज़ पर हम ग्राहकों के सामने टैबलेट्स के माध्यम से खाने से पहले डिशेज़ आदि के 15 सेकंड्स के विडियोज़ परोसते हैं, जिसकी बदौलत ग्राहकों को काफ़ी सहूलियत मिलती है। फ़ाउंडर्स का कहना है कि डैश रेस्ट्रॉन्ट्स को सोशल मीडिया कॉन्टेन्ट भी उपलब्ध कराता है।

चूंकि सभी फ़ाउंडर्स स्टार्टअप शुरू करने से पहले मीडिया के क्षेत्र से लंबे समय से जुड़े थे और उनके पास प्रोडक्शन और कॉन्टेन्ट के क्षेत्रों में 20 सालों का लंबा अनुभव भी था, इसलिए टीम को अपने स्टार्टअप के लिए कॉन्टेन्ट तैयार करने में कोई दिक्कत नहीं पेश आई।

मोनिका पूर्व में चख ले इंडिया, फ़्रेंच कनेक्शन और हाई-वे ऑन माय प्लेट जैशे कुकरी शोज़ के लिए फ़ॉर्मेट तैयार कर चुकी हैं। गुंजन, मशहूर पत्रकार शेखर गुप्ता के साथ वॉक द टॉक शो, बिग फ़ैट इंडियन वेडिंग और ऑलमोस्ट फ़ेमस के कॉन्टेन्ट क्रिएशन, प्रोडक्टशन और डायरेक्शन का काम कर चुकी हैं। कंपनी की को-फ़ाउंडर नूपुर के पास प्रोडक्शन और डायरेक्शन के क्षेत्रों में दो दशकों का अनुभव है और वह कई बड़े पुरस्कार भी जीत चुकी हैं। इतना ही नहीं, नूपुर स्मैशबोर्ड की फ़ाउंडर भी हैं, जो यौन-शोषण और हिंसा के ख़िलाफ़ एक ब्लॉकचेन-आधारित टेक प्लेटफ़ॉर्म है। चार फ़ाउंडर सदस्यों के अलावा स्टार्टप के पास 16 लोगों की टीम है, जो विभिन्न जिम्मेदारियां संभालती है।

डैश की क्लाइंट लिस्ट में मैरियट, ल मेरिडियन, मामागोटो रेस्ट्रॉन्ट्स, आईटीसी होटल्स और ताज होटल्स जैसे बड़े नाम शामिल हैं। मोनिका कहती हैं कि कि दिल्ली शहर खाने-पीने के मामले में बेहद शौक़ीन और संपन्न है, इसलिए उनका लक्ष्य है कि दिल्ली में ही अपने बिज़नेस को फैलाया जाए और इसके बाद मुंबई पर फ़ोकस किया जाए।

डैश, बीटूबी और बीटूसी दोनों ही मॉडल्स पर काम करता है और इसकी कार्यप्रणाली एक पॉइंट-ऑफ़-सेल सिस्टम की तरह है। डैश की टीम की योजना है कि जल्द ही अपने प्रोडक्ट को देशभर में और विदेश तक भी पहुंचाया जाए। इस साल के अंत तक पुणे और बेंगलुरु में भी डैश को लॉन्च किया जा सकता है। टीम लगातार अपने प्रोडक्ट के लिए आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस तकनीक विकसित करने के लिए फ़ंडिंग की तलाश में है।


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adminMarch 27, 20191min00

आप किसी 24 साल के युवा से खेती करने के बारे में पूछिए, पूरी संभावना है कि आपको जवाब न में मिलेगा। आखिर सच बात है कि आज के वक्त में कोई भी खेती के पेशे को नहीं अपनाना चाहता है। लेकिन मुंबई में रहने वाले जोशुआ लुईस और सकीना राजकोटवाला इसके अपवाद हैं। ये दोनों मुंबई में रहकर अनोखे ढंग से खेती करते हैं और ताजी सब्जियां उगाकर लोगों को ऑर्गैनिक फूड का विकल्प मुहैया करा रहे हैं।

2017 की बात है लुईस और सकीना पुडुचेरी गए थे जहां उन्होंने इंग्लैंड के रहने वाले कृष्णा मकेंजी से मुलाकात की जो वहां पर प्रकृति से जुड़कर खेती करने के काम में लगे हुए हैं। मुंबई लौटकर उन्होंने हर्बीवोर फार्म्स नाम से एक फार्म की शुरुआत की। यह मुंबई का पहला हाइपरलोकल हाइड्रोपॉनिक्स फार्म है जहां पर 2,500 से अधिक पौधे लगे हैं। यहां से ताजी और जैविक सब्जियों की सप्लाई होती है।

मुंबई में ताजी और ऑर्गैनिक सब्जियों के शौकीन लोगों को एक अच्छा विकल्प उपलब्ध कराने वाले इस दंपी ने कहा, ‘हर्बिवोर फार्म्स मुंबई का पहला ऐसा फार्म है। यह अंधेरी ईस्ट में स्थित है। हम पत्तेदार हरी सब्जियां उगाते हैं। इसमें हाइड्रोपॉनिक्स विधि का इस्तेमाल किया जाता है।’ हाइड्रोपोनिक्स एक ऐसी विधि होती है जिसमें मिट्टी की जगह पानी का इस्तेमाल होता है। पानी में पौधों की जड़ें डूबी होती हैं और एक केमिकल के जरिए उन पौधों को ऊर्जा मिलती रहती है। इसे घर के भीतर या छत पर लगाया जाता है और उसी के मुताबिक तापमान को नियंत्रित किया जाता है।

हर्बिवोर फार्म 1,000 sq ft एरिया में स्थित है और इसमें 2,500 तरह के पौधे हैं। सकीना कहती हैं, ‘हाइड्रोपोनिक्स से जुड़े सारे सवालों का हल तो हम नहीं ढूंढ़ सके, लेकिन हमें इसके बारे में कई सारी चीजें मालूम हुईं। हमने कई सारी गलतियां कीं और उनसे कई सारी चीजें हमने जानी और सीखीं। हम जो सब्जियां उगाते हैं वे एकदम साफ सुथरे और स्वस्थ माहौल की होती हैं। हम किसी भी तरह के कीटनाशक का इस्तेमाल नहीं करते इसलिए इन्हें खाने से स्वास्थ्य पर किसी तरह का विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता है।’

सकीना आगे बताती हैं कि इसमें 80 प्रतिशत कम जल की आवश्यकता होती है और ये रीसर्कुलेटिंग सिंचाई व्यवस्था का इस्तेमाल होता है। जिस जल में सब्जियों का उत्पादन होता है उसमें पौधों के विकास के लिए कई तरह के सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपस्थिति होती है। जिस तरह से पौधों को रखा जाता है उसमें सामान्य खेत से पांच गुना उत्पादन संभव हो जाता है। इतना ही नहीं ग्राहकों को फार्म से कुछ ही घंटे में सब्जियां डिलिवर हो जाती हैं।

