पुरानी यादें

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adminFebruary 14, 20191min30

हाल ही में एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा में दमदार किरदार में नजर आई जूही चावला मिस इंडिया भी रह चुकी हैं. मिस इंडिया के दौरान की उनकी एक तस्वीर सोशल मीडिया में खूब वायरल हो रही हैं.
बॉलीवुड की खूबसूरत अदाकारा जूही 1984 में मिस इंड‍िया बनी थीं. उन्हें मिस इंड‍िया का ताज एक्ट्रेस रेखा ने पहनाया था. दोनों की ये अनसीन तस्वीर सामने आई है. तस्वीर को खूब पसंद किया जा रहा है.

 
35 साल पहले रेखा ने जूही चावला को यूं पहनाया था मिस इंड‍िया का ताज
 

1984 में मिस इंड‍िया का ताज जीतने के बाद जूही चावला ने बॉलीवुड में 1986 में डेब्यू किया था. पुरानी तस्वीर में जूही चावला और रेखा को देखना काफी दिलचस्प है.

 

35 साल पहले रेखा ने जूही चावला को यूं पहनाया था मिस इंड‍िया का ताज
 

इसके बाद 1988 में आई फिल्म “कयामत से कयामत तक” की सफलता ने जूही को शोहरत की बुलंदी पर पहुंचा द‍िया. फिल्म में वे आमिर खान के साथ जोड़ी में थीं. जूही चावला हाल ही में फिल्म एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा में नजर आई थीं. इस फिल्म में उनकी जोड़ी अनिल कपूर संग नजर आई. जूही चावला बॉलीवुड एक्ट्रेस होने के साथ प्रोड्यूसर, आईपीएल टीम कोलकाता नाइट राइडर्स में शाहरुख खान संग पाटर्नर हैं.


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adminFebruary 11, 20192min70

टीना मुनीम 80 के दशक में बॉलीवुड की ग्लैमरस अभिनेत्रियों में शुमार थीं. 1978 में उन्होंने देव आनंद की फिल्म देश परदेश से अपने बॉलीवुड करियर की शुरुआत की. इसके बाद वे देव साहेब संग कुछ और फिल्मों में भी नजर आईं.

 

संजय दत्त संग था टीना मुनीम का अफेयर, इस वजह से हुए अलग
 

सबसे ज्यादा पॉपुलैरटी उन्हें ऋषि कपूर के अपोजिट कर्ज और संजय दत्त के अपोजिट रॉकी फिल्म से मिली. रॉकी फिल्म की शूटिंग के दौरान संजय संग उनके अफेयर की भी चर्चाएं रहीं. बाद में टीना ने बड़े उद्दयोगपति धीरूभाई अंबानी के छोटे बेटे अनिल अंबानी संग शादी की.

 

संजय दत्त संग था टीना मुनीम का अफेयर, इस वजह से हुए अलग
 

फरवरी 1991 में टीना ने अनिल अंबानी से शादी की. इसके बाद उन्होंने फिल्मों में काम नहीं किया. उनके दो बेटे अनमोल और अंशुल हैं.

 

संजय दत्त संग था टीना मुनीम का अफेयर, इस वजह से हुए अलग

 

1981 में फिल्म रॉकी की शूटिंग के दौरान टीना और संजय दत्त के बीच रोमांस के चर्चे थे. दोनों डेट भी करते रहे, लेकिन कहा जाता है कि संजय की नशे और ड्रग की लत के कारण इस रिश्ते का अचानक अंत हो गया.

 

संजय दत्त संग था टीना मुनीम का अफेयर, इस वजह से हुए अलग
 

सुपरस्टार राजेश खन्ना संग भी उनके अफेयर की अफवाहें उड़ी थीं. यासिर उस्मान द्वारा लिखी संजय दत्त पर लिखी गई विवादित बायोग्राफी “द क्रेजी अनटोल्ड स्टोरी ऑफ बॉलीवुड बेड बॉय” के मुताबिक ब्रेकअप के बाद संजय दत्त को काफी मुश्क‍िल हालात का सामना करना पड़ा था.

 

संजय दत्त संग था टीना मुनीम का अफेयर, इस वजह से हुए अलग
 

किताब के मुताबिक 1982 में एक शाम संजय दत्त के पड़ोसी बंदूक चलने की आवाज सुनकर चौंक गए. संजय दत्त ने अपने घर पर हवा में 22 बोर की रायफल लहराई थी. कुछ ही मिनटों में पड़ोसी और जानने वाले लोग इकट्ठे हो गए.

 

संजय दत्त संग था टीना मुनीम का अफेयर, इस वजह से हुए अलग

 

टीना से ब्रेकअप के बाद संजय परेशान हो गए थे. ओपन फायर करने के अलावा उन्होंने तोड़फोड भी की थी. बता दें कि संजय दत्त इन बातों का खंडन भी कर चुके हैं. उनके मुताबिक ये बातें बेबुनियाद हैं.


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adminFebruary 9, 20191min30

Jagjit Singh Birthday जगजीत सिंह गजलों की दुनि‍या के बेताज बादशाह माने जाते थे. वे एक समय के लि‍ए गजलों की जुबां बन गए थे. देश-दुन‍िया में उनके सैकड़ों कंसर्ट हुए.

