पुरानी यादें

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adminApril 3, 20191min00

वीरेंद्र सहवाग अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते हैं. उनके वन लाइनर्स बहुत पसंद किए जाते हैं. अपने मजेदार ट्वीट की वजह से सुर्खियों में बने रहते हैं. क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद भी उनके चाहने वालों में कमी नहीं आई है.  

सहवाग जहां जाते हैं उनके चाहने वाले उनकी एक झलक पाने को पीछे-पीछे पहुंच जाते हैं. उनके फैन्स से जुड़ा एक दिलचस्प वाक्या उनके ससुराल का है. एक टीवी इंटरव्यू में सहवाग ने बताया था कि एक बार उन्हें ससुराल से निकलने के लिए पुलिस बुलानी पड़ी थी.

सहवाग कहते हैं, ‘मैं पहली बार जब शादी से पहले अपने ससुराल गया. लेकिन वहां पहुंचने के बाद मुझे निकलने का मौका नहीं मिला. घर के नीचे करीब 10 हजार लोग एकत्रित हो गए. इसके बाद पुलिस को बुलाया गया. पुलिस ने पूरा क्राउड हटाया फिर मैं वहां से निकल पाया.’

सहवाग ने कहा, ‘उस दिन के बाद मैंने तय किया कि अब ससुराल नहीं आउंगा. नहीं तो फिर निकलने की मुसीबत हो जाएगी.’ मैदान के अंदर हों या बाहर सहवाग हमेशा अपने बिंदास अंदाज में देखे जाते हैं. यही कारण है कि बड़े-बड़े क्रिकेटर उनकी तारीफ करते नहीं थकते. महान क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर से जब एक कार्यक्रम के दौरान पूछा गया कि आप नॉन स्ट्राइकर एंड पर खड़े होकर किस खिलाड़ी को खेलते देख सबसे ज्यादा एंजॉय करते हैं, उनका जवाब था वीरेंद्र सहवाग.

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रन नहीं बनने पर क्रीज पर भजन गाते थे सहवाग

वीरेंद्र सहवाग मैदान पर गाने गाते थे यह सभी जानते हैं. लेकिन बहुत कम ही लोग यह बात जानते हैं कि वो मैदान पर भजन भी गाते थे. एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि जब वो रन नहीं बना पाते थे तो क्रीज पर खड़े होकर भजन गाना शुरू कर देते थे और जैसे ही रन बनने शुरू होते थे वो बॉलीवुड के गानों पर आ जाते थे.

जब गाना भूलने पर 12वें खिलाड़ी को क्रीज पर बुलाया

एक अवॉर्ड शो के दौरान सहवाग एक किस्सा सुनाते हुए बताते हैं कि वो राहुल ड्रविड़ के साथ 200 रन बनाकर बल्लेबाजी कर रहे थे. उस दौरान काफी देर से वह गाना गुनगुना रहे थे. मैच अच्छा चल रहा था, चौके-छक्के लग रहे थे. इसी बीच ड्रिंक्स ब्रेक हुआ. इसके बाद वो खिलाड़ियों के साथ बातें करने लगे. लेकिन जब दोबारा मैच शुरू हुआ तो सहवाग गाने के बोल (लिरिक्स) भूल गए.

जिसके बाद दो से तीन ओवर निकल गए और वो रन नहीं बना पा रहे थे क्योंकि उनका दिमाग गाने के बोल याद करने में व्यस्त था. तभी राहुल द्रविड़ ने सहवाग से पूछा कि सब ठीक है? इस पर सहवाग ने पूछा क्यों..? तो ड्रविड़ ने कि कहा कि बहुत देर से चौका-छक्का नहीं लगा. हालांकि, सहवाग ने राहुल को कुछ नहीं बताया और 12वें खिलाड़ी को बुलाया.

सहवाग ने 12वें खिलाड़ी से कहा कि जाकर मेरा आईपॉड निकालना, वीरू टू के नाम की प्ले लिस्ट खोलना और उसके अंदर जो छठा गाना है उसके लिरिक्स आकर बताना. इसके बाद उन्होंने गाना सुना और फिर गुनगुनाते हुए 319 रन की पारी खेली. यह गाना था ‘चला जाता हूं किसी की धुन में धड़कते दिल के, तराने लिए.’ 319 रन की पारी खेलने के बाद सहवाग भारत की तरफ से तिहरा शतक लगाने वाले पहले खिलाड़ी बने थे. यह मैच 2004 में पाकिस्तान के खिलाफ मुल्तान में खेला गया था.


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adminMarch 26, 20191min00

आज से करीब 45 साल पहले उत्तराखंड में एक आंदोलन की शुरुआत हुई थी, जिसे नाम दिया गया था चिपको आंदोलन. इस आंदोलन की चंडीप्रसाद भट्ट और गौरा देवी की ओर से की गई थी और भारत के प्रसिद्ध सुंदरलाल बहुगुणा ने आगे इसका नेतृत्व किया. इस आंदोलन में पेड़ों को काटने से बचने के लिए गांव के लोग पेड़ से चिपक जाते थे, इसी वजह से इस आंदोलन का नाम चिपको आंदोलन पड़ा था.