सकीना बताती हैं कि 90 फीसदी लोग जो उनके यहां से सैंपल के तौर पर कुछ सब्जियां ले गए वे दोबारा वापस आए और नियमित ग्राहक बन गए। हर्बीवोरस फार्म ने प्रति माह 1,500 रुपये का सब्सक्रिप्शन प्लान बनाया है। इसमें हर सप्ताह एक बॉक्स सब्जी डिलिवर की जाती है। दक्षिण मुंबई के लोगों को डिलिवरी चार्ज अतिरिक्त देना पड़ता है। ग्राहकों से मिली प्रतिक्रिया के बारे में ये दंपती कहते हैं कि बॉक्स की लागत ज्यादा है लेकिन फिर भी वे ग्राहकों को अच्छी और ताजी सब्जियां उपलब्ध कराने में किसी तरह का समझौता नहीं करते।


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adminMarch 23, 20191min00

कॉरपोरेट जगत और शेयर बाजार में कई लोगों की तकदीर ऐसा साथ देती है कि वे कुछ ही साल में अरबों रुपये बना लेते हैं. आपने फ्ल‍िपकार्ट के संस्थापकों बिन्नी बंसल और सचिन बंसल को हुई जबर्दस्त कमाई के बारे में तो सुना ही होगा. अब ऐसे ही एक भाग्यशाली कारोबारी साबित हुए हैं कैफे कॉफी डे (CCD) के संस्थापक वी जी सिद्धार्थ जिन्होंने माइंडट्री में अपने निवेश से सिर्फ आठ साल में 2,858 करोड़ रुपये कमा लिए हैं. उन्होंने माइंडट्री में करीब 436 करोड़ रुपये का निवेश किया था.

पिछले हफ्ते लार्सन ऐंड टूब्रो (L&T) ने माइंडट्री में सिद्धार्थ की 20.41 फीसदी हिस्सेदारी 3,269 करोड़ रुपये में खरीदी है. आठ साल पहले सिद्धार्थ ने माइंडट्री के ये शेयर महज 435.79 करोड़ रुपये में खरीदे थे. उन्होंने बीच में साल 2012 में इसमें से 2.5 लाख शेयर 122.33 रुपये प्रति शेयर के हिसाब से बेचकर 25.52 करोड़ रुपये हासिल किए थे. इसके बाद उन्होंने फिर साल 2018 में 250 शेयर 864 रुपये प्रति शेयर के हिसाब से बेचे थे और 2.16 लाख रुपये मिले थे. बीएसई को दी गई जानकारी के मुताबिक सिद्धार्थ ने अपनी हिस्सेदारी 3,269 करोड़ रुपये में बेची है. इस तरह उन्होंने माइंडट्री में अपनी हिस्सेदारी बेचकर 2,858.74 करोड़ रुपये का भारी मुनाफा कमाया है.

असल में L&T माइंडट्री पर होस्टाइल टेकओवर करना चाहती है और इसीलिए कंपनी आक्रामक तरीके से उसके शेयर खरीद रही है. कंपनी पर कम से कम 51 फीसदी की हिस्सेदारी हासिल करने की योजना के साथ L&T ने वी जी सिद्धार्थ से हिस्सेदारी खरीदी है. यही नहीं, इन आठ वर्षों में माइंडट्री में निवेश से सिर्फ लाभांश के रूप में सिद्धार्थ को 180 करोड़ रुपये हासिल हुए हैं.

वी जी सिद्धार्थ और सीसीडी की माइंडट्री में 20.41 फीसदी यानी कुल 3.35 करोड़ शेयरों की हिस्सेदारी थी. बीसीई को सीसीडी ने जो जानकारी दी है उसके मुताबिक यह बिक्री 975 रुपये प्रति शेयर हुई है, यानी कुल सौदा 3,269 करोड़ रुपये का हुआ है. साल 2011 में अपने पहले निवेश के बाद पिछले आठ साल में सिद्धार्थ ने माइंडट्री के शेयर 87 रुपये से लेकर 529 रुपये तक में खरीदे थे. साल 2011 में पहली बार कॉफी डे रिजॉर्ट ने माइंडट्री के 28 लाख यानी 6.95 फीसदी शेयर 87 रुपये प्रति शेयर के हिसाब से खरीदे थे यानी इनके लिए कुल 24.36 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे. वी जी सिद्धार्थ को अपने इस शुरुआती निवेश पर जबर्दस्त 1,020 (ROI) फीसदी का फायदा मिला.

मार्च, 2012 में सिद्धार्थ ने माइंडट्री में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर 11.26 फीसदी और फिर जून, 2012 में 3.27 फीसदी हिस्सेदारी खरीदकर इसे बढ़ाकर 14.53 फीसदी कर लिया. इसके बाद उन्होंने 2016, 2017 और 2018 में अपनी हिस्सेदारी फिर बढ़ाई जिसके बाद कुल हिस्सेदारी 20.41 फीसदी हो गई थी.


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adminMarch 20, 20191min00

आज हम आपके साथ जिस स्टार्टअप की कहानी साझा करने जा रहे हैं, उसकी शुरुआत से जुड़ा क़िस्सा काफ़ी दिलचस्प है। क्या आपने कभी सोचा है कि आपके पास कोई चीज़ आवश्यकता से अधिक मात्रा में है तो क्यों न उसे बेचा जाए और कुछ पैसे ही कमा लिए जाएं? कुछ ऐसा ही हुआ प्रियाश्री और निशिता वसंत के साथ, जिन्होंने तमिलनाडु में स्थित हिल टाउन कोडइकनल में रहने वाले आदिवासियों से अत्यधिक मात्रा में शहद ख़रीद लिया। इस शहद को उन्होंने रिश्तेदारों और दोस्तों के बीच बांट दिया, लेकिन इसके बावजूद उनके पास पर्याप्त मात्रा में शहद बचा रह गया और फिर उन्होंने एक ऑन्त्रप्रन्योर की तरह सोचते हुए इसे एक बिज़नेस आइडिया में तब्दील कर दिया और फ़ैसला लिया कि वे दोनों इस ऑर्गेनिक शहद और कोडइकनल की स्थानीय आबादी से मिलने वाले उत्पादों को ऑनलाइन और ऑफ़लाइन दोनों ही माध्यमों से ग्राहकों तक पहुंचाएंगे।

प्रियाश्री बताती हैं, “शहद के अलावा हमारे पास अत्यधिक मात्रा में मोम (मधुमक्खी के छत्ते से मिलने वाला) भी इकट्ठा हो गया था। हम समझ नहीं पा रहे थे कि इतनी सारी मोम का हम क्या करें। हम कॉस्मेटिक मार्केट में नहीं जाना चाहते थे क्योंकि हम जानते थे कि उस मार्केट में पहले से ही कई कंपनियां मौजूद हैं।”

