ज्ञानचंद

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adminSeptember 11, 20201min4080

भारत में हज़ारों साल से गांजे का सेवन किया जाता रहा है. अथर्ववेद में इसकी गिनती पांच महान पौधों में है. 1985 से पहले इस पर कोई रोक-टोक नहीं थी. फिर राजीव गांधी की सरकार 1985 में NDPS यानी Narcotic Drugs and Psychotropic Substances Act लेकर आई. तब गांजे पर बैन लग गया.

कई लोग गांजे को हेल्थ के लिए एक बड़ा खतरा बताते हैं, कुछ इसके मेडिकल बेनिफिट्स की ओर इशारा करते हैं. पिछले दशकों में गांजे को लीगल करने की मांग बढ़ी है. दुनिया के कई हिस्सों में इसे लीगल कर दिया गया है.

साइंसकारी के इस एपिसोड में एक ड्रग की बात करेंगे, जिसका नाम है – गांजा. इसे दूसरे नामों से भी जाना जाता है. जैसे कि Marijuana (मैरुआना). Weed (वीड). Stuff (स्टफ). माल. Pot (पॉट). Grass (ग्रास). लेकिन ये सब गली-मोहल्ले वाले नाम हैं. इसका साइंटिफिक नाम है Cannabis (कैनेबिस). कैनेबिस एक पौधा होता है. इसकी कई वैराइटी होती हैं, जिनमें से दो नस्ल बहुत फेमस हैं- Cannabis Sativa और Cannabis Indica.

 

कैनेबिस को हिंदी में भांग का पौधा कहते हैं. और इस पौधे से तीन ड्रग तैयार होते हैं- गांजा, भांग और चरस.

1. गांजा कैनेबिस के फूलों से तैयार किया जाता है. आमतौर इन्हें जलाकर इसके धुएं को अंदर लिया जाता है. स्मोक किया जाता है. लेकिन इसे खाने और घोलकर पीने के तरीक़े भी होते हैं.

2. चरस कैनेबिस के पौधे से निकले रेज़िन से तैयार होती है. रेज़िन यानी पेड़-पौधों से जो चिपचिपा मटेरियल निकलता है वो. हिंदी में इसे राल कहते हैं. चरस को ही हशीश या हैश भी कहते हैं.

3. भांग कैनेबिस की पत्तियों और बीजों को पीसकर बनती है. फिर इसे सुविधा के मुताबिक़ लोग खाते या पीते हैं.

ये तीनों Psychoactive Drug हैं. यानी ये दिमाग में कुछ-कुछ करते हैं. क्या करते हैं? हाई करते हैं. हाई यानी इनसे जो नशा चढ़ता है, उसे हाई होना कहते हैं. लेकिन जब कोई हाई होता है, तो उसके शरीर में होता क्या है? यहां हमें थोड़ी केमिस्ट्री और बायोलॉजी समझनी होगी.

 

गांजे की केमिस्ट्री

कैनेबिस के पौधे में कुछ स्पेशल टाइप के केमिकल होते हैं. इन्हें कहते हैं Cannabinoids (कैनेबिनॉइड्स). कैनेबिस के पौधे में लगभग 150 प्रकार के कैनेबिनॉइड्स पाए जाते हैं. इन में से दो केमिकल स्पेशल होते हैं- THC और CBD. जैसे शोले में जय और वीरू की जोड़ी थी. वैसे ही गांजे में THC और CBD की जोड़ी है.

 

THC और CBD. जय और वीरू. (शोले)

 

THC का पूरा नाम है Delta9-TetraHydroCannabinol. THC इस जय-वीरू वाली जोड़ी में वीरू है. धर्मेंद्र. नटखट टाइप का. गांजा, भांग और चरस से जो ‘हाई’ यानी नशा महसूस होता है, वो THC के कारण ही होता है. जिनता ज़्यादा THC, उतना ज़्यादा हाई होंगे.

CDB इस शोले का जय है. गंभीर किस्म का. अमिताभ बच्चन. इसकी अच्छी रेप्यूटेशन है. इससे नशा-वशा नहीं होता. बल्कि ये THC का उल्टा काम करता है. यानी THC के साइकोएक्टिव इफैक्ट्स को कम करता है. CBD कई बार एंग्ज़ाइटी यानी घबराहट की समस्या में भी मददगार साबित होता है.

इन दो कैनेबिनॉइड्स की मात्रा ये डिसाइड करती है कि कोई कैसे हाई होगा. ख़ासकर THC की मात्रा. लेकिन ये THC किसी को हाई कैसे करते हैं?

 

दिमाग काहे चकरा जाता है?

जो भी हम सोचते, समझते या महसूस करते हैं, वो ब्रेन के ज़रिए करते हैं. दिमाग के ज़रिए. और हमारा दिमाग़ ये सारा काम Neurons (न्यूरॉन्स) के ज़रिए करता है. न्यूरॉन्स यानी वो डाकिए, जिनके ज़रिए ब्रेन मैसेज सेंड और रिसीव करता है (सूचना का आदान-प्रदान करता है). कैनेबिस के नशे के दौरान इन्हीं न्यूरॉन्स के साथ खेल हो जाता है.

न्यूरॉन्स में Cannabinoid Receptors (कैनेबिनॉइड रिसेप्टर) होते हैं. मतलब कुछ ऐसी जगह जहां कैनेबिनॉइड जाकर फिट हो सकें.
रिसेप्टर एक तरह की कुर्सी, जिस पर सिर्फ कैनेबिनॉइड्स ही बैठ सकते हैं. इन्हीं में से कुछ कुर्सियों पर यानी रिसेप्टर साइट्स पर THC जाकर फिट हो जाता है और दिमाग में हेरा-फेरी हो जाती है.

आप कहेंगे. यार, ब्रेन में कैनेबिनॉइड रिसेप्टर पहले से मौजूद हैं. इसका मतलब हमारा ब्रेन चाहता है कि हम कैनेबिनॉइड लें. हमारी बॉडी तो गांजा फूंकने के लिए ही बनी है. लेकिन ऐसा कुछ नहीं है. कुछ कैनेबिनॉइड हमारे शरीर के अंदर ही बनते हैं. और ये रिसेप्टर इन्हीं कैनेबिनॉइड लिए होते हैं.

हमारे शरीर के अंदर एक कैनेबिनॉइड बनता है, जिसका नाम है Anandamide (एनंडेमाइड). इसका नाम संस्कृत शब्द ‘आनंद’ से आता है. कई बार दौड़ने या एक्सरसाइज करने के बाद बहुत आनंद आता है. इसे Runners High कहा जाता है. यानी दौड़ने से हाई हो जाना. ये रनर्स हाई का अनुभव हमें एनंडेमाइड के कारण होता है, जिसे हमारा शरीर खुद ही बनाता है.

एक कमाल की बात बताएं? कैनेबिस में मौजूद THC इस एनंडेमाइड की नकल करता है. जब कोई गांजा फूंकता है, तो उसके खून से होते हुए ये कैनेबिनॉइड दिमाग तक पहुंच जाते हैं. दिमाग़ के जिन हिस्सों में कैनेबिनॉइड रिसेप्टर्स की मात्रा ज़्यादा होती है, उन हिस्सों में ज़्यादा असर होता है. हमारे ब्रेन के तीन हिस्से हैं, जहां कैनेबिनॉइड रिसेप्टर अच्छी खासी मात्रा में होते हैं- Hippocampus (हिपोकैंपस), Cerebellum (सेरेबेलम) और Basal Ganglia (बेसल गैंग्लिया).

जब THC और CBD जैसे कैनेबिनॉइड इन हिस्सों में जाते हैं, तो इनसे जुड़े हमारे ब्रेन के फंक्शन प्रभावित होते हैं. जैसे कि शॉर्ट-टर्म मेमोरी, को-ऑर्डिनेशन, लर्निंग, प्रॉब्लम सॉल्विंग. लोगों को प्लेज़र भी महसूस होता है, यानी मज़ा आता है. टाइम पर्सेप्शन हिल जाता है. ये सब इफेक्ट्स हर किसी के लिए अलग-अलग होते हैं. लेकिन ये सब तो फूंकने के दौरान होता है. यानी शॉर्ट-टर्म इफेक्ट्स हैं. गांजा फूंकने के लॉन्ग टर्म इफेक्ट्स क्या हैं. इसके नुकसान क्या हैं?

 

दिमाग पर क्या असर पड़ता है?

गांजा फूंकने से होने वाले नुकसान पर बहुत लिमिटेड रिसर्च है. इसके अवैध होने के कारण. ये अलग-अलग लोगों पर अलग असर करता है. लेकिन एक बात पक्की है. कम उम्र में गांजे सेवन करने वालों का ब्रेन बुरी तरह प्रभावित हो सकता है. जब तक हम 20 साल के नहीं होते, हमारा दिमाग़ पूरी तरह डेवेलप नहीं होता. कई स्टडीज़ में पाया गया है कि टीन-एज यानी किशोर अवस्था में गांजा फूंकने वालों की कॉग्निटिव एबिलिटी पर बुरा असर पड़ सकता है.

 

यूएस के National Academies of Sciences, Engineering, and Medicine ने मैरुआना की रिसर्च का रिव्यू किया. इसमें पाया गया कि गांजे का सेवन कुछ लोगों के लिए ख़तरनाक साबित हो सकता है. कौन लोग? वो जिन्हें सांस संबंधी समस्या है या प्रेंग्नेंट महिलाएं या वो जिनमें मेंटल हेल्थ डिसऑर्डर डेवलप होने का रिस्क हैं. यानी ये बिगड़ते मानसिक स्वास्थ्य को और बिगाड़ सकता है. साथ ही इसका अत्यधिक सेवन करने से इस पर निर्भरता बढ़ती है. यानी इसके बिना रहना अजीब लगता है.

National Academies के रिसर्च रिव्यू ने इसके मेडिकल बेनिफिट्स भी बताए. इस रिपोर्ट के मुताबिक़, क्रॉनिक पेन, नॉसिया, वॉमिटिंग जैसी कई दिक़्क़तों में इसके मेडिकल बेनिफिट के पुख्ता प्रमाण देखे गए हैं. दूसरी बीमारियों में भी इसके बेनिफिट बताए जाते हैं. लेकिन अभी और रिसर्च की ज़रूरत है.

 

लीगल होना चइए कि नहीं होना चइए?

पिछले कुछ साल में कैनेबिस लीगल करने को लेकर बहस तेज़ हुई है. इसके लीगलाइज़ेशन की मांग के पीछे के तर्क भी जान लेने चाहिए.