चिपको आंदोलन की शुरुआत प्रदेश के चमोली जिले में गोपेश्वर नाम के एक स्थान पर की गई थी. आंदोलन साल 1972 में शुरु हुई जंगलों की अंधाधुंध और अवैध कटाई को रोकने के लिए शुरू किया गया. इस आंदोलन में महिलाओं का भी खास योगदान रहा और इस दौरान कई नारे भी मशहूर हुए और आंदोलन का हिस्सा बने.

इस आंदोलन में वनों की कटाई को रोकने के लिए गांव के पुरुष और महिलाएं पेड़ों से लिपट जाते थे और ठेकेदारों को पेड़ नहीं काटने दिया जाता था. जिस समय यह आंदोलन चल रहा था, उस समय केंद्र की राजनीति में भी पर्यावरण एक एजेंडा बन गया थाय इस आन्दोलन को देखते हुए केंद्र सरकार ने वन संरक्षण अधिनियम बनाया.

बता दें कि इस अधिनियम के तहत वन की रक्षा करना और पर्यावरण को जीवित करना है. कहा जाता है कि चिपको आंदोलन की वजह से साल 1980 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एक विधेयक बनाया था. इस विधेयक में हिमालयी क्षेत्रों के वनों को काटने पर 15 सालों का प्रतिबंध लगा दिया था. चिपको आंदोलन ना सिर्फ उत्तराखंड में बल्कि पूरे देश में फैल गया था और इसका असर दिखने लगा था.


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adminMarch 23, 20192min00

नदीम गुल्लानी के ये लफ़्ज़ कई लोगों की दिल की बात हैं. दुनिया कितनी ख़ूबसूरत होती अगर सरहदें ने होतीं? गिले-शिकवे न होते. दिलों में दूरियां न होती. 

ख़ैर ताकत के नशे में चूर हुक्मरानों ने इंसानों के बीच दीवार खड़ी कर दी है. एक ही मिट्टी की संतानों को ग़ैर बना दिया है. मलाल तो रह जाएगा पर हक़ीक़त यही है कि बीते कल को बदला नहीं जा सकता.  

भारत-पाकिस्तान. कहने को एक पर फिर भी अलग. भारत-पाकिस्तान की सीमा पर स्थित है हुसैनीवाला रेलवे स्टेशन जो साल में सिर्फ़ 2 दिन के लिए ही खुलता है. 

23 मार्च और 13 अप्रैल…

इन दो दिनों पर भारतीय रेलवे, फ़िरोज़पुर से हुसैनीवाला तक आम लोगों के लिए स्पेशल ट्रेन चलाती है. हर साल हज़ारों लोग शहीद स्मारक के दर्शन करने आते हैं.

 

23 मार्च को हर साल हुसैनीवाला में शहीदी मेला लगता है. मेले में शामिल होने के लिए पंजाब रोडवेज़ स्पेशल बस भी चलाती है.  

हुसैनीवाला कई घटनाओं का साक्षी है. ये उस घटना का भी साक्षी है कि किस तरह अंग्रेज़ों ने तीनों क्रान्तिकारियों को समय से पहले फांसी दी और उनका अंतिम संस्कार भी ढंग से नहीं किया. जनता के विरोध के भय से अंग्रेज़ों ने क्रान्तिकारियों की आधे जले शवों को सतलुज में बहा दिया था. आम जनता ने शवों को सतलुज से निकाल कर पूरे सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी था.  

1960 से पहले ये स्थान पाकिस्तान के अधीन था. जनता की आस्था को देखते हुए भारत सरकार ने इस स्थल को वापस लेने के बदले पाकिस्तान को फाजिल्का के 12 गांव और सुलेमानकी हेड वर्क्स दिए.

 

एक दौर था जब हुसैनीवाला से लाहौर के लिए ट्रेन चलती थी. अब वो रेल मार्ग बंद है. कहीं ट्रेवल पर जाएं या न जाएं, पर यहां ज़िन्दगी में एक दफ़ा हर किसी को जाना चाहिए.   


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adminMarch 20, 20192min00

हिन्दू पंचांग के अनुसार, होली फाल्गुन माह की पूर्णिमा को मनाई जाती है, जिसे रंगों का त्योहार भी कहा जाता है. होली इस बार 21 मार्च 2019 को है. होली को आमतौर पर हिंदुओं का त्योहार माना जाता है. लेकिन इस त्योहार में सिर्फ हिंदू ही नहीं दूसरे धर्म के लोग भी शामिल होते हैं.  ये परंपरा मुगलकाल से ही देखने को मिलती है, जिसके सबूत इतिहास में भी दर्ज हैं. इतिहासकारों के मुताबिक, मुगल शासक शाहजहां के काल में होली मनाने की परंपरा थी और इसे ‘ईद-ए-गुलाबी’ के नाम से जाना जाता था. आज भी कई मुसलमान होली का त्योहार पूरे उत्साह के साथ मनाते हैं. हालांकि, मुसलमानों के होली मनाने पर कई बार आपत्ति भी उठाई गई है.

होली को 'ईद-ए-गुलाबी' कहते थे मुगल, महफिलें सजाते थे बादशाह-नवाब
 
भारत के कई मुस्लिम कवियों ने अपनी रचनाओं में भी इस बात का उल्लेख किया है कि होली का पर्व सिर्फ हिंदू ही नहीं, मुसलमान भी मनाते हैं. इतिहासकारों के मुताबिक, मुगलकाल में होली का त्योहार ईद की तरह ही मनाया जाता था. मुगलकाल में होली खेले जाने के कई प्रमाण मिलते हैं. अकबर का जोधाबाई के साथ और जहांगीर का नूरजहां के साथ होली खेलने का वर्णन मिलता है. कई आर्टिस्ट ने अपनी पेंटिंग्स में मुगल बादशाहों को होली खेलते दिखाया है.
 