स्टार्टअप के फ़ाउंडर्स निशिता और प्रियाश्री ने कुछ वैसा ही किया, जैसा ऑन्त्रप्रन्योर्स आमतौर पर करते हैं। उन्होंने एक नए आइडिया पर काम शुरू किया। प्रियाश्री बताती हैं कि इस दौरान ही उनके एक रिश्तेदार ने कनाडा से उन्हें मोम से बने व्रैप्स भेजे, जो बहुद ही सुंदर थे और इसलिए उन्होंने तय किया कि वह इस प्रोडक्ट पर ही काम करना शुरू करेंगी।”

इस प्रोडक्ट का दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है और साथ ही, यह बायोडिग्रेडेबल भी होता है। इस प्रोडक्ट को लगातार आमतौर पर इस्तेमाल होने फ़ॉइल्स के ईको-फ़्रेंडली विकल्प के तौर पर लोकप्रियता मिल रही है। प्रयोगों के लंबे दौर के बाद ‘हूपु ऑन अ हिल’ ने इन व्रैप्स की कई वैरायटीज़ लॉन्च कीं।

 ये प्रोडक्ट्स कंपनी की वेबसाइट पर उपलब्ध हैं। दरअसल, ये व्रैप्स मधुमक्खी के छत्ते से मिलने वाली मोम में लिपटे हुए कॉटन के कपड़े हैं, जिन्हें फ़ूड मटीरियल्स को स्टोर करने और ट्रांसपोर्ट करने के लिए इस्तेमाल में लाया जाता है। ये व्रैप्स तीन साइज़ के साथ-साथ कई प्रिंट्स और कलर्स में भी उपलब्ध हैं। इनक़ी कीमत 390 रुपए प्रति पैक रखी गई है।

बेंगलुरु की रहने वालीं प्रियाश्री और निशिता गैर-सरकारी संगठन इंडियन नैशनल ट्रस्ट फ़ॉर आर्ट ऐंड कल्चरल हेरिटेज के साथ काम कर रही थीं और इसी दौरान वे दोनों पालनी हिल्स क्षेत्र पहुंचीं।

प्रियाश्री बताती हैं, “वे दोनों पालियन क्षेत्र में रहने वाले आदिवासियों द्वारा मधुमक्खी के छत्तों से शहद निकालने का काम करने वालों के इतिहास पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाने के लिए गए हुए थे। ये आदिवासी छत्तों से शहद निकालने के लिए परंपरागत तरीक़ों का इस्तेमाल करते हुए जंगलों में जाकर ऊंचे पेड़ों पर चढ़कर शहद निकालते थे। सदियों से इस समुदाय में यह एक परंपरा के रूप में चला आ रहा था। “

इस क्षेत्र से ही प्रियाश्री और निशिता ने शहद ख़रीदा और अपने परिवारवालों और दोस्तों को तोहफ़े में दे दिया। कुछ समय बाद ही उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि उन्होंने शहद कुछ ज़्यादा ही मात्रा में ख़रीद लिया है और उन्होंने बचे हुए शहद को बेचने का फ़ैसला लिया।

दोनों ने मिलकर हूपु पक्षी के नाम पर अपने घरेलू इलाके कोडइकनल से अपने स्टार्टअप की शुरुआत की। यह स्टार्टअप अपने ग्राहकों को पूरी तरह से प्राकृतिक और किसी भी तरह के केमिकल से रहित शहद उपलब्ध कराता है। दोनों दोस्तों ने अपने काम की शुरुआत ऑफ़लाइन रीटेल मार्केट से की थी। वे पालनी हिल्स के आदिवासी समुदाय से शहद लेते थे और अपने घर के एक छोटे से कमरे में ही उसे स्टोर करते थे। उन्होंने पालनी क्षेत्र की ही 4 महिलाओं को अपने काम के लिए हायर किया।

स्टार्टअप मौसम के हिसाब से शहद की बिक्री करता था। सीज़न के साथ-साथ फूलों और मधुमक्खियों की प्रजाति का भी ध्यान रखा जाता था। हाल में यह स्टार्टअप आपको जामुन हनी (दवाई के रूप में लोकप्रिय), मल्टी-फ़्लोरल, यूकोलिप्टस, केराना और डैमर वैराइटीज़ का शहद उपलब्ध करा रहा है। बेचने से पहले शहद को फ़िल्टर किया जाता है और इनकी पैकेजिंग कांच की बोतलों में की जाती है।

बेंगलुरु से अपने स्टार्टअप को न शुरू करने के पीछे की वजह बताते हुए निशिता और प्रियाश्री ने बताया कि बेंगलुरु में किसी भी तरह का सेटअप तैयार करने के लिए खर्चा अधिक होता है। उन्होंने जानकारी दी कि हाल में 6 महिलाएं उनके साथ काम कर रही हैं और स्टार्टअप का लगभग सारा काम वही देख रही हैं। इतना ही नहीं, ये महिलाएं कंप्यूटर चलाना भी सीख रही हैं। पालनी क्षेत्र की महिलाओं के पास काम के लिए ज़्यादा विकल्प नहीं रहते। निशिता और प्रियाश्री का कहना है कि वे इस क्षेत्र की महिलाओं एक नियमित रोज़गार दिलाना चाहती थीं और उन्हें ऐसा काम देना चाहती हैं, जिसमें उनका शोषण न हो। ये महिलाएं स्टार्टअप की बदौलत मासिक तौर पर 7 हज़ार रुपए तक की कमाई कर रही हैं।

खाली बोतलों और पैकेजिंग के लिए स्टार्टअप की टीम ने बेंगलुरु के वेंडर्स के साथ पार्टनरशिप कर रखी है। पालनी क्षेत्र में मॉनसून के दो सीज़न होते हैं और इसलिए ही यहां पर हनी हार्वेस्टिंग के भी दो सीज़न होते हैं। यहां का आदिवासी समुदाय घने जंगलों में जाकर लगभग एक हफ़्ते तक शहद निकालने का काम करते हैं और स्टार्टअप की टीम को लाकर देते हैं। आदिवासियों से शहद 450 रुपए से लेकर 650 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से ख़रीदा जाता है।

जंगलों से सीधे आने वाले इस शहद को मसलिन के कपड़े से फ़िल्टर किया जाता है और इसकी अशुद्धियां दूर की जाती हैं। फ़िल्टर होने की प्रक्रिया के बाद इन्हें बड़े बर्तनों में रख दिया जाता है और फिर इन्हें कांच की बोतलों में पैक किया जाता है। इस शहद का 500 ग्राम का जार 450 रुपए क़ीमत का है और वहीं 300 ग्राम का जार 290 रुपए का है। हूपु ऑन अ हिल पूरे भारत में अपने प्रोडक्ट की सप्लाई करता है।

छोटे शहर से स्टार्टअप शुरू करने के फ़ायदे गिनाते हुए प्रियाश्री और निशिता बताती हैं कि उन्हें लॉजिस्टिक्स से जुड़ी बड़ी चुनौतियों का सामना ज़रूर करना पड़ा, लेकिन छोटे शहर की बदौलत उन्हें स्टार्टअप शुरू करने के शुरुआती तौर पर उन्हें भारी निवेश नहीं करना पड़ा। साथ ही, उन्होंने बताया कि छोटे शहरों में किराया और लेबर भी कम लागत में उपलब्ध हो जाता है। प्रियाश्री ने जानकारी दी कि उन्होंने अपने स्टार्टअप का सेटअप तैयार करने के लिए 5 से 10 लाख रुपए का निवेश किया है।