दिल्ली और मुंबई गांजे के मामले में दुनिया के टॉप 10 शहरों में हैं. बैन होने के बावजूद गांजा बिक तो रहा ही है. बल्कि इसके अवैध होने से नुक़सान ये हो रहा है कि लोग किस गांजे का सेवन कर रहे हैं, उन्हें पता तक नहीं.

जहां गांजा लीगल है, वहां उनके पैकेट पर THC और CBD की मात्रा लिखी होती है. उसे देखकर लोग अपनी क्षमता, मूड, समय और मौके के मुताबिक इसका नशा करते हैं. पिछले दशकों में अंडरग्राउंड बिकने वाले गांजे में THC की मात्रा बढ़ी ही है. यानी लोग पहले से भी ज़्यादा नशीला माल फूंक रहे हैं. ये लोगों को और एडिक्ट बना सकता है. कई केस में मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर भी डाल सकता है. जैसे शराब पीने वालों को पता होता है कि उनके पेय में कितनी मात्रा में एल्कोहॉल है, वैसे ही गांजे वालों को भी ये पता होना चाहिए कि उनके स्टफ में कितना THC है.

दूसरा तर्क ये है कि गांजा शराब और सिगरेट से कम डेडली है. और इसके तो मेडिकल बेनिफिट्स भी हैं. गांजे के ओवरडोज़ से अब तक किसी की मौत दर्ज नहीं हुई है, जैसा कि हर साल शराब और दूसरे ड्रग्स से होना आम बात है. कई स्टडीज़ में ये सामने आया है कि गांजे की तुलना में शराब ज़्यादा एडिक्टिव है. तुलनात्मक रूप से शराब से होने वाले रोड एक्सिडेंट और हिंसक व्यवहार के चांस भी ज़्यादा हैं. कैनिबिस सपोर्टर्स का कहना है कि शराब और सिगरेट से कम अवगुण होने के बावजूद इसे अवैध बनाए रखना समझ से परे है.

2017 में एक स्टडी ने पाया गया कि अमेरिका के राज्यों में मेरुआना लीगल होने बाद एल्कोहॉल की बिक्री में 15% की गिरावट आई. ऐसा मानना है कि गांजे के लीगल होने से एल्कोहॉल, टोबेको और फ़ार्मा कंपनियों का शेयर कम हो जाएगा. हालांकि इस पर शोधकर्ताओं का मत बंटा हुआ है.

 

एक तर्क ये भी है कि इसके लीगलाइज़ेशन से सरकार के पास टैक्स का एक और सोर्स हो जाएगा.

पिछले बरसों में दुनिया के कई हिस्सों में मैरुआना ने लीगल स्टेटस हासिल किया है. कहीं मेडिकल यूज़ के लिए, तो कहीं रीक्रिएशनल यूज़ के लिए. यानी मौज-मस्ती के लिए. आपको स्क्रीन पर जो नक़्शा नज़र आ रहा है, उसमें हरा इलाक़ा मेडिकल यूज़ वाला है. नीला इलाक़ा मेडिकल और रीक्रिएशनल, दोनों के लिए है. और इंडिया समेत बाक़ी ग्रे इलाक़े में ये बैन है.


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adminSeptember 10, 20201min3990

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी ईपीएफओ वित्त वर्ष 2019-20 के लिए EPF पर 8.5 फीसदी ब्याज देगा. ईपीएफओ बोर्ड ने मार्च में ही 2019-20 के लिए 8.5 प्रतिशत ब्याज देने का फैसला लिया था. बुधवार, 9 सितंबर को संगठन ने ग्राहकों के खाते में पिछले वित्त वर्ष के लिए 8.15 फीसदी ब्याज देने का फैसला किया. बाकी 0.35 फीसदी ब्याज दिसंबर के महीने में मिलेगा. इसका असर छह करोड़ करोड़ लोगों पर पड़ेगा. मार्च में EPFO ने कमाई का जो अनुमान लगाया था, कोरोना वायरस की वजह से उस पर असर पड़ा है.

एक साल पहले यानी वित्त वर्ष 2018-19 की बात करें, तो EPF पर 8.65 फीसदी ब्याज मिला था. वित्त वर्ष 2017-18 में भी 8.55, जबकि 2016-17 में 8.65 फीसदी ब्याज मिला था.

करोना के समय इस साल अप्रैल से अगस्त तक ईपीएफओ ने 94.41 लाख क्लेम सेटल किए. 35,445 करोड़ रुपए का भुगतान किया. कोरोना और लॉकडाउन के दौरान अपने सदस्यों को कैश संकट से बचाने के लिए सेटलमेंट का फास्ट ट्रैक तरीका अपनाया.


क्या होता है ईपीएफओ?

कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी ईपीएफओ साल 1951 में बना. कर्मचारियों के लिए. इसके ऑफिस में ऐसी सभी कंपनियों को अपना रजिस्ट्रेशन कराना होता है, जहां 20 से ज्यादा कर्मचारी काम करते हैं. हर कंपनी के लिए ये ज़रूरी होता है कि वो कर्मचारियों का एक पीएफ खाता खुलवाए. और फिर उसमें कुछ पैसा जमा कराए. इसका मकसद निजी कंपनियों में काम करने वाले कर्मचारियों को एक सामाजिक सुरक्षा देना है. मतलब ये कि इस पैसे से कर्मचारियों के भविष्य की जरूरतों के लिए कुछ पैसों की बचत हो जाती है.

 

कैसे जमा होता है पैसा?

किसी भी कंपनी में काम करने वाले कर्मचारी का हर महीने कुछ पैसा काटा जाता है. ये बेसिक सैलरी का 12 फीसदी होता है. इसमें इतना ही योगदान यानी 12 फीसदी पैसा कंपनी की तरफ से दिया जाता है. कर्मचारी के हिस्से की 12 फीसदी रकम उसके ईपीएफ खाते में जमा हो जाती है. जबकि कंपनी के हिस्से में से केवल 3.67 फीसदी ही कर्मचारी के ईपीएफ खाते में जमा होता है. बाकी 8.33 परसेंट रकम कर्मचारी पेंशन योजना यानी ईपीएस में जमा हो जाती है. कर्मचारी अपनी बेसिक सैलरी में से 12 फीसदी से ज्यादा रकम भी कटा सकता है. इस पर भी टैक्स छूट मिलती है. मगर कंपनी केवल 12 फीसदी का ही योगदान करती है. ईपीएफ में बैंक की तरह नामांकन की भी सहूलियत होती है. कर्मचारी के साथ कैजुअल्टी की दशा में नॉमिनी को सारा पैसा मिल जाता है.

 

कितनी पेंशन मिलती है?

जैसा पहले बताया कि कंपनी के हिस्से की 8.33 फीसदी रकम पेंशन स्कीम में जाती है. कर्मचारी को 58 साल के उम्र के बाद पेंशन मिलती है. इसके लिए 10 साल नौकरी ज़रूरी है. पेंशन 1000 रुपए से 3250 रुपए महीने तक हो सकती है. ये पेंशन खाताधारक को आजीवन मिलती है.

 

एडवांस पैसा निकालने का क्या तरीका है?

पीएफ खाते से पैसा निकाला भी जा सकता है. कर्मचारी खुद की या परिवार में किसी की बीमारी पर सैलरी का छह गुना पैसा निकाल सकते हैं. कर्मचारी अपनी शादी में या परिवार में किसी की शादी या पढ़ाई के लिए जमा रकम का 50 फीसदी निकाल सकता है. होम लोन चुकाने के लिए सैलरी का 36 गुना पैसा पीएफ से मिल जाता है. घर की मरम्मत के लिए सैलरी का 12 गुना और घर खरीदने के लिए भी पैसा निकाल सकते हैं.


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adminSeptember 9, 20201min4010

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है. इस वीडियो में तीन-चार लोग एक महिला को घेरकर खड़े हैं. इसी वीडियो में महिला चीखकर कहती है, ‘आई विल पुट यू ऑन अ रेप केस’ (मैं तुम पर रेप का केस लगा दूंगी).

वीडियो में गालियां हैं. इसलिए हम उसे यहां नहीं लगा रहे.

 

वायरल वीडियो का एक स्क्रीनशॉट. (तस्वीर: ट्विटर)

 

क्या है पूरा मामला

हमने बात की प्रिया आर्या से. ये एक्टिविस्ट हैं. इन्होंने इस मामले में बेंगलुरु पुलिस के पास शिकायत दर्ज कराई है. उन्होंने बताया कि वीडियो में दिख रही महिला का नाम संगीता है. प्रिया के मुताबिक़, संगीता के पति का बिजनेस है, जिससे जुड़े लोन के सिलसिले में पेमेंट मांगने ये लोग आए थे, जो वीडियो में दिख रहे हैं. उनको धमकाते हुए संगीता कह रही हैं कि वो उस व्यक्ति पर रेप चार्ज लगाएंगी.

मामला पुराना है. पिछले साल का. लेकिन ये वीडियो अब वायरल हो रहा है.

 

कानून क्या कहता है?

भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 में बलात्कार के अपराध की सजा बताई गई है. इसमें रेप करने वाले अपराधी के लिए कम से कम सात साल की सज़ा का प्रावधान है. कुछ मामलों में ये सजा मिनिमम 10 साल की भी हो सकती है.

NCRB ( नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो) के अनुसार, रेप के दर्ज मामलों में हर चौथी विक्टिम नाबालिग होती है. यही नहीं, लगभग 94 फीसदी मामलों में रेप करने वाले अपराधी विक्टिम के जान-पहचान वाले होते हैं. लब्बोलुआब ये कि बलात्कार की समस्या गंभीर है. और ये डेटा तो तब है, जब रेप के कई मामले रिपोर्ट ही नहीं हो पाते. ऐसे में फॉल्स रेप केस लगाने की बात कहना एक गंभीर मुद्दे की ओर ध्यान खींचता है.

 

(सांकेतिक तस्वीर)

 

फॉल्स रेप केस के मामले में क्या होता है?

ये समझने के लिए हमने बात की अश्विन पंतुला से. ये लॉयर हैं. इन्होंने बताया कि अगर किसी व्यक्ति पर रेप केस के झूठे चार्ज लगते हैं, तो उसके पास तीनों स्थिति में ऑप्शन होते हैं :

पहला, अरेस्ट होने के पहले.

दूसरा, चार्जशीट फ़ाइल होने के बाद.

तीसरा, बरी होने के बाद.