होली को 'ईद-ए-गुलाबी' कहते थे मुगल, महफिलें सजाते थे बादशाह-नवाब

वहीं शाहजहां के समय तक होली खेलने का मुगलिया अंदाज बदल गया था. बताया जाता है कि शाहजहां के समय में होली को ‘ईद-ए-गुलाबी’ या ‘आब-ए-पाशी’ (रंगों की बौछार) कहा जाता था. जबकि, अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के बारे में प्रसिद्ध है कि होली पर उनके मंत्री उन्हें रंग लगाने जाया करते थे. मुगलकाल में होली के लिए खासतौर पर फूलों से रंग तैयार किए जाते थे.

 
होली को 'ईद-ए-गुलाबी' कहते थे मुगल, महफिलें सजाते थे बादशाह-नवाब
 
बहादुरशाह जफर का मानना था कि उनका धर्म होली खेलने से प्रभावित नहीं होता है. माना जाता है कि यह भावना अकबर के समय से ही मुगलों के बीच पैदा हुई थी. बहादुर शाह के बेटे मोहम्मद शाह रंगीला भी होली खेला करते थे. होली के समय उनकी बेगम पिचकारी लेकर उनके पीछे भागा करती थीं.
 
होली को 'ईद-ए-गुलाबी' कहते थे मुगल, महफिलें सजाते थे बादशाह-नवाब
 
इतिहासकारों का कहना है कि नवाबों का होली का जश्न मनाने का अंदाज भी काफी अलग था. ये लोग होली के दिन एक दूसरे पर गुलाबजल छिड़ककर उपहार के रूप में गुलाबजल से भरी बोतलें दिया करते थे. इस दौरान ढोल नगाड़ों की गूंज के साथ त्योहारों का समा बांधा जाता था.  जहांगीर की ऑटोबायोग्राफी ‘तुज़्क-ए-जहांगीरी’ में जिक्र मिलता है कि होली के समय जहांगीर महफिल का आयोजन किया करते थे.
 
होली को 'ईद-ए-गुलाबी' कहते थे मुगल, महफिलें सजाते थे बादशाह-नवाब
 
मुंशी जकाउल्लाह ने अपनी किताब ‘तारीख-ए-हिदुस्तानी’ में लिखा, कौन कहता है होली हिंदुओं का त्योहार है? मुंशी जकाउल्लाह ने ये भी लिखा, मुगलकाल में हिंदू-मुस्लिम, अमीर- गरीब सब एक साथ मिलकर होली का त्योहार मनाते थे. होली के पर्व पर गरीब से गरीब शख्स को भी अपने राजाओं को रंग लगाने की इजाजत होती थी.
 
होली को 'ईद-ए-गुलाबी' कहते थे मुगल, महफिलें सजाते थे बादशाह-नवाब

बता दें कि अमीर खुसरो (1253–1325), इब्राहिम रसखान (1548-1603), नजीर अकबरबादी (1735–1830), महजूर लखनवी (1798-1818), शाह नियाज (1742-1834) की रचनाओं में ‘गुलाबी त्योहार’ यानी  होली का जिक्र मिलता है.

होली को 'ईद-ए-गुलाबी' कहते थे मुगल, महफिलें सजाते थे बादशाह-नवाब

एक उर्दू अखबार जाम-ए-जहांनुमा (1844) के मुताबिक, मुगलकाल में होली के समय बहादुर शाह जफर होली के जश्न के लिए खास तैयारियां करते थे. महलों और हवेलियों में होली के गाने गाए जाते थे. मुगलकाल में ईद की तरह ही होली का जश्न मनाया जाता था. मेलों का आयोजन किया जाता था, नाच-गाने की महफिलें सजती थीं.

होली को 'ईद-ए-गुलाबी' कहते थे मुगल, महफिलें सजाते थे बादशाह-नवाब

बीजापुर सल्तनत के आदिल शाही वंश के राजा आदिल शाह और वाजिद अली शाह होली के समय मिठाइयां, ठंडाई बांटा करते थे. 19वीं सदी तक होली काफी धूमधाम से मनाई जाती थी. लेकिन समय के साथ धीरे-धीरे होली मनाने का चलन कम होता गया. कुल मिलाकर होली और ईद दो ऐसे त्योहार हैं, जो हिंदू और मुस्लिम दोनों को एक दूसरे के साथ मिलने जुलने का मौका देते हैं. भारत के कई क्षेत्रों में यह आज भी देखने को मिलता है.


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adminMarch 19, 20192min00

पद्म भूषण नंबी नारायणन की कहानी ऐसी है, जिस पर फ़िल्म बन सकती है और बन भी रही है. एक प्रतिभावान वैज्ञानिक जिसपर देश से गद्दारी का आरोप लगा, जेल भी गए और अंत में सरकार से सम्मान भी मिला.  