प्रियाश्री ने बताया कि शिपिंग के लिए उन्होंने भारत की पोस्ट पार्सल सर्विस का सहारा लिया। वह कहती हैं, “छोटे शहर से बिज़नेस शुरू करने वालों के लिए यह एक बेहद उम्दा ज़रिया है। यह पूरी तरह से विश्वसनीय भी है और साथ ही, यह देश के कोने-कोने तक पहुंच भी रखता है।”

भविष्य में, हूपु ऑन अ हिल अपने ऑपरेशन्स को बढ़ाने के लिए और भी अधिक महिलाओं को अपने साथ जोड़ने की योजना बना रहा है और साथ ही, अपने प्रोडक्ट लिस्ट में भी इज़ाफ़ा करने की तैयार कर रहा है।

प्रियाश्री ने अपने स्टार्टअप के एक बेहद ख़ास प्रोडक्ट का ज़िक्र करते हुए बताया कि हाल ही में उनकी कंपनी ने बीज़वैक्स क्रेयॉन्स लॉन्च किए हैं, जो फ़ूड कलरिंग और मोम से तैयार किए गए हैं। यह प्रोडक्ट बच्चों के लिए पूरी तरह से सुरक्षित है। हम ऐसे ही और नए प्रयोग करने की कोशिश कर रहे हैं।


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adminMarch 18, 20191min00

सफलता के पैमाने क्या हो सकते हैं, इसके बारे में हर किसी की अलग-अलग राय होगी। लेकिन 5 लाख रुपयों से शुरू हुआ कोई बिजनेस जब 50 करोड़ रुपये का रेवेन्यू इकट्ठा करने लगे तो कम से कम मान लेना चाहिए कि वह बिजनेस सफल हो गया है। मदुरै के फैजल अहमद की कहानी कुछ ऐसी ही है। फैजल ने 2006 में 5 लाख रुपये जुटाकर एक बिजनेस की शुरुआत की थी लेकिन 2011 में उनकी कंनपी दिवालिया हो गई और उनके 1 करोड़ रुपये का नुकसान हो गया। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी मेहनत की बदौलत आज इस मुकाम पर पहुंचे कि उनका बिजनेस 50 करोड़ रुपये का हो गया।

32 वर्षीय फैजल तीसरी पीढ़ी के उद्यमी हैं। यानी उनके पिता और दादाजी भी पहले बिजनेस ही किया करते थे। जब वे बीकॉम कर रहे थे तो उन्होंने अपने पिता द्वारा बिजनेस के लिए लिए गए लोन को चुकाने के प्रयत्न करने शुरू कर दिए थे। वे बताते हैं, ‘2006 में मैंने 7 सिलाई मशीनें लगाईं और उनसे रोजाना 100 शर्टें बनाने का काम शुरू किया। शुरू में मैं सीधे बडे़ व्यापारियों को माल सप्लाई किया करता था। पूरे राज्य में उस वक्त मेरे पास सिर्फ 2 डीलर हुआ करते थे। लेकिन धीरे-धीरे डीलरशिप की संख्या में इजाफा होता गया।’

फैजल बताते हैं कि वे स्वाभाविक गति से आगे बढ़ते गए। वे कहते हैं, ‘हम 20 से 30 फीसदी की गति से आगे बढ़ रहे थे। 2011 में हमने अपना शोरूम खोलने का फैसला किया। मदुरै, सलेम, त्रिची और डिंडीगुल में सक्सस (Suxus) के स्टोर्स खुले। इसके पीछे हमारा उद्देश्य ये था कि अगर दूसरे रीटेल स्टोर्स हमारी शर्ट्स को 150 रुपये में बेचते हैं तो हम उन शर्ट्स को 100 रुपये में ही बेचेंगे।’ लेकिन फैजल का ये आइडिया फ्लॉप हो गया और फैजल को काफी नुकसान उठाना पड़ा।

वे बताते हैं, ‘में एक करोड़ से ज्यादा का नुकसान हुआ। पांच स्टोर्स में थे तीन फ्रेंचाइजी थीं और दो हमारे खुद के स्टोर्स थे। उस वक्त इरोड का स्टोर प्राइम लोकेशन था औऱ उसके लिए हम हर महीने 1 लाख रुपये का किराया भर रहे थे। लेकिन हमारी सेल सिर्फ 3,000 रुपये की हो रही थी। इसके बाद 2013 में हमने अपने इरोड स्टोर को बंद करने का फैसला किया और सिर्फ मदुरै वाले स्टोर को चालू रखा। हमने सारे स्टॉक को वापस लाने से बेहतर उसे धीरे-धीरे बेचने की प्लानिंग की। पहले दिन सिर्फ 1,500 रुपये की सेल हुई।’ 

स्टोर में 5,000 से 6,000 पीस का स्टॉक था। फैजल के दिमाग में 1,000 रुपये में सात शर्ट्स बेचने का आइडिया आया। उन्होंने अपने स्टोर मैनेजर के जरिए 3,000 रजिस्टर ग्राहकों को वॉट्सऐप के जरिए सूचना दी। फैजल का यह आइडिया काम आया और अगले दिन 3.5 लाख रुपये की सेल हो गई। वे बताते हैं, ‘हमने सोचा था कि यह क्लियरेंस सेल है इसलिए काफी लोग खरीदने के लिए आएंगे और हमारी सोच सही निकली।’ 

इसके बाद पूरे शहर में इस सेल की खबर फैल गई। दूसरे दिन भी तीन लाख रुपये की सेल हुई और तीसरे दिन 2 लाख की सेल हुई। फैजल कहते हैं, ‘हमारा स्टॉक खत्म हो गया था और हमारे स्टोर मैनेजर ने हमें और माल भेजने को कहा। मैंने सोचा कि क्यों न इसे पूरे साल जारी रखा जाए। इस तरह से एक नया मॉडल हमारे सामने आया।’ इरोड वाला स्टोर फैजल के लिए रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेंटर बन गया। ये ऐसी जगह थी जहां पर वे इस बिजनेस मॉडल को आगे के लिए डेवलप कर सकते थे।

फैजल बताते हैं, ‘1,000 रुपये में सात शर्ट देने के बाद हमने 1,000 रुपये में पांच ट्राउजर्स और 1,000 रुपये में ही चार जींस बेचने का आइडिया सोचा। छह महीने के बाद हमने कुछ गलतियों और ट्रायल के बाद इस अपने मदुरै वाले स्टोर में भी लागू किया।’ वे बताते हैं कि ये आसान काम नहीं था। इरोड स्टोर में सेल के दिन कंपनी को घाटे में स्टॉक बेचना पड़ा। वे एक शर्ट को 146 रुपये में बेच रहे थे जिसकी लागत उन्हें 250 रुपये आ रही थी। इस तरह के मॉडल को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें किसी और रणनीति की जरूरत थी।

