ज्ञानचंद

29-10-2020-03.jpg

adminOctober 29, 20201min5520

मार्च, 2020 में सिंगल पैरेंट आदित्य तिवारी (पुरुष) को इंटरनेशनल वुमेंस डे के मौके पर ‘बेस्ट मदर ऑफ द वर्ल्ड’ का अवॉर्ड दिया गया. आदित्य ने जब 2016 में डाउन सिंड्रोम से पीड़ित एक बच्चे को गोद लिया, तब पुरुषों और चाइल्ड केयर को लेकर एक बहस तेज हुई. कहा गया कि क्या बच्चों की केयर सिर्फ महिलाओं की जिम्मेदारी है? भारत सरकार ने भी इस बात को समझा और सिंगल पैरेंट पुरुषों के लिए अच्छी खबर आई. केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने सोमवार, 26 अक्टूबर को कहा कि सभी सरकारी पुरुष कर्मचारी भी ‘चाइल्ड केयर लीव’ (CCL) के हकदार होंगे. मतलब अगर कोई पुरुष अकेले बच्चे का पालन-पोषण कर रहा है, तो उसे भी इसके लिए छुट्टी दिए जाने का प्रावधान है. आइए जानते हैं ‘चाइल्ड केयर लीव’ के बारे में तफ्सील से.

 

पहले बात पुरुषों को मिलने वाली चाइल्ड केयर लीव के बारे में

मोदी सरकार ने 2018 में ही सिंगल पैरेंट पुरुष कर्मचारियों के लिए चाइल्ड केयर लीव का खाका बना लिया था. यह बदलाव चाइल्ड केयर लीव के नियम 43 सी में बदलाव करके लाया गया था. इस बात पर ही केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने सोमवार को यह कहकर जोर दिया कि इसे लेकर जागरूकता की कमी है.

 

क्या हैं इसके नियम

# सिंगल पुरुष पैरेंट की परिभाषा में विधुर, तलाकशुदा और अविवाहित पुरुष आएंगे.

# किसी भी सिंगल पुरुष पैरेंट को बच्चा पालने के लिए 730 दिनों की छुट्टी दी जाएगी. इसे बच्चे के 18 साल होने तक लिया जा सकता है. अगर बच्चा विकलांग है, तो यह आयु-सीमा 22 साल की होगी.

# इन 730 दिनों में से पहले 365 दिन की छुट्टी में पूरी सैलरी मिलेगी. अगले 365 दिनों की छुट्टी में कुल सैलरी की 80 फीसदी रकम ही मिलेगी.

# यह छुट्टियां कमाई गई छुट्टियों (EL) के कोटे से मिलेंगी.

# लेकिन ये साल में तीन बार से ज्यादा नहीं ली जा सकतीं. मतलब 365 दिन की छुट्टी एक साल में तीन बार टुकड़े-टुकड़े में ली जा सकती हैं.

# सक्षम अधिकारी से अप्रूवल लेकर कोई भी सिंगल पुरुष पैरेंट चाइल्ड केयर लीव का लाभ उठा सकता है.

# इस दौरान लीव ट्रेवल कॉन्सेशन (LTC) का फायदा भी छुट्टी लेने वाले कर्मचारी को मिलेगा.

# इसके अलावा पुरुष 15 दिन की पैटरनिटी लीव भी ले सकते हैं.

 

अब तक क्या था कानून

भारत सरकार का डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनेल एंड ट्रेनिंग केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए सेवा शर्तें तय करता है. इन सेवा शर्तों में ही छुट्टियों का प्रावधान होता है. इनमें ही चाइल्ड केयर लीव का प्रावधान है. अब तक इस तरह का चाइल्ड केयर लीव का प्रावधान महिलाओं के लिए ही था. यह प्रावधान सिंगल मदर और सामान्य महिलाओं, दोनों के लिए रहे हैं. साल 2018 में मोदी सरकार ने सीसीएस रूल, 1972 में बदलाव किया. चाइल्ड केयर को महिलाओं के अलावा पुरुषों की भी जिम्मेदारी समझा गया. सिंगल पुरुषों के लिए भी बच्चों के लिए चाइल्ड केयर लीव का प्रावधान जोड़ा गया.

 

महिलाओं के लिए क्या हैं नियम

# महिला कर्मचारियों को उनके नाबालिग बच्चों (18 साल तक के सामान्य और 22 साल तक के विकलांग) की देखभाल के लिए उनकी पूरी सेवा के दौरान अधिकतम दो साल (अर्थात 730 दिन) की छुट्टी दी जाती है.

# अगर महिला सिंगल पैरेंट है, तो उसे साल में छह बार छुट्टियों का फायदा मिलेगा, जबकि बाकी महिलाओं को यह फायदा साल में अधिकतम तीन बार ही मिल सकेगा.

# इसके अलावा महिलाएं अपनी 180 दिन की मैटरनिटी लीव भी चाइल्ड केयर लीव के साथ ही ले सकती हैं. ये छुट्टी बच्चे को गोद लेने पर भी ली जा सकती है.


15-10-2020-06.jpg

adminOctober 15, 20203min6670

कहा जाता है कि किसी की आवाज़ से उसके व्यक्तित्व के बारे में आसानी से पता लगाया जा सकता है. ऐसा ही कुछ जानने के लिए पुरुषों की आवाज़ पर एक स्टडी की गई. स्टडी के नतीजे महिलाओं को सावधान करने वाले हैं. आमतौर पर महिलाओं को भारी आवाज़ वाले पुरुष पसंद होते हैं लेकिन इस स्टडी के अनुसार, भारी आवाज़ वाले पुरुष भरोसेमंद नहीं होते हैं और अपने पार्टनर को धोखा देते हैं.

 

चीन में हुई स्टडी

 

ये स्टडी चीन के साउथवेस्ट यूनिवर्सिटी ने की है. स्टडी के लिए धूम्रपान न करने वाले कई पुरुषों को शब्दों की एक सूची पढ़ने के लिए दी गई थी. फिर आवाज़ की फ्रीक्वेंसी और पिच को समझने के लिए इन शब्दों का विश्लेषण किया गया. इसके बाद रिश्तों के प्रति दृष्टिकोण जानने के लिए उनका मनोवैज्ञानिक परीक्षण किया गया.

 

टेस्ट में क्या निकला

 

टेस्ट में क्या निकला- 

स्टडी के नतीजों में सामने आया कि भारी आवाज़ वाले पुरुष अपने पार्टनर के प्रति कम प्रतिबद्ध थे और वो धोखा भी दे सकते थे. दरअसल, इन पुरुषों की आवाज़ से उनके सेक्स हार्मोन टेस्टोस्टेरोन के स्तर के बारे में पता लगाया गया.

 

टेस्टोस्टेरोन से लगाया पता

 

शोधकर्ताओं ने पाया कि कर्कश और तेज आवाज़ वालों की तुलना में ठहराव वाली आवाज़ के पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन का स्तर ज्यादा था. शोधकर्ताओं का कहना है कि टेस्टोस्टेरोन से किसी व्यक्ति की विशेषताओं और उसके व्यवहार के बारे में पता लगाया जा सकता है.

 

 टेस्टोस्टेरोन के स्तर से अंदाजा

 

भारी आवाज़ वाले पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन का स्तर ज्यादा होता है और इसलिए महिलाएं इनके प्रति ज्यादा आकर्षित होती हैं. स्टडी से ये भी पता चलता है कि ज्यादा टेस्टोस्टेरोन वाले पुरुषों के बच्चे स्वस्थ होते हैं.