 

अगर किसी व्यक्ति को ऐसा लगता है कि उसके खिलाफ ऐसा चार्ज लगाया जा सकता है, तो वो पहले ही एक्शन लेकर खुद को तैयार कर सकता है इस मामले से डील करने के लिए. ऐसा कई मामलों में नहीं हो पाता. लेकिन फिर भी इन ऑप्शन में क्या होता है, आप  यहां समझ लीजिए.

अरेस्ट होने से पहले आप अग्रिम जमानत (anticipatory bail) के लिए याचिका दाखिल कर सकते हैं, ताकि पुलिस कस्टडी में आपको परेशान न किया जाए.

अरेस्ट होने या चार्जशीट फ़ाइल होने के बाद दो ऑप्शन होते हैं-

 

(1) पहला, कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीडिंग (CrPC) के सेक्शन 482 के तहत एप्लीकेशन दी जा सकती है. FIR में लगी आपराधिक कार्यवाही (criminal proceedings) को खारिज कराने की. अगर आरोपी ये साबित कर दे कि उसके खिलाफ प्रथम दृष्टतया (Prima Facie) कोई केस नहीं बनता. या फिर ये सुबूत दे कि आरोप बिल्कुल असम्भाव्य हैं. या ये साबित कर दे कि ये पूरी प्रक्रिया उसे परेशान करने की बुरी नीयत के साथ शुरू की गई है. अगर हाई कोर्ट को ये लगता है कि एप्लीकेशन देने वाला व्यक्ति इन में से किसी भी शर्त को पूरा करता है, तो वो अपने अधिकार के तहत FIR की आपराधिक कार्यवाही को खारिज कर सकता है.

 

(2) दूसरा. हाई कोर्ट के सामने रिट याचिका दायर करना. ये उन मामलों में होता है, जब ये आशंका हो कि इस मामले में पुलिस या निचली अदालत के साथ मिलकर आरोपी पर कार्यवाही की जा रही है. हाई कोर्ट संबंधित अधिकारियों के लिए आदेश जारी कर सकता है कि वो अपनी ड्यूटी उचित रूप से निभाएं. या फिर वो रिट ऑफ प्रोहिबिशन (निषेधाज्ञा का अधिकार) जारी कर निचली अदालत में चल रही आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगा सकता है. इसके लिए भारतीय संविधान का अनुच्छेद 226 अदालत को इजाज़त देता है.

 

बरी होने के बाद व्यक्ति के पास क्या विकल्प हैं?

अगर किसी पर ऐसा झूठा आरोप लगता है, और कोर्ट उसे बरी कर दे, तो उसके बाद किसी भी व्यक्ति के पास कानूनन ये विकल्प होते हैं:

1. IPC की धारा 211 के तहत मामला. इस धारा के तहत व्यक्ति FIR दर्ज करवा सकता है. इस आरोप के साथ कि उसके खिलाफ झूठी आपराधिक कार्यवाही शुरू की गई, उसे नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से. इस मामले में सात साल तक की जेल हो सकती है.

2. IPC की ही धारा 182. इस धारा के अनुसार उन लोगों को सजा दी जाती है, जो किसी भी नागरिक अधिकारी को झूठी जानकारी देते हैं, किसी निर्दोष व्यक्ति को फंसाने के लिए. इसमें अधिकतम छह महीने की जेल हो सकती है.

3. IPC की धारा 499- 500 के तहत आपराधिक मानहानि (क्रिमिनल डिफेमेशन) का मुकदमा दायर किया जा सकता है. इसमें अधिकतम दो साल की जेल होती है.

4. मानहानि का सिविल मुकदमा भी दायर करना एक विकल्प है. इसमें जिस व्यक्ति पर आरोप लगे, वो अपनी इज्जत को हुए नुकसान के लिए आर्थिक मुआवजे की मांग कर सकता है. मुआवजे की कीमत इस बात पर निर्भर करती है कि उस व्यक्ति की समाज में क्या स्थिति थी.

बेंगलुरु के संगीता मामले में प्रिया आर्या ने जानकारी दी है. कि इस मामले को लेकर संगीता ने सोशल मीडिया पर वादा किया था कि वो लाइव आकर पूरी जानकारी देंगी. लेकिन संगीता ने कथित रूप से अपने सभी सोशल मीडिया अकाउंट डिसएबल कर दिए हैं.


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adminSeptember 4, 20202min4050

यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछ लें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.

PCOS. यानी पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (Polycystic ovary syndrome). ये एक मेडिकल कंडीशन है जिससे हिंदुस्तान में हर 10 में से एक औरत जूझ रही है. अगर मैं गिनूं तो मेरी ही जान-पहचान में छह ऐसी औरतें है जिन्हें PCOS है. PCOS में क्या हाल हो जाता है, ये उस लड़की से जानिए, जो इससे जूझ रही है.

 

नाम-अदिति (बदला गया है)
उम्र-30
पेशा- मीडिया प्रोफेशनल

मुझे 10 साल पहले पता चला मुझे PCOS है. दो-दो, तीन-तीन महीने तक पीरियड्स नहीं आते थे. जब पीरियड्स नहीं आते तो चेहरे पर, सिर पर बड़े-बड़े दर्द वाले दाने हो जाते. दवाई लेने पर कुछ महीने तक सब ठीक रहता. उसके बाद फिर से दिक्कत होने लगती. PCOS की वजह से वज़न बहुत तेज़ी से बढ़ता है. छोटी-छोटी चीज़ों से इरिटेशन होती है. PCOS पता चलने के बाद मैंने नोटिस किया कि मेरे चेहरे पर भी बाल आने लग गए हैं. बहुत ज़्यादा दाढ़ी जैसे नहीं आते हैं पर प्लकर से खींच कर निकालना पड़ता है हर हफ़्ते.

अंदाज़ा तो लग ही गया होगा कि कितनी परेशानी होती है!

तो हमने बात की डॉक्टर ध्रुपती डेढ़िया से. वो मुंबई की क्रिटीकेयर अस्पताल स्त्रीरोग विशेषज्ञ हैं. डॉक्टर डेढ़िया ने जो जानकारी हमें दी वो हम आपको बता रहे हैं, ताकि ये हर लड़की और औरत के काम आ सके. हम PCOS से जुड़े कुछ ज़रूरी सवालों के जवाब यहां देंगे.

 

PCOS क्या है?

PCOS ओवरी की बीमारी का नाम है. ओवरी का एक ही काम होता है अंडा बनाना. आदर्श स्थिति में 28 दिन का पीरियड साइकल होता है. इसमें ओवरी में अंडा बनता है, फिर ओवरी से बाहर निकलता है और पीरियड के रूप में शरीर से बाहर निकल जाता है. जब एक अंडे के बदले बहुत सारे अंडे बनने शुरू हो जाते हैं, तो एक भी अंडा ठीक से डेवलप नहीं हो पाता. इन अंडर डेवलप्ड अंडों को सिस्ट कहते हैं. ये सिस्ट ओवरी के अंदर ही रह जाते हैं. इस वजह से इस कंडीशन को पॉलिसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम कहते हैं. यानी ओवरी में बहुत सारे सिस्ट वाली बीमारी.

 

बाएं तरफ नार्मल ओवरी. दाईं तरफ़ PCOS से ग्रसित ओवरी.

 

लेकिन इससे होता क्या है?

अंडा बनाने के दौरान ओवरी एस्ट्रोजन नाम का हॉर्मोन बनाती है. अंडा जब भी ओवरी के बाहर आता है तब प्रोजेस्टेरॉन नाम का दूसरा हॉर्मोन बनता है. रेगुलर पीरियड आने के लिए इन दोनों हॉर्मोन्स की मात्रा में संतुलन ज़रूरी होता है. लेकिन PCOS में चूंकि कई अंडे बनते जाते हैं तो एस्ट्रोजन बहुत ज्यादा बनता है. लेकिन ये ओवरी से बाहर नहीं निकल पाते ऐसे में प्रोजेस्टेरॉन नहीं बन पाता है. यानी दोनों हॉर्मोन्स का बैलेंस बिगड़ जाता है. एस्ट्रोजन ज्यादा, प्रोजेस्टेरॉन कम. इससेः

-एस्ट्रोजन बढ़ने से औरत का वज़न बढ़ने लगता है.

-प्रोजेस्टेरॉन रिलीज़ नहीं होने के चलते पीरियड रेगुलर नहीं आते.

– पीरियड रेगुलर नहीं होंगे तो प्रेग्नेंसी में प्रॉब्लम हो सकती है.

-टेस्टेस्टेरॉन एक और हॉर्मोन है जिसकी हल्की सी मात्रा हर औरत में होती है. लेकिन पीरियड इर्रेगुलर रहता है तो इसकी मात्रा भी बढ़ जाती है, इससे चेहरे पर बाल आते हैं. सिर के बाल झड़ने लगते हैं.

 

लेकिन ये PCOS होता क्यों है?

– थायरॉइड. इसके बारे में हम पहले डिटेल में बात कर चुके हैं. जब किसी को हाइपो थायरॉइड होता है, यानी शरीर में थायरॉइड हॉर्मोन की मात्रा कम हो जाती है तो ओवरी ठीक से फंक्शन नहीं कर पाती है.

-अगर इंसुलिन की मात्रा ज़्यादा या कम रहती है तो ओवरी पर असर पड़ता है

– हमारी किडनी के ऊपर एक एड्रेनल ग्लैंड होता है. इसका काम होता है टेस्टेस्टेरॉन हॉर्मोन बनाना. अगर ये हॉर्मोन ज्यादा बनने लग जाए तो ओवरी का काम प्रभावित होता है.

– हमारे ब्रेन में पिट्यूटरी नाम का एक ग्लैंड होता है. इस ग्लैंड से प्रोलैक्टिन हॉर्मोन निकलता है. स्ट्रेस या ट्यूमर की वजह से इस हॉर्मोन की मात्रा कई बार बढ़ जाती है. इस वजह से भी ओवरी ठीक से फंक्शन नहीं कर पाती.

– जेनेटिक कारण.

-लाइफस्टाइल की दिक्कतें. जैसे जंक फूड खाना . एक्सरसाइज़ न करना. बहुत स्ट्रेस लेना.

 

अगर आपको PCOS है तो आपको जंक फ़ूड से थोड़ा दूर ही रहना पड़ेगा.

 

कैसे पता चलता है कि PCOS है?

