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adminNovember 23, 202010min4200

एक साइकिल. कहीं डंडे वाली तो कहीं बिना डंडे वाली. एक घंटी, कैरियर और सुंदर सी टोकरी लगी साइकिल… हो सकता है आपका बचपन इसकी सवारी के साथ बीता हो.

और बहुत मुमकिन है कि अब आपने ख़ुद को मोटरगाड़ी या बाइक तक अपग्रेड कर लिया हो और साइकिल से आपका शायद ही वास्ता पड़ता हो.

पर लॉकडाउन के दौरान बिहार की 15 बरस की एक लड़की ज्योति साधारण-सी साइकिल चलाकर 1200 किलोमीटर, गुरुग्राम से बिहार के अपने पुश्तैनी गाँव पहुँची थी.

निर्देशक एम. गनी की नई फ़िल्म ‘मट्टो की साइकिल’ ऐसे ही एक मज़दूर मट्टो (प्रकाश झा) और उसकी साइकिल की कहानी है.

फ़िल्म का एक सीन है जहाँ टूटी साइकिल की वजह से मट्टो रोज़ मज़दूरी पर देरी से आता है तो ठेकेदार पूछता है- “क्यों भई मट्टो जे कोई टाइम है आने का?”

तो मट्टो बड़ी लाचारी से जवाब देता है- “मेरो साइकिल में रोज़ कुछु न कुछु टेंटो लग जाए ठेकेदार.”

मट्टो आज का वो मज़दूर है जो कोरोना वाले लॉकडाउन में नहीं बल्कि ज़िंदगी नाम के परमानेंट लॉकडाउन में फँसा है जहाँ उसकी ‘नीची’ जाति, उसकी ग़रीबी, सब जैसे वायरस बन उसे ज़हनी और जिस्मानी तौर पर बीमार कर रहे हैं.

दक्षिण कोरिया में हुए बुसान फ़िल्म फ़ेस्टिवल से चर्चा में आई फ़िल्म मट्टो की साइकिल में जाने-माने निर्देशक प्रकाश झा लीड रोल में हैं.

 

समाज पर प्रहार है फ़िल्म

कोरोना लॉकडाउन में इस साल मज़ूदरों की जो हालत हुई, फ़िल्म उससे पहले बननी शुरू हो चुकी थी. तो इस विषय पर एम. गनी ने फ़िल्म बनाने की क्यों सोची, इसका जवाब उनकी निजी ज़िंदगी में रचा बसा है.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने बताया, “मट्टो जो इस फ़िल्म का मुख्य किरदार है, एक तरह से मेरे पिता का अक्स उनमें है. उत्तर प्रदेश में मेरा अपना परिवार भी ऐसा ही था, मज़दूरी की तलाश में परिवार घूमता था. इस कहानी का एक-एक किरदार मेरा देखा और जिया हुआ है.”

“ये कहानी हमेशा मेरे इर्द-गिर्द थी, हमने तो कई असल किरदारों के नाम तक नहीं बदले हैं. ये बरसों पहले से तय था कि मैं इस पर कुछ करूँगा.”

फ़िल्म देखकर आप महसूस करेंगे कि कहानी भले ही मट्टो नाम के एक मज़ूदर की है पर इस बहाने ये फ़िल्म समाज पर तीखा प्रहार भी है जो मेहनत-मजूरी करने वाले इस तबके को या तो हिकारत की नज़र से देखता है या उससे भी बदतर. ये सारे लोग हमारे बीच होते हुए भी ओझल ही रहते हैं.

मट्टो का रोल करने वाले प्रकाश झा इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, “हम विकास की राह पर चल तो पड़े हैं लेकिन हमारी सामाजिक मानसिकता नहीं बदल पा रही. वो (मज़दूर) हमारे आलीशान घर बनाते हैं, और ख़ुद बिना आशियाने के रहते हैं और पैदल सड़कों पर चलने को मजबूर हैं. एक पूरा तबका है जिसका कोई मोल नहीं है समाज में.”

 

मट्टो की साइकिल

 

“मुझे इस फ़िल्म की कहानी ने बहुत प्रभावित किया. एक मज़दूर और उसकी साइकिल की कहानी- वो साइकिल जिसकी उम्र उसकी बेटी की उम्र से बस एक साल ज़्यादा है.”

वहीं निर्देशक एम. गनी मानते हैं, “दरअसल हमने अपने आसपास के मट्टो को देखना कम कर दिया है. मैं ख़ुद भी सोचने लगा था कि अब लोगों ने साइकिल चलाना कम कर दिया है. मैं कई दिन तक शहरों के बाहरी इलाक़ों में गया और मज़दूरों को देखता था, मज़दूर तो आज भी साइकिल पर ही चलते हैं. इस साल तो हमने देखा ही कि मज़दूर कैसे साइकिल, या पैदल चलकर लॉकडाउन में घर पहुँचे.”

 

मट्टो की साइकिल

 

ज़रूरतें इंसान को पास लाती हैं

मट्टो और उसकी साइकिल की कहानी के ज़रिए ये फ़िल्म जात-पात, स्टेटस और महिलाओं से जुड़े मुद्दों को भी छूकर जाती है.

फ़िल्म में एक वकील है जो मट्टो को अक्सर उसके दोस्त कल्लू पंचरवाले की दुकान पर मिल जाता है. ये किरदार निर्देशक के भाई के दोस्त की निजी ज़िंदगी पर आधारित है.

फ़िल्म में वकील होते हुए भी उसे अक्सर केस नहीं मिलता. पूछने पर वो कहता है, “हमारी नेमप्लेट ही खोटी है. बस सुअरन के पीछे घूमते रहो, गटर में घुसते रहो तो ही दुनिया ख़ुश रहती है हमसे.”

 

मट्टो की साइकिल

 

या फिर वो कार वाला अनाम शख़्स जो ख़ुद ग़लत तरीक़े से गाड़ी लगाता है और जब मट्टो की साइकिल से उसकी टक्कर हो जाती है तो उसे बड़े रुआब से आधी अंग्रेज़ी में बोलता है कि ये टूट जाती तो इसका ख़र्च कौन ‘बियर’ करता?

निर्देशक एम. गनी कहते हैं, “फ़िल्म में उस कार वाले के ग़ुस्से की एक वजह है कि वो प्रिविलेज्ड है, हमें लगता है कि हम पैसे और पावर वाले हैं तो हम ऐसे ही बर्ताव कर सकते हैं.”

फ़िल्म की बात करें तो ग्रामीण परिवेश वाले एक देहाती मज़दूर के रोल में प्रकाश झा काफ़ी सहज लगते हैं- चाहे उनकी बोली हो, हावभाव या वेशभूषा.

निर्देशक गनी इसका श्रेय प्रकाश झा को ही देते हैं, “प्रकाश जी ने ख़ुद को रोल के लिए तैयार किया. वो मज़दूरों के बीच जाकर रहे और लेबर चौक पर जाकर बैठा करते थे. सर पर ईंटा लेकर चलने वाले सारे शॉट उनके ख़ुद के हैं. उन दिनों वो बिना एसी के रहते थे.”

वैसे फ़िल्म में तमाम नाउम्मीदियों के बीच उम्मीद की एक किरण भी दिखती है कैसे ग़रीब और शोषित एक-दूसरे के साथ खड़े हुए नज़र आते हैं.

ख़ुद हाशिए पर होते हुए भी मट्टो का साथ अगर कोई देता है तो उसका मुसलमान दोस्त कल्लू पंचरवाला और दलित वकील.

एम. गनी मानते हैं कि ज़रूरतें लोगों को क़रीब लाती हैं और अगर हमारी ज़रूरतें, हमारी दिक़्क़ते एक जैसी हों तो एक-दूसरे को समझना आसान होता है. दरअसल साम्यावादी होना इंसान के फ़ेवर में चला जाता है- मुस्कुराते हुए वो अपनी राय रखते हैं.

