टोटल धमाल: मूवी रिव्यू

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माधुरी दीक्षित, अनिल कपूर और अजय देवगन जैसे दिग्गज अगर 90’s की किसी मूवी में अकेले-अकेले भी होते, तो भी सिर्फ अपने दम पर दर्शकों को सिनेमा हॉल तक लाने की कुव्वत रखते. प्लस रितेश देशमुख, अरशद वारसी, जावेद ज़ाफ़री, बोमन ईरानी, संजय मिश्रा, महेश मांजरेकर, जॉनी लीवर, सोनाक्षी सिन्हा जैसे ढेरों उतने ही मंझे और फेमस कलाकार. मतलब ये कि एक बार तो केवल इस स्टार कास्ट को एक साथ स्क्रीन शेयर करते हुए देखने के लिए ही ‘टोटल धमाल’ की टिकट खरीदी जा सकती है. यानी इसके अलावा इस फिल्म में जो कुछ भी मिले उसे बोनस मानकर ग्रहण कीजिए.

तो सवाल ये कि – बोनस के रूप में आपको कुछ मिलता है?

बिल्कुल मिलता है. लेकिन बहुत थोड़ा. बहुत देर से. वो क्या कहते हैं… टू लिटिल, टू लेट.

फिल्म धमाल फ्रेंचाइज़ी की तीसरी मूवी है. पहली दो थीं – ‘धमाल’ और ‘डबल धमाल’. और अपने सभी अच्छे मोमेंट्स के साथ और बावज़ूद ‘टोटल धमाल’ इस ट्रायोलॉजी की सबसे कमज़ोर फिल्म कही जाएगी. हर डिपार्टमेंट में. ऑफ़ कोर्स स्टार कास्ट को छोड़कर, जिसके बारे में हम सबसे पहले बात कर चुके हैं और आगे भी एक बार करेंगे.

‘टोटल धमाल’ ‘कर्ज’ मूवी के गीत ‘पैसा’ और किरदारों के इंट्रोडक्शन से शुरू होती है, और यकीन मानिए- ये गीत, ये पहला सीन, ये इंट्रोडक्शन पूरी फिल्म का सबसे अच्छा, सबसे इंट्रेस्टिंग और सबसे एंटरटेनिंग पार्ट है. इसके बाद फिल्म बिट्स ऐंड पार्ट्स, यानी टुकड़ों में अच्छी लगती है.

…बहुत अच्छी नहीं, बस अच्छी!

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कहानी का सेंट्रल आइडिया लगभग वही है जो इस सीरीज़ की सबसे पहली फिल्म का था. बस उसमें की जा रही W की खोज इसमें OK की खोज में बदल जाती है. यानी ये भी कहा जा सकता है कि ‘टोटल धमाल’ इस सीरीज़ की पिछली फिल्म का सीक्वल कम, रीमेक ज़्यादा लगती है. बस कुछ चीज़ों को थोड़ा इधर-उधर किया गया है. लेकिन फिर भी ये सीक्वल या रीमेक तुलनात्मक रूप से दोयम ही साबित होता है. ओके! तो अब आगे बात करते हैं. तो इस OK की तलाश में 4 जोड़े लगे हैं. इनकी और इनके करैक्टर्स की बात अलग-अलग करते हैं. आधा रिव्यू तो उसी से कंप्लीट हो जाना है –

# 1 – अविनाश पटेल और बिंदु (अनिल कपूर, माधुरी दीक्षित) –

17 साल से अनहैप्पिली मैरिड कपल जो अपने तलाक से पहले अपने बेटे से मिलने जा रहे हैं. अनिल और माधुरी के बीच की ऑन स्क्रीन केमिस्ट्री देखते ही बनती है. इनके इंट्रोडक्शन वाले सीन से आपको ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ के कोर्ट सीन और उसके चुटीले डायलॉग्स की याद आएगी. जब कोई कॉमेडी डायलॉग या सीन न भी हों, तब भी ये दोनों अपनी प्रेज़ेंस भर से ही उस सीन में जान फूंक देते हैं. और जैसा कि मैं एक्स्पेक्ट कर रहा था इनके बीच के कुछ डायलॉग आपको इनकी पुरानी फिल्मों की याद दिलाते हैं. और ये जानबूझकर है –

– वन टू का फोर, फोर टू का वन, माई नेम इज़ ढक्कन

– सरोज खान के पीछे धक-धक, धक-धक करती थी.