 

जीवनसाथी का चुनाव

 

हालांकि, जीवनसाथी के चुनाव के वक्त महिलाएं पुरुषों के आवाज़ से ज्यादा उसके व्यक्तित्व पर ज्यादा ध्यान देती है. पार्टनर के तौर पर वो ऐसे पुरुषों को चुनना पसंद करती हैं जो घर के हर काम में उसका साथ दे सके.


12-10-2020-05.jpg

adminOctober 12, 20201min3770

हेल्दी लाइफ के लिए शादीशुदा जीवन अब जरूरी हो गया है. महामारी के इस संकट काल में यह तर्क सच साबित होने लगा है. एक नई स्टडी के मुताबिक, कोविड-19 (Covid-19) से कुंवारे लोगों में मौत का खतरा शादीशुदा लोगों की तुलना में ज्यादा होता है. स्वीडन की यूनिवर्सिटी ऑफ स्टॉकहोम के शोधकर्ताओं ने इसे लेकर चेतावनी भी दी है.

स्टॉकहोम यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने दावा किया है कि कुंवारे लोगों के अलावा लो इनकम, कम पढ़े-लिखे और कम या मध्यम आय वाले देशों में कोरोना वायरस (Coronavirus) से मौत की संभावनाएं ज्यादा हैं. ये स्टडी ‘स्वीडिश नेशनल बोर्ड ऑफ हेल्थ एंड वेलफेयर’ द्वारा स्वीडन में कोविड-19 से हुई रजिस्टर्ड मौतों के डेटा पर आधारित है.

इस स्टडी में 20 वर्ष या उससे ज्यादा उम्र के लोगों को ही शामिल किया गया है. ‘जनरल नेचर कम्युनिकेशंस’ में प्रकाशित इस स्टडी के लेखक स्वेन ड्रेफ्हाल कहते हैं, ‘कोविड-19 (Covid-19) से हुई मौतों के साथ कई बड़े फैक्टर्स मजबूती के साथ जुड़े हुए हैं.’

रिपोर्ट के मुताबिक, अविवाहित यानी कुंवारे पुरुषों या महिलाओं (Unmarried people) में कोविड-19 (Covid-19) से मौत का खतरा विवाहित लोगों की तुलना में डेढ़ से दो गुना ज्यादा होता है. इस लिस्ट में अनमैरिड, विधवा/विधुर और तलाकशुदा लोग भी शामिल हैं.

रिपोर्ट में एक और बड़ा दावा ये भी हुआ है कि महिलाओं की तुलना में पुरुषों में कोविड-19 से मौत का खतरा दोगुने से भी ज्यादा है. इससे पहले हुई कुछ स्टडी में भी बताया गया था कि सिंगल या अनमैरिड लोगों की विभिन्न बीमारियों से ज्यादा मौतें होती हैं. इसके कुछ पहलुओं को उदाहरण देकर भी समझाया गया है.

ड्रेफ्हाल कहते हैं, ‘अक्सर जो लोग शुरुआत से ही किसी ना किसी बीमारी का शिकार रहते हैं, पार्टनर को लेकर उनमें जरा कम एट्रैक्शन देखने को मिलता है. यही वजह है कि ऐसे लोग आगे चलकर शादी में बहुत कम दिलचस्पी दिखाते हैं.’

ड्रेफ्हाल के मुताबिक, ‘मैरिड कपल की तुलना में सिंगल लोगों को कम संरक्षित एनवायरनमेंट मिलता है. इसलिए, मैरिड कपल्स अनमैरिड लोगों से कम बीमार पड़ने के साथ एक स्वस्थ जीवन का आनंद ले सकते हैं. हमारे शोध में कोविड-19 से अनमैरिड लोगों में मौत की ज्यादा संभावना को इससे बेहतर समझा जा सकता है.’

बता दें कि कोरोना वायरस से अब तक पूरी दुनिया में 3 करोड़ 74 लाख से भी ज्यादा लोग शिकार हो चुके हैं. कोरोना का सबसे ज्यादा असर अमेरिका, भारत और ब्राजील जैसे देशों पर पड़ा है. अकेले अमेरिका और भारत में ही कोरोना के कुल डेढ़ करोड़ से ज्यादा मामलों की पुष्टि हो चुकी है.


01-10-2020-12.jpg

adminOctober 1, 20201min4400

सोशल मीडिया पर स्क्रॉल करते हुए कभी ग़ौर किया है कि साल का कौन सा ऐसा महिना होता है जिसमें आपको सबसे ज़्यादा बर्थ डे पोस्ट्स, नोटिफ़िकेशन्स और स्टेटस दिखते हैं?

कभी ध्यान दिया है? आपका न्यूज़ फ़ीड हर महीने बचपन की तस्वीरों, केक पुते मुंह के दांत चियारते फ़ोटो से भरा होता है पर साल का एक ख़ास महीना है जब इन तस्वीरों की तादाद सबसे ज़्यादा होती है.

 

 

एक रिपोर्ट के अनुसार, अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों पर किए गए सर्वे से पता चला है कि सबसे ज़्यादा बर्थ डे सितंबर में आते हैं.

9 सितंबर से 21 सितंबर के बीच सबसे ज़्यादा जन्मदिन पड़ते हैं.

 

सवाल ये उठता है कि आख़िर ऐसा क्यों होता है. इसके कुछ कारण हैं- 

1. अगर वक़्त में पीछे जाएं तो ध्यान जाता है दिसंबर पर. इस महीने में काफ़ी लोग छुट्टियां मनाने जाते हैं. परिवार के साथ स्पेशल टाइम बिताने का मौक़ा मिलता है. और ये कन्सिविंग की भी अच्छी वजह है.

2. हमारा शरीर रिप्रोडक्शन के लिए सर्दियां प्रिफ़र करता है. सर्दियों में ही स्पर्म की क्वालिटी भी अच्छी होती है और इससे कन्सिविंग के चांस बढ़ जाते हैं. ठंड की वजह से पार्टनर्स के बीच इन्टिमेसी भी ज़्यादा होती है.

आर्टिकल कैसा लगा कमेंट बॉक्स में बताइए.


01-10-2020-09.jpg

adminOctober 1, 20203min4480

कोरोना वायरस जब से आया है, खबरों में आपने ICMR का नाम पक्का सुना होगा. ICMR यानी इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च. ये देश में बीमारी और दवा से जुड़ी रिसर्च वगैरह की सबसे टॉप की बॉडी है. इसकी ही शाखा है NIN, यानी नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन. ऑफिस हैदराबाद में है. NIN का काम है, देश की जनता को क्या खाना चाहिए, कितनी मात्रा में खाना चाहिए, ये सब बताना. कई सारे सर्वे के आधार पर.

अब हाल ही में NIN ने एक अनुशंसित आहार भत्ता (Recommended dietary allowances- RDA) जारी किया. अब आप पूछेंगे कि इसका मतलब क्या? माने संस्था ने यही बताया है कि भारत के एक वयस्क आदमी या औरत को क्या-क्या खाना चाहिए. इसके लिए उन्होंने वयस्क आदमी के आदर्श वज़न को 65 किलो माना है और औरत के वज़न को 55 किलो. आदमी की औसत हाइट 5 फुट 8 इंच मानी है और औरत की 5 फुट 3 इंच.

 

तो इसमें खास बात क्या है?

दरअसल, 2010 की रिपोर्ट अनुसार, भारतीय पुरुषों की औसत हाइट 5 फुट 6 इंच मानी गई थी. महिलाओं की 5 फुट. वज़न का पैमाना पुरुषों के लिए 60 किलो था और महिलाओं के लिए 50 किलो. अब NIN ने इन आदर्श वज़न और हाइट में बढ़ोतरी कर दी है.

 

ऐसा क्यों और कैसे किया?