 

सक्सस के रीटेल स्टोर का उद्घाटन

 

फैजल ने अपनी लागत घटानी शुरू कर दी। इसके लिए उन्होंने काफी बड़ी संख्या में उत्पादन किया और थोक में कच्चा माल खरीदा। इस तरह से उन्होंने अपने खर्चों में कटौती की। कपड़ों के रीटेल व्यापार में आमतौर पर 40 से 50 फीसदी का मार्जिन होता है। फैजल की कंपनी सक्सस (Suxus) ने इस मार्जिन को 5 से 10 फीसदी पर ला दिया। उन्होंने ऐसा करके अपने ग्राहकों का भरोसा जीत लिया। 

उन्होंने नए स्टोर्स खोलने शुरू किए और इस बार उन्हें फायदा भी हुआ। एक ओर जहां गारमेंट इंडस्ट्री में स्टोर में 7,000 रुपये प्रति स्क्वॉयर फुट सेल होती है और इंडस्ट्री के दिग्गज 13,000 रुपये प्रति स्क्वॉयर फीट तक ही सिमट जाते हैं वहां फैजल की औसतन सेल 25,000 रुपये प्रति स्क्वॉयर फुट हो रही थी। फैजल ने अपने इस प्रयोग से दिखा दिया कि अच्छा मुनाफा पाते हुए भी पैसे बनाए जा सकते हैं।

 

बड़े सपने

आज तमिलनाडु में सक्सस (Suxus) के छह स्टोर्स हैं। ये स्टोर्स मदुरै, कोयंबटूर, इरोड, नमक्कल, सलेम और कांचीपुरम में स्थित हैं। फैजल की कंपनी आज बिजनेस टू बिजनेस के साथ-साथ बिजनेस टू कस्टमर्स मॉडल पर बिजनेस करते हैं। वे अपने दाम को वाजिब रखते हैं। उनकी कंपनी सिर्फ पुरुषों के कपड़े तैयार करती है जिसमें शर्ट्स, ट्राउजर्स, टी-शर्ट्स और डेनिम्स होती हैं।

उनके स्टोर्स में काफी कम सेल्स होते हैं और किसी डिपार्टमेंटल स्टोर्स की तरह वहां खुद से सामान देखने की सुविधा होती है। इससे ग्राहकों को कपड़े चुनने में ज्यादा आसानी होती है। खास बात यह है कि उनकी कंपनी पर किसी प्रकार का कर्ज नहीं है और उन्हें किसी बाहरी स्रोत से फंडिंग भी नहीं मिलती है। वे बताते हैं, ‘2013 में जब हमने इस मॉडल को शुरू किया था तो हमारा रेवेन्यू 1.35 करोड़ रुपये था। इस वक्त हमारा रेवेन्यू 50 करोड़ हो गया हो गया है। अगले साल तक हम इन स्टोर्स को तमिलनाडु के सारे कस्बों और शहरों तक पहुंचाना चाहते हैं और उसके बाद हमारी योजना केरल तक विस्तार करने की है।’ 

वे बताते हैं. ‘2030 तक हम अपने स्टोर्स की संख्या बढ़ाकर 420 तक करना चाहते हैं। हम उत्तर भारत में भी अपने स्टोर्स खोलने चाहते हैं। इसके बाद हमारा सपना है कि हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहुंच बनाएं।’ फैजल ने अभी तक जहां भी अपने स्टोर्स खोले हैं उन्हें हर जगह से अच्छा रिस्पॉन्स मिला है और पहले ही दिन 3,000 से अधिक लोगों ने स्टोर्स में अपने कदम रखे। तमिलनाडु जैसे राज्य में जहां सिर्फ राजनेता और फिल्मी हस्तियां ही भीड़ जुटा पाती हैं वहां सक्सस ने भी भीड़ जुटाने की कला सीख ली है। फैजल बताते हैं कि कई बार स्टोर्स में इतनी भीड़ हो जाती है कि उन्हें संभालने के लिए पुलिस बुलानी पड़ जाती है।

फैजल ने मार्केटिंग के लिए शुरू में वॉट्सऐप का इस्तेमाल किया लेकिन बाद में लोगों ने खुद ही एक दूसरे से इतनी तारीफ की कि उनकी लोकप्रियता अपने आप बढ़ती चली गई। वे डिजिटल मीडिया का खूब लाभ उठाते हैं। उनके मुताबिक, ‘हम यूट्यूब वीडियो के माध्यम से लोगों को कपड़े के बारे में जानकारी देते हैं। हम ग्राहकों को बताते हैं कि उनके कपड़े की असल लागत क्या है। इसके बाद भी अगर ग्राहक ब्रैंड्स के कपड़े खरीदता है तो ये उसकी मर्जी है नहीं तो हमारे कपड़े खरीदने में कोई बुराई नहीं है।’

इसके अलावा वे ग्राहकों की प्रतिक्रिया को वीडियो में रिकॉर्ड करते हैं और उसे फिर सोशल मीडिया पर पब्लिश करते हैं। वे आगे कहते हैं, ‘हमारे पास दो लाख से अधिक ग्राहकों का डेटाबेस है। हम उनके बीच ये वीडियो डालते हैं। हमारे वीडियो काफी वायरल होते हैं।’ इन सारी चीजों के अलावा फैजल अपनी जानकारी में विस्तार करते रहते हैं। वे कई सारे ट्रेड और बिजनेस संगठनों से जुड़े हैं। वे हमेशा इंडस्ट्री के विशेषज्ञों से कुछ न कुछ सीखते रहते हैं जो उनके बिजनेस में काफी काम आता है।

फैजल बताते हैं कि उन्होंने सफलता से ज्यादा असफलता से सीखा है। वे कहते हैं, ‘मुझे अहसस हुआ कि आप अपने बिजनेस को लोगों के सफलता के पैमाने पर नहीं खड़ा सकते हैं। आपको अपना मॉडल खुद बनाना पड़ेगा। जब मैंने शुरुआत की थी तो मुझे ज्यादा जानकारी नहीं थी इसलिए मुझे काफी नुकसान उठाना पड़ा।’ वे मानते हैं कि अगर इरोड वाले स्टोर में उन्हें असफलता नहीं मिली होती तो आज वे इतने सफल नहीं होते। वे कहते हैं, ‘आपको अपनी जगह बनानी होगी और दूसरों से अलग होना पड़ेगा। आपको वो करना होगा जो बाकी नहीं कर रहे हैं। इसके बाद ही आप अपना बिजनेस बढ़ सकते हैं।’