जगजीत सिंह गजलों की दुनि‍या के बेताज बादशाह माने जाते थे. वे एक समय के लि‍ए गजलों की जुबां बन गए थे. देश-दुन‍िया में उनके सैकड़ों कंसर्ट हुए. 8 फरवरी 1941 को जन्मे जगजीत ने कई फिल्मों में संगीत दिया, लेकिन बाद में गज़ल गायकी में ही रम गए. उन्होंने गज़ल को बिल्कुल अलग अंदाज में गाया. इसके लिए उनकी आलोचना हुई और आरोप लगा कि जगजीत ने गज़ल के शास्त्रीय अंदाज की अनदेखी की. हालांकि, जगजीत ऐसे आरोपों को सिरे से खारिज करते रहे. बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी, वो कागज की कस्ती, तुम इतना जो मुस्करा रहे हो, आहिस्ता-आहिस्ता जैसे तमाम गज़ल-गीत संगीत की दुनिया को जगजीत की अनमोल भेंट हैं.

ऐसा बीता जगजीत का बचपन

जगजीत सिंह का जन्म 8 फरवरी, 1941 को बीकानेर (राजस्थान) में हुआ था. जन्म के वक्त उनका नाम जगजीवन सिंह था. उन्होंने सरकारी स्कूल और खालसा कॉलेज से पढ़ाई की. उनके पिता चाहते थे कि जगजीत इंजीनियर बने. पढ़ाई के बाद जगजीत सिंह ने ऑल इंडिया रेडियो जालंधर में एक सिंगर और म्यूजिक डायरेक्टर के रूप में काम शुरू कर दिया. उसके बाद कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी हरियाणा से पोस्ट ग्रेजुएट की पढ़ाई भी की. जगजीत सिंह ने गुरुद्वारे में पंडित छगनलाल मिश्रा और उस्ताद जमाल खान से क्लासिकल संगीत की शिक्षा ली.

घर वालों को बिना बताए चले गए मुंबई

मार्च 1965 में जगजीत सिंह अपने परिवार को बिना बताए मुंबई चले आए और स्ट्रगल शुरू कर दिया. स्ट्रगलिंग के समय में उन्होंनं 200 रुपये के लिए भी गाया. मुंबई में जगजीत सिंह की मुलाकात एक बंगाली महिला चित्रा दत्ता से हुई और दोनों 1969 में शादी के बंधन में बंध गए. इन्हें एक बेटा विवेक भी हुआ. साल 1976 में जगजीत सिंह और चित्रा की एल्बम ‘The Unforgettable’ रिलीज हुई, जिसे काफी सराहा गया. इसकी वजह से ये दोनों कपल स्टार बन गए. एल्बम का गीत ‘बात निकलेगी’ काफी पसंद किया गया. जगजीत सिंह और चित्रा सिंह एक साथ कई सारे कॉन्सर्ट किया करते थे और अलग-अलग गजल एल्बम का हिस्सा भी बने. इनका 1980 में आया हुआ एल्बम ‘वो कागज की कश्ती’ बेस्ट सेलिंग एल्बम बन गया था. उस जमाने में जगजीत सिंह गजल किंग बन गए थे. प्राइवेट एल्बम के साथ-साथ जगजीत ने फिल्मों में भी कई गजलें गाईं , उनमें ‘प्रेम गीत’, ‘अर्थ’, ‘जिस्म’, ‘तुम बिन’, ‘जॉगर्स पार्क’ जैसी फिल्में प्रमुख हैं.

 

बेटे के न‍िधन के बाद टूट गए थे जगजीत

 जगजीत सिंह के बेटे विवेक की मात्र 18 साल की उम्र में एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी. इसकी वजह से उनकी पत्नी चित्रा सिंह काफी अपसेट रहने लगी थीं और एक वक्त के बाद उन्होंने गाना तक छोड़ दिया था.

जब गजत सम्राट ने दुन‍िया को कहा अलव‍िदा

भारत सरकार की तरफ से जगजीत सिंह को साल 2003 में ‘पद्म भूषण’ सम्मान से नवाजा गया था. साल 2011 में जगजीत सिंह को यूके में गुलाम अली के साथ परफॉर्म करना था, लेकिन cerebral hemorrhage की वजह से उन्हें 23 सितम्बर 2011 को मुंबई के लीलावती अस्पताल में भर्ती कराया गया. हालत बिगड़ती गई, जगजीत सिंह कोमा में चले गए और 10 अक्टूबर 2011 को जगजीत सिंह ने आखिरी सांसें ली.


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adminJanuary 29, 20191min100

George Fernandes पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस की मां किंग जॉर्ज-V की प्रशंसक थी, इसलिए उन्होंने अपने पहले बेटे का नाम जॉर्ज रखा था.

 

देश के पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस का 88 साल की उम्र में निधन हो गया है. जॉज फर्नांडिस ने साल 1967 से 2004 तक 9 लोकसभा चुनाव जीते और इस दौरान उन्होंने कई बड़े मंत्रालय भी संभाले, जिसमें रक्षामंत्री, कम्यूनिकेशन, इंडस्ट्री और रेलवे मंत्रालय का नाम शामिल है. ‘अनथक विद्रोही’ के नाम से मशहूर जॉर्ज फर्नांडिस ने देश में कई बड़ी हड़ताल और विरोध का नेतृत्व किया था, जिसमें 1974 में की गई देशव्यापी रेल हड़ताल अहम है.