– पीरियड्स की दिक्कत होने पर सोनोग्राफी करते हैं. इससे पता चलता है कि ओवरी का साइज़ ठीक है या नहीं. साइज़ बढ़ा होने पर डॉक्टर हॉर्मोन टेस्ट करवाने को कहते हैं.

– हॉर्मोन टेस्ट के लिए ब्लड का सैम्पल लिया जाता है. इसमें टेस्टेस्टेरॉन, प्रोजेस्टेरॉन लेवल्स चेक किए जाते हैं. लेवल ऊपर नीचे आने पर हॉर्मोनल ट्रीटमेंट शुरू करते हैं.

 

इसका इलाज क्या है?

– इसमें डॉक्टर या तो प्रोजेस्टेरॉन सप्लीमेंट देते हैं ताकि एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरॉन का संतुलन सही हो जाए या गर्भ निरोधक गोलियों के अलग-अलग डोसेज देते हैं. ये दवाएं एक पूरे साइकल के हिसाब से आती हैं. इससे पीरियड रेगुलर हो जाता है.

– पीसीओएस के निपटने का दूसरा और लॉन्ग टर्म में बेनिफिट देने वाला तरीका है लाइफस्टाइल में बदलाव करने का. इसमें डॉक्टर एक्सरसाइज़ करने और हेल्दी खाना खाने की एडवाइज़ देते हैं.

-थायरॉइड या इंसुलिन रेजिस्टेंस को दवाओं से ठीक किया जा सकता है.

 

PCOS को कंट्रोल करने के लिए हॉर्मोन की दवाइयां दी जाती हैं. ये एक्ने, चेहरे पर बाल, वेट गेन पर रोकथाम के लिए भी असरदार है.

 

अब आते हैं PCOS के लिए सबसे ज़रूरी चीज़, यानी डायट पर

PCOS में आपको अपने खाने-पीने का ख़ास ख़याल रखना होगा. क्या चीज़ें आपको अपनी डाइट में रखनी हैं, क्या नहीं. ये हमें बताया डायटीशियन श्रेया ने.

-प्रोटीन और फाईबर अपनी डाइट में ज़्यादा करें

-ऐसा दूध जिसमें एंटी बायोटिक या ग्रोथ हॉर्मोन मिला हो वो नहीं लेना चाहिए

-अपनी डाइट में रागी, ज्वार, बाजरा लें

-केला, आम वगैरह ज़्यादा न खाएं क्योंकि इस कंडीशन में आपको डायबिटीज़ जैसा रिस्ट्रिक्शन करना है

इन डाइट टिप्स का ख़ास ख़याल रखिएगा.


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adminSeptember 3, 20203min4210

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह रूस की राजधानी मास्को गए हैं. क्यों? शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (SCO) की रक्षा मंत्रियों की बैठक में हिस्सा लेने के लिए. तीन दिवसीय दौरे में वो रूस के रक्षा मंत्री सर्गेई शोइगू समेत संगठन के सदस्य देशों के रक्षा मंत्रियों और अधिकारियों से मुलाकात करेंगे. आतंकवाद, उग्रवाद और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर बातचीत होगी. ये बैठक भारत-चीन के बीच लद्दाख में जारी तनाव के बीच हो रही है. दोनों ही देश इस संगठन के सदस्य हैं और बैठक में चीन के रक्षा मंत्री जनरल वेई फेंग भी शामिल होंगे. हालांकि रिपोर्ट के मुताबिक, राजनाथ सिंह के साथ उनकी मुलाकात तय नहीं है.

इस बीच सवाल है कि शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (SCO) क्या है? इसका काम क्या है? कौन से देश इस संगठन के सदस्य हैं? इससे भारत को क्या फायदा है?

 

SCO और उसके सदस्य देश

दुनियाभर के कई देश कूटनीतिक मसलों में एक-दूसरे की मदद करते हैं या ऐसा करने का वादा करते हैं. आपसी सहयोग के लिए उन्होंने संगठन बना रखे हैं. अलग-अलग समय पर इन देशों के मुखिया या उनके प्रतिनिधि आपस में मिलते हैं. बतियाते हैं. सुझाव देते हैं. भविष्य को लेकर करार करते हैं. ऐसा ही एक संगठन है- शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (SCO) या शंघाई सहयोग संगठन.

शंघाई चीन का शहर है. 15 जून, 2001 को यहां शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (SCO) बनाने का ऐलान किया गया. तब इसमें छह देश थे- किर्गिस्तान, कज़ाकिस्तान, रूस, ताजिकिस्तान और उज़्बेकिस्तान. 2017 में इसमें भारत और पाकिस्तान भी शामिल हो गए.

 

अब आठ देश इसके स्थायी सदस्य हैं.

मुख्य तौर पर सदस्य देशों के मुखिया SCO समिट में मिलते हैं. 2019 में किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में SCO समिट हुई थी, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हिस्सा लिया था. इसमें पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान भी शामिल हुए थे, लेकिन दोनों की मुलाकात नहीं हुई थी.

 

2019 में किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों का SCO सम्मेलन. फाइल फोटो: India Today

 

कहां-कहां हैं ये देश?

इन आठ देशों की लोकेशन की वजह से इस संगठन को यूरेशियाई देशों का संगठन कहा जाता है. यूरेशिया मतलब यूरोप प्लस एशिया. रूस एशिया और यूरोप, दोनों का हिस्सा है. पांच देश- किर्गिस्तान, कज़ाकिस्तान, ताजिकिस्तान और उज़्बेकिस्तान मध्य एशिया में हैं. चीन पूर्वी एशिया में है. भारत और पाकिस्तान, दोनों दक्षिण एशिया में हैं. इन्हें नक्शे में देखिए-

 

मध्य एशिया में पांच देश आते हैं- कज़ाकिस्तान, किरगिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज़्बेकिस्तान. (फोटो: गूगल मैप्स

 

संगठन का काम क्या है?

SCO का मकसद राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य मामलों में के देश एक-दूसरे की मदद करना है. इन्होंने जो लक्ष्य तय किए हैं, वो ये हैं-

– सदस्य देशों के बीच आपसी भरोसा मजबूत करना
– जो सदस्य पड़ोसी हैं, उनके बीच पड़ोसी की भावना बढ़ाना
– राजनीति, व्यापार, अर्थव्यवस्था, रिसर्च, तकनीक और संस्कृति जैसे क्षेत्रों में असरदार सहयोग
– शिक्षा, ऊर्जा, परिवहन, पर्यटन, पर्यावरण से जुड़े मुद्दों में भी आपसी सहयोग बढ़ाना
– शांति, सुरक्षा और स्थिरता का माहौल बनाए रखने के लिए पारस्परिक हिस्सेदारी
– लोकतांत्रिक, निष्पक्ष और तर्कसंगत राजनीतिक और आर्थिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाने की कोशिश

 

स्थायी सदस्यों के अलावा SCO के साथ कौन है?

शंघाई सहयोग संगठन के चार ऑर्ब्जवर देश हैं. ये चारों हैं- अफगानिस्तान, ईरान, बेलारूस और मंगोलिया. ये देश सदस्य देशों के आस-पास हैं और इस पूरे क्षेत्र की सुरक्षा और लिंकेज के हिसाब से अहम हैं. इनके अलावा SCO में छह डायलॉग पार्टनर भी हैं- अज़रबैजान, आर्मेनिया, कंबोडिया, नेपाल, तुर्की और श्रीलंका.

 

भारत के लिए SCO की अहमियत क्या है?

पाकिस्तान के साथ भारत के संबंध अच्छे नहीं हैं. चीन से लद्दाख में झगड़ा चल ही रहा है. मगर इन दोनों के अलावा SCO के दूसरे सदस्यों के साथ भारत की अच्छी बनती रही है. खासकर रूस और मध्य एशियाई देशों से.

मध्य एशिया के देशों के लिए भारत की नीति है- कनेक्ट सेंट्रल एशिया पॉलिसी. इसके अलावा रूस, कज़ाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज़्बेकिस्तान को मिला दें, तो दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा प्राकृतिक गैस और तेल का भंडार बनता है. तुर्कमेनिस्तान के पास दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा और उज़्बेकिस्तान के पास आठवां सबसे बड़ा गैस भंडार है. कज़ाकिस्तान और उज़्बेकिस्तान के पास यूरेनियम भी है. अगर इनके साथ भारत का करार हो, तो कम लागत में हमें तेल और गैस की सप्लाई मिल सकती है.

 

मध्य एशिया से हमारे रिश्ते कैसे हैं?

SCO के पांच मध्य एशियाई देश भारत के विस्तृत पड़ोस का हिस्सा हैं. इनके साथ हमारे रिश्ते पुराने हैं. भारत के कुषाण साम्राज्य के राजा कनिष्क को वहां के लोग अपना पूर्वज मानते हैं. कनिष्क का राज भारत के अलावा मध्य एशिया में भी फैला था. इसी मध्य एशिया के सिल्क रूट की राह कई यात्री भारत आए. न केवल व्यापार, बल्कि धर्म और संस्कृति में भी कई कनेक्शन हैं. आज भी हिंदी फिल्में और इनके गाने मध्य एशियाई देशों में काफी पसंद किए जाते हैं.

 

सोवियत के दौर में इनसे कैसा संबंध था?

कज़ाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज़्बेकिस्तान- ये सब सोवियत का हिस्सा हुआ करते थे. सोवियत के साथ भारत के संबंध अच्छे थे. जब दुनिया के एक बड़े प्रभावी हिस्से ने सोवियत से दूरी बनाई हुई थी, उस दौर में भी मध्य एशिया के इन पांचों मुल्कों के साथ भारत के अच्छे ताल्लुकात थे. बल्कि 1965 में भारत-पाकिस्तान के बीच जंग में संघर्ष-विराम होने के बाद दोनों देश समझौते के लिए उज़्बेकिस्तान की ही राजधानी ताशकंद में पहुंचे थे.

भारत बेहद गिने-चुने देशों में था, जिसका ताशकंद में अपना एक दूतावास हुआ करता था. सोवियत खत्म होने के बाद भारत और मध्य एशियाई देशों में थोड़ी दूरी आ गई. लेकिन अब ये देश प्राकृतिक संसाधनों के बल पर मजबूत हो गए हैं.

 

ताशकंद समझौते के समय की तस्वीर. लालबहादुर शास्त्री और अयूब खान, दोनों साथ खड़े हैं. इस तस्वीर के कुछ ही घंटों बाद शास्त्री की मौत हो गई. फाइल.

 

SCO से भारत को और क्या फायदे हैं?