फैजव थयरोकेयर टेक्नॉलजी के फाउंडर और चेयरमैन ए वेलुमनी की बात का उदाहरण देते हुए कहते हैं, ‘चुराया हुआ मॉडल कभी सिद्ध नहीं हो सकता है और सिद्ध मॉडल कभी चोरी नहीं हो सकता।’ जब योरस्टोरी ने आखिरी सवाल के तौर पर उनसे सक्सस नाम रखने के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि इसे दोनों तरफ से पढ़ा जा सकता है। 


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adminMarch 16, 20192min00

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पद्म अवॉर्ड के लिए चुनी गईं हस्तियों को पुरस्कार से सम्मानित किया. इस साल 112 हस्तियों के नाम पद्म अवॉर्ड के लिए फाइनल किए गए थे और राष्ट्रपति ने पहले एक पद्म विभूषण, आठ पद्म भूषण और 46 पद्मश्री वितरित किए थे और अन्य हस्तियों को आज अवॉर्ड दिए गए. इसमें एक ऐसा नाम भी शामिल रहा, जो दिन में चाय बेचकर पैसा कमाते हैं और अपनी कमाई को गरीब बच्चों की पढ़ाई के लिए खर्च कर देते हैं. इनका नाम है डी प्रकाश राव.

इस चायवाले ने किया गजब काम, मोदी हुए थे मुरीद, अब मिला पद्मश्री
 
डी प्रकाश राव ओडिशा के कटक के रहने वाले हैं और आज राष्ट्रपति ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया. वे पिछले कई सालों से चाय बेच रहे हैं.
 
इस चायवाले ने किया गजब काम, मोदी हुए थे मुरीद, अब मिला पद्मश्री
 
खास बात ये है कि वो चाय से होने वाली कमाई का बड़ा हिस्सा समाज के लिए खर्च कर रहे हैं. वे अपनी कमाई से गरीब बच्चों को शिक्षा और खाने का समान उपलब्ध करवाते हैं.
 
इस चायवाले ने किया गजब काम, मोदी हुए थे मुरीद, अब मिला पद्मश्री
 
शुरुआत में स्कूल चलाने का पूरा खर्चा वो खुद उठाते थे, लेकिन अब कुछ अन्य लोग भी इस काम में उनकी मदद कर रहे हैं. वे स्कूल आने वाले बच्चों को दूध और फ्रूट भी उपलब्ध करवाते हैं. साथ ही प्रकाश राव बच्चों को पढ़ाते हैं.
 
इस चायवाले ने किया गजब काम, मोदी हुए थे मुरीद, अब मिला पद्मश्री
 
बता दें कि वे 7 साल की उम्र से काम कर रहे हैं और लॉअर टॉर्सो पैरालाइसिस से पीड़ित हैं. अभी तक 200 से अधिक बार रक्त दान कर चुके प्रकाश राव की तारीफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी की है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 मई, 2018 को रेडियो पर मन की बात करते हुए इनकी तारीफ की थी.
 
इस चायवाले ने किया गजब काम, मोदी हुए थे मुरीद, अब मिला पद्मश्री
 
उस दौरान पीएम मोदी ने भी कहा था कि पिछले 50 साल से चाय बेचने वाले प्रकाश राव अपनी आधी आमदनी 70 गरीब बच्चों की शिक्षा पर खर्च करते हैं. वो हम सब के लिए एक प्रेरणास्त्रोत हैं.
 
इस चायवाले ने किया गजब काम, मोदी हुए थे मुरीद, अब मिला पद्मश्री
 
बता दें कि डी. प्रकाश राव कटक के बख्शीबाजार में एक स्लम में रहते हैं. यहीं उनकी चाय की दुकान भी है. प्रकाश बचपन में पढ़ाई करना चाहते थे, लेकिन उनके पिता उनसे अपने काम में मदद चाहते थे. जब वो ग्यारहवीं क्लास में थे तो उनके पिता को गंभीर बीमारी हो गई. इस वजह से पढ़ाई छोड़ वो दुकान चलाने लगे. हालांकि बाद में उन्होंने 2000 में एक स्कूल खोला और झुग्गी झोपड़ियों के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया.

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adminMarch 13, 20191min00

आज हम आपको बेंगलुरु के एक स्टार्टअप के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसने ग्राहकों की ज़रूरत को ध्यान में रखते हुए जैकेट्स के साथ एक नया प्रयोग किया है और ख़ास तरह की जैकेट्स तैयार की हैं। क्या आप ऐसी जैकेट्स के बारे में सोच सकते हैं, जो वज़न में बेहद हल्की हो, लेकिन पहनने वाले की सहूलियत के लिए उसमें 20 पॉकेट्स हों। इतना ही नहीं, इस जैकेट में आपको न तो गर्मी लगेगी और न ही इसे पहनने के बाद आपको पानी से इसे बचाने की ज़रूरत पड़ेगी। बेंगलुरु के इस स्टार्टअप का नाम है, एमिरेट फ़ैशन्स, जो ये ‘वर्सटाइल’ जैकेट्स बना रहा है।

इन जैकेट्स की असाधारण ख़ूबियों को दुनियाभर से सराहना और मान्यता मिल चुकी है। बेंगलुरु के ही रहने वाले सनीन जावली ने ये जैकेट्स तैयार की हैं और वर्सटाइल जैकेट्स नाम से मार्केट में मौजूद इन जैकेट्स को इंडिया बुक ऑफ़ वर्ल्ड रेकॉर्ड्स और वर्ल्ड रेकॉर्ड इंडिया द्वारा दुनिया की सबसे हल्की जैकेट का दर्जा भी दिया जा चुका है।

सनीन जावली ने नवंबर, 2016 में क्राउड फ़ंडिंग प्लेटफ़ॉर्म फ़्यूलड्रीम पर इसे लॉन्च किया था। वर्सटाइल जैकेट्स की सफलता की कहानी भी उतनी ही दिलचस्प है, जितनी इन जैकेट्स की ख़ूबियां। स्टार्टअप की शुरुआत से पहले सनीन आईबीएम में कंप्यूटर इंजीनियर थे। इस दौरान ही उन्होंने ऑन्त्रप्रन्योर बनने का फ़ैसला लिया। इस समय तक सनीन के पास बिज़नेस में लगाने के लिए सिर्फ़ 2 लाख रुपए ही थे। उन्होंने बिज़नेस की शुरुआत के लिए अपने दोस्त के साथ पार्टनरशिप की। उनके दोस्त का बेंगलुरु के आरटी नगर में गारमेंट मैनुफ़ैक्चरिंग का बिज़नेस था। दोनों ने मिलकर 2010 में एमिरेट्स फ़ैशन की शुरुआत की। एक साल ही बाद उनके इस दोस्त ने कंपनी छोड़ दी और सनीन ने 5 लोगों की टीम के साथ अपना बिज़नेस जारी रखा।