ISRO के इस वैज्ञानिक की एक पहचान ‘विकास इंजन’ बनाने की भी है, इस इंजन की वजह से ही भारत ने अपना पहला PSLV लॉन्च किया था. आज भी ISRO के एतिहासिक मिशनों में इसी इंजन का इस्तेमाल होता है, जैसे- चंद्रयान और मंगलयान. आज भारतीय स्पेस तकनीक का अगुवाई करने वाले नंबी नारायणी को 24 साल लग गए अपने आप को निर्दोष साबित करने में.

एक वक्त था जब भारत ठोस ईंधन के लिए रॉकेट के उच्च तकनीक के लिए विदेशों पर निर्भर था. नारायणन पहले व्यक्ति थे जिन्होंने द्रव्य इंधन की दिशा में बदलाव की शरुआत की.  

उनके इस विचार से उनके सीनियर जैसे डॉक्टर ए. पी. जे. अब्दुल कलाम, विक्रम साराभाई आदि सहमत नहीं थे लेकिन उन्हें आगे शोध करने की इजाज़त दे दी गई.  

वो Princeton University में Rocket Propulsion विषय पर शोध करने के लिए गए. उसके बाद उन्होंने पांच साल French Viking Engine और Liquid Propulsion तकनीक पर शोध किया. वही तकनीक आगे चल कर ‘विकास इंजन’ को तैयार करने में कारगर साबित हुआ.

साल 1994 तक नंबी नारायणन ISRO के Cryogenic Space Engine प्रोग्राम के इंचार्ज बन चुके थे. इस दौरान उन पर जासूसी करने का ग़लत आरोप लगा.  

नारायणन के साथ चार अन्य को गुप्त सुचनाओं को मालदीव के इंटेलिजेंस अधिकारी मरियम रशीदा और फ़ौज़िया हसन को देने के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया गया. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार वो 50 दिनों तक जेल में भी रहे थे.

यह केस 1996 में CBI को सौंप दिया गया, CBI ने जांच की रिपोर्ट केरल कोर्ट में पेश की और सभी आरोपों को निराधार बताया.  

लेकिन इससे नारायणन के चरित्र पर गहरा दाग लग चुका था और उनके नाम के साथ धोखेबाज़ लग चुका था. वो जहां भी जाते थे उनको और उनके परिवार को शर्मिंदगी झेलनी पड़ती थी.  

लंबी लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उनपर लगाए सभी आरोपों को ख़ारिज कर दिया और केरल की सरकार को उन्हें हर्जाने के तौर पर 50 लाख देने का आदेश दिया. ख़ुद को निर्दोष साबित करने में उन्हें 24 साल लग गए.

जब जनवरी में उन्हें पद्म भूषण अवॉर्ड देने की घोषणा हुई, तब उन्होंने कहा, ‘मैं बहुत ख़ुश हूं, मुुझ पर जासूसी का आरोप था, मेरी पहचान उस रूप में ज़्यादा चर्चित थी, ये सम्मान मेरे योगदान को पहचान दिलाएगा.’

नारायणन ने अपनी कहानी को किताब की शक्ल भी दी है, जिसका नाम है Ready To Fire, इस किताब के ऊपर Rocketry: The Nambi Effect नाम की फ़िल्म भी बन रही है.


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adminMarch 13, 20192min00

12 मार्च 2006. इस तारीख को न तो साउथ अफ्रीका की क्रिकेट टीम कभी भूल पाएगी, न ही ऑस्ट्रेलिया की. इस दिन ऑस्ट्रेलिया ने वन डे इतिहास का सबसे बड़ा स्कोर बनाया था. जिसे तीन घंटे कुछ मिनट बाद ही साउथ अफ्रीका ने धूल में मिला दिया. 434 रनों के पहाड़ पर अपना बुलडोज़र चढ़ा दिया. हर मायने में वो मैच अभूतपूर्व रहा है. आज उसी मैच की बात. साथ ही कुछ दिलचस्प किस्से भी.

पहले तो मैच की रिपोर्ट

जोहान्सबर्ग में हुए उस मैच में टॉस ऑस्ट्रेलिया ने जीता और पहले बैटिंग चुनी. सोच यही थी कि पाटा विकेट पर बड़ा स्कोर बनाना है. ऐसा हुआ भी. बड़ा नहीं, बहुत बड़ा स्कोर बनाया. इतना बड़ा कि वर्ल्ड रिकॉर्ड ही बना दिया. न सिर्फ वन डे के इतिहास में पहली बार 400 का आंकड़ा पार किया, बल्कि 34 रन और जोड़े. रिकी पोंटिंग ने ज़बरदस्त सेंचुरी मेरी. 105 गेंदों में 164 रन बनाए. जिसमें 13 चौके और 9 छक्के शामिल थे. गिलख्रिस्ट, कैटिच और हसी ने भी खूब हाथ दिखाए. रनों का एवरेस्ट खड़ा कर दिया. इनिंग्स ब्रेक के दौरान कोई भी साउथ अफ्रीका का हल्का सा भी चांस नहीं मान रहा था.

पोंटिंग ने 9 छक्के मारे थे उस मैच में.