जॉर्ज फर्नांडिस का जन्म 3 जून 1930 को जॉन जोसफ फर्नांडिस के यहां मेंगलुरू में हुआ था. वे अपने 6 भाई-बहनों में सबसे बड़े थे और उनके नाम के पीछे भी बड़ी रोचक कहानी है. दरअसल उनकी मां किंग जॉर्ज-V की प्रशंसक थी, इसलिए उन्होंने अपने पहले बेटे का नाम जॉर्ज रखा था. बता दें कि किंग जॉर्ज का जन्म भी 3 जून को ही हुआ था. कहा जाता है कि जॉर्ज फर्नांडिस 10 भाषाओं के जानकार थें, जिसमें हिंदी, अंग्रेजी, तमिल, मराठी, कन्नड़, उर्दू, तुलु, कोंकणी आदि भाषाएं शामिल हैं.

उन्होंने अपने शुरुआती सालों में अपने घर के पास सरकारी स्कूल और चर्च स्कूल में पढ़ाई की थी. उसके बाद उन्होंने St. Aloysius College से पढ़ाई की. रिपोर्ट्स के अनुसार उनके पिता उन्हें वकील बनाना चाहते थे, लेकिन जॉर्ज फर्नांडिस वकील नहीं बनना चाहते थे.

मंगलौर में शुरुआती पढ़ाई करने के बाद फर्नांडिस को एक क्रिश्चियन मिशनरी में पादरी बनने की शिक्षा लेने भेजा गया. हालांकि चर्च में उनका मोहभंग हो गया और उन्होंने 18 साल की उम्र में चर्च छोड़ दिया और मुंबई चले गए. उसके बाद सोशलिस्ट पार्टी और ट्रेड यूनियन आंदोलन के कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे. फर्नांडिस की शुरुआती छवि एक जबरदस्त विद्रोही की थी.

 
गौरतलब है कि इमरजेंसी के दौरान जॉर्ज फर्नांडिस काफी एक्टिव रहे थे, आपातकाल हटने के बाद वह राजनीति में कूदे और पहली बार चुनाव लड़ा. उन्होंने जेल में रहते हुए ही बिहार के मुजफ्फरपुर से चुनाव लड़ा और उसमें जीत भी हासिल की. उसके बाद वो कई बार मंत्री बने और अटल बिहार वाजपेयी की सरकार में वे रक्षा मंत्री थे.

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adminJanuary 23, 20191min100

Bal Thackeray Birth Anniversary: बाल ठाकरे के बारे में किसने सोचा था कि एक कार्टूनिस्ट कभी राजनेता बनेना और राजनेता ऐसा जिस पर कई बार कानून तोड़ने के आरोप लगे. लेकिन फिर भी ठाकरे बोलते रहे, उन्हें किसी का डर नहीं था. यही पहचान उनकी खासयित थी. बाबरी विध्वंस से लेकर उत्तर भारतीयों पर हमलों के आरोप के बावजूद ठाकरे महाराष्ट्र में सत्ता के केंद्र बिंदू बने रहे. आइए आज उनकी जयंती पर जानते हैं उनसे जुड़ी ये कुछ खास बातें..

बाल ठाकरे का जन्‍म तत्‍कालीन बोम्‍बे रेजिडेंसी के पुणे में 23 जनवरी 1926 को एक मराठी परिवार में हुआ था. उनका असल नाम बाल केशव ठाकरे है. बाला साहब ठाकरे और हिदू हृदय सम्राट के नाम से भी उन्‍हें जाना जाता है. बता दें, 9 भाई-बहनों में बाल ठाकरे सबसे बड़े थे.

बाल ठाकरे ने शिवसेना नाम की राजनीतिक पार्टी का भी गठन किया. उनकी पार्टी की महाराष्‍ट्र में अच्‍छी पकड़ है और बाहरी लोगों के विरोध के कारण उन्‍हें ज्‍यादा पहचान मिली.

 

ऐसे शुरू हुआ उनका करियर

बाल ठाकरे अच्छे कार्टूनिस्ट थे, जिन्होंने महाराष्ट्र में अपनी पहचान खुद बनाई. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत मुंबई के एक अंग्रेजी दैनिक ‘द फ्री प्रेस जर्नल’ के साथ बातौर कार्टूनिस्‍ट की. साल 1960 में बाल ठाकरे ने कार्टूनिस्‍ट पद की नौकरी छोड़ दी. जिसके बाद अपना राजनीतिक साप्‍ताहिक अखबार मार्मिक निकाला. आपको बता दें, बाल ठाकरे के कार्टून ‘टाइम्‍स ऑफ इंडिया’ में हर रविवार को छपा करते थे.

 

पिता से हुए प्रेरित

बाल ठाकरे का राजनीतिक दर्शन उनके पिता से प्रभावित था. उनके पिता केशव सीताराम ठाकरे ‘संयुक्‍त महाराष्‍ट्र मूवमेंट’ के जाने-पहचाने चेहरा थे. उनके पिता केशव सीताराम ठाकरे ने भाषायी आधार पर महाराष्‍ट्र राज्‍य के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया था. बता दें बाल ठाकरे शिवसेना के मुखपत्र मराठी अखबार ‘सामना’ और हिन्‍दी अखबार ‘दोपहर का सामना’ के फाउंडर थे.