पुराने दिन याद करते हुए सनीन बताते हैं, “मैं बिज़नेस के लिए परंपरागत तरीक़े ही अपना रहा था और मेरे पास न तो कोई ख़ास बिज़नेस स्ट्रैटजी थी और न ही मैंने मार्केट के बारे में कुछ ख़ास रिसर्च की थी। शुरुआती कुछ सालों तक हम हर तरह की जैकेट्स और यूनिफ़ॉर्म्स वगैरह मैनुफ़ैक्चर और सप्लाई करते थे। लेकिन एमिरेट्स फ़ैशन्स सप्लाई के लिए सिर्फ़ बड़े ब्रैंड्स पर ही निर्भर नहीं रह सकते थे क्योंकि ऐसे में मामलों में पेमेंट्स समय पर नहीं होतीं।”

इस दौरान ही सनीन ने अलग तरह का प्रोडक्ट्स तैयार करने के लिए रिसर्च शुरू की। जल्द ही उन्हें एक अमेरिकी ब्रैंड की मल्टी-पॉकेट जैकेट SCOTTeVEST के बारे में पता चला। इस जैकेट की क़ीमत 250 डॉलर थी। ये जैकेट्स ख़ासतौर पर ट्रैवलर्स के लिए बनाई जाती थीं। सनीन ने तय किया कि वह भारत में भी इस तरह का प्रयोग करेंगे, लेकिन अपने डिज़ाइन के साथ। ज़्यादा से ज़्यादा ग्राहकों तक पहुंच बनाने के लिए उन्होंने तय किया कि वह अपने डिज़ाइन को किफ़ायती क़ीमतों पर उपलब्ध कराएंगे।

सनीन बताते हैं कि अमेरिकी ब्रैंड की जैकेट के बारे में जानने के बाद उन्होंने उसी दिन रात में 1.30 बजे अपने जैकेट का पहला डिज़ाइन तैयार किया। अगली सुबह उन्होंने अपने पैटर्न मास्टर और सैंपल मेकर के साथ मिलकर जैकेट का प्रोटोटाइप तैयार करवाया। क्राउड फ़ंडिंग प्लेटफ़ॉर्म फ़्यूलड्रीम पर लॉन्च करने के बाद सनीन को अपने डिज़ाइन्स के लिए ग्राहकों की अच्छी प्रतिक्रिया मिलने लगी। सनीन तो यहां तक दावा करते हैं कि वर्सटाइल भारत का एकमात्र ऐसा अपेयरल ब्रैंड है, जिसने क्राउडफ़ंडिंग के ज़रिए 70 लाख रुपए तक जुटाए हैं।

सनीन बताते हैं कि लॉन्च के दो घंटों के भीतर ही उन्हें 100 प्री-ऑर्डर्स मिल गए। वह बताते हैं कि लॉन्च के 6 महीनों के भीतर कंपनी ने 3000 प्री-ऑर्डर्स की मदद से 50 लाख रुपए कमाए। कंपनी ने अप्रैल, 2017 में अपना दूसरा डिज़ाइन लॉन्च किया- जो पूरी तरह से वॉटरप्रूफ़ बॉम्बर जैकेट का डिज़ाइन था और इसमें 20 पॉकेट्स और 32 फ़ीचर्स थे। इन फ़ीचर्स में सेफ़्टी डिफ़्लेक्टर्स भी शामिल थे। वर्सटाइल ने अपने तीसरे डिज़ाइन को फ़ेदर नाम दिया क्योंकि इस डिज़ाइन का वज़न सिर्फ़ 179 ग्राम था।

वर्सटाइल की टीम

सनीन दावा करते हैं कि उनका यह डिज़ाइन पिछले 8 महीनों से ऐमज़ॉन की जैकेट कैटगरी में बेस्ट सेलर है। इसके बाद कंपनी ने एक फ़ैन-कूल्ड डिज़ाइन लॉन्च किया, जिसमें 10 पॉकेट्स और 20 फ़ीचर्स थे। इतना ही नहीं, इस डिज़ाइन में रिवर्सिबल स्लीवलेस के फ़ीचर के साथ-साथ 11 न दिखाई देने वाली पॉकेट्स और आरएफ़आईडी प्रोटेक्शन के भी फ़ीचर्स थे।

वर्सटाइल की प्रोजेक्ट रेंज: 

-क्रेडिट और डेबिट कार्ड्स वगैरह सुरक्षित रखने के लिए आरएफ़आईडी थेफ़्ट प्रोटेक्शन के फ़ीचर्स के साथ जैकेट्स और वॉलेट्स

-रिवर्सिबल पैंट्स और टी-शर्ट्स

-स्टेन रेपलेंट और स्पिल-प्रूफ़ शर्ट्स और टी-शर्ट्स

-चार अलग-अलग तरीक़ों से चार अलग-अलग कलर्स के साथ पहनी जा सकने वालीं मल्टी-वे वियरेबल टी-शर्ट्स

सनीन ने बताया कि उनका ब्रैंड हर महीने कम से कम एक नया प्रोडक्ट ज़रूर लॉन्च करता है। हाल में, वर्सटाइल ऐमज़ॉन के टॉप-100 बेस्टसेलर ब्रैंड्स में से एक है। वर्सटाइल का दावा है कि ऑनलाइन मार्केटप्लेस और देश में चुनिंदा जगहों पर मौजूद ऑफ़लाइन रीटेल स्टोर्स के ज़रिए एक महीने में 20 हज़ार से भी ज़्यादा यूनिट्स बेची जाती हैं। कंपनी ने अभी तक 3 लाख से अधिक यूनिट्स की सेल कर ली है। सनीन दावा करते हैं कि वर्सटाइल 100 प्रतिशत की मासिक विकास दर के साथ आगे बढ़ रहा है।

वर्सटाइल की योजना है कि अगले दो सालों में 200 नए लोगों को टीम में शामिल किया जाए और साथ ही, कंपनी ने फ़्रैंचाइज़ी मॉडल पर भी काम करना शुरू कर दिया है। सनीन का कहना है कि उन्हें उम्मीद है कि 2020 तक उनके ब्रैंड के भारत और विदेश में कम से कम 10 रीटेल स्टोर्स खुल जाएंगे। साथ ही, सनीन ने बताया कि इस वित्तीय वर्ष में उनकी कंपनी का रेवेन्यू 6 करोड़ रुपए का भी आंकड़ा पार कर जाएगा।


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adminFebruary 28, 20191min00

हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला के पास एक कुत्ते को किसी कार ने जोरदार टक्कर मार दी थी। उसका बायां पैरा बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया था। वह कुत्ता वहीं पर तड़पता रहा, लेकिन किसी ने उसकी चीख नहीं सुनी। लेकिन ‘पीपल फार्म’ की नजर उस पर पड़ी और फार्म के वॉलंटीयर्स ने उसे उठाकर अस्पताल पहुंचाया गया। उस कुत्ते का नाम रखा गया ओरियन।

पीपल फार्म की स्थापना जोएलेन एंडर्सन ने की थी। वे कहती हैं, ‘ओरियन की सर्जरी होने के बाद हम उसे फार्म में लेकर आए। हमने उसके घावों पर पट्टी बांधी और हर रोज उसका ख्याल रखा। इतना ख्याल रखने की वजह से चमत्कारिक ढंग से, वह सिर्फ एक महीने में ठीक हो गया। अब वह पूरी तरह से ठीक हो चुका है। उसके ठीक होने की खुशी में ही मेरी खुशी है।’