ये जानने के लिए ‘दी लल्लनटॉप’ ने बात की NIN के साइंटिस्ट और न्यूट्रिशनिस्ट डॉक्टर सुब्बाराव से. उन्होंने बताया-

“हमने औसत हाइट और वज़न ऐसे ही नहीं बदले हैं. हर एक भारतीय व्यक्ति को कितना पोषक आहार, कितनी मात्रा में खाना है, इसके लिए जब हम रिपोर्ट तैयार करते हैं, तो कई सारी रिसर्च होती है. पिछले 10-15 साल में क्या-क्या सर्वे हुए हेल्थ के सेक्शन में, ये भी हम देखते हैं. हमने पाया कि पिछले 10 बरसों में एवरेज हेल्दी इंडियन्स की हाइट और वज़न में थोड़ी बढ़ोतरी हुई है. इसे देखते हुए ही हमने RDA तैयार किया. साथ ही एवरेज हाइट-वज़न का पैमाना बदला.”

 

और क्या है RDA की रिपोर्ट में?

इस रिपोर्ट के मुताबिक, RDA की पुरानी कमिटी ने हाइट और वज़न का जो पैमाना सेट किया था, वो 1989 के दौरान सामने आए डेटा के आधार पर था. इस डेटा में केवल भारत के कुछ ही हिस्सों के लोगों को कवर किया गया था. यानी इसमें पूरे भारत के लोगों का सर्वे शामिल नहीं था. फिर 2010 वाली जो कमिटी आई, उसने रिसर्च का दायरा थोड़ा बढ़ाया. भारत के 10 राज्यों से इकट्ठे हुए डेटा पर काम किया. उस वक्त भी जो डेटा मौजूद था, वो ज्यादातर ग्रामीण भारत से था. उसके आधार पर भारतीय पुरुषों और औरतों की एवरेज या आदर्श हाइट का पैमाना तय किया गया. वही पैमाना, जो ऊपर आपको बताया है.

अब बारी आई मौजूदा कमिटी की. इस कमिटी ने रिसर्च के मामले में अपने पैर बहुत पसारे. हाल के सर्वे को अहमियत दी. देश के लगभग-सभी राज्यों के लोगों का सर्वे किया. वो किस तरह का खाना खाते हैं, किस भौगोलिक इलाके में रहते हैं, ये सब देखा गया. चूंकि अलग-अलग स्थानों के आधार पर लोगों की हाइट और वज़न में अंतर आता है, इसलिए इसे देखना भी बेहद ज़रूरी है. कोशिश की गई कि हर भौगोलिक इलाके के लोगों के हाइट और वज़न का रिकॉर्ड लिया जाए. इसके अलावा नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-4 (2015-16) समेत हालिया समय में हुए बाकी ज़रूरी सर्वे का भी विश्लेषण किया. इनमें WHO द्वारा किया गया सर्वे भी शामिल है. उसके बाद कहीं जाकर भारतीयों की औसत हाइट और वज़न को बदला गया.

 

NIN की रिपोर्ट.

 

डॉक्टर डी.एल शर्मा, ICMR में साइंटिस्ट हैं. उन्होंने बताया-

“जो एवरेज हाइट और वज़न है, वो एंथ्रोपोमेट्री मेज़रमेंट है. और हर देश के लोगों का एंथ्रोपोमेट्री डेटा अलग होता है. उसी तरह से हर एक एरिया का भी अलग हो सकता है. भारत में आदिवासी लोगों का, नॉर्थ के लोगों का, साउथ का अलग होगा. भौगोलिक इलाकों का, वहां के पर्यावरण का, खान-पान का असर किसी पर्टिकुलर जगह पर रहने वाले लोगों की हाइट और वज़न पर पड़ता है. जैसे अभी जो सर्वे किया गया है, उसमें सबका एंथ्रोपोमेट्री डेटा लिया गया होगा, उसके बाद इसका एवरेज निकाला गया होगा.”

अब ये एंथ्रोपोमेट्री मेज़रमेंट क्या है? यानी ये जानना कि किसी व्यक्ति के शरीर में मसल्स, हड्डियों और चर्बी की कितनी मात्रा है. जगह के हिसाब से लोगों के एंथ्रोपोमेट्री मेज़रमेंट में बदलाव आता है.

 

थोड़ा न्यूट्रिशन वाले खाने पर और फोकस हो जाए?

‘कीप मूविंग इंडिया’ नाम के यूट्यूब चैनल पर 2016 में एक वीडियो पोस्ट हुआ था, जिसमें एक टेबल पंजाबी खाने और झारखंडी खाने से सजाया गया था. जनरली पंजाबी लोग झारखंड के लोगों की तुलना में ज्यादा लंबे होते हैं. डॉक्टर अंजलि हुडा, जो न्यूट्रिशन स्पेशलिस्ट हैं, उन्होंने इस टेबल को देखकर कहा था-

“आपके खाने से आपके हाइट और वज़न का रिलेशन होता है. पंजाबी खाना ज्यादा रिच है. इसमें बटर है, ज्यादा मलाई है और क्वांटिटी में भी इकट्ठा खाते हैं. न्यूट्रिशन का हाइट पर बहुत फर्क पड़ता है. आप कितना खाते हो, कितनी कैलोरी खाते हो, इसका बहुत फर्क पड़ता है.”

 

डॉक्टर अंजलि हुडा. वीडियो स्क्रीनशॉट.

 

अब बात BMI की

NIN की रिपोर्ट आने के बाद ये खबर भी सामने आई कि BMI यानी बॉडी मास इंडेक्स के पैमाने को भी बदला गया है. इस पर डॉक्टर सुब्बाराव ने साफ किया कि BMI का पैमाना नहीं बदला गया है. जैसा पहले था, वैसा ही अभी भी है.

दरअसल, रिपोर्ट में एक जगह पर मेंशन है कि नॉर्मल BMI की रेंज 18.5 से 22.9 kg/m2. बस इसी से लोगों को कन्फ्यूज़न हुआ कि BMI की रेंज भी बदल गई है.

 

ये रेंज का झमेला बाद में, पहले जाने कि BMI क्या है?

BMI वो पैमाना है, जो ये बताता है कि आपका शरीर हाइट और वज़न के हिसाब से कितना फिट है. कहीं आप अंडरवेट तो नहीं, या कहीं ओवरवेट तो नहीं, या फिर मोटे तो नहीं. ये सब BMI से पता चल जाता है.

 

कैसे पता लगाते हैं?

ये आपके वज़न और हाइट के वर्ग का अनुपात होता है. आपको अपने वज़न को हाइट गुणा हाइट से भाग देना होगा. वज़न किलोग्राम में होना चाहिए, और हाइट मीटर में.

मान लीजिए कि आपका वज़न 62 किलो है और हाइट है 1.62 मीटर. तो पहले 1.62 को 1.62 से ही गुणा करें. नतीजा आया 2.62. अब 62 किलो को 2.62 से भाग दे दीजिए. नतीजा आया 23, ये ही BMI है. इसकी यूनिट है kg/m2, मतलब केजी पर मीटर स्क्वेयर.

 

पोषक आहार लेने से भी बहुत फर्क पड़ता है.

 

तो क्या आप फिट हैं या ओवरवेट?

देखिए BMI के भी दो तरह के टेबल हैं. एक तो WHO वाला, दूसरा इंडिया वाला.