 

परिवार

बाल ठाकरे की पत्‍नी का नाम मीना ठाकरे था, साल 1995 में उनकी मृत्यु हो गई थी. उनके तीन बेटे स्‍वर्गीय बिंदुमाधव, जयदेव और उद्धव ठाकरे हैं. बता दें, उनके बड़े बेटे बिंदुमाधव ठाकरे की एक सड़क दुर्घटना में 20 अप्रैल 1996 को मुंबई-पुणे हाइवे पर मौत हो गई थी.

 

जब हुआ शिवसेना का गठन

1966 में बाल ठाकरे ने मुंबई के राजनीतिक और व्‍यावसायिक परिदृष्‍य पर महाराष्‍ट्र के लोगों के अधिकार के लिए राजनीतिक पार्टी ‘शिवसेना’ का गठन किया था. शुरुआती दिनों से ही शिवसेना की राजनीति विवाद का केंद्र रही. सत्ताधारी पार्टियां तक उनसे डरती थीं. शिवसेना का शाब्दिक अर्थ ‘शिव की सेना’ है. शिव से अर्थ महान मराठा शिवाजी से है. इन दिनों बाल ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे पार्टी की कमान संभाल रहे हैं.

शिवसेना के गठन के बाद भी पार्टी का मुख्‍य उद्देश्‍य मराठी लोगों के लिए दक्षिण भारतीय लोगों, गुजरातियों और मारवाड़ियों से काम की सुनिश्चितता था. अपने हिन्‍दूवादी एजेंडे का साथी शिवसेना को बीजेपी के रूप में मिला और दोनों ने मिलकर 1995 में महाराष्‍ट्र विधानसभा चुनाव जीता. बता दें, बाल ठाकरे हमेशा मराठी मानुष की लड़ाई लड़ते रहे. उन्‍होंने मुंबई पर मराठियों का पहला अधिकार बताते हुए बाहरी लोगों को यहां से खदेड़ने की आवाज उठाई. बता दें,  बाल ठाकरे ने बीमारी के चलते कुछ समय तक खुद को पार्टी के दैनिक कार्यों से अलग कर लिया था.

 

नहीं लड़ा कभी चुनाव

मायानगरी मुंबई को अपना गढ़ बनाकर काम करने वाले बाल ठाकरे ने न तो कभी कोई चुनाव लड़ा, न ही कोई राजनीतिक पद स्वीकार किया. इसके बावजूद वह महाराष्ट्र की राजनीति में अहम भूमिका निभाते रहे थे.

 

जब लगा 6 साल तक बैन

28 जुलाई 1999 को बाल ठाकरे पर चुनाव आयोग की सिफारिश पर 6 साल के लिए वोट न डालने और चुनाव न लड़ने का बैन लगा दिया गया था. 2005 में उन पर  लगे बैन को हटा लिया गया और उन्‍होंने इसके बाद पहली बार 2006 में बीएमसी चुनाव के लिए वोट डाला. बता दें, धर्म के नाम पर वोट मांगने के आरोप में उन्हें बैन कर दिया गया था.

 

माइकल जैक्‍सन से जब हुई थी मुलाकात

1996 में पॉप स्‍टार माइकल जैक्‍सन एक कन्‍सर्ट के लिए मुंबई आए और शिवसेना ने उनका बड़ी ही गर्मजोशी से स्‍वागत किया था. माइकल जैक्‍सन बाल ठाकरे के घर गए और कहा जाता है कि उन्‍होंने उस टॉयलेट सीट पर ऑटोग्राफ भी दिया, जिसका उन्‍होंने इस्‍तेमाल किया था.

 

निधन

17 नवंबर 2012 का ही वो दिन था जब मुंबई समेत पूरे देश में शोक की लहर फैल गई थी. 86 साल के ठाकरे का निधन मुंबई में उनके निवास मातोश्री में दोपहर करीब साढ़े तीन बजे हुआ था.

(शिवाजी पार्क में हुआ था अंतिम संस्कार)

डॉक्टरों के मुताबिक दिल का दौरा पड़ने से ठाकरे का निधन हुआ था. मायानगरी मुंबई को अपना गढ़ बनाकर काम करने वाले बाल ठाकरे अपने विवादित बयानों की वजह से अक्सर सुर्खियां बटोरते रहे हैं…


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adminJanuary 22, 20191min90

भारत भले ही 15 अगस्त 1947 को आजाद हो गया था, लेकिन भारत को 26 जनवरी 1950 को पूर्व गणराज्य बना. इसी दिन को पूरा भारत गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है. बता दें, 26 जनवरी 1950 को दो साल के अधिक समय में तैयार हुआ संविधान लागू हुआ और इस संविधान से भारत के हर नागरिक को अपनी सरकार चुनकर अपना शासन चलाने का अधिकार मिला.  इसी दिन 21 तोपों की सलामी के बाद डॉ. राजेन्‍द्र प्रसाद ने राष्ट्रीय ध्वज फहरा कर भारतीय गणतंत्र के ऐतिहासिक जन्‍म की घो‍षणा की थी.

भारत के गणतंत्र की यात्रा कई सालों पुरानी थी और जो 1930 में एक सपने के रूप में संकल्पित की गई और करीब 20 साल बाद 1950 में यह पूरी हुई. दरअसल गणतंत्र राष्‍ट्र की कल्पना की शुरुआत 31 दिसंबर 1929 को रात में भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस के लाहौर सत्र में हुई थी. यह सत्र पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्‍यक्षता में आयोजि‍त किया गया था.