पीपल फार्म एक पशु देखभाल केंद्र है जहां पर ऑर्गैनिक फार्मिंग भी की जाती है। यह हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के धनोटू गांव के पास स्थित है। इस फार्म में हर प्रकार के घायल जानवरों का इलाज किया जाता है, जिसमें बिल्लियां, खच्चर, सुअर, आवारा कुत्तों से लेकर गाय तक शामिल रहती हैं। इसे 2014 में रॉबिन सिंह, जोएलिन और शिवानी भल्ला ने शुरू किया था। इसका उद्देश्य घायल जानवरों की देखभाल करना था।

इस फार्म में एक पशु चिकित्सालय है, एक गौशाला और एक कुत्तों का आसरा घर भी है। ये सब फिर से उपयोग की जाने वाली सामग्री से बना है। पीपल फार्म ने अब तक 590 से भी ज्यादा जानवरों को बचाया है और 128 जानवरों की नसबंदी की है। वहीं 100 जानवरों को गोद लेकर उन्हें नई जिंदगी दी है। इसमें 89 जानवर तो ऐसे थे जिन्हें सड़क पर तड़पड़ता छोड़ दिया गया था।

रॉबिन ने योरस्टोरी से बात करते हुए कहा, ‘भारत में आवारा पशुओं के प्रति क्रूरता बेहद आम है। पीपल फार्म का लक्ष्य जानवरों को मिलने वाले दुख और उनके साथ होने वाले अमानवीय व्यवहार को खत्म करना है।’ पीपल फार्म में एक 8 साल के कुत्ते को किसी ने पत्थर फेंक कर मार दिया था जिससे उसकी आंख खराब हो गयी थी। एक बैल पर किसी ने खौलता हुआ पानी डाल दिया था। एक गाय जिसका नाम लक्ष्मी रखा गया उसके पैर पर किसी ने मार दिया था। इन सब जानवरों को पीपल फार्म में आसरा मिला। पीपल फार्म के वॉलंटीयर इन सब जानवरों की देखभाल करते हैं।

 

पीपल फार्म में वॉलंटीयर के तौर पर काम करने वाली रवीना सीकरी कहती हैं, ‘हमने इन सभी जानवरों की अच्छे से देखभालकी और पशु चिकित्सकों की मददद से उचित दवाएं भी दीं।। हमने उन्हें हर दिन प्यार और स्नेह दिया। हमारे फार्म में 23 वॉलंटीयर हैं जो कि आवारा जानवरों की सेवा में हमेशा तत्पर रहते हैं।’

पीपल फार्म अपने आठ किलोमीटर के दायरे में बचाव अभियान चलाता है। रॉबिन बताते हैं, “जैसे ही किसी भी पड़ोसी क्षेत्र के निवासी घायल जानवर को पाते हैं तो वे हमें फोन करते हैं या एक ईमेल भेजते हैं। इसके बाद हमारा बचाव दल तुरंत स्थान पर पहुंच जाता है और घाव की गंभीरता के आधार पर, वे जानवर को आगे के उपचार के लिए फार्म में लाते हैं। अगर चोट मामूली होती है तो इसका मौके पर ही इलाज कर दिया जाता है। पीपल फार्म में हमीरपुर और डलहौजी जैसी जगहों से भी फोन आते हैं जो कि सौ किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। ऐसी स्थिति में फोन करने वाले को जानवर को पीपल फार्म तक छोड़ने के लिए कहा जाता है।

अगर किसी जानवर को जॉइंट रिप्लेसमेंट, फ्रैक्चर रिपेयर, स्किन ट्रांसप्लांट जैसी सर्जरी की आवश्यकता होती है तो उसे फार्म के डॉक्टर ही अंजाम देते हैं। बेल्जियम के जस्टिन केउलिन और स्टेला मिनोए अभी यहां वेटरनरी सर्जन के तौर पर काम कर रहे हैं। अगर जानवर की हालत ज्यादा खराब होती है तो उसे नजदीकी पशु चिकित्सक के पास ले जाया जाता है। रॉबिन कहते हैं, ‘सर्जरी हो जाने के बाद जानवरों को फार्म में तब तक देखभाल के लिए रखा जाता है जब तक कि वे पूरी तरह से ठीक नहीं हो जाते। बाद में उन्हें या तो उस स्थान पर वापस ले जाया जाता है जहाँ वे रहते हैं या उन्हें किसी को गोद में दे दिया जाता है।

भारत में जानवरों और उनके कल्याण के प्रति उदासीनता कोई नई बात नहीं है। ऐसी कई घटनाएं हमारे सामने आई हैं जब लोगों ने अपने पालतू जावरों पर अत्याचार किया। पीपल फार्म को इसी उद्देश्य के लिए शुरू किया गया था ताकि ऐसे जानवरों की देखरेख की जा सके। इसे शुरू करने वाले रॉबिन अमेरिका में प्रोग्रामर के तौर पर काम कर रहे थे। बाद में उन्होंने डिजिटल डाउनलोड्स और गुड्स को बेचने के लिए अपने ऑनलाइन मार्केटप्लेस ई-जंकी की स्थापना की।

एक वॉलंटीयर

 

रॉबिन कहते हैं, ‘मैंने पुडुचेरी के ऑरोविल का सफर किया तो मुझे अहसास हुआ कि हमें भी समाज को कुछ वापस देना चाहिए। मैं वहां एक ऐसे व्यक्ति से मिला जो लावारिस छोड़ दिए गए कुत्तों की देखभाल करता था। तब से मैं लगातार इस काम में लगा हुआ हूं।’ रॉबिन ने दिल्ली में जानवरों की नसबंदी का कार्यक्रम शुरू किया। ठीक उसी वक्त वे किसी ऐसे ठिकाने की तलाश में थे जहां पर घायल जानवरों के इलाज की व्यवस्था की जा सके। शिवानी ई-जंकी में रॉबिन की सहकर्मी थीं और जॉएलेन एक बिजनेस मीटिंग के सिलसिले में अमेरिका में रॉबिन से मिली थीं। उन्होंने मिलकर एक टीम बनाई और पीपल फार्म की स्थापना की।

पीपल फार्म में जानवरों की देखरेख के अलावा ऑर्गैनिक फार्मिंग को भी बढ़ावा दिया जाता है। यहां वॉलंटीयर प्रोग्राम भी संचालित किए जाते हैं जिसमें सप्ताह में छह दिन पूरे दिन में चार घंटे काम करना शामिल होता है। वॉलंटीयर्स से उम्मीद की जाती है कि वे जानवरों के बचाव और देखभाल में मदद करें और साथ ही खेतों में काम करने में मदद करें। पीपल फार्म से जानवरों को गोद भी लिया जा सकता है। इसकी जानकारी वेबसाइट से ली जा सकती है।



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