मध्य एशिया से भारत की सीमा नहीं लगती. न ही उन तक पहुंचने के लिए समंदर का सीधा कोई रास्ता है. भारत के लिए मध्य एशिया तक पहुंचने का सबसे छोटा रास्ता पाकिस्तान और अफगानिस्तान से होकर जाता है. पाकिस्तान से हमारे रिश्ते ठीक नहीं हैं. दूसरा, अफगानिस्तान बेहद अस्थिर और असुरक्षित समझा जाता है. व्यापार और कारोबार के लिए बस लिंक और नेटवर्क नहीं, सुरक्षा भी चाहिए.

इसी की कमी के कारण TAPI (तुर्कमेनिस्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, इंडिया) जैसी अहम गैस पाइपलाइन योजना लटकी हुई है. 1,814 किलोमीटर लंबी ये पाइपलाइन तुर्कमेनिस्तान से शुरू होकर अफगानिस्तान और पाकिस्तान होते हुए भारत तक पहुंचेगी. चारों देशों ने 2010 में इसके समझौते पर दस्तखत किए. 2020 में इसके शुरू होने की बात थी, मगर ये कब हो पाएगा, पता नहीं. अब SCO में चीन और पाकिस्तान दोनों हैं. दोनों देशों से हमारी खटपट है. ऐसे में ये योजना कब भारत पहुंचेगी, ये फिलहाल कह पाना मुश्किल है. बातचीत से कोई रास्ता निकल पाए, तो भारत को काफी फायदा हो सकता है.


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adminSeptember 2, 20201min3220

फ़ेसबुक ने कुछ वक़्त पहले ब्राज़ील के ऐप स्टोर से अपने ‘लाइट’ ऐप को ग़ायब कर दिया. इसका कहना था कि ज़्यादा लोग इस्तेमाल नहीं कर रहे थे इसलिए इसे हटा लिया गया. मगर ऐप्स के लाइट वर्ज़न होते क्यों हैं?

आपने गूगल प्ले स्टोर और ऐपल के ऐप स्टोर पर भी बहुत से ऐप्स के ‘लाइट’ वर्ज़न देखे होंगे जैसे ट्विटर लाइट, स्पॉटिफ़ाई लाइट, ऊबर लाइट, वग़ैरह-वग़ैरह. इसके साथ ही कुछ ऐप्स के ‘बीटा’ वर्ज़न भी मौजूद रहते हैं जैसे वॉट्सऐप बीटा और क्रोम बीटा. आज हम आपको इन लाइट और बीटा ऐप्स का खेल बताएंगे.

 

क्या होते हैं ‘लाइट’ ऐप्स?

जैसा कि नाम से ही पता चल रहा है, ‘लाइट’ ऐप्स असली वाले ऐप का हल्का-फुल्का वर्ज़न होते हैं. यानी इनका साइज़ कम होता है. इनमें सारे फीचर नहीं होते, बस बेसिक फीचर होते हैं. एक ऐप में जैसे-जैसे फ़ीचर बढ़ते हैं, ऐप भारी होने लग जाता है. मतलब इसका साइज़ बढ़ जाता है और ये फ़ोन के प्रोसेसर और रैम पर ज़्यादा लोड डालने लग जाते हैं.

नए स्मार्टफ़ोन तो इसको आराम से झेल लेते हैं मगर पुराने फ़ोन और एंट्री-लेवल स्मार्टफ़ोन को अम्मा-अब्बा और नाना-नानी सब याद आ जाते हैं. इसी का एक जीता जागता एग्ज़ाम्पल PUBG मोबाइल लाइट है. असली वाले गेम की तुलना में इसका साइज़ भी छोटा है और ये फ़ोन पर इतना लोड भी नहीं डालता.

 

PUBG मोबाइल लाइट.

 

और तो और भारी भरकम ऐप को सही से काम करने के लिए इंटरनेट की स्पीड भी अच्छी चाहिए होती है. वहीं ऐप्स के लाइट वर्ज़न धीमे इंटरनेट पर भी अच्छे से काम करते हैं. फ़ेसबुक लाइट को ही लेलो, 2G इंटरनेट स्पीड पर भी बढ़िया चलता है. तो शॉर्ट में बोलें तो लाइट ऐप्स पुराने या सस्ते स्मार्टफ़ोन के लिए राहत हैं. और धीमे इंटरनेट वालों के साथी.

 

बीटा वर्ज़न क्या होता है?

किसी भी ऐप का बीटा वर्ज़न उसका टेस्टिंग ग्राउंड होता है. जैसे स्कूल में आप मैथ के मुश्किल सवाल को कॉपी कर करने से पहले रफ़ कॉपी पर माथा पच्ची करते रहे होंगे, बस वही रफ़ कॉपी ये बीटा ऐप होते हैं.

जब डेवलपर को ऐप में कोई नया फ़ीचर जोड़ना होता है तो उसकी टेस्टिंग के लिए पहले बीटा वर्ज़न में डालता है. बीटा वर्ज़न चलाने वाले लोग डेवलपर को बताते हैं कि फ़लां-फ़लां गड़बड़ी आ रही है. इसी गड़बड़ी को बग कहते हैं. और डेवलपर जब तक सारे बग का सफ़ाया ना कर दे, तब तक स्टेबल वर्ज़न या नॉर्मल वर्ज़न में अपडेट को नहीं भेजता है.

बीटा ऐप को वही लोग डाउनलोड करते हैं जिनको नए फ़ीचर सबसे पहले चाहिए होते हैं. मगर सारे लोग इसलिए नहीं डालते क्योंकि बीटा ऐप में काफ़ी गड़बड़ी भी होती हैं. हर कोई रफ़ कॉपी से पढ़ना नहीं पसंद करेगा ना.

 

लाइट ऐप और बीटा ऐप कैसे इंस्टॉल करते हैं?

लाइट ऐप तो आप नॉर्मल ऐप की तरह डाउनलोड कर सकते हैं. बस गूगल प्ले स्टोर या ऐपल ऐप स्टोर पर जाइए और इंस्टॉल का बटन दबा दीजिए. कुछ बीटा ऐप्स भी ऐसे ही इंस्टॉल कर सकते हैं. मान लीजिए एंड्रॉयड फ़ोन पर क्रोम का बीटा वर्ज़न इंस्टॉल करना है तो प्ले स्टोर पर क्रोम बीटा लिख कर सर्च करिए और फिर इसे इंस्टॉल कर लीजिए.

मगर कुछ बीटा ऐप्स अलग से ऐप की तरह मौजूद नहीं होते. इनके बीटा प्रोग्राम में आपको एंटर करना होता है, उसके बाद आपका ऐप बीटा वर्जन में कंवर्ट हो जाता है. आप जब इंस्टाग्राम खोलेंगे तो नीचे आपको “जॉइन द बीटा” (Join the beta) लिखा हुआ मिलेगा. यहां पर आप क्लिक करके बीटा वर्ज़न चला सकते हैं. ऐसे ऐप्स का बीटा ऐक्सेस लिमिटेड होता है. अगर बीटा प्रोग्राम फ़ुल होगा तो नीचे आपको यही लिखा हुआ मिलेगा.

ऐपल आइफ़ोन में ऐप्स का बीटा वर्ज़न चलाने के लिए आपको ‘टेस्ट फ़्लाइट’ नाम का ऐप इंस्टॉल करना होगा. आप जिन भी बीटा ऐप्स को चला रहे होंगे वो इसी के अंदर नज़र आएंगे. आइओएस पर बीटा ऐप्स ऐसे ही चलते-फिरते नहीं मिलते. आपके पास उस ऐप के बीटा टेस्टिंग प्रोग्राम का इन्वाइट होना चाहिए. कई बार ये ऐप्स की वेबसाइट पर भी मिल जाता है. इन्वाइट लिंक पर क्लिक करके आपको ‘टेस्ट फ़्लाइट’ सलेक्ट करना होगा. बस इतना ही.

 

बोनस फ़ैक्ट: अल्फ़ा फ़ीचर

अब जब हम बीटा ऐप की बात कर ही रहे हैं तो अल्फ़ा फ़ीचर की भी बात कर लेते हैं. कई बार डेवलपर अपने बीटा ऐप में एक नए फ़ीचर को जोड़ता है, मगर वो नज़र नहीं आता. यानी वो फ़ीचर ऐप में मौजूद है लेकिन बीटा यूज़र उसको इस्तेमाल नहीं कर सकता. ये सिर्फ़ और सिर्फ़ इंटर्नल टेस्टिंग के लिए डाला जाता है. इसी को अल्फ़ा फ़ीचर बोलते हैं.

ऐसा तब किया जाता है जब कोई नया फ़ीचर बेहद ही शुरुआती स्टेज में होता है. जब तक डेवलपर और उसकी टीम ख़ुद इसे टेस्ट करके सैटिस्फ़ाई नहीं हो जाते, तब तक ये बीटा में नहीं आता. फिर बीटा स्टेज में पास होने के बाद फ़ीचर स्टेबल ऐप में आता है.


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adminAugust 31, 20201min2970

क्या आप जानते हैं कि मच्छर (Mosquito) आपका खून क्यों चूसते हैं? उन्हें खून पीने की आदत कैसे पड़ी? इसका जवाब वैज्ञानिकों ने खोज लिया है. वैज्ञानिकों ने इसके पीछे जो वजह बताई है, वो जानकार आप हैरान रह जाएंगे. क्योंकि दुनिया की शुरुआत में मच्छरों को खून पीने की आदत नहीं थी. ये धीरे-धीरे बदलाव आया है.

मच्छरों ने इंसानों और अन्य जानवरों का खून पीना इसलिए शुरू किया, क्योंकि वो सूखे प्रदेश में रहते थे. जब भी मौसम सूखा होता है और मच्छरों को अपने प्रजनन के लिए पानी नहीं मिलता तो वे इंसानों या जानवरों का खून चूसना शुरू कर देते हैं.

न्यू जर्सी की प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने कुछ समय पहले अफ्रीका के एडीस एजिप्टी मच्छरों (aedes aegypti mosquitoes) का अध्ययन किया था. ये वही मच्छर है जिसकी वजह से जीका वायरस फैलता है. डेंगू और पीला बुखार भी इसी कारण होता है. न्यू साइंटिस्ट में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, अफ्रीका के मच्छरों में एडीस एजिप्टी मच्छर की कई प्रजातियां हैं. सारी प्रजातियों के मच्छर खून नहीं पीते. ये कई अन्य चीजों को खा-पीकर अपना गुजारा करते हैं.

