पुरानी यादें

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adminNovember 23, 20201min3630

28 साल की एक लड़की. मस्तमौला. इरादे पक्के. जो काम सामने आया, कर दिया. दौड़ने वाला घोड़ा सामने आया, दौड़ा लिया. चलने वाला घोड़ा आया, चला दिया. रानी ने बुलाया तो तन्मयता से काम कर दिया. जब मेकअप कर लिया तो खुद ही रानी लगने लगी. रानी के साथ लड़ाई पर गई. जब रानी घिर गई तो खुद ही रानी बन लड़ पड़ी. क्योंकि रानी उसकी सखी थी. ये दोस्ती की बात थी. साथ ही अपने राज्य के प्रति प्रेम की बात थी.

सबसे बड़ी बात थी अपने जौहर को दिखाने की. बचपन में कुल्हाड़ी से लकड़ी काटने गई थी. तेंदुआ आ गया सामने, उसे भी काट दिया. रानी को इस लड़की की ये अदा पसंद थी. वो रानी थी लक्ष्मीबाई और ये लड़की थी झलकारी बाई. जिसका नाम इतिहास के पन्नों में इतना नीचे दबा है कि खोजते-खोजते पन्ने फट जाते हैं. वक्त की मार थी, लोग-बाग राजा-रानियों से ऊपर किसी और की कहानी नहीं लिखते थे.

पर जो बात है, वो बात है. कहानी उड़ती रही. डेढ़ सौ साल बाद भी वो लड़की जिंदा है. भारत के बहुजन समाज की हीरोईन. सबको नायक-नायिकाओं की तलाश रहती है. बहुजन समाज को इससे वंचित रखा गया था. पर इस लड़की ने बहुत पहले ही साबित कर दिया था कि इरादे और ट्रेनिंग से इंसान कुछ भी कर सकता है. बाकी बातें तो फर्जी होती हैं. बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम ने जब लोगों को जगाना चाहा तो इसी लड़की के नाम का सहारा लिया था. वरना एक वर्ग दूसरे वर्ग को यही बता रहा था कि बहुत सारे काम तो तुम कर ही नहीं सकते हो.

22 नवंबर 1830 को झांसी के एक कोली परिवार में पैदा हुई थी झलकारी. पिता सैनिक थे. तो पैदाइश से ही हथियारों के साथ उठना-बैठना रहा. पढ़ाई-लिखाई नहीं हुई. पर उस वक्त पढ़ता कौन था. राजा-रानी तक जिंदगी भर शिकार करते थे. उंगलियों पर जोड़ते थे. उस वक्त बहादुरी यही थी कि दुश्मन का सामना कैसे करें. चतुराई ये थी कि अपनी जान कैसे बचायें.

तो झलकारी के गांव में एक दफे डाकुओं ने हमला कर दिया. कहने वाले यही कहते हैं कि जितनी तेजी से हमला किया, उतनी तेजी से लौट भी गये. क्योंकि झलकारी के साथ मिलकर गांव वालों ने बड़ा इंतजाम कर रखा था. फिर झलकारी की शादी भी हो गई. एक सैनिक के साथ. एक बार पूजा के अवसर पर झलकारी रानी लक्ष्मीबाई को बधाई देने गई तो रानी को भक्क मार गया. झलकारी की शक्ल रानी से मिलती थी. और फिर उस दिन शुरू हो गया दोस्ती का सिलसिला.

1857 की लड़ाई में झांसी पर अंग्रेजों ने हमला कर दिया. झांसी का किला अभेद्य था. पर रानी का एक सेनानायक गद्दार निकला. नतीजन अंग्रेज किले तक पहुंचने में कामयाब रहे. जब रानी घिर गईं, तो झलकारी ने कहा कि आप जाइए, मैं आपकी जगह लड़ती हूं. रानी निकल गईं और झलकारी उनके वेश में लड़ती रही. जनरल रोज ने पकड़ लिया झलकारी को. उन्हें लगा कि रानी पकड़ ली गई हैं. उनकी बात सुन झलकारी हंसने लगी. रोज ने कहा कि ये लड़की पागल है. पर ऐसे पागल लोग हो जाएं तो हिंदुस्तान में हमारा रहना मुश्किल हो जाएगा.

मैथिली शरण गुप्ता ने झलकारी बाई के बारे में लिखा है:

जा कर रण में ललकारी थी,
वह तो झांसी की झलकारी थी.
गोरों से लड़ना सिखा गई,
है इतिहास में झलक रही,
वह भारत की ही नारी थी.