 

WHO के मुताबिक-

BMI आपके शरीर का स्टेटस
18.5 से कम अंडरवेट हैं आप
18.5 – 24.9 नॉर्मल वेट
25.0 – 29.9 ओवरवेट हैं आप
30.0 से ज्यादा मोटापा हो रखा है

 

अब बात भारत की

भारत में अनुवांशिक तौर पर लोगों के पेट के हिस्से में चर्बी जमा हो जाती है. इसलिए यहां BMI का पैमाना अलग सेट किया गया है. नेशनल हेल्थ पोर्टल (NHP) के मुताबिक, भारत में-

 

BMI आपके शरीर का स्टेटस
18.5 से कम अंडरवेट हैं आप
18.5 – 22.9  नॉर्मल BMI
 23.0 – 24.9  ओवरवेट हैं आप
 25 से ज्यादा  मोटापा हो रखा है

 

वैसे अभी भी कई डॉक्टर्स WHO वाली रेंज के हिसाब से काम करते हैं.

डॉक्टर जगत शंकरगौदा होम्योपैथ डॉक्टर हैं. उन्होंने अपने एक वीडियो में बताया था कि जिनका BMI ओवरवेट वाली रेंज में आता है, वो थोड़ी डाइट कंट्रोल और एक्सरसाइज़ से इसे नॉर्मल रेंज में ला सकते हैं. वहीं जो अंडरवेट हैं, तो अच्छे खाने से इसे ठीक किया जा सकता है. वहीं जो मोटे हैं, उन्हें कई बार डॉक्टर्स से सलाह लेनी ज़रूरी होती है.

 

BMI की आलोचना भी होती रही है

डॉक्टर्स का ये कहना है कि BMI उतना सटीक पैमाना नहीं है फिटनेस मापने का. क्योंकि कई बार हो सकता है कि किसी व्यक्ति की मसल्स भारी हों, और वो उस वजह से ओवरवेट की कैटेगिरी में आ सकता है. वहीं हो सकता है कि किसी के शरीर में चर्बी ज्यादा हो, हड्डियों और मसल्स का वज़न कम हो और वो BMI की नॉर्मल रेंज में आए. इंडिया के ही नहीं, विदेश के डॉक्टर्स भी इसकी आलोचना करते रहे हैं. लेकिन फिर भी इसे अभी शरीर की हालत जानने का ठीक-ठाक पैमाना माना जाता है.


28-09-2020-03.jpg

adminSeptember 28, 20201min5890

प्रफेसर त्रिलोचन शास्त्री IIT और IIM जैसे इंस्टीट्यूट से पढ़े हुए हैं. IIM में डीन भी रहे. फिलहाल IIM-बैंगलोर में पढ़ा रहे हैं. असोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानी कि ADR के फाउंडर हैं. इसके अलावा उन्होंने Farm Veda नाम की एक कंपनी भी तैयार की है, जिसका काम है किसान की फसल को उसके खेत से सीधे हमारे किचन तक पहुंचाना. यानी बिचौलिया सिस्टम खत्म करने की दिशा में काम. देश के करीब 36 हजार किसान अब तक इससे जुड़ चुके हैं.

कृषि संबंधी तीन बिल दोनों सदनों से पास हो गए हैं. राष्ट्रपति की मुहर के बाद कानून बन जाएंगे. देश में कई जगह किसान इसका विरोध कर रहे हैं. बिल और इससे जुड़े प्रावधानों पर प्रफेसर त्रिलोचन शास्त्री ने अहम बातें की हैं. उन्होंने अंग्रेजी में लिखा है. वही बातें आपको हिन्दीं में बता रहे हैं. पढ़िए.

किसानों के लिए तीन बिल लाए गए हैं. ये बिल भारत के कृषि क्षेत्र में प्राइवेट सेक्टर की एंट्री को आसान बनाने की कोशिश करते हैं. इसमें APMC और निर्धारित मंडियों के दायरे से बाहर जाकर भी फसल का सौदा करने की छूट दी गई है. और इन ट्रांजेक्शन पर कोई मार्केट फीस, कोई सेस या अन्य कोई चार्ज नहीं लगेगा. ये टैक्स किसान तो भरता नहीं था. ये टैक्स भरते थे खरीदार. इस लिहाज से ये नया लाभ भी व्यापारियों को ही मिलेगा. लेकिन किसानों का भी कोई नुकसान नहीं है. नुकसान किसी का है, तो राज्य सरकारों का. जिन्हें इन टैक्स के ज़रिये एक बड़ा रेवेन्यू मिलता था. उदाहरण के लिए – फसल खरीदी पर लगने वाले टैक्स, मार्केट फीस से पंजाब सरकार सालाना करीब चार हजार करोड़ रुपए कमाती थी. ये अब धम से नीचे गिरेगा. राज्यों के कानून में जो कुछ भी केंद्र सरकार के बिल से अलग है, वो अब हटा दिया गया है. इसलिए पंजाब के राजनीतिक दल इस बिल का जमकर विरोध कर रहे हैं.

[* APMC: एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमेटी. इसका काम होता है बाज़ार के उतार-चढ़ाव से किसान को बचाना और ये सुनिश्चित करना कि उसे फसल का सही-सही दाम या एमएसपी मिलता रहे.]

बिल कहता है कि कोई विवाद होने पर उसे एसडीएम के स्तर पर हल किया जाएगा, न्यायालय के स्तर पर नहीं. असेंशियल कमोडिटीज़ एक्ट में भी संशोधन किए गए हैं. आवश्यक वस्तुओं के दाम पर सरकारी नियंत्रण कम हुआ है. सरकार इसे नियंत्रित करने के आदेश तभी जारी करेगी, जब सब्ज़ियों और फलों की कीमत में 100 फीसदी की बढ़ोतरी होगी. या फिर जब ख़राब न होने वाले खाद्यान्नों की कीमत में 50 फीसदी तक का इज़ाफा होगा. इससे उपभोक्ता को तो फायदा होता है, लेकिन किसान को नहीं. क्योंकि अधिकतर छोटे किसान कटाई के वक्त ही फसल बेचते हैं. उस वक्त तो दाम यूं भी कम ही होते हैं. दामों में उतार-चढ़ाव व्यापारी को फायदा देते हैं, किसानों को नहीं.

 

MSP के प्रोटेक्शन को खो देने का डर

पंजाब, हरियाणा की बात करते हैं. यहां जो फसल उगती है, उसका करीब-करीब 100 फीसदी सरकार खरीद लेती है. MSP पर. अभी धान की MSP करीब 18.68 रुपए प्रति किलो है. अब बाकी राज्यों की बात करते हैं. यहां सरकार फसल का करीब 10 फीसदी ही खरीदती है और दाम है 12 से 14 रुपए. इस उदाहरण से साफ हो रहा है कि कृषि बिल का सबसे ज़्यादा विरोध पंजाब, हरियाणा में ही क्यों हो रहा है. ये MSP के प्रोटेक्शन को खो देने का डर है. सच ये है कि भारत में जितना भी चावल या गेहूं होता है, उसका करीब-करीब दो तिहाई खुले बाज़ार में ही जाता है. सरकार इसे नहीं खरीदती. अगर हम दाल, बाजरा, ज्वार, रागी, कपास जैसी बाकी फसलों की बात करें तो सरकारी ख़रीद का ये आंकड़ा और भी कम है. इस समस्या के लिए नया बिल कोई समाधान नहीं देता.

[* MSP: मिनिमम सपोर्ट प्राइज़. सरकार जिस दाम पर किसान से फसल का प्रोक्योरमेंट (ख़रीदी) करती है, उसे MSP कहते हैं. ये सरकार की तरफ से तय होता है और किसान की लागत से ज़्यादा रखा जाता है. ताकि उसे लाभ मिले.]

 

क्या मंडियों का हाल एयरपोर्ट जैसा होगा?