उधर साउथ अफ्रीका के इरादे कुछ और ही थे. चोकिंग के लिए बदनाम ये टीम उस दिन कुछ और ही खाकर मैदान पर उतरी थी. तीन रन पर डिपेनार का विकेट खोने के बाद उन्होंने ऐसा पांचवा गियर लगाया कि ऑस्ट्रेलिया के होश उड़ गए. कप्तान स्मिथ और बावले हर्शेल गिब्स ने आतंक मचा दिया. 55 गेंदों पर 90 रन बनाकर स्मिथ आउट हुए लेकिन गिब्स का कहर जारी रहा. उस दिन वो किसी और ही दुनिया के खिलाड़ी लग रहे थे. (वजह आगे सामने आएगी). 111 गेंदें खेलकर उन्होंने 175 रन बना डाले. जिनमें 7 छक्के और 21 – हां, इक्कीस – चौके शामिल थे. जब चौथे विकेट के रूप में गिब्स आउट हुए, साउथ अफ्रीका अभी लक्ष्य से 136 रन दूर थी. गेंदें बची थीं 107.

गिब्स पर उस दिन नशा चढ़ा था.

मैच फंसता हुआ नज़र आ रहा था. ऐसे वक़्त में दो और लोगों ने गिब्स की डाली नींव पर कमरा चढ़ा दिया. वो दो लोग थे वान डर वाथ और मार्क बाउचर. वान डर वाथ ने तेज़ी से 18 गेंदों में 35 रन मारे. उनके आउट होने के बाद मार्क बाउचर टीम को विजय तक ले गए. आख़िरी ओवर की एक गेंद बाकी रहते साउथ अफ्रीका ने 434 रनों की चढ़ाई, कामयाबी से चढ़ ली.

जीत की ख़ुशी मनाते मार्क बाउचर.

ये मैच कई मायनों में अनोखा था. एक तो ये कि इसमें वन डे का सबसे बड़ा स्कोर बना, जो उसी दिन चेस भी कर लिया गया. पूरे मैच में 87 चौके और 26 छक्के लगे जो कि एक वर्ल्ड रिकॉर्ड है. यानी 504 रन तो सिर्फ चौके-छक्कों से आए. जैसे बैटिंग नहीं बल्कि तलवारबाज़ी हुई हो. ऑस्ट्रेलिया के मिक लुईस ने 10 ओवर में 113 रन दिए, जो बुरी गेंदबाज़ी का रिकॉर्ड है और आजतक कायम है. ये उस सीरीज का पांचवा वन डे था. और सीरीज 2-2 से बराबर होने के कारण एक तरह से फाइनल था. इसे जीतकर अफ्रीका ने सीरीज भी जीत ली. रेफरी को भी ये समझ नहीं आया कि सबसे बढ़िया खिलाड़ी किसे चुने. इसलिए प्लेयर ऑफ़ दी मैच अवॉर्ड पोंटिंग और गिब्ज़ दोनों में साझा किया गया.

ये तो हुई मैच की कहानी. अब सुनिए वो किस्से जो मैदान में नहीं मैदान, के बाहर घटते हैं.

गिब्स का शराब में गोते लगाना

मैच से एक रात पहले की बात है. ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ी माइक हसी डिनर के लिए निकले. उन्होंने देखा कि गिब्स बैठकर दारू पी रहे हैं. उन्होंने कुछ कहा नहीं और वो चले गए. जब वो वापस लौटे, तब भी गिब्स दारू पी रहे थे. कोई बात नहीं हुई और हसी कमरे में चले गए. वहां ऑस्ट्रेलियन टीम में एक बैठक हुई. बैठक ख़त्म होने के बाद जब हसी बाल्कनी में आए, तब भी गिब्स दारू ही पी रहे थे. उसके कुछ घंटों बाद जब हसी एक बार फिर बाल्कनी में आए, गिब्स दारू के ही हवाले थे. कहने की बात ये कि उस रात गिब्स देर रात तक शराब की सोहबत में थे. सुबह ब्रेकफास्ट से एक घंटा पहले तक वो दारू पी रहे थे.

गिब्स की शराबनोशी के गवाह थे माइक हसी.

ज़ाहिर सी बात है इतनी पीने के बाद नशा लंबे समय तक रहना ही था. दूसरे दिन गिब्स ने जो आतिशी बल्लेबाज़ी की, उसका ज़्यादातर अरसा वो नशे में थे. ये कहानी माइक हसी और हर्शेल गिब्स दोनों ने ही सुनाई थी. फर्क बस इतना था कि एक कहानी में शराब पीने का वक़्त रात के डेढ़-दो बजे तक था, तो दूसरी में सुबह चार बजे तक.

कैलिस ने ऐसा क्या कहा, जो सारी टीम चार्ज हो गई?

जब आपको 434 जैसा विशाल स्कोर चेज करना हो, तो मुकाबले से पहले ही आपका हौसला टूटने लगता है. लेकिन अफ्रीका को उस दिन देखकर ऐसा एक भी पल के लिए नहीं लगा कि ये टीम नर्वस है. ऐसा क्योंकर मुमकिन हुआ? वजह थे साउथ अफ्रीका के महान खिलाड़ी जैक्स कैलिस.

कैलिस साउथ अफ्रीकन टीम के लिए बरगद का पेड़ हैं.

जब इनिंग्स ब्रेक हुआ, पूरी टीम कोच मिकी आर्थर के इर्द-गिर्द इकट्ठा हुई. कहने लगी इसे चेज करने की कोई स्ट्रेटेजी बताई. माइक झल्लाकर बोले, “पूछ तो ऐसे रहे हो, जैसे मैं रोज़ 434 का स्कोर चेज करता हूं!” बात सही भी थी. लेकिन तभी कैलिस आगे आए. बोले कि हमने बढ़िया बोलिंग की. ऑस्ट्रेलिया ने 15 रन कम बनाए हैं. ये पिच साढ़े चार सौ रनों की है. वो लोग पिछड़ गए हैं. बात मज़ाक में कही लग रही थी लेकिन थी नहीं. सारे खिलाड़ी बातें करने लगे. सिवाय गिब्स के. वो एक कोने में ऊंघ रहे थे. नशा जो हावी था.