 

ज़िन्दगी जीने का नुस्खा देता दिलदार कल्लू

मथुरा के एक गाँव में बसी इस फ़िल्म की एक मज़बूत कड़ी है इसकी स्थानीय बोली. भाषा की ऐसी विविधिता मेनस्ट्रीम फ़िल्मों में कम देखने को मिलती है.

जब ज़िंदगी से निराश मट्टो अपने दोस्त कल्लू से कहता है कि देखते-देखते 20 साल निकल गए, कछु नहीं कर पाए यार… तो ज़िंदादिल कल्लू उसे दिलासा देता है- “का मातम मना रहे हो, हसबे-बोलबे में ही ज़िंदगी का सार है, और मेरो जैसा सेलिब्रिटी तेरो यार है.”

ये मीठी बोली और मीठा अंदाज़ सुनकर ज़रूर आपके चेहरे पर भी मुस्कान आ जाएगी.

फ़िल्म लॉकडाउन से पहले बनी है लेकिन इस साल मीलों पैदल चलते मज़दूरों की दुर्दशा के साए में ये कहीं ज़्यादा प्रासंगिक मालूम होती है और एम. गनी ने इसे काफ़ी संवेदनशीलता से बनाया भी है.

फ़िल्म मट्टो की साइकिल देखने के बाद पता नहीं क्यों मैंने सबसे पहले उस 15 साल की बच्ची ज्योति और उसके पिता को फ़ोन लगाया जो दिल्ली से बिहार साइकिल चलाकर आई थी.

बिहार के अपने गाँव से ज्योति के पिता मोहन पासवान ने बताया कि अभी उनके पास कुछ काम नहीं है और वो इंतज़ार कर रहे हैं कि चुनाव के बाद उनकी सुध लेने वाला कोई होगा.

बिल्कुल वैसी ही उम्मीद जैसी फ़िल्म में मट्टो को अपने इलाक़े से चुनाव लड़ने वाले नेता से थी. लगा जैसे फ़िल्मी कहानी का मट्टो और हक़ीक़त का मोहन आमने-सामने आकर खड़े हो गए हों.

या प्रकाश झा की नज़रों से देखें तो वो कहते हैं कि उनकी 1985 की फ़िल्म का बंधुआ मज़दूर संजीवन राम और आज का मट्टो जैसे अब भी एक ही मुहाने पर खड़े हैं.

और सरहदों को पार कर अगर आप दुनिया का सिनेमा देखेंगे तो मट्टो आपको वहाँ भी नज़र आएगा.

 

नाउम्मीदी में उम्मीद की किरण

1948 में इटली की फ़िल्म आई थी ‘बाइसिकल थीफ़्स’ जिसे दुनिया की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में गिना जाता है. फ़िल्म में मट्टो की ही तरह एंटोनियो नाम के ग़रीब मज़दूर को नौकरी पर जाने के लिए हर हाल में एक साइकिल की ज़रूरत है क्योंकि उसकी साइकिल चोरी हो गई है वरना वो भूखा मरेगा.

लेकिन ग़रीबी की वजह से उसे मट्टो की तरह हिकारत ही मिलती है जब तक कि वो मजबूरीवश एक साइकिल चोर नहीं बन जाता. तब भी उसे गुनहगार न समझने वाला उसका छोटा-सा बेटा ही है, जैसे मट्टो के पास कल्लूपंचर वाला था.

तो दुनिया के ऐसे असली मट्टो से फ़िल्म के निर्देशक क्या कहना चाहेंगे?

अपनी बात निर्देशक गनी कुछ यूँ ख़त्म करते हैं, “मैं मज़दूरों को कुछ कहना नहीं चाहता बल्कि उन लोगों की बात सुनना चाहता हूँ जिन्हें इस पर बोलना चाहिए था. अगर एक बच्ची साइकिल चलाकर बिहार पहुँची है तो ये कोई फ़ख़्र की बात नहीं है. पर एक उम्मीद की किरण मुझे दिखती है.”

“जब मज़ूदर दिक़्क़त में थे, कितने लोगों ने इनके दर्द को समझा. संवेदनशीलता मरी नहीं है अब तक. ये बात मुझे उम्मीद देती है.”

 


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adminNovember 23, 20201min4900

आयुर्वेद में पोस्टग्रेजुएट करने वाले डॉक्टर्स भी जनरल सर्जरी कर सकेंगे. इसमें ऑर्थोपेडिक सर्जरी के साथ आंख, कान, गले और दांतों से जुड़ी सर्जरी शामिल है. सरकार ने इंडियन मेडिकल सेंट्रल काउंसिल (पोस्ट ग्रेजुएट आयुर्वेद एजुकेशन) रेग्युलेशन 2016 में संशोधन किया है. इसका मकसद जनरल सर्जरी और आंख, नाक, कान गले से जुड़ी बीमारियों के बारे में पोस्ट ग्रेजुएट स्टूडेंट्स के लिए फॉर्मल ट्रेनिंग शुरू करना है.

 

क्या है नोटिफिकेशन में? 

आयुर्वेद के छात्र सर्जरी के बारे में पढ़ाई तो करते थे, लेकिन उनके सर्जरी करने के अधिकारों को सरकार की ओर से स्पष्ट नहीं किया गया था. 19 नवंबर को जारी किए गए गजट नोटिफिकेशन के मुताबिक, आयुर्वेद के सर्जरी में पीजी करने वाले छात्रों को आंख, नाक, कान, गले के साथ ही जनरल सर्जरी के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित किया जाएगा.

पारंपरिक दवाओं की सर्वोच्च नियामक संस्था सेंट्रल काउंसिल ऑफ इंडियन मेडिसिन (CCIM) का कहना है,

उसके डॉक्टर पिछले 25 सालों से आयुर्वेद संस्थानों और अस्पतालों में सर्जरी कर रहे हैं. यह नोटिफिकेशन सिर्फ इसकी वैधानिकता के सवालों को स्पष्ट करना है.

CCIM ने नोटिफिकेशन जारी कर कहा है,

आयुर्वेद के डॉक्टर कुल 58 तरह की सर्जरी करेंगे. उन्हें जनरल सर्जरी (सामान्य चीर-फाड़), ईएनटी (नाक, कान, गला), ऑप्थेलमॉलजी (आंख), ऑर्थो (हड्डी) और डेंटल (दांत) से संबंधी बीमारियों के इलाज के लिए जरूरी सर्जरी कर पाएंगे.

 

विशेषज्ञों का क्या कहना है?

केंद्र सरकार के आयुर्वेद के पूर्व सलाहकार डॉ. एस.के. शर्मा ने एक मीडिया हाउस से बातचीत में कहा,

यह पहल मील का पत्थर साबित होगा. इससे देश में कुशल सर्जनों की कमी दूर होगी. देश के दूरदराज इलाकों के मरीजों को भी उच्च स्तर का इलाज मिल सकेगा. आयुर्वेद के विद्यार्थियों को प्रसव, गर्भपात, गर्भाशय की सर्जरी का भी अधिकार दिया जाना चाहिए.

IMA ने विरोध जताया

इंडियन मेडिकल असोसिएशन ने CCIM के इस फैसले को एकतरफा बताया है. आयुर्वेदिक डॉक्टरों को सर्जरी के अयोग्य बताते हुए कड़ी आलोचना की है. संस्था की तरफ से जारी बयान में कहा गया है,

आईएमए ने लक्ष्मण रेखा खींच रखी है जिसे लांघने पर घातक परिणाम सामने आएंगे. आईएमए काउंसिल को सलाह देता है कि वो प्राचीन ज्ञान के आधार पर सर्जरी का अपना तरीका इजाद करे और उसमें आधुनिक चिकित्सा शास्त्र पर आधारित प्रक्रिया से बिल्कुल दूर रहे.