प्रधानमंत्री कई बार आश्वासन दे चुके हैं MSP पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. फिर भी किसान लगातार विरोध कर रहे हैं. शायद इस बिल में कुछ संशोधन किसानों की चिंता को कम कर पाएं. संशोधन, जो इस बात को साफ तौर पर आगे रख सकें कि सरकारी खरीद की मात्रा और MSP तय करने के मौजूदा फॉर्मूले पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है. साथ ही बिल को स्पष्ट तौर पर ये आश्वासन भी देना होगा कि जिस तरह के देश के एयरपोर्ट का आज निजीकरण हो रहा है, कल को वैसा ही मंडियों के साथ नहीं होगा.

अब मान लीजिए अगर कृषि में प्राइवेट सेक्टर के दख़ल को स्थापित होने दिया जाए, टैक्स फ्री प्राइवेट मंडी तैयार की जाएं, तो इसका असर क्या होगा? आप दक्षिण अमेरिका की तरफ जाइए. तमाम ऐसे उदाहरण मिलेंगे, जहां यूएस फूड कॉर्पोरेशन ने किसानों की फसल पर एकाधिकार हासिल किया. और यहां धीरे-धीरे, साल-दर-साल फसलों का खरीदी मूल्य कम होता चला गया. अब भारत की बात करते हैं. कई ऐसे राज्य जहां विपक्षी पार्टियों की सरकार है, वे पहले भी कई बार MSP पर खरीदी की प्रक्रिया को रोक चुके हैं. उनका कहना रहा है कि केंद्र सरकार की ओर से समय पर फंड ही नहीं मिलता. अब ये बिल आने के बाद चार राज्य साफ तौर पर कह चुके हैं कि वे या तो इस कानून को लागू नहीं करेंगे या फिर इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे. ये चार राज्य हैं- पंजाब, हरियाणा, छत्तीसगढ़ और केरल.

 

छोटे किसानों की बात अनसुनी

नया बिल मध्यम और बड़े वर्ग के किसानों को शायद शुरुआत में कुछ लाभ दे. लेकिन बड़ा लाभ फिर भी प्राइवेट सेक्टर को ही देगा. छोटे किसान, बाज़ार की पहुंच से बहुत दूर हैं. उनकी समस्याएं ज्यों की त्यों बनी रहेंगी. खेती-किसानी से जुड़े मुद्दों को राजनेता, राजनीति के चश्मे से देखते हैं. इकॉनमिस्ट और बुद्धिजीवी लोग किसी विचारधारा के चश्मे से देखते हैं. फिर चाहे वो विचारधारा खुले बाजार की हो या समाजवाद की. कॉर्पोरेट जगत इन मुद्दों को नफ़ा-नुकसान के चश्मे से देखता है. लेकिन इन सबके बीच छोटे किसानों की बात, उसका विश्लेषण गुम ही रह जाता है. हमारे देश में ऐसे 10 करोड़ छोटे किसान हैं. इनमें से भी 85 फीसदी बहुत छोटे स्तर पर खेती-किसानी करते हैं. ये सब मिलकर देश के 40 फीसदी परिवारों का प्रतिनिधित्व करते हैं.

 

अमृतसर में विरोध प्रदर्शन. तारीख़- 26 सितंबर. (फोटो- PTI)

 

कृषि में प्राइवेट सेक्टर की एंट्री के पक्ष में भी तर्क दिए जाते हैं. वो ये कि सरकार की तरफ से चलाए जाने वाले फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (FCI) के सिस्टम में बहुत धांधली है और इसमें बहुत बड़े स्तर पर फसलों की बर्बादी होती है. इसका एक विकल्प हो सकते हैं- कृषि उत्पादक संगठन यानी कि FPO. बस इनको बेहतर तरीके से चलाने की ज़रूरत है, ताकि किसानों को लाभ मिलता रहे. भारत का अमूल इसका दुनियाभर में जाना-माना उदाहरण है. चुके हुए सरकारी सिस्टम की जगह बड़ा प्राइवेट रिप्लेसमेंट ला देना ही एकमात्र उपाय नहीं है.

[* FCI: फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया. सरकारी संस्था है. इसका काम होता है किसानों से MSP पर खाद्यान्न खरीदकर उसका स्टोरेज करना और फिर उसके डिस्ट्रीब्यूशन पर ध्यान देना.

* FPO: कृषि उत्पादक संगठन. किसानों का समूह, जो फसल उत्पादन के साथ तमाम व्यावसायिक गतिविधियां भी चलाता है. FPO से किसानों को अपनी फसल बेचने की सुविधा मिलती है. सरकार ने इसी साल 10 हजार FPO के गठन की मंजूरी दी थी.]


22-09-2020-06.jpg

adminSeptember 22, 20201min6180

“विरोध के अधिकार को लेकर कोई यूनिवर्सिल पॉलिसी नहीं हो सकती है. इसमें केस-टू-केस बदलाव आते रहते हैं. ऐसे में हालात को ध्यान में रखते हुए कुछ कटौतियां भी करनी ज़रूरी होती हैं, ताकि संतुलन बना रहे.”

ये टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट की है. 21 सितंबर, सोमवार को. सुनवाई हो रही थी दिल्ली के शाहीन बाग में हुए एंटी-सीएए प्रोटेस्ट को लेकर आई तमाम याचिकाओं पर. याचिकाएं, जिसमें ज़िक्र है उन असुविधाओं का, जो शाहीन बाग प्रोटेस्ट की वजह से लोगों को हुईं. सुप्रीम कोर्ट ने लोगों के विरोध के अधिकार और रोड ब्लॉक किए जाने के बीच ‘संतुलन’ स्थापित करने की ज़रूरत पर अपना फैसला सुरक्षित रखा है.

दिल्ली के शाहीन बाग में दिसंबर से शुरू होकर करीब तीन महीने तक एंटी-सीएए प्रोटेस्ट चला था. रोड ब्लॉक रही थी, जिससे पूरे एनसीआर के लोगों को आने-जाने में दिक्कत हुई थी. रोड ब्लॉक करके विरोध जताने के इसी तरीके पर तमाम आपत्तियां जताई गई थीं. बाद में जब कोविड-19 का ख़तरा बढ़ा, लॉकडाउन लगा, सोशल डिस्टेंसिंग अमल में आई, तो ये प्रोटेस्ट भी ख़त्म किया गया था.

 

जस्टिस एसके कौल, अनिरुद्ध बोस और कृष्ण मुरारी ने की बेंच ने कहा –

“(रोड ब्लॉक के बीच) कुछ ऐसे परिस्थितियां बनीं, जो किसी के हाथ में नहीं थीं. कह सकते हैं कि भगवान ने ख़ुद हस्तक्षेप किया (कोरोना के रेफरेंस में). विरोध के अधिकार और रोड ब्लॉक किए जाने के बीच संतुलन ज़रूरी है. लोकतंत्र में विरोध तो होते हैं. संसद में भी और रोड पर भी. लेकिन रोड पर इसका शांतिपूर्ण तरीके से होना ज़रूरी है.”

 

वकील अमित साहनी ने भी इस मामले में याचिका लगाई थी. उन्होंने कहा –

“इस तरह के विरोध प्रदर्शन भविष्य में नहीं होने चाहिए. जनहित में यही अच्छा है. शाहीन बाग में 100 दिन से ऊपर प्रदर्शन चलने दिया गया और इससे लोगों को भारी असुविधा हुई. अब कल हरियाणा में ही चक्का जाम कर दिया गया. 24-25 सितंबर को भारत बंद का ऐलान किया गया है. ऐसे विरोध नहीं होना चाहिए.”