बहरहाल, कैलिस की उस बात ने जादुई असर किया. इससे सभी खिलाड़ियों के दिमाग से प्रेशर हट गया. जब अफ्रीका की टीम दोबारा मैदान में घुसी, उसका हौसला आसमान छू रहा था.

आगे का सब इतिहास है.


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adminMarch 4, 20191min00

किरण मोरे को चिढ़ाने के लिए जावेद मियांदाद की मेढक कूद को आज 27 साल हो गए. 4 मार्च को भारत-पाकिस्तान के बीच 1992 के वर्ल्ड कप मैच के दौरान मोरे-मियांदाद का ‘झगड़ा’ आज भी क्रिकेट फैंस को याद है. उस मैच में मियांदाद ने ‘मशहूर मेढक कूद’ लगाई थी.

 

आखिर क्या हुआ था उस मैच में?

सिडनी में हुए मैच में किरण मोरे ने मियांदाद के खिलाफ बार-बार अपील क्या की, मियांदाद को गुस्सा आ गया. उन्होंने सचिन तेंदुलकर के उस ओवर में मिड ऑफ पर शॉट लगाया और रन के लिए तेजी से दौड़ पड़े, लेकिन खतरे को भांपते हुए क्रीज में लौट गए. इस बीच आए थ्रो पर मोरे ने बेल्स उड़ाई, तो मियांदाद आपा खो बैठे और विकेट के आगे मेढक कूद लगाई. जिससे दुनियाभर के क्रिकेट प्रशंसक सन्न रह गए. हलांकि मियांदाद पाकिस्तान को वह मैच जिता नहीं पाए. भारत ने वह मैच 43 रनों से जीत लिया.

 

पाकिस्तान को हर बार मिली है हार

दरअसल, भारत-पाकिस्तान के बीच वनडे वर्ल्ड कप में वह पहली भिड़ंत थी. दोनों के बीच वर्ल्ड कप में अब तक छह मुकाबले हो चुके हैं और सभी में भारत की जीत हुई है. आंकड़े भारत के पक्ष में हैं, लेकिन यह कहना मुश्किल होता है कि मैच कौन जीतेगा. जब भी इन दोनों चिर प्रतिद्वंद्वियों के बीच मुकाबला होता है, तो मैदान पर खिलाड़ियों के बीच नोक झोंक खूब सुर्खियां बटोरती हैं.

 

इस बार 16 जून को भारत-पाक मैच

इस बार 2019 वर्ल्ड कप में भारत को अपने लीग मुकाबले में मैनचेस्टर में 16 जून को पाकिस्तान से भिड़ना है. पुलवामा हमले के बाद दोनों देशों के बीच बढ़े राजनयिक तनाव के कारण इस मैच के बहिष्कार की मांग की जा रही है. भारत क्रिकेट के कुछ बड़े नामों ने यह मांग की है, जिसमें हरभजन सिंह और सौरव गांगुली भी शामिल हैं.

 

ICC ने ठुकराई PAK से संबंध खत्म करने की मांग

उधर, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) ने ‘आतंकवाद उत्पन्न’ करने वाले देशों से संबंध तोड़ने के बीसीसीआई के आग्रह को ठुकराते हुए कहा कि इस तरह के मामलों में आईसीसी की कोई भूमिका नहीं है. पुलवामा आतंकी हमले में सीआरपीएफ के 40 जवानों की शहादत के बाद बीसीसीआई ने आईसीसी को पत्र लिखकर वैश्विक संस्था और उसके सदस्य देशों से आतंकियों को शरण देने वाले देशों से संबंध तोड़ने की अपील की थी.


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adminFebruary 27, 20191min00

26 फरवरी को भारतीय वायुसेना की ओर से पाकिस्तान के बालाकोट में किए हमले ने पुलवामा आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देकर एक बार फिर साबित कर दिखाया कि भारतीय वायु सेना कितनी ताकतवर है. वहीं ऐसा पहली बार नहीं है जब भारतीय वायु सेना ने पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब दिया हो. इससे पहले वायु सेना के मार्शल अर्जन सिंह के नेतृत्व में पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी थी.

मार्शल ऑफ इंडियन एयरफोर्स अर्जन सिंह भारतीय एयरफोर्स के इतिहास में पहले प्रमुख थे, जिन्होंने पहली बार देश के किसी युद्ध में वायु सेना का नेतृत्व किया. वो भारत के ऐसे तीसरे अफसर थे जिन्हें राष्ट्रपति भवन में सेना का दुर्लभ सम्मान मिला था. आपको बता दें, 1 अगस्त 1964 को अर्जन सिंह एयर मार्शल की पदवी के साथ चीफ ऑफ एयर स्टाफ बनाए गए थे.