इसी बैठक में हिस्सा लेने वाले लोगों ने पहले 26 जनवरी को “स्‍वतंत्रता दिवस” के रूप में मनाने करने की शपथ ली थी, जिससे कि ब्रिटिश राज से पूर्ण स्‍वतंत्रता के सपने को साकार किया जा सके. इसके बाद लाहौर सत्र में नागरिक अवज्ञा आंदोलन की रूपरेखा तैयार हुई और यह फैसला लिया गया कि 26 जनवरी 1930 को ‘पूर्ण स्‍वराज दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा. इसके लिए सभी क्रांतिकारियों और पार्टियों ने एकजुटता दिखाई.

उसके बाद भारतीय संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को की गई, जिसका गठन भारतीय नेताओं और ब्रिटिश कैबिनेट मिशन के बीच हुई बातचीत के बाद किया गया था. इस सभा का उद्देश्य भारत को एक संविधान प्रदान करना था. कई चर्चाओं और बहस के बाद भारतीय संविधान पर अंतिम रूप देने से पहले कई बार संशोधित किया गया. उसके बाद 3 साल बाद 26 नवंबर 1949 को आधिकारिक रूप से अपनाया गया.

भारत तो 15 अगस्त 1947 को आजाद हो गया था, लेकिन जब 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के बाद भारत को सही मायने में आजादी मिली. इसी दिन डॉ. राजेन्‍द्र प्रसाद ने गवर्नमेंट हाउस के दरबार हाल में भारत के प्रथम राष्‍ट्रपति के रूप में शपथ ली और उन्‍होंने राष्‍ट्रीय ध्‍वज भी फहराया. बता दें कि 395 अनुच्‍छेदों और 8 अनुसूचियों के साथ भारतीय संविधान दुनिया में सबसे बड़ा लिखित संविधान है.


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adminJanuary 12, 20191min70

Swami Vivekananda Birth Anniversary: ‘मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों’ से 126 साल पहले स्वामी विवेकानंद ने शिकागो (अमेरिका) में विश्व धर्म संसद में एक भाषण की शुरुआत की थी. विवेकानंद का दिया हुआ ये भाषण इतिहास के पन्नों में सदा के लिए अमर हो गया. ये तो सभी जानते हैं कि जब उन्होंने ये भाषण दिया था को पूरे सभागार कई मिनटों तक तालियों की गूंज हर तरफ गूंजती रही. लेकिन क्या आप जानते हैं जिस भाषण को देने के बाद जहां उन्हें एक अलग पहचान मिली, उस भाषण देने शिकागो नहीं जाना चाहते थे विवेकानंद. आइए जानते हैं- क्या थी वजह

बताया जाता है कि दक्षिण गुजरात के काठियावाड़ के लोगों ने सबसे पहले स्वामी विवेकानंद को विश्व धर्म सम्मेलन में जाने का सुझाव दिया था. फिर चेन्नई के उनके शिष्यों ने भी निवेदन किया. खुद विवेकानंद ने लिखा था कि तमिलनाडु के राजा भास्कर सेतुपति ने पहली बार उन्हें यह विचार दिया था. जिसके बाद स्वामी जी कन्याकुमारी पहुंचे थे.

 

जब शिष्यों ने जुटाए पैसे

जब स्वामी विवेकानंद चेन्नई से वापस लौटे उस दौरान उनके शिष्यों ने शिकागो जाने लिए पैसे जोड़े थे, लेकिन जब इस बारे में विवेकानंद को मालूम चला तो उन्होंने कहा कि जमा किए हुए सारे पैसे गरीबों में बांट दिए जाए. बता दें, शिकागो (अमेरिका) में विश्व धर्म सम्मेलन में भाषण देने के स्वामी विवेकानंद ने जो कष्ट उठाने पड़ें. शिकागो पहुंचकर भाषण देने इतना आसान बात नहीं थी.

 

मालगाड़ी में बिताई रात, नहीं थे खर्चे के पैसे

स्वामी विवेकानंद विश्व धर्म सम्मेलन के पांच हफ्ते पहले ही शिकागो पहुंच गए थे. शिकागो काफी महंगा शहर था. उनके पास खर्चे के पर्याप्त पैसे नहीं थे. और जितने पैसे उनके पास थे वह खत्म हो रहे थे.

 

शिकागो की ठंड

जब स्वामी विवेकानंद शिकागो के लिए मुंबई से रावाना हो रहे थे उस दौरान उनके दोस्तों ने कुछ गर्म कपड़े दिए थे, लेकिन जब विवेकानंद का जहाज 25 जुलाई 1893 को  शिकागो पहुंचा तो वहां कड़कड़ाती ठंड थी. उन्होंने लिखा- “मैं हडि्डयों तक जम गया था”. शायद मेरे दोस्तों को नॉर्थवेस्ट अमेरिका की कड़ाके की ठंड का अनुमान नहीं था.

 

5 हफ्ते पहले पहुंच गए थे शिकागो

स्वामी विवेकानंद 5 हफ्ते पहले शिकागो पहुंच गए थे. जितने पैसे थे वह धीरे- धीरे खत्म हो गए थे. पैसे न होना और कड़ाके की ठंड की वजह से उनका शरीर थककर चूर हो गया था. जिसके बाद उन्हें खुद को कड़ाके की सर्दी से बचाने के लिए यार्ड में खड़ी मालगाड़ी में रात गुजारनी पड़ी थी.