जब विरोध प्रदर्शन चल रहा था, तो सुप्रीम कोर्ट ने कुछ वार्ताकारों को भी शाहीन बाग भेजा था, ताकि बातचीत के ज़रिये कुछ हल निकाला जा सके और कम से कम रोड को खुलवाया जा सके. लेकिन उसका भी कोई नतीजा नहीं निकला था. अब फैसला सुरक्षित रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि वार्ताकारों को भेजना एक प्रयोग था, जो शायद काम किया या शायद काम नहीं भी किया.


19-09-2020.jpg

adminSeptember 19, 20201min4540

इंडियन प्रीमियर लीग 2020 शुरू होने ही वाली है. शनिवार, 19 सितंबर को मुंबई इंडियंस और चेन्नई सुपरकिंग्स के बीच होने वाले मैच के साथ दुनिया की सबसे बड़ी T20 लीग शुरू हो जाएगी. यह मैच अबू धाबी के शेख जाएद स्टेडियम में खेला जाएगा.

कोविड-19 के चलते इस बार टूर्नामेंट UAE में खेला जा रहा है. आमतौर पर 10 वेन्यूज पर होने वाला यह टूर्नामेंट इस बार तीन वेन्यूज पर ही खेला जाएगा. आठ टीमों के बीच होने वाले 60 मैचों को अबू धाबी, दुबई और शारजाह मिलकर होस्ट करेंगे. टूर्नामेंट विदेश में होने के चलते इस बार होम और अवे का कॉन्सेप्ट भी नहीं होगा. सारी ही टीमें अवे में खेल रही होंगी.

IPL2020 शुरू होने से पहले चलिए आपको बताते हैं तीनों स्टेडियम के बारे में. यहां के तीनों स्टेडियम दिल्ली के फिरोजशाह कोटला और बेंगलुरु के एम. चिन्नास्वामी जैसे छोटे स्टेडियम से बड़े हैं. अबू धाबी का शेख जाएद स्टेडियम, दुबई इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम और शारजाह क्रिकेट स्टेडियम इंटरनेशनल वेन्यू हैं. इससे पहले 2014 में भी यहां IPL के कुछ मैच खेले जा चुके हैं. हालांकि पिछली बार यहां टूर्नामेंट के शुरुआती मैच ही खेले गए थे. तो चलिए अब शुरू करते हैं

 

# शेख जाएद स्टेडियम, अबू धाबी

शेख जाएद स्टेडियम ने 2014 में भी IPL मैचों को होस्ट किया था. हालांकि इस बार मामला अलग होगा, क्योंकि मैच खाली स्टेडियम में कराए जाएंगे. 20,000 लोगों के बैठने की क्षमता वाले इस स्टेडियम ने 2006 में पहली बार इंटरनेशनल मैच होस्ट किया था. भारत और पाकिस्तान के बीच खेले गए वनडे मैच से इस स्टेडियम का शुभारंभ हुआ था.

यहां पहला इंटरनेशनल T20 मैच फरवरी, 2010 में खेला गया. यह मैच अफगानिस्तान और स्कॉटलैंड के बीच हुआ था. इसी साल नवंबर में यहां पहला टेस्ट मैच भी खेला गया. यह मैच पाकिस्तान और साउथ अफ्रीका के बीच हुआ था.

# दुबई इंटरनेशनल स्टेडियम

25,000 की क्षमता वाला यह स्टेडियम हाल ही में बना है. साल 2009 में हुए वनडे मैच के साथ इसने इंटरनेशनल सीन में एंट्री मारी थी. इस स्टेडियम में अब तक 62 इंटरनेशनल T20 मैच खेले जा चुके हैं.

यहां पहला वनडे मैच पाकिस्तान और ऑस्ट्रेलिया के बीच खेला गया था. साल 2010 में मैदान ने अपना पहला टेस्ट होस्ट किया. इसमें पाकिस्तान और साउथ अफ्रीका भिड़े थे.

 

# शारजाह क्रिकेट स्टेडियम

इस स्टेडियम को कौन नहीं जानता. यह UAE की सबसे पुरानी क्रिकेट फैसिलिटी है. साल 1982 में बने इस स्टेडियम में 17,000 लोगों को बिठाने की सुविधा है. साल 2014 में छह मैच होस्ट करने वाले शारजाह क्रिकेट स्टेडियम को इस बार 12 मैच मिले हैं. यहां पहला मैच 22 सितंबर को राजस्थान रॉयल्स और चेन्नई सुपर किंग्स के बीच खेला जाएगा.

IPL2020 का आखिरी लीग मैच भी यहीं होगा. यह मैच 3 नवंबर को मुंबई इंडियंस और सनराइजर्स हैदराबाद के बीच खेला जाएगा. प्ले-ऑफ और फाइनल की तारीखें और वेन्यू अभी घोषित नहीं हुए हैं.


11-09-2020-05.jpg

adminSeptember 11, 20201min5160

भारत में हज़ारों साल से गांजे का सेवन किया जाता रहा है. अथर्ववेद में इसकी गिनती पांच महान पौधों में है. 1985 से पहले इस पर कोई रोक-टोक नहीं थी. फिर राजीव गांधी की सरकार 1985 में NDPS यानी Narcotic Drugs and Psychotropic Substances Act लेकर आई. तब गांजे पर बैन लग गया.

कई लोग गांजे को हेल्थ के लिए एक बड़ा खतरा बताते हैं, कुछ इसके मेडिकल बेनिफिट्स की ओर इशारा करते हैं. पिछले दशकों में गांजे को लीगल करने की मांग बढ़ी है. दुनिया के कई हिस्सों में इसे लीगल कर दिया गया है.

साइंसकारी के इस एपिसोड में एक ड्रग की बात करेंगे, जिसका नाम है – गांजा. इसे दूसरे नामों से भी जाना जाता है. जैसे कि Marijuana (मैरुआना). Weed (वीड). Stuff (स्टफ). माल. Pot (पॉट). Grass (ग्रास). लेकिन ये सब गली-मोहल्ले वाले नाम हैं. इसका साइंटिफिक नाम है Cannabis (कैनेबिस). कैनेबिस एक पौधा होता है. इसकी कई वैराइटी होती हैं, जिनमें से दो नस्ल बहुत फेमस हैं- Cannabis Sativa और Cannabis Indica.

 

कैनेबिस को हिंदी में भांग का पौधा कहते हैं. और इस पौधे से तीन ड्रग तैयार होते हैं- गांजा, भांग और चरस.

1. गांजा कैनेबिस के फूलों से तैयार किया जाता है. आमतौर इन्हें जलाकर इसके धुएं को अंदर लिया जाता है. स्मोक किया जाता है. लेकिन इसे खाने और घोलकर पीने के तरीक़े भी होते हैं.

2. चरस कैनेबिस के पौधे से निकले रेज़िन से तैयार होती है. रेज़िन यानी पेड़-पौधों से जो चिपचिपा मटेरियल निकलता है वो. हिंदी में इसे राल कहते हैं. चरस को ही हशीश या हैश भी कहते हैं.

3. भांग कैनेबिस की पत्तियों और बीजों को पीसकर बनती है. फिर इसे सुविधा के मुताबिक़ लोग खाते या पीते हैं.

ये तीनों Psychoactive Drug हैं. यानी ये दिमाग में कुछ-कुछ करते हैं. क्या करते हैं? हाई करते हैं. हाई यानी इनसे जो नशा चढ़ता है, उसे हाई होना कहते हैं. लेकिन जब कोई हाई होता है, तो उसके शरीर में होता क्या है? यहां हमें थोड़ी केमिस्ट्री और बायोलॉजी समझनी होगी.

 

गांजे की केमिस्ट्री

कैनेबिस के पौधे में कुछ स्पेशल टाइप के केमिकल होते हैं. इन्हें कहते हैं Cannabinoids (कैनेबिनॉइड्स). कैनेबिस के पौधे में लगभग 150 प्रकार के कैनेबिनॉइड्स पाए जाते हैं. इन में से दो केमिकल स्पेशल होते हैं- THC और CBD. जैसे शोले में जय और वीरू की जोड़ी थी. वैसे ही गांजे में THC और CBD की जोड़ी है.