 

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प्रिंसटन यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता नोआह रोज ने इस रिपोर्ट में दावा किया था कि किसी ने अभी तक मच्छरों की विभिन्न प्रजातियों के खान-पान को लेकर अध्ययन नहीं किया. हमने अफ्रीका के सब-सहारन रीजन के 27 जगहों से एडीस एजिप्टी मच्छर के अंडे लिए. इन अंडों से मच्छरों को निकलने दिया. फिर इन्हें इंसान, अन्य जीव, गिनी पिग जैसे लैब में बंद डिब्बों में छोड़ दिया ताकि उनके खून पीने के पैटर्न को समझ सकें. एडीस एजिप्टी मच्छरों की अलग-अलग प्रजातियों के मच्छरों का खान-पान एकदम अलग निकला

नोआह का कहना था कि ये बात एकदम गलत साबित हो गई कि सारे मच्छर खून पीते हैं. हुआ यूं कि जिस इलाके में सूखा या गर्मी ज्यादा पड़ती है. पानी कम होता है. वहां पर मच्छरों को प्रजनन के लिए नमी की जरूरत पड़ती है. पानी की कमी को पूरा करने के लिए मच्छर इंसानों और अन्य जीवों का खून पीना शुरू कर देते हैं.

मच्छरों के अंदर ये बदलाव कई हजार साल में आया है. एडीस एजिप्टी मच्छरों की खास बात ये थी कि बढ़ते शहरों की वजह से पानी की किल्लत से जूझने लगे. तब जाकर इन्हें इंसानों का खून पीने की जरूरत पड़ने लगी.

लेकिन जहां इंसान पानी जमा करके रखते हैं, वहां एनोफिलीस मच्छरों (मलेरिया करने वाला) को कोई दिक्कत नहीं होती है. ये अपना प्रजनन कूलर, गमले, क्यारी जैसी जगहों पर कर लेते हैं. लेकिन जैसे ही पानी की कमी महसूस होती है, ये तुरंत इंसानों या अन्य जीवों पर खून पीने के लिए हमला कर देते हैं.


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adminAugust 29, 20202min5440

हेडलाइन पढ़कर आए हैं तो ज़ाहिर है कि आप जान ही रहे हैं कि हम यहां इंटरनेट के बारे में बात करने वाले हैं. ये इंटरनेट पर हमारी बातचीत का दूसरा हिस्सा है. पहला हिस्सा आप यहां पढ़ सकते हैं. इसमें हमने बताया था कि इंटरनेट क्या होता है, कैसे काम करता है. सर्वर क्या होते हैं और समुद्र में केबल क्यों बिछाई जाती है.

इस हिस्से में ये समझने की कोशिश करेंगे कि फाइबर केबल्स के ज़रिए डेटा का लेन-देन कैसे होता है? सर्वर को पता कैसे चलता है कि कहां डेटा भेजना है? और आपके फोन को कैसे पता चलता है कि किस सर्वर से डेटा मंगाना है?

यहां काम आता IP Address. इसे पोस्टल सर्विस से समझा जा सकता है. डेटा भी आप तक ठीक वैसे ही पहुंचता है, जैसे आपके घर में पोस्ट से खत आता है. जिस तरह आपके घर का एक यूनीक पता होता है, जिसकी मदद से डाकिया आपका खत पहुंचा देता है. ठीक उसी तरह इंटरनेट से जुड़े हर डिवाइस को एक यूनीक ऐड्रेस असाइन किया जाता है. इसे IP Address कहते हैं. यानी Internet Protocol address. चूंकि कंप्यूटर्स गणित की भाषा समझते हैं, इसलिए ये IP address एक नंबर होता है. जब आप किसी लिंक पर क्लिक करते हैं, तो फाइबर पाइपलाइन से होती हुई उस वेबसाइट के सर्वर तक एक रिक्वेस्ट जाती है. इस रिक्वेस्ट में लिखा ये होता है कि ‘सर्वर जी, हमें फलाने IP address पर ढिकाना डेटा भेजना है.’ फिर सर्वर हज़ारों किलोमीटर दूर से वो डेटा आपके IP address के लिए रवाना करता है.

आप पूछेंगे उस वेबसाइट के सर्वर तक हमारी रिक्वेस्ट कैसे पहुंचती है? वो तो आप ही पहुंचाते हैं. किसी वेब ब्राउज़र में वेबसाइट एंटर करके. या किसी लिंक पर क्लिक करके. हर वेबसाइट के सर्वर का भी एक IP एड्रेस होता है, जिसकी मदद से उस सर्वर तक पहुंचा जा सकता है. लेकिन हर वेबसाइट का IP एड्रेस याद रख पाना यूज़र के लिए मुमकिन नहीं है. इसलिए हर IP एड्रेस के लिए एक Domain Name दे दिया जाता है. डोमेन नेम जैसे www.youtube.com, www.facebook.com या www.iamfeedy.com.

ये डोमेन नेम एंटर करते ही, वेब ब्राउज़र या मोबाइल ऐप्लीकेशन उस वेबसाइट का IP एड्रेस खोज लेते हैं. ये ठीक वैसे ही है जैसे हम अपनी फोनबुक में किसी नाम के सामने उसका नंबर खोजते हैं. इंटरनेट के डोमेन नेम और IP address की इस फोनबुक को कहते हैं – DNS सर्वर. DNS माने Domain Name System. DNS को संचालित करने का काम ICANN नाम की संस्था करती है. ICANN यानी Internet Corporation for Assigned Names and Numbers. DNS सर्वर की मदद से हमारा बेव ब्राउज़र उस बेवसाइट का IP एड्रेस ढूंढ निकालता है. और आपकी रिक्वेस्ट उस वेबसाइट के सर्वर तक पहुंचा देता है. उस रिक्वेस्ट में आपके डिवाइस का IP address लिखा होता है. इस तरीके से आप उस सर्वर से डेटा का लेन-देन कर पाते हैं.

जब कोई डेटा, किसी सर्वर से दूसरे डिवाइस जाने के लिए निकलता है, तो पहले वो छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट जाता है. इन्हें Data Packets कहते हैं. उसी पोस्टल सर्विस वाले उदाहरण से समझें तो मान लीजिए अपनी फाइबर पाइपलाइन से कोई चिट्ठी भेजनी है. एक बार में एक ही रास्ते से पूरी चिट्ठी भेजना थोड़ा स्लो मेथड है. तो उस चिट्ठी के कई टुकड़े कर दिए जाते हैं और फिर उन्हें अलग अलग रास्तों सबसे तेज़ मुमकिन तरीके में भेज दिया जाता है. इन सभी पैकेट्स पे IP ऐड्रेस लिखे होते हैं. जिनकी मदद से इन्हें अपनी मंज़िल तक पहुंचा दिया जाता है. फिर वहां पहुंचकर ये सारे पैकेट्स इकट्ठे होते हैं और पूरी डेटा फाइल तैयार होती है. अगर आपने कोई स्लो इंटरनेट कनेक्शन चलाया है तो आपने ध्यान दिया होगा कि कई बार एक इमेज अलग-अलग टुकड़ों में धीरे-धीरे आपकी स्क्रीन पर बनती है. ऐसा सारे डेटा पैकेट्स के एक साथ न आने के कारण होता है.

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data packets

 

ये डेटा पैकेट्स अलग-अलग रास्तों से चलते हुए किसी भी क्रम में आ सकते हैं. फिर इन्हें आपस में कैसे जोड़ा जाता है? और ये कैसे सुनिश्चित किया जाता है कि सारे डेटा पैकेट्स अलग-अलग रास्तों से होते हुए एक ही पते पर पहुंचे? इसका जवाब है Internet Protocols. डेटा के लेन देन की पूरी प्रोसेस को बिना किसी रुकावट के अंजाम देने के लिए कुछ नियम बनाए गए हैं. इन नियमों को ही इंटरनेट प्रोटोकॉल्स के नाम से जाना जाता है. इन प्रोटोकॉल्स से चलने पर हर पैकेट सही ठिकाने पर सही सूरत में पहुंचता है.

डेटा के सोर्स और डेस्टिनेशन के बीच में कई छोटे-छोटे पड़ाव भी होते हैं. इन्हें हम Routers कहते हैं. राउटर्स का काम होता है IP एड्रेस के मुताबिक, डेटा को सही दिशा में आगे बढ़ाना. मतलब डेटा को अगले ऐसे राऊटर तक पहुंचा देना जो मंज़िल के ज्यादा करीब हो. इसे सड़क और गाड़ी वाले एग्जाम्पल से अच्छा समझा जा सकता है. मान लीजिए कि हम अपनी गाड़ी लेकर किसी अनजान शहर की तरफ निकल पड़े. लेकिन हर चौराहे पे एक राऊटर नाम का आदमी खड़ा है जो हमें वहां से आगे का रास्ता बता देता है. तो इस तरह इन चौराहों से होते हुए अपने डेस्टिनेशन तक आसानी से पहुंच जाएंगे.

 

router

 

हर डेटा ट्रांसमिशन में ये दिक्कत आती है कि लंबा सफर तय करने में डेटा का सिग्नल कमज़ोर होने लगता है. इसे Attenuation कहते हैं. जैसे हमें अपनी गाड़ी में फ्यूल भराते रहना ज़रूरी है, वैसे ही इस डेटा सिग्नल को बूस्ट करते रहना ज़रूरी है. इसे Amplification कहते हैं. हज़ारों किलोमीटर के सफर में कई डिवाइस डेटा सिग्नल को एंप्लीफाई करते रहते हैं.

कई बार सारे डेटा पैकेट्स सोर्स-कम्प्यूटर (सर्वर) से डेस्टिनेशन-कम्प्यूटर तक पहुंच ही नहीं पाते. कुछ पैकेट्स रास्ते में ही कहीं खो जाते हैं. इन्हें लॉस्ट डेटा पैकेट्स कहते हैं. ऐसी सूरत में इंटरनेट प्रोटोकॉल्स के तहत डेस्टिनेशन-कम्प्यूटर सोर्स-कम्प्यूटर से इन पैकेट्स को दोबारा भेजने की रिक्वेस्ट करता है. और फिर इन डेटा पैकेट्स को वापस भेजा जाता है.