 

जानें किसका हिस्सा था ‘धर्म सम्मेलन’

साल 1893 का ‘विश्व धर्म सम्मेलन’ कोलंबस द्वारा अमेरिका की खोज करने के 400 साल पूरे होने पर आयोजित विशाल विश्व मेले का एक हिस्सा था. अमेरिकी नगरों में इस आयोजन को लेकर इतनी होड़ थी कि अमेरिकी सीनेट में न्यूयॉर्क, वॉशिंगटन, सेंट लुई और शिकागो के बीच मतदान कराना पड़ा, जिसमें शिकागो को बहुमत मिला था. जिसके बाद तय हुआ कि  ‘धर्म सम्मेलन’ विश्व मेले का हिस्सा है.

बता दें, 1893 में स्वामी विवेकानंद ने मुंबई से यात्रा शुरू करके याकोहामा से एम्प्रेस ऑफ इंडिया नामक जहाज से शुरू की थी जहां बैंकुअर पहुंचकर ट्रेन से शिकागो भाषण देने पहुंचे थे.

 

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adminJanuary 3, 20192min240

भारतीय क्रिकेट को सचिन तेंदुलकर जैसा नायाब तोहफा देने वाले कोच रमाकांत आचरेकर का बुधवार को निधन हो गया. सचिन ने शोक व्यक्त करते हुए कहा, ‘आचरेकर सर की उपस्थिति से स्वर्ग में भी क्रिकेट समृद्ध होगा.’

सचिन से आचरेकर ने कहा था- ऐसा करो कि लोग तुम्हारे लिए ताली बजाएं
 
सचिन ने कहा, ‘अन्य छात्रों की तरह मैंने भी क्रिकेट की एबीसीडी सर के मार्गदर्शन में ही सीखी. मेरे जीवन में उनके योगदान को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता. उन्होंने वह नींव रखी, जिस पर मैं खड़ा हूं.’
 
सचिन से आचरेकर ने कहा था- ऐसा करो कि लोग तुम्हारे लिए ताली बजाएं
 
सचिन ने पिछले साल शिक्षक दिवस पर वीडियो पोस्ट कर उस वाकये को याद किया था, जिसने उनकी जिंदगी बदल दी. साथ ही बताया कि गुरु की डांट उनके लिए कितना अहम सबक साबित हुई.
 
सचिन से आचरेकर ने कहा था- ऐसा करो कि लोग तुम्हारे लिए ताली बजाएं
 
सचिन ने कहा था- ‘मेरे स्कूल का एक अजीब सा अनुभव रहा. मैं अपने स्कूल (शारदाश्रम विद्यामंदिर स्कूल) की जूनियर टीम में था और हमारी सीनियर टीम वानखेडे़ स्टेडियम (मुंबई) में हैरिस शील्ड का फाइनल खेल रही थी. उसी दिन कोच आचरेकर सर ने मेरे लिए एक प्रैक्टिस मैच करवाया था. उन्होंने मुझसे स्कूल के बाद वहां जाने के लिए कहा.’
 
सचिन से आचरेकर ने कहा था- ऐसा करो कि लोग तुम्हारे लिए ताली बजाएं
 
सचिन ने कहा, ‘मैंने टीम के कप्तान से बात की है, तुम्हें चौथे नंबर पर बल्लेबाजी करनी है और फील्डिंग की कोई जरूरत नहीं है.’
 
सचिन से आचरेकर ने कहा था- ऐसा करो कि लोग तुम्हारे लिए ताली बजाएं
 
सचिन ने कहा, ‘मैं वह अभ्यास मैच खेलने नहीं गया और वानखेडे़ स्टेडियम जा पहुंचा. जहां अपने स्कूल की सीनियर टीम का हौसला बढ़ाने लगा. मैं ताली बजा रहा था और मैच का आनंद ले रहा था. खेल के बाद मैंने आचरेकर सर को देखा, मैंने उन्हें नमस्ते किया. सर ने मुझसे पूछा, ‘आज तुमने कितने रन बनाए?
 
सचिन से आचरेकर ने कहा था- ऐसा करो कि लोग तुम्हारे लिए ताली बजाएं
 
मैंने (सचिन) कहा- ‘सर मैं सीनियर टीम को चीयर करने के लिए यहां आया हूं. यह सुनते ही, मेरे सर ने सभी लोगों के बीच मुझे डांटा. ‘
 
सचिन से आचरेकर ने कहा था- ऐसा करो कि लोग तुम्हारे लिए ताली बजाएं
 
सचिन ने कहा, ‘दूसरों के लिए ताली बजाने की जरूरत नहीं है. तुम अपने क्रिकेट पर ध्यान दो और ऐसा कुछ हासिल करो कि दूसरे तुम्हारे लिए ताली बजाएं.’ मेरे लिए यह बहुत बड़ा सबक था, इसके बाद मैंने कभी भी मैच नहीं छोड़ा.’
 
सचिन से आचरेकर ने कहा था- ऐसा करो कि लोग तुम्हारे लिए ताली बजाएं
 
इसी के बाद फरवरी 1988 में तेंदुलकर (326 नाबाद) और विनोद कांबली (349 नाबाद) ने इतिहास रच दिया. आजाद मैदान में सेंट जेवियर्स हाई स्कूल के खिलाफ हैरिस शील्ड सेमीफाइनल में शारदाश्रम विद्यामंदिर के लिए दोनों ने 664 रनों की रिकॉर्ड साझेदारी की.
 