 

THC और CBD. जय और वीरू. (शोले)

 

THC का पूरा नाम है Delta9-TetraHydroCannabinol. THC इस जय-वीरू वाली जोड़ी में वीरू है. धर्मेंद्र. नटखट टाइप का. गांजा, भांग और चरस से जो ‘हाई’ यानी नशा महसूस होता है, वो THC के कारण ही होता है. जिनता ज़्यादा THC, उतना ज़्यादा हाई होंगे.

CDB इस शोले का जय है. गंभीर किस्म का. अमिताभ बच्चन. इसकी अच्छी रेप्यूटेशन है. इससे नशा-वशा नहीं होता. बल्कि ये THC का उल्टा काम करता है. यानी THC के साइकोएक्टिव इफैक्ट्स को कम करता है. CBD कई बार एंग्ज़ाइटी यानी घबराहट की समस्या में भी मददगार साबित होता है.

इन दो कैनेबिनॉइड्स की मात्रा ये डिसाइड करती है कि कोई कैसे हाई होगा. ख़ासकर THC की मात्रा. लेकिन ये THC किसी को हाई कैसे करते हैं?

 

दिमाग काहे चकरा जाता है?

जो भी हम सोचते, समझते या महसूस करते हैं, वो ब्रेन के ज़रिए करते हैं. दिमाग के ज़रिए. और हमारा दिमाग़ ये सारा काम Neurons (न्यूरॉन्स) के ज़रिए करता है. न्यूरॉन्स यानी वो डाकिए, जिनके ज़रिए ब्रेन मैसेज सेंड और रिसीव करता है (सूचना का आदान-प्रदान करता है). कैनेबिस के नशे के दौरान इन्हीं न्यूरॉन्स के साथ खेल हो जाता है.

न्यूरॉन्स में Cannabinoid Receptors (कैनेबिनॉइड रिसेप्टर) होते हैं. मतलब कुछ ऐसी जगह जहां कैनेबिनॉइड जाकर फिट हो सकें.
रिसेप्टर एक तरह की कुर्सी, जिस पर सिर्फ कैनेबिनॉइड्स ही बैठ सकते हैं. इन्हीं में से कुछ कुर्सियों पर यानी रिसेप्टर साइट्स पर THC जाकर फिट हो जाता है और दिमाग में हेरा-फेरी हो जाती है.

आप कहेंगे. यार, ब्रेन में कैनेबिनॉइड रिसेप्टर पहले से मौजूद हैं. इसका मतलब हमारा ब्रेन चाहता है कि हम कैनेबिनॉइड लें. हमारी बॉडी तो गांजा फूंकने के लिए ही बनी है. लेकिन ऐसा कुछ नहीं है. कुछ कैनेबिनॉइड हमारे शरीर के अंदर ही बनते हैं. और ये रिसेप्टर इन्हीं कैनेबिनॉइड लिए होते हैं.

हमारे शरीर के अंदर एक कैनेबिनॉइड बनता है, जिसका नाम है Anandamide (एनंडेमाइड). इसका नाम संस्कृत शब्द ‘आनंद’ से आता है. कई बार दौड़ने या एक्सरसाइज करने के बाद बहुत आनंद आता है. इसे Runners High कहा जाता है. यानी दौड़ने से हाई हो जाना. ये रनर्स हाई का अनुभव हमें एनंडेमाइड के कारण होता है, जिसे हमारा शरीर खुद ही बनाता है.

एक कमाल की बात बताएं? कैनेबिस में मौजूद THC इस एनंडेमाइड की नकल करता है. जब कोई गांजा फूंकता है, तो उसके खून से होते हुए ये कैनेबिनॉइड दिमाग तक पहुंच जाते हैं. दिमाग़ के जिन हिस्सों में कैनेबिनॉइड रिसेप्टर्स की मात्रा ज़्यादा होती है, उन हिस्सों में ज़्यादा असर होता है. हमारे ब्रेन के तीन हिस्से हैं, जहां कैनेबिनॉइड रिसेप्टर अच्छी खासी मात्रा में होते हैं- Hippocampus (हिपोकैंपस), Cerebellum (सेरेबेलम) और Basal Ganglia (बेसल गैंग्लिया).

जब THC और CBD जैसे कैनेबिनॉइड इन हिस्सों में जाते हैं, तो इनसे जुड़े हमारे ब्रेन के फंक्शन प्रभावित होते हैं. जैसे कि शॉर्ट-टर्म मेमोरी, को-ऑर्डिनेशन, लर्निंग, प्रॉब्लम सॉल्विंग. लोगों को प्लेज़र भी महसूस होता है, यानी मज़ा आता है. टाइम पर्सेप्शन हिल जाता है. ये सब इफेक्ट्स हर किसी के लिए अलग-अलग होते हैं. लेकिन ये सब तो फूंकने के दौरान होता है. यानी शॉर्ट-टर्म इफेक्ट्स हैं. गांजा फूंकने के लॉन्ग टर्म इफेक्ट्स क्या हैं. इसके नुकसान क्या हैं?

 

दिमाग पर क्या असर पड़ता है?

गांजा फूंकने से होने वाले नुकसान पर बहुत लिमिटेड रिसर्च है. इसके अवैध होने के कारण. ये अलग-अलग लोगों पर अलग असर करता है. लेकिन एक बात पक्की है. कम उम्र में गांजे सेवन करने वालों का ब्रेन बुरी तरह प्रभावित हो सकता है. जब तक हम 20 साल के नहीं होते, हमारा दिमाग़ पूरी तरह डेवेलप नहीं होता. कई स्टडीज़ में पाया गया है कि टीन-एज यानी किशोर अवस्था में गांजा फूंकने वालों की कॉग्निटिव एबिलिटी पर बुरा असर पड़ सकता है.

 

यूएस के National Academies of Sciences, Engineering, and Medicine ने मैरुआना की रिसर्च का रिव्यू किया. इसमें पाया गया कि गांजे का सेवन कुछ लोगों के लिए ख़तरनाक साबित हो सकता है. कौन लोग? वो जिन्हें सांस संबंधी समस्या है या प्रेंग्नेंट महिलाएं या वो जिनमें मेंटल हेल्थ डिसऑर्डर डेवलप होने का रिस्क हैं. यानी ये बिगड़ते मानसिक स्वास्थ्य को और बिगाड़ सकता है. साथ ही इसका अत्यधिक सेवन करने से इस पर निर्भरता बढ़ती है. यानी इसके बिना रहना अजीब लगता है.

National Academies के रिसर्च रिव्यू ने इसके मेडिकल बेनिफिट्स भी बताए. इस रिपोर्ट के मुताबिक़, क्रॉनिक पेन, नॉसिया, वॉमिटिंग जैसी कई दिक़्क़तों में इसके मेडिकल बेनिफिट के पुख्ता प्रमाण देखे गए हैं. दूसरी बीमारियों में भी इसके बेनिफिट बताए जाते हैं. लेकिन अभी और रिसर्च की ज़रूरत है.

 

लीगल होना चइए कि नहीं होना चइए?

पिछले कुछ साल में कैनेबिस लीगल करने को लेकर बहस तेज़ हुई है. इसके लीगलाइज़ेशन की मांग के पीछे के तर्क भी जान लेने चाहिए.