‘तेज़ाब’ से शुरू हुई ये केमिस्ट्री अब ‘टोटल धमाल’ तक जा पहुंची है.

लेकिन यहां पर भी मुझे लगा कि इन दोनों करैक्टर्स और उनके रिलेशन में काफी पोटेंशियल था, जिसका केवल एक बहुत छोटा हिस्सा ही फिल्म में एक्सप्लोर किया गया है. नॉस्टेल्जिया के साथ ह्यूमर के तड़के को मिलाने से जो रेसिपी बनती है, वो न केवल अंदर तक गुदगुदाती है बल्कि राइटर की स्मार्टनेस का भी लोहा मनवाती है. तो, इनके बीच के डायलॉग्स, और ज़्यादा नॉस्टेल्जिक, और ज़्यादा क्रिस्प, और ज़्यादा विटी हो सकते थे. यदि आप मेरी तरह स्त्री हितों के पैरोकार हैं, तो अनिल कपूर और माधुरी दीक्षित के किरदारों के बीच के डायलॉग से कभी-कभी ऑफेंड हो सकते हैं.

# 2 – आदित्य और मानव (अरशद वारसी, जावेद ज़ाफ़री) –

अगर आपने पहली दो फ़िल्में देखी हैं, तो इनके किरदार को जानते ही होंगे. लेकिन फिर भी बता देते हैं, ये दो भाई हैं. जिसमें आदित्य थोड़ा ज़्यादा अक्लमंद और मानव थोड़ा ज़्यादा संवेदनशील है. बस एक दूसरे से थोड़ा ज़्यादा. वरना तो न ही दोनों अक्लमंद हैं, न ही संवेदनशील. बहरहाल अगर आपने ‘धमाल’ देखी है तो, ‘टोटल धमाल’ में इन दोनों को देखकर निराश होंगे. लेकिन फिल्म ख़त्म हो जाने के बाद. क्यूंकि फिल्म जब तक चल रही होती है, तब तक आपको उम्मीद बंधी रहती है. और इसलिए ही मैं कह रहा हूं कि फिल्म के किरदारों में काफी पोटेंशियल था. ऐसा नहीं है कि दोनों दर्शकों को हंसाने में सर्वथा असफल रहे हों. लेकिन ये या फिर कोई भी किरदार, डायलॉग या घटना आपको हंसा-हंसा के आपके पेट में दर्द कर दे ऐसा नहीं होता.

# 3 – राधे और जॉनी (अजय देवगन, संजय मिश्रा) –

दोनों ठग हैं. एन्ट्री में ही ‘मेन इन ब्लैक’ या ‘मिशन इंपॉसिबल’ टाइप की एक ठगी को देसी स्टाइल में अंजाम देते हुए पाए जाते हैं. वैसे पूरी फिल्म में सबसे कमज़ोर रोल संजय मिश्रा को ही मिला है. उनका तकिया कलाम – ब्रो, आपको इरिटेशन की हद तक चुभता है. अजय देवगन की एक्टिंग और ‘ओवर एक्टिंग’, जो उनके रोल के आवश्यक था, अच्छी है लेकिन उनके किरदार में मूल ही वो दम वो गहराई न थी कि वो आपको प्रभावित करें.

और अंतिम जोड़ी है –

# 4 – देशबंधु और उसके दोस्त की (रितेश देशमुख और पित्तोबाश) –

एक और जोड़ी. इनके बारे में बात न भी की जाए तो भी ठीक ही है. इनको रोल दिए गए हैं, इन्होंने वो कर दिए हैं. सिंपल.

इसके अलावा बोमन ईरानी, जॉनी लीवर, जैकी श्रॉफ की आवाज़, महेश मांजरेकर और सुदेश लहरी केवल होने भर से मनोरंजन करते हों तो करते हों. रोल तो किसी का भी ऐसा नहीं था कि मैं किसी के लिए भी वो क्लीशे लाइन यूज़ कर सकूं – अपने छोटे से रोल में प्रभावित करते हैं.