इंडियन मेडिकल असोसिएशन ने फैसले को मेडिकल संस्थानों में चोर दरवाजे से एंट्री का प्रयास बताते हुए कहा कि ऐसे में NEET जैसी परीक्षा का कोई महत्व नहीं रह जाएगा. संस्था ने इस नोटिफिकेशन को वापस लेने की मांग की है.

 

 

इंडियन मेडिकल असोसिएशन ने आरोप लगाए हैं कि CCIM की पॉलिसी में छात्रों के लिए मॉर्डन मेडिसिन से जुड़ी किताबें मुहैया कराने को लेकर भेद है. संस्था दोनों सिस्टम को मिलाने की कोशिश का विरोध करेगी.

असोसिएशन ऑफ सर्जन्स ऑफ इंडिया के अध्यक्ष रघुराम का कहना है,

जनरल सर्जरी आधुनिक मेडिकल साइंस का हिस्सा है. इसे आयुर्वेद के साथ मुख्य धारा में नहीं लाया जा सकता. आयुर्वेद की पढ़ाई में पोस्टग्रेजुएट सिलेबस में इस तरह की ट्रेनिंग मॉड्यूल के जरिए डॉक्टरों को एमएस (आयुर्वेद) की उपाधी देना मरीजों की सुरक्षा के बुनियादी मानकों से खिलवाड़ करने जैसा होगा.


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adminNovember 23, 20201min3630

28 साल की एक लड़की. मस्तमौला. इरादे पक्के. जो काम सामने आया, कर दिया. दौड़ने वाला घोड़ा सामने आया, दौड़ा लिया. चलने वाला घोड़ा आया, चला दिया. रानी ने बुलाया तो तन्मयता से काम कर दिया. जब मेकअप कर लिया तो खुद ही रानी लगने लगी. रानी के साथ लड़ाई पर गई. जब रानी घिर गई तो खुद ही रानी बन लड़ पड़ी. क्योंकि रानी उसकी सखी थी. ये दोस्ती की बात थी. साथ ही अपने राज्य के प्रति प्रेम की बात थी.

सबसे बड़ी बात थी अपने जौहर को दिखाने की. बचपन में कुल्हाड़ी से लकड़ी काटने गई थी. तेंदुआ आ गया सामने, उसे भी काट दिया. रानी को इस लड़की की ये अदा पसंद थी. वो रानी थी लक्ष्मीबाई और ये लड़की थी झलकारी बाई. जिसका नाम इतिहास के पन्नों में इतना नीचे दबा है कि खोजते-खोजते पन्ने फट जाते हैं. वक्त की मार थी, लोग-बाग राजा-रानियों से ऊपर किसी और की कहानी नहीं लिखते थे.

पर जो बात है, वो बात है. कहानी उड़ती रही. डेढ़ सौ साल बाद भी वो लड़की जिंदा है. भारत के बहुजन समाज की हीरोईन. सबको नायक-नायिकाओं की तलाश रहती है. बहुजन समाज को इससे वंचित रखा गया था. पर इस लड़की ने बहुत पहले ही साबित कर दिया था कि इरादे और ट्रेनिंग से इंसान कुछ भी कर सकता है. बाकी बातें तो फर्जी होती हैं. बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम ने जब लोगों को जगाना चाहा तो इसी लड़की के नाम का सहारा लिया था. वरना एक वर्ग दूसरे वर्ग को यही बता रहा था कि बहुत सारे काम तो तुम कर ही नहीं सकते हो.

22 नवंबर 1830 को झांसी के एक कोली परिवार में पैदा हुई थी झलकारी. पिता सैनिक थे. तो पैदाइश से ही हथियारों के साथ उठना-बैठना रहा. पढ़ाई-लिखाई नहीं हुई. पर उस वक्त पढ़ता कौन था. राजा-रानी तक जिंदगी भर शिकार करते थे. उंगलियों पर जोड़ते थे. उस वक्त बहादुरी यही थी कि दुश्मन का सामना कैसे करें. चतुराई ये थी कि अपनी जान कैसे बचायें.

तो झलकारी के गांव में एक दफे डाकुओं ने हमला कर दिया. कहने वाले यही कहते हैं कि जितनी तेजी से हमला किया, उतनी तेजी से लौट भी गये. क्योंकि झलकारी के साथ मिलकर गांव वालों ने बड़ा इंतजाम कर रखा था. फिर झलकारी की शादी भी हो गई. एक सैनिक के साथ. एक बार पूजा के अवसर पर झलकारी रानी लक्ष्मीबाई को बधाई देने गई तो रानी को भक्क मार गया. झलकारी की शक्ल रानी से मिलती थी. और फिर उस दिन शुरू हो गया दोस्ती का सिलसिला.

1857 की लड़ाई में झांसी पर अंग्रेजों ने हमला कर दिया. झांसी का किला अभेद्य था. पर रानी का एक सेनानायक गद्दार निकला. नतीजन अंग्रेज किले तक पहुंचने में कामयाब रहे. जब रानी घिर गईं, तो झलकारी ने कहा कि आप जाइए, मैं आपकी जगह लड़ती हूं. रानी निकल गईं और झलकारी उनके वेश में लड़ती रही. जनरल रोज ने पकड़ लिया झलकारी को. उन्हें लगा कि रानी पकड़ ली गई हैं. उनकी बात सुन झलकारी हंसने लगी. रोज ने कहा कि ये लड़की पागल है. पर ऐसे पागल लोग हो जाएं तो हिंदुस्तान में हमारा रहना मुश्किल हो जाएगा.

मैथिली शरण गुप्ता ने झलकारी बाई के बारे में लिखा है:

जा कर रण में ललकारी थी,
वह तो झांसी की झलकारी थी.
गोरों से लड़ना सिखा गई,
है इतिहास में झलक रही,
वह भारत की ही नारी थी.

झलकारी के अंत को लेकर बड़ा ही मतभेद है. कोई कहता है कि रोज ने झलकारी को छोड़ दिया था. पर अंग्रेज किसी क्रांतिकारी को छोड़ते तो ना थे. कोई कहता है कि तोप के मुंह पर बांध कर उड़ा दिया गया था. जो भी हुआ हो, झलकारी को अंग्रेजों ने याद रखा था. वहीं से कुछ जानकारी कहीं-कहीं आई. वृंदावन लाल वर्मा ने अपने उपन्यास झांसी की रानी में झलकारी बाई का जिक्र किया है. पर इतिहास में ज्यादा जिक्र नहीं मिलता है.

उसी दौरान एक और वीर लड़की हुई थी. उदा देवी. लखनऊ की बेगम हजरत महल के साथ रहने वाली. 1857 की लड़ाई के दौरान कैप्टेन वालेस एक जगह अपने साथियों के साथ रुका. पानी पीने के लिये. वहां ब्रिटिश सैनिकों की लाशें गिरी हुई थीं. उसने देखा कि सब पर ऊपर से गोली चलने के निशान हैं. तो उसने अपने साथियों को इशारा कर ऊपर पेड़ पर गोलियां चला दीं. एक लाश गिरी. यूनिफॉर्म पहने हुए. दो-दो बंदूकों के साथ. ये उदा देवी थीं. वालेस रो पड़ा. बोला कि मुझे मालूम होता कि ये औरत है तो मैं गोली ना चलाता. खैर, ये बात वालेस ने क्यों कहा समझ नहीं आया. क्योंकि दूसरे देश में आकर गोली चला रहे थे. इससे औरतों को कितनी तकलीफ थी. ये तो नहीं मालूम पड़ा. फर्जी बात करना अंग्रेज अफसरों का स्वभाव था. उदा की बहादुरी के सामने खुद का बड़प्पन जो दिखाना था. बसपा के गठन के समय ये लड़की भी समाज को एकजुट करने के काम आई.