इंटरनेट प्रोटोकॉल्स के मुताबिक, हर डेटा पैकेट में उसके क्रम से जुड़ी जानकारी भी होती है. मतलब कौनसा डेटा पैकेट आगे लगेगा, कौनसा पीछे लगेगा. इसी जानकारी से डेस्टिनेशन-कम्प्यूटर में इन्हें जोड़कर डेटा को सही क्रम में जोड़कर रिट्रीव कर लिया जाता है. ऐसा न हो तो ये होगा न कि इमेज में पैर ऊपर आ गए, और नाक नीचे चली गई. लेकिन ऐसा नहीं होता. इंटरनेट प्रोटोकॉल्स की मदद से ये डेटा आप तक सही सलामत पहुंचता है और ये सिलसिला जारी रहता है.

 

अब हम बड़े सवाल पर आ जाते हैं. और पता करने की कोशिश करते हैं कि इंटरनेट का मालिक कौन है?

आप तक इंटरनेट पहुंचाने का काम करता है आपका ISP यानी Internet Service Provider. जैसे आपने जिस कंपनी की सिम ली होगी या जिस कंपनी का ब्रॉडबैंड कनेक्शन लिया होगा, वो आपका Internet Service Provider है. और आप पइसा भी इसी ISP को देते हैं. लेकिन ये पूरा इंटरनेट नहीं चलाते. अगर बड़े स्केल पे देखें तो ISPs को तीन स्तर पर बांटा जा सकता है. पहली वो बड़ी कंपनियां जिन्होंने समंदर के नीचे केबल्स बिछाए हैं. इन्हें हम टियर 1 में रखते हैं. इसके बाद आती हैं वो ISPs जिनकी नेशनल लेवल पे प्रज़ेंस है. मतलब जिनकी केबल्स देश भर में बिछे हुए हैं. ये टियर 2 की कंपनियां हो गईं. अब अगर टियर 2 की किसी कंपनी को इंटरनेट सेवा चाहिए तो उसे टियर 1 की कंपनी के केबल का इस्तेमाल करना होगा या उन्हें किराए पर लेना होगा. और इसके लिए उसे टियर 1 की ISP को पइसे देने पड़ेंगे. ठीक इसी तरह टियर 3 में आने वाली लोकल ISPs को टियर 2 की कंपनियों को भुगतान करना होता है. ताकि वो अपने ग्राहकों को इंटरनेट जोड़ सकें.

 

ISP infrastructure

 

इस तरह से हमारा दिया हुआ पैसा इन कंपनियों के बीच बंट जाता है. और इसका एक हिस्सा उन कंपनियों को भी मिलता है जिनके बड़े-बड़े डेटा सेंटर्स हैं. और फिर आप जो ऐड देखते हैं उसका पैसा वेबसाइट्स को मिलता है. मतलब सीधे-सीधे बोलें तो इंटरनेट का पूरा-पूरा मालिक तो कोई भी नहीं है. अलग-अलग कंपनियां इंटरनेट के अलग-अलग हिस्सों को ज़रूर ओन करती हैं. और इसे संचालित करने का काम कई संस्थाएं करती हैं. इंटरनेट की दुनिया में सबसे बड़ा रोल इंफ्रास्ट्रक्चर का है. जिस कंपनी का जितना फैला हुआ और विस्तृत इंफ्रास्ट्रक्चर होगा उतनी ही ज्यादा उसकी कमाई होगी.


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adminAugust 21, 20201min3350

केंद्र सरकार ई-पासपोर्ट लाने की योजना बना रही है. नेशनल इंफॉर्मेटिक्स सेंटर ने इसके लिए रिक्वेस्ट फ़ॉर प्रपोजल (आरएफपी) जारी किया है. इसके ज़रिए सरकार एक ऐसी एजेंसी का चुनाव करना चाहती है, जो इन ई-पासपोर्ट के लिए आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर और सॉल्यूशंस तैयार कर सके.

सरकार ने इसका पायलट प्रोजेक्ट शुरू भी कर दिया है. अंग्रेजी दैनिक इकनॉमिक टाइम्स की ख़बर के मुताबिक़, सरकार 20,000 सरकारी और डिप्लोमैटिक ई-पासपोर्ट ट्रायल बेसिस पर जारी कर चुकी है.

माना जा रहा है कि अगले साल से ये नए ई-पासपोर्ट आम लोगों को भी जारी किए जाने लगेंगे. ऐसे में अगर आप अगले साल नए पासपोर्ट के लिए आवेदन करते हैं या अपना पासपोर्ट रिन्यू कराते हैं, तो बड़ी संभावना है कि आपको ई-पासपोर्ट दिया जाए.

ख़बरों के मुताबिक, चुनी गई एजेंसी एक डेडिकेटेड यूनिट लगाएगी ताकि हर घंटे 10,000 से 20,000 ई-पासपोर्ट जारी किए जा सके. इसके लिए दिल्ली और चेन्नई में आईटी सिस्टम्स लगाए जाएँगे.

 

लेकिन, ये ई-पासपोर्ट होते क्या हैं?

ई-पासपोर्ट ऐसे पासपोर्ट होते हैं, जिनमें एक इलेक्ट्रॉनिक माइक्रोप्रोसेसर चिप लगा होती है.

फ़िलहाल नागरिकों को पासपोर्ट दिए जाते हैं, वे पर्सनलाइज्ड होते हैं और उन्हें बुकलेट्स पर प्रिंट किया जाता है.

सामान्य पासपोर्ट और ई-पासपोर्ट में क्या फ़र्क होता है?

एरोस्पेस, डिफेंस, ट्रांसपोर्टेशन और सिक्योरिटी मार्केट्स के लिए इलेक्ट्रिकल सिस्टम्स बनाने वाले और सर्विसेज मुहैया कराने वाले थालिस ग्रुप के मुताबिक़, “इलेक्ट्रॉनिक पासपोर्ट या ई-पासपोर्ट पारपंरिक पासपोर्ट के जैसे ही होते हैं. लेकिन, इनमें एक छोटा इंटीग्रेटेड सर्किट (चिप) लगा होता है. यह चिप पासपोर्ट के कवर या इसके पन्नों पर लगाई जाती है.”

 

आम पासपोर्ट के मुक़ाबले ज़्यादा सुरक्षित

इस चिप के ज़रिए पासपोर्ट को अधिक डिज़िटल सिक्योरिटी फ़ीचर्स मिलते हैं. इस चिप में पासपोर्ट धारक के बायोमीट्रिक्स भी शामिल होते हैं. साथ ही यह चिप पासपोर्ट की वैधता को भी साबित करने में मददगार होती है. इस चिप में दर्ज सूचनाओं को बदला नहीं जा सकता है. इस तरह से ई-पासपोर्ट्स में फ़र्जीवाड़ा करना मुश्किल है.

बार-बार अंतरराष्ट्रीय ट्रैवल करने वालों के लिए भी यह फ़ायदेमंद है, साथ ही इमिग्रेशन अधिकारियों को भी ई-पासपोर्ट्स से यात्रियों के बारे में अधिक ठोस और प्रमाणित सूचना मिलती है.

साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट और इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (आईएएमएआई) के कंसल्टेंट रक्षित टंडन बताते हैं, “अगर सिक्योरटी के पहलू से देखें तो ई-पासपोर्ट में यूजर की डिज़िटल आइडेंटिटी वेरिफ़ाई होती है. फिजिकल पासपोर्ट में डेटा को स्कैन करके रखना और इस स्कैन्ड डेटा को रिट्रीव करना कितना मुश्किल काम होता है. ई-पासपोर्ट में आपके बायोमीट्रिक से जानकारियाँ वेरिफाई हो जाती हैं.”

 

अपराधियों के देश छोड़ने पर लगेगी लगाम

ई-पासपोर्ट क्या अपराधियों पर भी लगाम लगाने में कामयाब हो सकता है? रक्षित कहते हैं कि कई दफ़ा अपराधी देश छोड़कर भाग जाने में इस वजह से सफल हो जाते हैं क्योंकि जब तक पुलिस उन्हें एयरपोर्ट पर बाहर जाने से रोकने की लंबी काग़ज़ी कार्यवाही पूरी करती है, तब तक अपराधी देश से निकल चुके होते हैं.

वे कहते हैं, “जब ई-पासपोर्ट आ जाएँगे तो किसी अपराधी को देश छोड़ने से रोकना एक बटन दबाने के ज़रिए मुमकिन हो जाएगा. साथ ही ऐसे लोग दूसरे देश में भी घुस नहीं पाएँगे, क्योंकि पूरा डेटा डिज़िटल होगा.”

वे कहते हैं, “डार्क नेट पर ऐसे कई लोग हैं, जो फ़र्जी पेपर पासपोर्ट बेच रहे हैं. ई-पासपोर्ट एक अच्छा क़दम है.”

 

क्या होते हैं ई-पासपोर्ट और इनसे क्या फायदा होगा?इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

 

मानकीकरण

पासपोर्ट्स के मानकीकरण का काम आईसीएओ (इंटरनेशल सिविल एविएशन ऑर्गनाइजेशन) करता है, जो यूएन का ही एक हिस्सा है. लेकिन, देशों के पास अपने हिसाब से इन मानकों को लागू करने का अधिकार होता है.

2016 में यह तय हुआ था कि अब से सभी पासपोर्ट मशीन में पढ़े जाने योग्य होने चाहिए. इसके लिए मशीन रीडेबल ट्रैवल डॉक्यूमेंट्स (एमआरटीडी) शब्द का इस्तेमाल किया गया था.

एमआरटीडी का मतलब यह है कि पासपोर्ट के पहले पन्ने के नीचे की दो लाइनों में नाम, एक्सपायरी की तारीख, जारी करने वाला देश जैसी जानकारियाँ हों.

हालाँकि, आईसीएओ ने अभी तक चिप को मानक के तौर पर अनिवार्य नहीं किया है. लेकिन, दुनिया के कई देश अपने पासपोर्ट्स की साख को बढ़ाने के लिए चिप का इस्तेमाल करते हैं.

आईसीएओ के मुताबिक़, दुनिया के 100 से अधिक देश और ग़ैर-राष्ट्र इकाइयाँ (जैसे संयुक्त राष्ट्र) फ़िलहाल ई-पासपोर्ट जारी करते हैं.

एक अनुमान के मुताबिक़, दुनिया में इस समय क़रीब 49 करोड़ ई-पासपोर्ट सर्कुलेशन में हैं. यूरोप के ज़्यादातर देशों में इसी तरह के ई-पासपोर्ट चलते हैं


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adminAugust 14, 20201min4910

साल 2016 के फरवरी की सर्दियां थीं. 29 साल के अमित दिल्ली में अपने घर रजाई में लिपटे नींद की आगोश में सपनों की दुनिया में सैर कर रहे थे.