दिल्ली और मुंबई गांजे के मामले में दुनिया के टॉप 10 शहरों में हैं. बैन होने के बावजूद गांजा बिक तो रहा ही है. बल्कि इसके अवैध होने से नुक़सान ये हो रहा है कि लोग किस गांजे का सेवन कर रहे हैं, उन्हें पता तक नहीं.

जहां गांजा लीगल है, वहां उनके पैकेट पर THC और CBD की मात्रा लिखी होती है. उसे देखकर लोग अपनी क्षमता, मूड, समय और मौके के मुताबिक इसका नशा करते हैं. पिछले दशकों में अंडरग्राउंड बिकने वाले गांजे में THC की मात्रा बढ़ी ही है. यानी लोग पहले से भी ज़्यादा नशीला माल फूंक रहे हैं. ये लोगों को और एडिक्ट बना सकता है. कई केस में मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर भी डाल सकता है. जैसे शराब पीने वालों को पता होता है कि उनके पेय में कितनी मात्रा में एल्कोहॉल है, वैसे ही गांजे वालों को भी ये पता होना चाहिए कि उनके स्टफ में कितना THC है.

दूसरा तर्क ये है कि गांजा शराब और सिगरेट से कम डेडली है. और इसके तो मेडिकल बेनिफिट्स भी हैं. गांजे के ओवरडोज़ से अब तक किसी की मौत दर्ज नहीं हुई है, जैसा कि हर साल शराब और दूसरे ड्रग्स से होना आम बात है. कई स्टडीज़ में ये सामने आया है कि गांजे की तुलना में शराब ज़्यादा एडिक्टिव है. तुलनात्मक रूप से शराब से होने वाले रोड एक्सिडेंट और हिंसक व्यवहार के चांस भी ज़्यादा हैं. कैनिबिस सपोर्टर्स का कहना है कि शराब और सिगरेट से कम अवगुण होने के बावजूद इसे अवैध बनाए रखना समझ से परे है.

2017 में एक स्टडी ने पाया गया कि अमेरिका के राज्यों में मेरुआना लीगल होने बाद एल्कोहॉल की बिक्री में 15% की गिरावट आई. ऐसा मानना है कि गांजे के लीगल होने से एल्कोहॉल, टोबेको और फ़ार्मा कंपनियों का शेयर कम हो जाएगा. हालांकि इस पर शोधकर्ताओं का मत बंटा हुआ है.

 

एक तर्क ये भी है कि इसके लीगलाइज़ेशन से सरकार के पास टैक्स का एक और सोर्स हो जाएगा.

पिछले बरसों में दुनिया के कई हिस्सों में मैरुआना ने लीगल स्टेटस हासिल किया है. कहीं मेडिकल यूज़ के लिए, तो कहीं रीक्रिएशनल यूज़ के लिए. यानी मौज-मस्ती के लिए. आपको स्क्रीन पर जो नक़्शा नज़र आ रहा है, उसमें हरा इलाक़ा मेडिकल यूज़ वाला है. नीला इलाक़ा मेडिकल और रीक्रिएशनल, दोनों के लिए है. और इंडिया समेत बाक़ी ग्रे इलाक़े में ये बैन है.


10-09-2020-05.jpg

adminSeptember 10, 20201min4570

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी ईपीएफओ वित्त वर्ष 2019-20 के लिए EPF पर 8.5 फीसदी ब्याज देगा. ईपीएफओ बोर्ड ने मार्च में ही 2019-20 के लिए 8.5 प्रतिशत ब्याज देने का फैसला लिया था. बुधवार, 9 सितंबर को संगठन ने ग्राहकों के खाते में पिछले वित्त वर्ष के लिए 8.15 फीसदी ब्याज देने का फैसला किया. बाकी 0.35 फीसदी ब्याज दिसंबर के महीने में मिलेगा. इसका असर छह करोड़ करोड़ लोगों पर पड़ेगा. मार्च में EPFO ने कमाई का जो अनुमान लगाया था, कोरोना वायरस की वजह से उस पर असर पड़ा है.

एक साल पहले यानी वित्त वर्ष 2018-19 की बात करें, तो EPF पर 8.65 फीसदी ब्याज मिला था. वित्त वर्ष 2017-18 में भी 8.55, जबकि 2016-17 में 8.65 फीसदी ब्याज मिला था.

करोना के समय इस साल अप्रैल से अगस्त तक ईपीएफओ ने 94.41 लाख क्लेम सेटल किए. 35,445 करोड़ रुपए का भुगतान किया. कोरोना और लॉकडाउन के दौरान अपने सदस्यों को कैश संकट से बचाने के लिए सेटलमेंट का फास्ट ट्रैक तरीका अपनाया.


क्या होता है ईपीएफओ?

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी ईपीएफओ साल 1951 में बना. कर्मचारियों के लिए. इसके ऑफिस में ऐसी सभी कंपनियों को अपना रजिस्ट्रेशन कराना होता है, जहां 20 से ज्यादा कर्मचारी काम करते हैं. हर कंपनी के लिए ये ज़रूरी होता है कि वो कर्मचारियों का एक पीएफ खाता खुलवाए. और फिर उसमें कुछ पैसा जमा कराए. इसका मकसद निजी कंपनियों में काम करने वाले कर्मचारियों को एक सामाजिक सुरक्षा देना है. मतलब ये कि इस पैसे से कर्मचारियों के भविष्य की जरूरतों के लिए कुछ पैसों की बचत हो जाती है.

 

कैसे जमा होता है पैसा?

किसी भी कंपनी में काम करने वाले कर्मचारी का हर महीने कुछ पैसा काटा जाता है. ये बेसिक सैलरी का 12 फीसदी होता है. इसमें इतना ही योगदान यानी 12 फीसदी पैसा कंपनी की तरफ से दिया जाता है. कर्मचारी के हिस्से की 12 फीसदी रकम उसके ईपीएफ खाते में जमा हो जाती है. जबकि कंपनी के हिस्से में से केवल 3.67 फीसदी ही कर्मचारी के ईपीएफ खाते में जमा होता है. बाकी 8.33 परसेंट रकम कर्मचारी पेंशन योजना यानी ईपीएस में जमा हो जाती है. कर्मचारी अपनी बेसिक सैलरी में से 12 फीसदी से ज्यादा रकम भी कटा सकता है. इस पर भी टैक्स छूट मिलती है. मगर कंपनी केवल 12 फीसदी का ही योगदान करती है. ईपीएफ में बैंक की तरह नामांकन की भी सहूलियत होती है. कर्मचारी के साथ कैजुअल्टी की दशा में नॉमिनी को सारा पैसा मिल जाता है.

 

कितनी पेंशन मिलती है?

जैसा पहले बताया कि कंपनी के हिस्से की 8.33 फीसदी रकम पेंशन स्कीम में जाती है. कर्मचारी को 58 साल के उम्र के बाद पेंशन मिलती है. इसके लिए 10 साल नौकरी ज़रूरी है. पेंशन 1000 रुपए से 3250 रुपए महीने तक हो सकती है. ये पेंशन खाताधारक को आजीवन मिलती है.

 

एडवांस पैसा निकालने का क्या तरीका है?

पीएफ खाते से पैसा निकाला भी जा सकता है. कर्मचारी खुद की या परिवार में किसी की बीमारी पर सैलरी का छह गुना पैसा निकाल सकते हैं. कर्मचारी अपनी शादी में या परिवार में किसी की शादी या पढ़ाई के लिए जमा रकम का 50 फीसदी निकाल सकता है. होम लोन चुकाने के लिए सैलरी का 36 गुना पैसा पीएफ से मिल जाता है. घर की मरम्मत के लिए सैलरी का 12 गुना और घर खरीदने के लिए भी पैसा निकाल सकते हैं.



Contact

CONTACT US


Social Contacts



Newsletter


You cannot copy content of this page