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adminNovember 23, 20203min3330

भारतीय बाजार में धीरे-धीरे स्कूटर (स्कूटी) की मांग बढ़ती जा रही है. अब ग्रामीण इलाकों में भी स्कूटर के खरीदार बढ़ रहे हैं. पहले कहा जाता था कि जहां सड़कें अच्छी होती हैं वहीं स्कूटर की डिमांड ज्यादा होती है. लेकिन अब देश के कोने-कोने में स्कूटर को लेकर क्रेज बढ़ रहा है.

भारत में दर्जनों स्कूटर बनाने वाली कंपनियां हैं. लेकिन बाजार पर चुनिंदा टू-व्हीलर कंपनियां ही राज करती हैं. जिसने ग्राहकों का भरोसा जीता है. आज हम आपको पिछले महीने यानी अक्टूबर में भारत में सबसे ज्यादा बिकने वाले ऐसे 5 स्कूटर्स के बारे में बताने जा रहे हैं, जो आपके बजट में फिट हो जाते हैं.

 

Honda Activa

 

Honda Activa: भारतीय स्कूटर बाजार में होंडा एक्टिवा का नंबर 1 पर कब्जा है. अक्टूबर में एक्टिवा के कुल 2,39,570 यूनिट्स की बिक्री हुई. हालांकि अक्टूबर 2019 के मुकाबले सेल में गिरावट दर्ज की गई है. दिल्ली में इसकी (एक्स-शोरूम) कीमत 65,892 रुपये है.

 

TVS Jupiter:

 

TVS Jupiter: शानदार लुक की वजह से टीवीएस जुपिटर की भारतीय बाजार में खास पकड़ है. अक्टूबर महीने में जुपिटर के कुल 74,159 यूनिट्स की बिक्री हुई. अक्टूबर में दूसरा सबसे ज्यादा बिकने वाला स्कूटर जूपिटर रहा है. इस स्कूटर की (एक्स-शोरूम) कीमत 63,852 रुपये है.

 

Suzuki Access

 

Suzuki Access: सुजुकी एक्सेस की अच्छी डिमांड है. पिछले महीने  कुल 52,441 यूनिट Suzuki Access स्कूटर बिके. इस आंकड़े के साथ Suzuki Access तीसरा सबसे ज्यादा बिकने वाला स्कूटर बन गया है. Suzuki Access की एक्स-शोरूम कीमत 70,500 रुपये है.

 

Honda Dio

 

Honda Dio: अक्टूबर महीने में बिक्री के मामले में Honda Dio स्कूटर चौथे नंबर रहा. अक्टूबर में Honda Dio के कुल 44,046 यूनिट्स बिके. भारतीय बाजार में Honda Dio की एक्स-शोरूम कीमत 61,970 रुपये है.

 

TVS Ntorq

 

TVS Ntorq: टीवीएस के एक और स्कूटर ने पिछले महीने बिक्री के मामले में अपनी अच्छी बढ़त हासिल की. अक्टूबर महीने में TVS Ntorq के कुल 31,524 यूनिट्स बिके. भारत में मौजूद यह एक बेहद ही हाईटेक स्कूटर है. बिक्री के मामले में ये पांचवें नंबर है. इस स्कूटर की एक्स-शोरूम कीमत 68,885 रुपये है.


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adminNovember 23, 20204min4180

मशहूर कोरियोग्राफर सरोज खान का आज बर्थ-डे है. उनके कोरियोग्राफ किए हुए गानों के स्टेप्स पर डांस करती हुई हम जैसी लड़कियां बड़ी हुईं. जिसे आइकन कहा जाता है, सरोज खान उन चंद लोगों में से थीं जिन्होंने परदे के पीछे रह कर भी कमाल रचा. कोरियोग्राफी के लिए उन्हें आठ फिल्मफेयर अवॉर्ड्स मिल चुके थे, जो इस कैटेगरी में हाइएस्ट हैं. कोई उनके करीब तक नहीं है. उनके कुछ ऐसे ही कोरियोग्राफ किए हुए गाने, जो बेहद पॉपुलर हुए, आप यहां देख सकते हैं. साथ ही उससे जुड़ी कुछ रोचक जानकारी भी पढ़ लीजिएगा. 71 साल की उम्र में इसी साल उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया था.

 

1. चने के खेत में

फिल्म:अंजाम (1994)

किस पर फिल्माया गया: माधुरी दीक्षित

इस गाने का हुक स्टेप बहुत पॉपुलर हुआ. हुक स्टेप उसे कहते हैं जो गाने में बार-बार रिपीट होता है. चने के खेत में लाइन पर माधुरी जो एक्शन करती हैं, वो आज भी करने की कोशिश करते हुए लोग देखे जा सकते हैं. (दिखने में आसान है, करने में नहीं).

 

 

2. तम्मा तम्मा लोगे

फिल्म: थानेदार (1990)

किस पर फिल्माया गया: संजय दत्त, माधुरी दीक्षित

इस गाने के बारे में  सरोज खान ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनकी एक सहेली ने आकर संजय दत्त की तारीफ की थी. कि गाने में वो बहुत अच्छे लगे. मैंने उसे बताया कि गाने में तो माधुरी भी थी. उसने कहा कि उसने माधुरी को तो नोटिस ही नहीं किया. मैं यकीन नहीं कर पाई. ये अचानक से हुआ था.

 

 

3. निम्बूड़ा निम्बूड़ा

फिल्म: हम दिल दे चुके सनम (1999)

किस पर फिल्माया गया: ऐश्वर्या राय

इस गाने के लिए सरोज खान को बेस्ट कोरियोग्राफी का फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला था. ये गाना एक राजस्थानी लोकगीत की तर्ज पर बना है. ओरिजिनल गाने का शीर्षक निम्बूड़ा था जिसे राजस्थान के मांगणियार समुदार के गाजी खान बरना ने पॉपुलर किया था.

 

 

4. डोला रे डोला

फिल्म: देवदास (2002)

किस पर फिल्माया गया: माधुरी दीक्षित और ऐश्वर्या राय

इस गाने को लिखने में डायरेक्टर संजय लीला भंसाली को हफ्ते भर का समय लग गया. क्योंकि वो इसकी हर लाइन परफेक्ट करना चाहते थी. इस गाने की शूटिंग के दौरान भारी झुमकों की वजह से ऐश्वर्या राय के कानों से खून निकलना शुरू हो गया था. लेकिन उन्होंने किसी को बताए बिना शूटिंग जारी रखी.

 

 

5. हमको आजकल है

फिल्म: सैलाब (1990)

किस पर फिल्माया गया: माधुरी दीक्षित

इसमें लीड सिंगर ने सिर्फ एक लाइन गाई है. ‘हमको आजकल है इंतज़ार, कोई आए, ले के प्यार’. बाकी सबकुछ कोरस गाता है. कोरस के तमाम सवालों का जवाब माधुरी इस एक ही बात से देती है. ये कुछ अलग प्रयोग था, जो बेहतरीन बन पड़ा था.

 

 

6. ये इश्क हाय

फिल्म: जब वी मेट (2007)

किस पर फिल्माया गया: करीना कपूर

इस गाने का एक कवर सर्बिया नाम के देश के एक गाने में इस्तेमाल हुआ है. नेमम एलाना. इस फिल्म की एक ख़ास बात ये है कि इसका टाइटल पॉपुलर वोट से डिसाइड हुआ था. उस समय इंटरनेट इतना पॉपुलर नहीं था. तो अख़बारों में भी ऐड छपवाए गए थे और पब्लिक से उनकी राय मांगी गई थी. दूसरे ऑप्शन्स थे इश्क वाया भटिंडा और पंजाब मेल.

 

 

7. तबाह हो गए

फिल्म:कलंक (2019)

किस पर फिल्माया गया: माधुरी दीक्षित

इस गाने के साथ सरोज खान ने रेमो डिसूजा के साथ कोलैबोरेट किया था. और उनकी फेवरेट स्टूडेंट माधुरी तो थी हीं. पूरे गाने को कोरियोग्राफ करने में दो दिन लगे थे. इसके आखिर में जो क्लाइमेक्स शॉट है, वो एक ही टेक में पूरा किया गया था. इसमें माधुरी ने लगातार दस चक्कर लिए थे.