 
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adminDecember 25, 20181min100

भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का आज 94वां जन्मदिवस है. तीन बार देश के प्रधानमंत्री रहे वाजपेयी एक सफल नेता होने के साथ ही एक कवि भी रहे. वे हमेशा अपने भाषणों में अपनी कविताएं सुनाया करते थे. अटल भारत में दक्षिणपंथी राजनीति के उदारवादी चेहरा रहे और एक लोकप्रिय जननेता के तौर पर पहचाने गए. लेकिन उनकी एक छवि उनके साहित्यिक पक्ष से भी जुड़ी है. उन्होंने कई कविताएं लिखीं और समय-दर-समय उन्हें संसद और दूसरे मंचों से पढ़ा भी. उनका कविता संग्रह ‘मेरी इक्वावन कविताएं’ उनके समर्थकों में खासा लोकप्रिय है. इस मौके पर पेश हैं, उनकी चुनिंदा कविताएं.

 

1: कदम मिलाकर चलना होगा

बाधाएं आती हैं आएं

घिरें प्रलय की घोर घटाएं,

पावों के नीचे अंगारे,

सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं,

निज हाथों में हंसते-हंसते,

आग लगाकर जलना होगा.

कदम मिलाकर चलना होगा.

हास्य-रूदन में, तूफानों में,

अगर असंख्यक बलिदानों में,

उद्यानों में, वीरानों में,

अपमानों में, सम्मानों में,

उन्नत मस्तक, उभरा सीना,

पीड़ाओं में पलना होगा.

कदम मिलाकर चलना होगा.

उजियारे में, अंधकार में,

कल कहार में, बीच धार में,

घोर घृणा में, पूत प्यार में,

क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,

जीवन के शत-शत आकर्षक,

अरमानों को ढलना होगा.

कदम मिलाकर चलना होगा.

सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,

प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,

सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,

असफल, सफल समान मनोरथ,

सब कुछ देकर कुछ न मांगते,

पावस बनकर ढलना होगा.

कदम मिलाकर चलना होगा.

कुछ कांटों से सज्जित जीवन,

प्रखर प्यार से वंचित यौवन,

नीरवता से मुखरित मधुबन,

परहित अर्पित अपना तन-मन,

जीवन को शत-शत आहुति में,

जलना होगा, गलना होगा.

क़दम मिलाकर चलना होगा.

 

2. दो अनुभूतियां

-पहली अनुभूति

बेनकाब चेहरे हैं, दाग बड़े गहरे हैं

टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूं

गीत नहीं गाता हूं

लगी कुछ ऐसी नज़र बिखरा शीशे सा शहर

अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूं

गीत नहीं गाता हूं

पीठ मे छुरी सा चांद, राहू गया रेखा फांद

मुक्ति के क्षणों में बार बार बंध जाता हूं

गीत नहीं गाता हूं

-दूसरी अनुभूति

गीत नया गाता हूं

टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर

पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर

झरे सब पीले पात कोयल की कुहुक रात

प्राची में अरुणिम की रेख देख पता हूं

गीत नया गाता हूं

टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी

अन्तर की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी

हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा,

काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं

गीत नया गाता हूं

 

3. दूध में दरार पड़ गई

खून क्यों सफेद हो गया?

भेद में अभेद खो गया.

बंट गये शहीद, गीत कट गए,

कलेजे में कटार दड़ गई.

दूध में दरार पड़ गई.

खेतों में बारूदी गंध,

टूट गये नानक के छंद

सतलुज सहम उठी, व्यथित सी बितस्ता है.

वसंत से बहार झड़ गई

दूध में दरार पड़ गई.

अपनी ही छाया से बैर,

गले लगने लगे हैं ग़ैर,

ख़ुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता.

बात बनाएं, बिगड़ गई.

दूध में दरार पड़ गई.

ठन गई

मौत से ठन गई.

जूझने का मेरा इरादा न था,

मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,

यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,

ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,

लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?

तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ,

सामने वार कर फिर मुझे आज़मा

मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,

शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,

दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,

न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,

आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,

नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,

देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई

मौत से ठन गई

 

5. एक बरस बीत गया

झुलासाता जेठ मास

शरद चांदनी उदास

सिसकी भरते सावन का

अंतर्घट रीत गया

एक बरस बीत गया

सीकचों मे सिमटा जग

किंतु विकल प्राण विहग

धरती से अम्बर तक

गूंज मुक्ति गीत गया

एक बरस बीत गया

पथ निहारते नयन

गिनते दिन पल छिन

लौट कभी आएगा

मन का जो मीत गया

एक बरस बीत गया

 

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adminDecember 24, 20181min290

मोहम्मद रफी… वो आवाज जो एक बार किसी के कानों में पड़ जाए तो हमेशा हमेशा के लिए लोगों के जेहन में समा जाती है. जितनी मधुर उतनी ही कोमल, जितनी कोमल उतनी ही सहज. बिल्कुल उनके स्वभाव की तरह. लगभग चार दशकों तक अपनी आवाज के जादू से वे लोगों को मंत्रमुग्ध करते रहे. जॉनर चाहें कोई भी हो, रफी साहब चुटकियों में गा देते थे. गजल को गजल हो सुफी हो या भक्ति रस, क्लासिकल हो, सेमी क्लासिकल या लाइट सॉन्ग, रफी की आवाज में सभी शैलियों के गाने फिट बैठते थे. उनके जन्मदिन पर जानें कुछ मशहूर किस्से.