सुबह के चार बजे अचानक सीने में दर्द उठा. दर्द इतना बुरा था कि अचानक नींद खुल गई. शरीर पसीने से तरबतर था. घर पर कोई नहीं था जो अमित को अस्पताल ले जा सकता.

अमित ने कहराते हुए दर्द को सहा, घंटे भर में दर्द कम हुआ और फिर से नींद आ गई. सो कर उठे तो तबीयत थोड़ी ठीक लगी तो अमित ने डॉक्टर के पास जाने का फ़ैसला टाल दिया.

लेकिन अगले दिन चलने फिरने से लेकर रोज़मर्रा के काम में भी उन्हें दिक्कत आई. इसलिए अमित ने डॉक्टर के पास जाने का फ़ैसला किया.

डॉक्टर ने अमित की बात सुन कर उन्हें इको-कार्डियोग्राम कराने की सलाह दी. इको-कार्डियोग्राम में पता चला की 36 घंटे पहले अमित को जो दर्द उठा था, वो हार्ट-अटैक था.

डॉक्टर की बात सुनते ही, अमित के होश उड़ गए. वो समझ ही नहीं पा रहे थे कि इतनी कम उम्र में हार्ट अटैक कैसे आ सकता है?

 

बढ़ रहे हैं हार्ट अटैक के मामले

आंकड़े बताते हैं कि कम उम्र में हार्ट-अटैक वाले मामले दिनों-दिन भारत में बढ़ते जा रहे हैं.

24 मई को पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा सांसद बंडारू दत्तात्रेय के बेटे बंडारू वैष्णव की हार्ट अटैक से मौत हो गई. वो सिर्फ 21 साल के थे. वैष्णव हैदराबाद से एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे थे.

ख़बरों के मुताबिक़ देर रात को खाना खाने के बाद वैष्णव को अचानक से सीने में दर्द की शिकायत हुई. परिवार वाले उसे लेकर गुरु नानक अस्पताल पहुंचे, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.

 

नौजवानों में दिल की बीमारी

अमरीका के एक रिसर्च जरनल में छपे लेख के मुताबिक़ 2015 तक भारत में 6.2 करोड़ लोगों को दिल से जुड़ी बीमारी हुई. इसमें से तकरीबन 2.3 करोड़ लोगों की उम्र 40 साल से कम है.

यानी 40 फ़ीसदी हार्ट के मरीज़ों की उम्र 40 साल से कम है. भारत के लिए ये आंकड़े अपने आप में चौंकाने वाले हैं.

जानकार बताते हैं कि पूरी दुनिया में भारत में ये आंकड़े सबसे तेज़ी से बढ़ रहे हैं.

healthdata.org के मुताबिक प्रीमैच्योर डेथ यानी अकाल मृत्यु के कारणों में 2005 में दिल की बीमारी का स्थान तीसरा था.

लेकिन 2016 में दिल की बीमारी, अकाल मृत्यु का पहला कारण बन गया है.

10 -15 साल पहले तक दिल की बीमारी को अकसर बुजुर्गों से जोड़ कर देखा जाता था.

लेकिन पिछले एक दशक में दिल से जुड़ी बीमारी के आंकड़े कुछ और कहानी कहते हैं.

 

कमज़ोर दिल के कारण

देश के जाने माने कार्डियोलॉजिस्ट और पद्मश्री से सम्मानित डॉक्टर एस सी मनचंदा के मुताबिक दरअसल देश के युवाओं का दिल कमज़ोर हो गया है.

डॉक्टर मनचंदा फिलहाल दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में हैं, इससे पहले एम्स में कार्डियो विभाग के कई सालों तक हेड रह चुके हैं.

हार्ट अटैक, स्वास्थ्य

 

उनके मुताबिक कमज़ोर दिल का कारण हमारा नए जमाने की जीवन शैली है.

 

देश के युवाओं में फैले ‘लाइफ स्टाइल डिस्ऑर्डर’ के लिए वो पांच कारणों को अहम मानते हैं-

•जीवन में तनाव

•खाने की ग़लत आदत

•कम्प्यूटर/ इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों पर देर तक काम करना

•स्मोकिंग, तंबाकू, शराब की लत

•पर्यावरण का प्रदूषण

 

डॉक्टर मनचंदा के मुताबिक चाहे 29 साल के अमित हो या फिर 21 साल के वैष्णव दोनों ही मामलों में इन पांच में से एक वजह है उनके हार्ट अटैक की.

अमित ने भी बताया कि 22 साल की उम्र से वो सिगरेट पीते थे.

 

29 साल के होते होते होते वो एक चेन स्मोकर बन गए थे.

लेकिन हार्ट अटैक आने के 2 साल बाद उन्होंने अब सिगरेट पीना छोड़ दिया है. पर दिल की बीमारी के लिए आज भी तीन दवाई रोज़ खानी पड़ती है.

वैष्णव के बारे में ऐसी कोई जानकारी नहीं है, लेकिन पढ़ने के उम्र में आजकल बच्चों में तनाव आम है. इतना ही नहीं छात्रों जीवन में खाने की ग़लत समय, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का पढ़ने के लिए घंटों तक इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है.

 

हार्ट अटैक के लक्षण

डॉक्टरों की मानें तो हार्ट अटैक का सबसे बड़ा लक्षण माना जाता है- सीने में तेज़ दर्द. अक्सर किसी फ़िल्मी दृश्य में जब कभी किसी को दिल का दौरा पड़ता है तो वो अपना सीना ज़ोर से जकड़ लेता है, दर्द के मारे उनकी आँखों में घबराहट दिखने लगती है और वो ज़मीन पर गिर पड़ता है. हम सभी को लगता है कि दिल का दौरा पड़ने पर ऐसा ही एहसास होगा जैसे हमारे सीने को कुचला जा रहा है. ऐसी अनुभूति होती भी है, लेकिन हमेशा नहीं.

जब दिल तक खून की आपूर्ति नहीं हो पाती तो दिल का दौरा पड़ता है. आमतौर पर हमारी धमनियों के रास्ते में किसी तरह की रुकावट आने की वजह से खून दिल तक नहीं पहुँच पाता, इसीलिए सीने में तेज़ दर्द होता है. लेकिन कभी-कभी दिल के दौरे में दर्द नहीं होता. इसे साइलेंट हार्ट अटैक कहा जाता है.

healthdata.org के मुताबिक आज भी दुनिया में अलग अलग बीमारी से मरने वाले वजहों में दिल की बीमारी सबसे बड़ी वजह है.

साल 2016 में अलग अलग बीमारी से मरने वालों में 53 फ़ीसदी लोगों की मौत दिल की बीमारी की वजह से हुई.

 

किन महिलाओं को हार्ट अटैक का सबसे अधिक ख़तरा?

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के डॉक्टर के. के. अग्रवाल के मुताबिक, “महिलाओं में प्री मेनोपॉज़ हार्ट की बीमारी नहीं होती.”

इसके पीछे महिलाओं में पाए जाने वाले सेक्स हॉर्मोन हैं जो उन्हें दिल की बीमारी से बचाते हैं.

लेकिन पिछले कुछ समय में महिलाओं में प्री मेनोपॉज़ वाली उम्र में भी हार्ट अटैक जैसे बीमारियां देखी जा रही हैं.

पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन के डॉ. श्रीनाथ रेड्डी के मुताबिक, “अगर कोई महिला स्मोकिंग करती है, या गर्भनिरोधक पिल्स का लंबे समय से इस्तेमाल करती रही है तो प्राकृतिक रूप से उसके शरीर की हार्ट अटैक से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है.”

डॉ. रेड्डी के मुताबिक मेनोपॉज़ के पांच साल बाद महिलाओं में भी हार्ट अटैक का ख़तरा पुरुषों के बराबर ही हो जाता है.

कई तरह के शोध हैं जिसमें पाया गया है कि महिलाएं अकसर सीने में दर्द को नज़रअंदाज़ कर देती हैं और इसलिए इलाज उनको देर से मिलता है.

 

हार्ट अटैक, स्वास्थ्य

 

हार्ट अटैक से बचने के लिए क्या करें?

डॉ मनचंदा के मुताबिक हार्ट अटैक के ख़तरे से बचने के लिए युवाओं को अपनी जीवनशैली में बदलाव लाने की ज़रूरत है.

उनके मुताबिक बहुत हद तक योग से ये बदलाव संभव है.

वो योग को हार्ट अटैक से बचाव का सबसे कारगर तरीका मानते हैं.

डॉ. मनचंदा कहते हैं, “योग से न सिर्फ तनाव दूर होता है बल्कि लोग शांत चित्त और ज़्यादा एकाग्र होते हैं.”

 

हार्ट अटैक से बचना है तो ट्रांस फैट से बचें

इसके अलावा डॉक्टर मनचंदा के अनुसार युवाओं को दिल की बीमारी से बचाने के लिए सरकार को भी कुछ मदद करनी चाहिए.

इस सवाल पर कि सरकार कैसे हार्ट अटैक रोक सकती है, डॉक्टर मनचंदा कहते हैं, “जंक फूड पर सरकार को ज़्यादा टैक्स लगाना चाहिए, जैसे सरकार तंबाकू और सिगरेट पर लगाती है. साथ ही जंक फूड पर बड़े-बड़े मोटे अक्षरों में वॉर्निंग लिखना चाहिए. सरकार इसके लिए नियम बना सकती है.”

डॉक्टर मनचंदा की माने तो ऐसा करने से समस्या जड़ से खत्म तो नहीं होगी, लेकिन लोगों में जागरूकता ज़रूर बढ़ेगी.

अक्सर ये भी सुनने में आता है कि हार्ट अटैक का सीधा संबंध शरीर के कोलेस्ट्रोल लेवल से होता है, इसलिए अधिक तेल में तला हुआ खाना न तो बनाएं न ही खाएं.

लेकिन इस बात में कितनी सच्चाई है?

डॉ. मनचंदा कहते हैं कोलेस्ट्रोल से नहीं लेकिन ट्रांस फैट से हार्ट अटैक में दिक्कत ज्य़ादा आ सकती है.

ट्रांस फैट शरीर में अच्छे कोलेस्ट्रोल को कम करता है और बुरे कोलेस्ट्रोल को बढ़ाता है.

वनस्पति और डालडा ट्रांस फैट के मुख्य स्रोत होते हैं. इसलिए इनसे बचना चाहिए.

जानकारों के मुताबिक इन तरीकों पर अमल कर युवा हार्ट अटैक के अटैक से बच सकते हैं.

 



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