 

 

8. हवा हवाई

फिल्म: मिस्टर इंडिया (1987)

किस पर फिल्माया गया: श्रीदेवी

इस गाने को गाने वाली कविता कृष्णमूर्ति ने बताया कि ये गाना वो नहीं गाने वाली थीं. उन्होंने गाना सिर्फ डब किया था. लेकिन कम्पोजर लक्ष्मीकांत जी ने उन्हें बताया कि उनकी आवाज़ ही इस गाने के लिए इस्तेमाल की जाएगी, और इसे दुबारा रिकॉर्ड नहीं किया जाएगा.

 

 

9. धक-धक करने लगा

फिल्म: बेटा (1992)

किस पर फिल्माया गया: माधुरी दीक्षित , अनिल कपूर

फिल्म के डायरेक्टर और को प्रोड्यूसर इंद्रा कुमार ने ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ को दिए इंटरव्यू में बताया कि इस गाने की शूटिंग के लिए उन्होंने छह दिन प्लैन किए थे. लेकिन माधुरी के पास डेट्स नहीं बची थीं. तो इस पांच मिनट के गाने के पहले ढाई मिनट तीन दिन में और बाकी का गाना एक रात में शूट हुआ था.

 

 

10. चोली के पीछे

फिल्म: खलनायक (1993)

किस पर फिल्माया गया: नीना गुप्ता, माधुरी दीक्षित

इस गाने के लिए ना सिर्फ सरोज खान  को बेस्ट कोरियोग्राफी के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला था, बल्कि इस गाने को गाने वाली अलका याग्निक और इला अरुण को भी बेस्ट फीमेल प्लेबैक सिंगर का अवॉर्ड मिला था. इस गाने पर बहुत बवाल हुआ था और इसे बैन भी कर दिया गया था. लेकिन बाद में इसे वापस लाया गया.

 

 

सरोज खान की लिगेसी उनके गानों में मौजूद रहेगी. आने वाले कई सालों तक छोटी-छोटी बच्चियों से लेकर उनकी मांओं तक उनके स्टेप्स पर थिरकती दिखेंगी. गाने बदलते रहेंगे, सरोज और उनका नृत्य के लिए प्रेम हमेशा मौजूद रहेगा.


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adminNovember 23, 20201min3580

हर इंसान का एक लक्ष्य होता है और उसी को ध्यान में रखकर आगे बढ़ता है. लेकिन लक्ष्य का चुनाव करना थोड़ा मुश्किल काम है. निजी जिंदगी हो या फिर निवेश का रास्ता, सही लक्ष्य से ही मंजिल मिलती है. अगर आप निवेश करने के बारे में सोच रहे हैं तो फिर ये खबर आपके लिए बेहद जरूरी है. खासकर नए निवेशक इन पांच बिंदुओं को ध्यान में रखकर अगर निवेश का पहला कदम उठाएंगे तो राह आसान हो जाएगी.

 

1. निवेश का लक्ष्य तय हो

नए निवेशक को सबसे पहले आमदनी और खर्च के बीच के संतुलन को समझना होगा. महीने में कितनी कमाई है, उसका सही से ब्योरा होना चाहिए. उसके बाद फिर खर्च को उसमें अलग करने की जरूरत होगी. आमदनी से खर्च को हटाने के बाद बाकी रकम का एक संतुलित हिस्सा निवेश के लिए रखना चाहिए. ऐसा नहीं कि एक महीने में बहुत बड़ी राशि निवेश कर दें, और फिर दूसरे महीने निवेश के लिए सोचने पड़े. इसलिए निवेश का लक्ष्य तय होना सबसे जरूरी है, यानी आपका गोल क्या है?

 

2. लक्ष्य को लेकर समझ साफ हो

कहा जाता है कि दूसरे को देखकर पैसे बचाना सीखें. लेकिन निवेश हमेशा अपने बजट के मुताबिक करना चाहिए. किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए उससे जुड़े तमाम पहलुओं को लेकर समझ साफ होना चाहिए. उदाहरण के तौर पर आप कहां निवेश कर रहे हैं? कितने साल के लिए कर रहे हैं? और जो रिटर्न मिल रहा है वो लक्ष्य हासिल होगा या नहीं. साल-दर-साल आमदनी में बढ़ोतरी होगी फिर उसको कहां निवेश करें.

 

3. लक्ष्य ऐसा हो जो हासिल हो सके

लक्ष्य को तभी हासिल किया जा सकता है, जब निवेश से पहले उसका रोडमैप तैयार हो, यानी अगर आपको साल के अंत में एक लाख रुपये चाहिए तो फिर सालभर तक उस तरह की फाइनेंसियल रणनीति अपनानी होगी जिससे लक्ष्य हासिल हो. उदाहरण के तौर पर एक साल के लिए इक्विटी में निवेश बेहतर कदम नहीं होता है. ऐसे में उन रास्तों को अपनाने की जरूरत होगी जो आपको लक्ष्य के करीब ले जाए और साल में अंत में लक्ष्य हासिल हो. अगर 10 साल बाद एक करोड़ रुपये का लक्ष्य हो फिर निवेश के लिए ऐसे फंड्स को चुनने की जरूरत होगी जो लक्ष्य को दिलाए. केवल लक्ष्य तय करने से उस तक नहीं पहुंचा जा सकता.

 

4. लक्ष्य समय से पूरा हो

स्मार्ट निवेशक उसे माना जाता है, जो सही समय पर अपने लक्ष्य को हासिल कर ले. अगर दो साल बाद किसी को शादी के लिए 10 लाख रुपये की जरूरत होगी. ऐसे में यहां समय 2 साल का फिक्स है, जिसे आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है. लेकिन अगर महीने में केवल 10 हजार रुपये निवेशक के द्वारा लगाया जा रहा है तो फिर ये लक्ष्य समय में पूरा नहीं हो सकता. ऐसे में लक्ष्य तो जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि लक्ष्य को समय के साथ हासिल करना.

 

5. मौजूदा आर्थिक स्थिति का रखें ख्याल

हमेशा हर किसी को निवेश के वक्त मौजूदा आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखकर चलना चाहिए. क्योंकि अगर पूरी जमा पूंजी को निवेश में झोंक देंगे तो फिर मौजूदा आर्थिक स्थिति बिगड़ सकती है. ऐसे में निवेश को बीच में रोकना भी पड़ सकता है, जिससे लक्ष्य कभी पूरा नहीं हो पाएगा. इसलिए जेब को ध्यान में रखकर निवेश करना चाहिए. ये जरूरी है कि भविष्य के लिए हर दिन के हिसाब से निवेश करना चाहिए. लेकिन वर्तमान से समझौता कर भविष्य को खुशहाल नहीं किया जा सकता है.