हिंदी के अलावा असामी, कोंकणी, भोजपुरी, ओड़िया, पंजाबी, बंगाली, मराठी, सिंधी, कन्नड़, गुजराती, तेलुगू, माघी, मैथिली, उर्दू, के साथ साथ इंग्लिश, फारसी, अरबी और डच भाषाओं में भी मोहम्मद रफी ने गीत गाए हैं, आइये जानते हैं मोहम्मद रफी साहब के बारे में कुछ खास बातें…

मोहम्मद रफी का जन्म 24 दिसंबर 1924 को अमृतसर (पंजाब) में हुआ था. मोहम्मद रफी के घर का नाम ‘फीको’ था. रफी साहब बहुत शर्मीले थे और उन्होंने अपने करियर में बहुत कम इंटरव्यू ही दिए हैं. अपने संगीत प्रेम से जुड़ी शुरुआती यादों को ताजा करते हुए रफी साहब ने कहा था कि वे बचपन से ही राह चलते फकीरों को सुनते हुए मग्न हो जाते थे. ऐसे ही एक फकीर ने उन्हें खूब प्रभावित किया. वे उस फकीर को सुनते हुए उसे फॉलो करते हुए दूर निकल गए थे.

मोहम्मद रफी ने उस्ताद अब्दुल वाहिद खान, पंडित जीवन लाल मट्टू और फिरोज निजामी से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली थी. मात्र 13 साल की उम्र में मोहम्मद रफी ने लाहौर में उस जमाने के मशहूर अभिनेता ‘के एल सहगल’ के गानों को गाकर पब्लिक परफॉर्मेंस दी थी. रफी साहब ने सबसे पहले लाहौर में पंजाबी फिल्म ‘गुल बलोच’ के लिए ‘सोनिये नी, हीरिये नी’ गाना गाया था. मोहम्मद रफी ने मुंबई आकर साल 1944 में पहली बार हिंदी फिल्म के लिए गीत गाया था. फिल्म का नाम ‘गांव की गोरी’ था.

मोहम्मद रफी को एक दयालु सिंगर माना जाता था और वे काफी कोमल हृदय के थे. उनकी सरलता ही सभी को उनकी तरफ खींचने के लिए विवश कर देती थी. कई-कई बार तो गाने के लिए वे फीस का जिक्र नहीं करते थे. बाज दफा तो ऐसा भी हुआ कि उन्होंने सिर्फ 1 रुपये में गीत गा दिए.

मोहम्मद रफी ने सबसे ज्यादा डुएट गाने ‘आशा भोसले’ के साथ गाए हैं. लता मंगेशकर के साथ रॉयलटी को लेकर हुए विवाद के चलते दोनों के बीच में अनबन हो गई थी. पहले रफी और लता ने साथ में ढेर सारे सुंदर नगमे गाए. मगर विवाद के बाद लता मंगेशकर ने रफी साहब के साथ गाना छोड़ दिया. इस दौरान रपी साहब ने आशा भोसले के साथ कई यादगार नगमें गाए.

रफी साहब के साथ किशोर कुमार और मुकेश ऐसे सिंगर रहे जिन्हें लोग खूब सुनते थे. तीनों की जोड़ी बेमिसाल थी. तीनों ने अमर अखबर एंथनी में एक साथ गाना भी गाया था. किशोर कुमार खुद एक महान गायक थे. बावजूद इसके किशोर के लिए भी उनकी दो फिल्मों ‘बड़े सरकार’ और ‘रागिनी’ में रफी साहब ने आवाज दी थी.

रफी साहब ने फिल्म बैजू बावरा के गाने गाए थे. इसमें एक गाना “ओ दुनिया के रखवाले” उन्होंने गाया था. गाना थोड़ा टफ था. कहा जाता है कि गाने को गाते वक्त रफी साहब के गले से खून निकल आया था. इसके बाद काफी समय तक उनका गला खराब रहा. लोगों को लगा कि अब रफी साहब दोबारा कभी नहीं गा पाएंगे. मगर उन्होंने फिर से वापसी की और एक से बढ़कर एक सुरीले नगमें गाए. रफी को ‘क्या हुआ तेरा वाद’ गाने के लिए ‘नेशनल अवॉर्ड’ से सम्मानित किया गया था. 1967 में उन्हें भारत सरकार की तरफ से ‘पद्मश्री’ अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया.

मोहम्मद रफी को दिल का दौरा पड़ने की वजह से 31 जुलाई 1980 को देहांत हो गया था और खबरों के अनुसार उस दिन जोर की बारिश हो रही थी. रफी साहब के देहांत पर मशहूर गीतकार नौशाद ने लिखा, ‘गूंजते है तेरी आवाज अमीरों के महल में, झोपड़ों की गरीबों में भी है तेरे साज, यूं तो अपनी मौसिकी पर सबको फक्र होता है मगर ए मेरे साथी मौसिकी को भी आज तुझ पर नाज है.

 

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