1965 में पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ “ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम” को अंजाम दिया था और पाकिस्तानी टैंकों ने अखनूर शहर पर धावा बोल दिया. एयर चीफ अर्जन सिंह की यह सबसे बड़ी चुनौती थी. जिसके बाद उन्होंने पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए भारतीय वायुसेना का नेतृत्व किया और 1965 में पाकिस्तान के साथ हुई लड़ाई में निर्णायक भूमिका निभाई थी.

 

(ये तस्वीर 1965 की है जिसमें अर्जन सिंह साथी सैनिकों के साथ)

अर्जन सिंह का जन्म पंजाब के लयालपुर में 15 अप्रैल 1919 को हुआ था, जो अब पाकिस्तान के फैसलाबाद के नाम से जाना जाता है. अर्जन सिंह भारतीय वायुसेना के एकमात्र फाइव स्टार रैंक ऑफिसर थे. अर्जन सिंह को जो सर्वोच्‍च सम्‍मान मिला, वो अब तक सेना में केवल 3 अफसरों को ही मिला है. सैम मानेक शा को ये सम्‍मान दिया गया था. उन्‍हीं की तरह केएम करियप्‍पा को भी ये सम्‍मान दिया गया. फिर एयरफोर्स में अर्जन सिंह को ये सम्‍मान मिला. अर्जन सिंह के सम्मान में पश्चिम बंगाल के पानागढ़ एयरबेस को ‘अर्जन सिंह एयरबेस’ का नाम दिया गया है.

 

 

(साथी सैन्य अधिकारियों के साथ मार्शल अर्जन सिंह)

अर्जन सिंह ही केवल ऐसे चीफ ऑफ एयर स्टॉफ थे जिन्होंने एयरफोर्स प्रमुख के तौर पर लगातार पांच साल अपनी सेवाएं दी थी. आपको बता दें, 1950 में भारत के गणराज्य बनने के बाद अर्जन सिंह को ऑपरेशनल ग्रुप का कमांडर बनाया गया. यह ग्रुप भारत में सभी तरह के ऑपरेशन के लिए जिम्मेदार होता है. वायुसेना के इतिहास में एयर वाइस मार्शल के पद पर सबसे लंबे समय तक सेवा देने का रिकॉर्ड अर्जन सिंह के पास है. 16 सितंबर 2017 में दिल्ली के आर्मी अस्पताल में उनका निधन हो गया था.

 

उड़ाए थे 60 विमान

सर्वोच्च रैंक हासिल करने के बाद भी सेवानिवृत्त होने से ठीक पहले तक अर्जन सिंह विमान उड़ाते रहे और कई दशकों के अपने सैन्य जीवन में उन्होंने 60 तरह के विमान उड़ाए, जिनमें द्वितीय विश्व युद्ध से पहले के तथा बाद में समसामयिक विमानों के साथ-साथ परिवहन विमान भी शामिल हैं.

 

1965 की लड़ाई में पाक की हार

अर्जन सिंह न केवल निडर पायलट थे, बल्कि उन्हें एयर फोर्स की गहरी जानकारी थी. पाकिस्तान के खिलाफ 1965 में हुई लड़ाई में अर्जन सिंह ने भारतीय वायु सेना की कमान संभाली. जहां उनके  नेतृत्व में  पाकिस्तान के भीतर घुसकर भारतीय वायुसेना ने कई एयरफील्ड्स तबाह कर डाले और पाकिस्तानी वायुसेना को जीत हासिल नहीं करने दी, जबकि अमेरिकी सहयोग के कारण पाकिस्तानी वायु सेना बेहतर सुसज्जित थी.

मार्शल अर्जन सिंह ने अराकान अभियान के दौरान 1944 में जापान के खिलाफ एक स्क्वाड्रन का नेतृत्व किया था , इम्फाल अभियान के दौरान हवाई अभियान को अंजाम दिया और बाद में यांगून में अलायड फोर्सेज का काफी सहयोग किया.

 

एक घंटे का वक्त मांगा और पाकिस्तान की हार तय कर दी

पाकिस्तान से 1965 युद्ध में अर्जन सिंह ने बड़ी भूमिका निभाई थी. जब 1965 में पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ “ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम” को अंजाम दिया और पाकिस्तानी टैंकों ने अखनूर शहर पर धावा बोल दिया. उस समय अर्जन सिंह ने की भारतीय वायुसेना का नेतृत्व किया था. आपको बता दें, पाकिस्तानी हमले की खबर मिलते ही जब रक्षा मंत्रालय ने सभी सेना प्रमुखों को तलब किया और कुछ मिनटों की इस मुलाकात में अर्जन सिंह से पूछा गया कि वह कितनी जल्दी पाकिस्तान के बढ़ते टैंकों को रोकने के लिए एयर फोर्स का हमला कर सकते हैं.

अर्जन सिंह ने रक्षा मंत्रालय से हमला करने के लिए सिर्फ 1 घंटे का समय मांगा था. वहीं  अर्जन सिंह अपनी बात पर खरे उतरे और अखनूर की तरफ बढ़ रहे पाकिस्तानी टैंक और सेना के खिलाफ पहला हवाई हमला 1 घंटे से भी कम समय में कर दिया. इसके बाद पूरे युद्ध के दौरान अर्जन सिंह ने वायु सेना के नेतृत्व किया जिसके बाद पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी.