 


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adminNovember 19, 20201min3470

आयुष बैद द्वारा 2018 में लॉन्च किया गया, Ellementry एक लाइफस्टाइल ब्रांड है, जो हैंडीक्राफ्ट प्रोडक्ट्स की ऑनलाइन बिक्री करता है। यह आयुष के पिता द्वारा संचालित दिलीप इंडस्ट्रीज का रिटेल ऑफशूट ब्रांड है। यहां बताया गया है कि इसका बिजनेस मॉडल कैसे काम करता है।

जयपुर स्थित इंडियन हैंडीक्राफ्ट्स एक्सपोर्टर दिलीप बैद के पुत्र 24 वर्षीय आयुष बैद के लिए हैंडीक्राफ्ट्स में दिलचस्पी लेना स्वाभाविक था।

अपने पिता को, जो दिलीप इंडस्ट्रीज चलाते हैं, 175 करोड़ रुपये के टर्नओवर का कारोबार चलाते हुए देखते हुए, आयुष ने तीन दशकों तक भारतीय संस्कृति और कला के सार को समझा, जिसने हैंडीक्राफ्ट्स में कब्जा कर लिया था।

इसने उन्हें मुख्य रूप से 2018 में हैंडीक्राफ्ट प्रोडक्ट्स की ऑनलाइन बिक्री करने वाले एक लाइफस्टाइल ब्रांड एलिमेंट्री (Ellementry) शुरू करने के लिए प्रेरित किया। जयपुर स्थित कंपनी हाथ से बने घरेलू उत्पादों जैसे कि बरतन और परोसने के बर्तन बनाने के लिए कारीगरों को नियुक्त करती है।

बी 2 सी ब्रांड अब दिलीप इंडस्ट्रीज का रिटेल ऑफशूट ब्रांड बन गया है। ब्रांड ने 2019-20 में बिक्री में 12 करोड़ रुपये दर्ज करने का दावा किया है।

 

कैसा रहा सफर

आयुष का आंत्रप्रेन्योरशिप में प्रवेश तब शुरू हुआ जब उन्होंने अपने बी 2 बी को हैंडीक्राफ्ट एक्सपोर्ट के बिजनेस को बढ़ावा देने में मदद करना शुरू किया।

एक बार गर्मियों में, जब वह अपने पिता के बिजनेस के आंकड़ों का एनालिसिस कर रहे थे, तब आयुष को एक बिजनेस आइडिया आया। उन्होंने देखा कि इंडियन हैंडीक्राफ्ट्स को विदेशों में पहचाना और सराहा गया है।

लेकिन हैंडमेड होम प्रोडक्ट्स के लिए घरेलू बाजार अभी भी अनछुआ था, विशेष रूप से संगमरमर-कांच और टेराकोटा-लकड़ी के बरतन की आला श्रेणी में।

आयुष ने इन प्रोडक्ट्स को भारतीय उपभोक्ताओं के लिए भी उपलब्ध कराने की आवश्यकता महसूस की। आखिरकार, वे भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के प्रतिनिधि थे। आयुष ने सोचा कि अगर सही खुदरा रणनीति अपनाई गई तो ये प्रोडक्ट भारत को मिल जाएंगे।

जल्द ही, उन्होंने उपभोक्ता जरूरतों पर रिसर्च करना शुरू कर दिया और ब्रांडेड हैंडीक्राफ्ट प्रोडक्ट्स की मांग का पता लगाने के लिए स्थानीय कारीगरों से मुलाकात की।

वे कहते हैं, “मैं फैमेली बिजनेस वाले परिवार में पला-बढ़ा, मैं नए बिजनेस आइडियाज के लिए हमेशा से ग्रहणशील था। मैंने यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (UCL) में अध्ययन किया, और मैंने सीखा कि ईकॉमर्स और डेटा एनालिटिक्स कैसे काम करता है।”

आयुष कहते हैं, “मैंने बाजार का गहन विश्लेषण किया और आवश्यक जमीनी कार्य किया। मैं अपने पिता के हैंडीक्राफ्ट प्रोडक्ट्स को एक ई-कॉमर्स वेबसाइट के माध्यम से रिटेल करने के विचार के साथ आया था।“

 

एलिमेंट्री ब्रांड

जब आयुष ने एलिमेंट्री को शुरू किया, तो उसकी खास बात यह थी कि वह सबसे अच्छे हैंडीक्राफ्ट प्रोडक्ट्स के अलावा कुछ भी नहीं बेचेंगे। हालांकि, इस तरह के विचार को एग्जीक्यूट करने के लिए बड़ी मात्रा में फंडिंग की आवश्यकता होती है।

वह कहते हैं, “हमने Bennett, Coleman and Company Limited (BCCL) को आइडिया दिया। हम बाजार के गहन शोध और समझ के साथ तैयार हुए। BCCL ने इस अवधारणा को पसंद किया और ब्रांड कैपिटल सौदे के रूप में 250 करोड़ रुपये का निवेश किया। बाकी आर्थिक सहायता हमारे परिवार की थी।”

आयुष का दावा है कि एलिमेंट्री एक प्रत्यक्ष, निर्माता-से-उपभोक्ता संबंध स्थापित करने वाले पहले भारतीय हैंडीक्राफ्ट ब्रांड्स में से एक है। यह भारतीय हैंडीक्राफ्ट इंडस्ट्री में मानक के रूप में ऐजेंट्स का उपयोग नहीं करता है, ताकि प्रोडक्ट्स को बाजार में स्थानांतरित किया जा सके।

ब्रांड केवल भारतीय बाजार को पूरा करता है, जबकि दिलीप इंडस्ट्रीज सीधे रिटेल खरीदारों के साथ काम करके अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बेचती है।

फर्म ने पहले ईकॉमर्स ब्रांड के रूप में शुरुआत की और पहले साल में बाजार से उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिली। 2019-20 में, एलिमेंट्री ने बिक्री में 12 करोड़ रुपये दर्ज किए, और इसने ब्रांड को आठ फिजिकल स्टोर खोलने और दिल्ली, जयपुर, मुंबई, बेंगलुरु और हैदराबाद में अपनी पहुंच का विस्तार करने के लिए प्रेरित किया।

कंपनी के अनुसार, पहले से मौजूद चुनौती को हल करने के लिए ऑफलाइन उपस्थिति महत्वपूर्ण थी। हैंडमेड होम प्रोडक्ट्स की ऑनलाइन मांग की पहचान करने के बावजूद, ग्राहकों द्वारा किए गए खरीद निर्णय में स्पर्श और महसूस पहलू ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुछ संभावित ग्राहक भी अपनी गुणवत्ता का कोई आश्वासन नहीं होने पर हर दिन उपयोग होने वाले हैंडीक्राफ्ट प्रोडक्ट्स को खरीदने के लिए तैयार नहीं थे।

आयुष कहते हैं, “हमें ग्राहकों को अपने प्रोडक्ट्स और उनकी क्वालिटी पर विश्वास करना था। भले ही हम रोजमर्रा के सामान जैसे बरतन बेच रहे थे, लोग उन्हें ऑनलाइन खरीदने के बारे में आशंकित थे। वे अब भी उन्हें खरीदने से पहले प्रोडक्ट्स को छूना और महसूस करना चाहते थे।”

टच-एंड-फील और क्वालिटी आश्वासन की चुनौती को दूर करने के लिए कुछ फिजिकल स्टोर खोलने के अलावा, BCCL के स्वामित्व वाले ‘The Times of India’ में विज्ञापन देकर एलिमेंट्री की वृद्धि को गति दी गई।

आयुष कहते हैं, “2020 में, हमने अब तक 6.5 करोड़ रुपये कमाए हैं।“

 

बिजनेस मॉडल

एलिमेंट्री एक बी 2 सी मॉडल को फॉलो करती है, और अपने प्रोडक्ट्स को अपनी वेबसाइट के माध्यम से और साथ ही Amazon, Myntra, Tata Cliq आदि पर बेचती है। यह ब्रांड पूरे भारत में हाई-एंड बुटीक स्टोर्स को सप्लाई करता है, और इसमें Foodhall, Project Eve, और Shoppers’ Stop के साथ शॉप-इन-शॉप एसोसिएशन है।

अंतिम उपभोक्ताओं के लिए ब्रांड के मूल्य प्रस्ताव के बारे में बताते हुए, आयुष कहते हैं, “हमने इस बात की खोज की है कि मुख्य रूप से बरतन और कुकवेयर सेगमेंट में सुंदर और उपयोगी प्रोडक्ट्स के लिए भारतीय बाजार खाली था। हमने अपने प्रोडक्ट्स को हाई रैंक और कार्यक्षमता में सुनिश्चित किया। जैसा कि हम दिलीप इंडस्ट्रीज के ऑफशूट हैं, हम अंतरराष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा और गुणवत्ता मानकों को सुनिश्चित करने में सक्षम हैं।”