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स्टारकास्ट के बाद जो चीज़ सबसे ज़्यादा नंबर लूट के ले जाती है फिल्म में स्पेशल इफेक्ट्स. गाड़ियों का जो इस्तेमाल इस फिल्म में किया गया है वो ‘रोहित शेट्टी’ मार्का है. और इसलिए ही फिल्म में भी अजय देवगन और संजय मिश्रा का किरदार डायलॉग में भी रोहित शेट्टी का रेफरेंस लेकर आते हैं.

जो बैकग्राउंड में छाया दिख रही है. वो जानवरों की है. बहुत से जानवरों ने भी इसमें एक्टिंग की है.

इसके अलावा हेलिकॉप्टर का सीन हो या चिड़ियाघर के जानवर. सब असली लगते हैं. लेकिन विरोधाभास ये है कि फिल्म और फिल्म की स्क्रिप्ट का कुल-जमा फील पूरी तरह नकली, पूरी तरह ‘निर्जीव’ लगता है. इसमें अब हम भारतीय दर्शकों को कोई दिक्क्त नहीं क्यूंकि स्लैपस्टिक कॉमेडी की जो विधा भारत में विकसित हुई है, उसमें कुछ भी हो सकता है. फिर चाहे वो बॉलीवुड फ़िल्में हों या साउथ इंडियन. बस इस दौरान कम से कम आप अपने को अश्लीलता और भद्देपन से बचा ले जाओ तो काफी है. और फिल्म ऐसा करने में पूरी तरह सफल रहती है.

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फिल्म को हम केवल तीन ही कसौटी में कस रहे हैं – एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट और एंटरटेनमेंट. क्यूंकि, जैसा मेरे कुलीग मुबारक कहते हैं, फिल्म के ट्रेलर और बज़ से अगर दर्शकों से संतरे का प्रॉमिस किया गया है तो एक समीक्षक के रूप में आपका कर्तव्य है कि ये देखा जाए कि फिल्म संतरा डिलीवर करती है या नहीं. वर्ना सेब, केला, अनार… आई मीन सोशल मैसेज, लॉजिक, स्क्रिप्ट या आर्ट की बात की जाए तो वो इस या ऐसी किसी फिल्म से उम्मीद रखना ही ग़लत होगी. लेकिन मुझे निजी रूप से इस फिल्म से एक दिक्क्त है. वो ये कि ये संतरा भी खट्टा है. यानी आप बाकी सब चीज़ों से कॉम्प्रोमाईज़ कर रहे हो, दर्शकों का मनोरंजन भर करने के लिए लेकिन उसमें भी आप आंशिक रूप से सफल हो पा रहे हो.

ये फिल्म समीक्षकों से ज़्यादा आम दर्शकों और बड़ों से ज़्यादा बच्चों को पसंद आएगी.

फिल्म से एक दिक्क्त और भी है. वो ये कि इसमें ‘धमाल’ फ्रैंचाइज़ी की सफलता को भुनाने की कोशिश भर की गई है. स्टोरी, स्क्रीनप्ले और डायलॉग तक में ऐसा कुछ नया या चमत्कृत करने वाला नहीं है कि जो फिल्म देख चुकने के बाद भी आपके दिल या दिमाग में चिपका रह जाए. डायलॉग में जो चीज़ अच्छी और क्रिएटिव है वो है ‘पन’. मतलब शब्दों को तोड़ मरोड़ के उसके नए ही मायने निकालना. जैसे एक जगह जानवर को ‘जान’ और ‘वर’ में तोड़कर अलग ही मायने निकाले गए हैं. समझ में नहीं आता कि कहीं तो डायलॉग इतने स्मार्टली लिखे गए हैं और कहीं खानापूर्ती कर दी गई है.

अजय देवगन और मंकी

तो अंत में ये ही कहेंगे कि ‘टोटल धमाल’ एक हल्की-फुल्की फैमिली मूवी है. लेकिन ओवर ऑल भी ये फिल्म हल्की-फुल्की ही है. वो होती हैं न, अलसाई दुपहरियों में दो तीन बजे टीवी में आती हैं जो फ़िल्में. हर दूसरे हफ्ते. इन्हें आपने वन गो में पूरा कभी नहीं देखा होता है, लेकिन हर बार थोड़ा-थोड़ा देखकर आप एक दिन पूरी फिल्म देख चुकते हो. टोटल धमाल ऐसी और सिर्फ ऐसी ही फिल्म है.


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