 

क्या था ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम

ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम के तहत पाकिस्तानी राष्ट्रपति और जनरल अयूब खान ने जबरन कश्मीर पर कब्जा करने की योजना बनाई. जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान का यह हमला कश्मीर पर कब्जा करने के लिए सक्षम था. लेकिन जनरल अयूब खान ने भारतीय सेना और भारतीय वायु सेना की क्षमता के बारे में मालूम नहीं था. लिहाजा, हमले के पहले घंटे में ही हुए भारतीय वायुसेना के हमले से पाकिस्तान का पूरा प्लान फेल हो गया. जिसके बाद उनके हाथ कुछ न लगा.


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adminFebruary 14, 20191min00

हाल ही में एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा में दमदार किरदार में नजर आई जूही चावला मिस इंडिया भी रह चुकी हैं. मिस इंडिया के दौरान की उनकी एक तस्वीर सोशल मीडिया में खूब वायरल हो रही हैं.
बॉलीवुड की खूबसूरत अदाकारा जूही 1984 में मिस इंड‍िया बनी थीं. उन्हें मिस इंड‍िया का ताज एक्ट्रेस रेखा ने पहनाया था. दोनों की ये अनसीन तस्वीर सामने आई है. तस्वीर को खूब पसंद किया जा रहा है.

 
35 साल पहले रेखा ने जूही चावला को यूं पहनाया था मिस इंड‍िया का ताज
 

1984 में मिस इंड‍िया का ताज जीतने के बाद जूही चावला ने बॉलीवुड में 1986 में डेब्यू किया था. पुरानी तस्वीर में जूही चावला और रेखा को देखना काफी दिलचस्प है.

 

35 साल पहले रेखा ने जूही चावला को यूं पहनाया था मिस इंड‍िया का ताज
 

इसके बाद 1988 में आई फिल्म “कयामत से कयामत तक” की सफलता ने जूही को शोहरत की बुलंदी पर पहुंचा द‍िया. फिल्म में वे आमिर खान के साथ जोड़ी में थीं. जूही चावला हाल ही में फिल्म एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा में नजर आई थीं. इस फिल्म में उनकी जोड़ी अनिल कपूर संग नजर आई. जूही चावला बॉलीवुड एक्ट्रेस होने के साथ प्रोड्यूसर, आईपीएल टीम कोलकाता नाइट राइडर्स में शाहरुख खान संग पाटर्नर हैं.


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adminFebruary 11, 20192min00

टीना मुनीम 80 के दशक में बॉलीवुड की ग्लैमरस अभिनेत्रियों में शुमार थीं. 1978 में उन्होंने देव आनंद की फिल्म देश परदेश से अपने बॉलीवुड करियर की शुरुआत की. इसके बाद वे देव साहेब संग कुछ और फिल्मों में भी नजर आईं.

 

संजय दत्त संग था टीना मुनीम का अफेयर, इस वजह से हुए अलग
 

सबसे ज्यादा पॉपुलैरटी उन्हें ऋषि कपूर के अपोजिट कर्ज और संजय दत्त के अपोजिट रॉकी फिल्म से मिली. रॉकी फिल्म की शूटिंग के दौरान संजय संग उनके अफेयर की भी चर्चाएं रहीं. बाद में टीना ने बड़े उद्दयोगपति धीरूभाई अंबानी के छोटे बेटे अनिल अंबानी संग शादी की.

 

संजय दत्त संग था टीना मुनीम का अफेयर, इस वजह से हुए अलग
 

फरवरी 1991 में टीना ने अनिल अंबानी से शादी की. इसके बाद उन्होंने फिल्मों में काम नहीं किया. उनके दो बेटे अनमोल और अंशुल हैं.

 

संजय दत्त संग था टीना मुनीम का अफेयर, इस वजह से हुए अलग

 

1981 में फिल्म रॉकी की शूटिंग के दौरान टीना और संजय दत्त के बीच रोमांस के चर्चे थे. दोनों डेट भी करते रहे, लेकिन कहा जाता है कि संजय की नशे और ड्रग की लत के कारण इस रिश्ते का अचानक अंत हो गया.

 

संजय दत्त संग था टीना मुनीम का अफेयर, इस वजह से हुए अलग
 

सुपरस्टार राजेश खन्ना संग भी उनके अफेयर की अफवाहें उड़ी थीं. यासिर उस्मान द्वारा लिखी संजय दत्त पर लिखी गई विवादित बायोग्राफी “द क्रेजी अनटोल्ड स्टोरी ऑफ बॉलीवुड बेड बॉय” के मुताबिक ब्रेकअप के बाद संजय दत्त को काफी मुश्क‍िल हालात का सामना करना पड़ा था.

 

संजय दत्त संग था टीना मुनीम का अफेयर, इस वजह से हुए अलग
 

किताब के मुताबिक 1982 में एक शाम संजय दत्त के पड़ोसी बंदूक चलने की आवाज सुनकर चौंक गए. संजय दत्त ने अपने घर पर हवा में 22 बोर की रायफल लहराई थी. कुछ ही मिनटों में पड़ोसी और जानने वाले लोग इकट्ठे हो गए.

 

संजय दत्त संग था टीना मुनीम का अफेयर, इस वजह से हुए अलग

 

टीना से ब्रेकअप के बाद संजय परेशान हो गए थे. ओपन फायर करने के अलावा उन्होंने तोड़फोड भी की थी. बता दें कि संजय दत्त इन बातों का खंडन भी कर चुके हैं. उनके मुताबिक ये बातें बेबुनियाद हैं.



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