हैंडीक्राफ्ट्स मैन्युफैक्चरिंग के अपने वाइब्रेंट इकोसिस्टम के लिए जाना जाने वाला, एलिमेंट्री, दिलीप इंडस्ट्रीज के समान प्रोडक्शन लाइन का उपयोग करता है। एक बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन असेंबली लाइन पर बने प्रोडक्ट्स की तुलना में हैंडमेड प्रोडक्ट्स को कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

आयुष कहते हैं, “यह दृष्टिकोण बहुत सारे रोजगार भी पैदा करता है। कुल मिलाकर, हमारे पास हमारे साथ काम करने वाले 4,000 से अधिक भारतीय कारीगर हैं।“

उनका मानना ​​है कि एलीमेंट्री की निर्माण क्षमताएं इसे प्रोडक्ट्स को प्रतिस्पर्धी रूप से कीमत देने, क्वालिटी कंट्रोल बनाए रखने और प्रोडक्शन में कम बदलाव का समय सुनिश्चित करने की अनुमति देती हैं।

आयुष बताते हैं, “हमें अनसोल्ड इन्वेंट्री से निपटने की ज़रूरत नहीं है। बाहर से प्रोडक्ट्स की खरीद के बजाय, हम उन्हें घर में मांग के अनुसार बनाते हैं। उदाहरण के लिए, इस महामारी के दौरान, घर से काम करना नया आदर्श बन गया। लोगों को घर के फर्नीचर, किचन प्रोडक्ट्स और होम प्रोडक्ट्स से अधिक काम की आवश्यकता होती है। हम इस आवश्यकता को जल्दी से समझने और पूरा करने में सक्षम थे। हम जल्द ही वर्क-फ्रोम-होम कलेक्शन शुरू करने जा रहे हैं।“

हालांकि, हैंडमेड प्रोडक्ट्स का निर्माण करने के लिए कारीगरों को रोजगार देने का मतलब है कि एलिमेंट्री के प्रोडक्ट्स थोड़े महंगे हैं। कारीगरों को पूरी निर्माण प्रक्रिया अपने हाथों से पूरी करनी होती है, जिसमें समय लगता है।

आयुष कहते हैं, “मशीनें हमारी कलाकार नहीं हैं – लोग हैं। हमारी प्रोडक्ट रेंज लगभग 290 रुपये से शुरू होती है।”

 

भविष्य की योजनाएं

लॉकडाउन के दौरान, रेस्टोरेंट्स का बंद होना एलिमेंट्री के लिए आशीर्वाद के रूप में आया। कई लोगों के लिए घर का खाना बनाना एक शौक बन गया है, आयुष ने देखा कि आकर्षक दिखने वाले बरतन की मांग बढ़ रही है।

वे कहते हैं, “हमारे इंस्टाग्राम पेज और ऑनलाइन मार्केटिंग के साथ, हम इन उपभोक्ताओं को अपने मौजूदा ग्राहकों के साथ टैप कर रहे हैं। घर के पके हुए भोजन की ओर यह बदलाव हमारे बरतन की मांग और परोसे जाने वाले प्रोडक्ट्स में काफी वृद्धि कर रहा है।”

आगे जाकर, एलिमेंटरी की योजना फ्रैंचाइज़ी मॉडल के तहत कुछ स्टोर खोलने की है। इसने लखनऊ, कोचीन, गुरुग्राम और बेंगलुरु में फ्रेंचाइजी के लिए योजना बनाई है।

विदेशों में एलिमेंट्री के प्रोडक्ट्स की बढ़ती मांग को देखते हुए, आयुष ने अपने प्रोडक्ट्स को संयुक्त राज्य अमेरिका और जापान में बेचने की भी योजना बनाई है। ब्रांड SKUs की संख्या में वृद्धि करना चाहता है, और घर के सामान और डिजाइनर हार्डवेयर में वेंचर करता है।

आयुष कहते हैं, “इस तरह के पैमाने के विस्तार और विकास को डेटा और क्रिएटिविटी को इंटीग्रेट करने पर ध्यान देने की आवश्यकता है। हमारे मौजूदा सामग्रियों के साथ प्रयोग करने के बाद, भविष्य के शोध cane/bamboo के साथ मजबूत प्रोडक्ट बनाने पर होंगे।”


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adminNovember 19, 20201min3380

भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी एक सख्तमिजाज प्रशासक मानी जाती थीं. बहुत लोग उनके व्यक्तित्व और अंदाज के मुरीद थे. लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक समय इंदिरा खुद को बदसूरत समझती थीं?

इंदिरा गांधी की करीबी दोस्त पुपुल जयकर ने इंदिरा के सहयोग से ही उनकी बायोग्राफी लिखी थी. इसके मुताबिक, 13 की उम्र में इंदिरा खुद को ‘बदसूरत’ मानती थीं.

दरअसल इंदिरा के बचपन के समय उनके घर का माहौल बहुत अच्छा नहीं था. पुपुल लिखती हैं, ‘6 साल की उम्र में ही इंदिरा ने मां की हताशा को महसूस करना शुरू कर दिया था. मां के बारे में बीबी अम्मा और बुआ विजयलक्ष्मी के ‘घटिया ताने’ को वह सुनतीं तो मां के पक्ष में बोल पड़ती. उसने दादी, परदादी, दादा और पिता तक से बहस की. बाद में वह समझ गई कि उसकी बातों का कोई असर नहीं होता है और उसके पिता उसकी बात अनुसनी कर देते हैं. ऐसे ही माहौल में इंदिरा ने अपनी भावनाओं को दबाए रखना और चुप रहना सीखा. वह समझ गईं कि मोतीलाल के घर की शांति दो लोगों ने भंग की गई हुई है- बुआ विजयलक्ष्मी और बीबी अम्मा.’

 

पुपुल आगे लिखती हैं,

‘इंदिरा के लिए ये दिन कष्टप्रद थे. सरूप (विजयलक्ष्मी) अकसर इंदिरा को ‘मूर्ख और बदसूरत’ कहतीं. इंदिरा ने इसे सुन लिया. इन संज्ञाओं ने 13 साल की बच्ची को बुरी तरह त्रस्त कर डाला था. इन टिप्पणियों का किसी ने विरोध नहीं किया, इसलिए इंदिरा खुद को बदसूरत ही समझने लगी. वह अपने आप में सिमट गई और आत्मविश्वास खो बैठी. एक चंचल शरारती बालिका रातों-रात संकोची बन गई.’

 

इंदिरा गांधी. 

 

जैसे-जैसे इंदिरा बड़ी होती गईं, अकेले रहना उसे भाता गया. खादी के सफेद कुर्ते-पाजामे में पतली टांगों वाली इस लड़की के सिर पर गांधी टोपी रखी होती, थोड़ी झुकी हुई. वह बगीचे में चली जाती. पेड़ों पर चढ़ने में उसे कोई दिक्कत नहीं होती.

पुपुल लिखती हैं कि इंदिरा ने जहरीले शब्दों के लिए बुआ को कभी माफ नहीं किया. इन शब्दों ने उसके यौवन को मार दिया. बाद के कुछ साल में, वे बड़े भावावेशों के साथ इन शब्दों का जिक्र करती रहीं. बल्कि मौत से एक पखवाड़े पहले तक भी वे शब्द उनके ज़ेहन में ताजा थे.


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adminNovember 19, 20201min3620

नीड्स नो इंट्रोडक्शन. लाल शॉर्ट्स, बड़े पीले जूते और सफेद दस्ताने पहने चूहे वाले कार्टून कैरेक्टर. भयंकर फेमस. मिकी का आज हैप्पी बड्डे है. 18 नवंबर. आज ही के दिन 1928 में मिकी का डेब्यू हुआ था. जब न्यू यॉर्क के कॉलोनी थियेटर में फिल्म स्टीमबोट विली रिलीज़ हुई थी.

 

कैसे पैदा हुआ मिकी

वाल्टर एलियास ‘वॉल्ट’ डिज़्नी. अमेरिका के प्रॉड्यूसर, डायरेक्टर, एनिमेटर, बिज़नेसमैन, एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के बड़े नाम और न जाने क्या-क्या. दुनिया के सबसे बड़े प्रॉडक्शन हाउस वॉल्ट डिज़्नी की नींव रखने वाले. वाल्टर अब दुनिया में नहीं हैं. 1966 में उनका निधन हो गया.

1927 के अल्ले-पल्ले की बात है. वाल्टर उस समय 26 साल के थे. उन्होंने एक कार्टून कैरेक्टर तैयार किया था- ऑसवाल्ड, द लकी रैबिट. इस पर सीरीज़ भी चल रही थी. सीरीज़ को वाल्टर आगे चलाना चाहते थे, पर प्रोड्यूसर्स ने इसे बंद करने का फैसला किया. वे न्यूयॉर्क गए, प्रोड्यूसर से मिलने. लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. उल्टा ये कह दिया गया कि ऑसवाल्ड का कॉपीराइट प्रॉडक्शन हाउस के पास है, न कि वाल्टर के पास. इसलिए वाल्टर अब कहीं बाहर ये कार्टून कैरेक्टर नहीं बेच सकते. वाल्टर उदास और गुस्से से भरे मन के साथ ट्रेन में वापस लौट रहे थे. लॉस एंजिलिस को.

ट्रेन के एक कोने में शांत बैठे-बैठे उन्होंने एक रफ स्केच सा खींचा. एक चूहा. Rest in History.

“मेरे जेहन में कुछ दिन पहले से ही एक चूहे का कैरेक्टर दौड़ रहा था. आप पूछेंगे चूहा क्यों? क्योंकि चूहे के साथ हम सब एक कनेक्ट महसूस करते हैं. सहानुभूति महसूस करते हैं. लेकिन साथ ही हम चूहे को देखकर डरते या चौंकते भी हैं. मैं खुद चूहे से डरता हूं. इसलिए ये कैरेक्टर लोगों से काफी जुड़ सकता था.” – वाल्टर

 

नामकरण

चूहे वाला ये कार्टून कैरेक्टर जैसे ही कागज पर उतरा, वाल्टर को भा गया. फौरन एक नाम दिया- मॉर्टिमर. कार्टून अपनी बीवी को दिखाया, जो वाल्टर के साथ ट्रेन में ही थीं. उनको भी बहुत पसंद आया. लॉस एंजिलिस उतरने से पहले बीवी ने कहा कि यार ये मॉर्टिमर नाम जम नहीं रहा. इसका नाम रखो- मिकी. मिकी माउस.

 

रिजेक्शन

घर पहुंचते ही वाल्टर ने मिकी के पहले कार्टून पर काम शुरू किया. इसी साल पहला कार्टून तैयार भी हो गया- प्लेन क्रेज़ी. दूसरा कार्टून भी तैयार किया गया- दि गैलोपिन. लेकिन वाल्टर को तब झटका लगा, जब इन दोनों कार्टून को कोई भी प्रॉड्यूस करने को तैयार नहीं हुआ. बताते चलें कि ये दोनों कार्टून म्यूट थे. यानी उनकी आवाज़ नहीं थी.

इसी बीच एक ख़बर आती है. वॉर्नर ब्रदर्स, जो उस समय के भी बड़े प्रॉडक्शन हाउस में से थे, वे अब बोलती फिल्मों में इन्वेस्ट करेंगे. पहली फुरसत में वाल्टर ने मिकी के तीसरे कार्टून पर काम शुरू कर दिया- स्टीमबोट विली. बोलता कार्टून. लेकिन लॉस एंजिलिस में उस समय कोई ऐसा स्टूडियो नहीं था, जहां फिल्म की ऑडियो रिकॉर्डिंग की जा सके. इसके लिए वाल्टर को न्यू यॉर्क जाना पड़ा. फिल्म स्टीमबोट विली तैयार हुई. पहला प्रीमियर हुआ और यहीं से न्यू यॉर्क के कॉलोनी थियेटर ने फिल्म को प्रोड्यूस करने का फैसला ले लिया. रिलीज़ होते ही लोगों ने मिकी को हाथों-हाथ लिया.


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adminNovember 19, 20201min3060

कोविड के इस दौर में ये बात अब बड़ी ऑब्वियस और न्यू नॉर्मल हो चुकी है कि मास्क बहुत ज़रूरी है. किसी भी सार्वजनिक स्थान पर हों, दफ्तर में हों, घर के नीचे नुक्कड़ तक जाना हो… मास्क लगाएं. न लगाने पर अधिकतर जगहों पर जुर्माना भी लग रहा है. लेकिन एक बड़ा कन्फ्यूजन है. अगर हम अपनी निजी गाड़ी के अंदर बैठे हैं, तो मास्क लगाना है या नहीं? जब अकेले कार में हैं, तो लगाना है कि नहीं?

इसका जवाब सुनिए..

“आपकी पर्सनल गाड़ी आपका प्राइवेट ज़ोन नहीं है. इसमें बैठे हर व्यक्ति को मास्क लगाना ज़रूरी है.”

ये बात दिल्ली सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट के सामने 18 नवंबर को कही. दिल्ली में सौरभ शर्मा नाम के एक व्यक्ति का सितंबर में चालान कट गया था. 500 रुपए का. सौरभ कार में थे औऱ मास्क नहीं पहना था. पेशे से वकील सौरभ ने इसके ख़िलाफ पिटीशन फाइल की और 10 लाख रुपए का मुआवजा मांगा. दिल्ली हाई कोर्ट में जस्टिस नवीन चावला की सिंगल जज बेंच के सामने मामले पर सुनवाई हुई. जवाब में दिल्ली सरकार ने कहा –

“याचिकाकर्ता का कहना है कि चूंकि वो कार में अकेले सफर कर रहे थे, इसलिए ये नहीं माना जा सकता कि वे सार्वजनिक स्थल पर हैं. और इस नाते मास्क न लगाने पर उनका चालान काटने का कोई तुक नहीं बनता. यहां बताना ज़रूरी है कि गाइडलाइंस ये कहती हैं कि कोई भी व्यक्ति अगर अपनी पर्सनल गाड़ी में चल रहा हो, ऑफिस की गाड़ी में चल रहा हो, दोनों ही स्थिति में उसका मास्क पहनना ज़रूरी है. ये बात हर सार्वजनिक स्थल के लिए ज़रूरी है. और किसी की भी पर्सनल गाड़ी इसी कैटेगरी में आती है. उसे प्राइवेट ज़ोन नहीं कहा जा सकता.”

दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के एक जजमेंट को भी कोट किया, जिसके मुताबिक –

“जब कोई पर्सनल गाड़ी किसी पब्लिक रोड पर है तो इसे प्राइवेट नहीं माना जा सकता.”

हालांकि अभी कोर्ट का फैसला आना बाकी है. मामले की अगली सुनवाई सात जनवरी को होगी. इस बीच मिड जून (अनलॉक से) से लेकर अक्टूबर अंत तक अकेले दिल्ली में ही मास्क न पहनने पर करीब चार लाख चालान कट चुके हैं. कार, बाइक या पैदल, हर किसी के मास्क पर पुलिस की नज़र है. बाकी जैसा कि बच्चन साब हर फोन कॉल पर बताते हैं कि कोविड अभी ख़त्म नहीं हुआ है. दो ग़ज दूरी और मास्क है बहुत ज़रूरी. तो आप भी सोशल डिस्टेंसिंग रखिए, मास्क लगाइए और स्वस्थ्य रहिए.



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