झलकारी के अंत को लेकर बड़ा ही मतभेद है. कोई कहता है कि रोज ने झलकारी को छोड़ दिया था. पर अंग्रेज किसी क्रांतिकारी को छोड़ते तो ना थे. कोई कहता है कि तोप के मुंह पर बांध कर उड़ा दिया गया था. जो भी हुआ हो, झलकारी को अंग्रेजों ने याद रखा था. वहीं से कुछ जानकारी कहीं-कहीं आई. वृंदावन लाल वर्मा ने अपने उपन्यास झांसी की रानी में झलकारी बाई का जिक्र किया है. पर इतिहास में ज्यादा जिक्र नहीं मिलता है.

उसी दौरान एक और वीर लड़की हुई थी. उदा देवी. लखनऊ की बेगम हजरत महल के साथ रहने वाली. 1857 की लड़ाई के दौरान कैप्टेन वालेस एक जगह अपने साथियों के साथ रुका. पानी पीने के लिये. वहां ब्रिटिश सैनिकों की लाशें गिरी हुई थीं. उसने देखा कि सब पर ऊपर से गोली चलने के निशान हैं. तो उसने अपने साथियों को इशारा कर ऊपर पेड़ पर गोलियां चला दीं. एक लाश गिरी. यूनिफॉर्म पहने हुए. दो-दो बंदूकों के साथ. ये उदा देवी थीं. वालेस रो पड़ा. बोला कि मुझे मालूम होता कि ये औरत है तो मैं गोली ना चलाता. खैर, ये बात वालेस ने क्यों कहा समझ नहीं आया. क्योंकि दूसरे देश में आकर गोली चला रहे थे. इससे औरतों को कितनी तकलीफ थी. ये तो नहीं मालूम पड़ा. फर्जी बात करना अंग्रेज अफसरों का स्वभाव था. उदा की बहादुरी के सामने खुद का बड़प्पन जो दिखाना था. बसपा के गठन के समय ये लड़की भी समाज को एकजुट करने के काम आई.


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adminNovember 19, 20201min3380

भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी एक सख्तमिजाज प्रशासक मानी जाती थीं. बहुत लोग उनके व्यक्तित्व और अंदाज के मुरीद थे. लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक समय इंदिरा खुद को बदसूरत समझती थीं?

इंदिरा गांधी की करीबी दोस्त पुपुल जयकर ने इंदिरा के सहयोग से ही उनकी बायोग्राफी लिखी थी. इसके मुताबिक, 13 की उम्र में इंदिरा खुद को ‘बदसूरत’ मानती थीं.

दरअसल इंदिरा के बचपन के समय उनके घर का माहौल बहुत अच्छा नहीं था. पुपुल लिखती हैं, ‘6 साल की उम्र में ही इंदिरा ने मां की हताशा को महसूस करना शुरू कर दिया था. मां के बारे में बीबी अम्मा और बुआ विजयलक्ष्मी के ‘घटिया ताने’ को वह सुनतीं तो मां के पक्ष में बोल पड़ती. उसने दादी, परदादी, दादा और पिता तक से बहस की. बाद में वह समझ गई कि उसकी बातों का कोई असर नहीं होता है और उसके पिता उसकी बात अनुसनी कर देते हैं. ऐसे ही माहौल में इंदिरा ने अपनी भावनाओं को दबाए रखना और चुप रहना सीखा. वह समझ गईं कि मोतीलाल के घर की शांति दो लोगों ने भंग की गई हुई है- बुआ विजयलक्ष्मी और बीबी अम्मा.’

 

पुपुल आगे लिखती हैं,

‘इंदिरा के लिए ये दिन कष्टप्रद थे. सरूप (विजयलक्ष्मी) अकसर इंदिरा को ‘मूर्ख और बदसूरत’ कहतीं. इंदिरा ने इसे सुन लिया. इन संज्ञाओं ने 13 साल की बच्ची को बुरी तरह त्रस्त कर डाला था. इन टिप्पणियों का किसी ने विरोध नहीं किया, इसलिए इंदिरा खुद को बदसूरत ही समझने लगी. वह अपने आप में सिमट गई और आत्मविश्वास खो बैठी. एक चंचल शरारती बालिका रातों-रात संकोची बन गई.’

 

इंदिरा गांधी. 

 

जैसे-जैसे इंदिरा बड़ी होती गईं, अकेले रहना उसे भाता गया. खादी के सफेद कुर्ते-पाजामे में पतली टांगों वाली इस लड़की के सिर पर गांधी टोपी रखी होती, थोड़ी झुकी हुई. वह बगीचे में चली जाती. पेड़ों पर चढ़ने में उसे कोई दिक्कत नहीं होती.

पुपुल लिखती हैं कि इंदिरा ने जहरीले शब्दों के लिए बुआ को कभी माफ नहीं किया. इन शब्दों ने उसके यौवन को मार दिया. बाद के कुछ साल में, वे बड़े भावावेशों के साथ इन शब्दों का जिक्र करती रहीं. बल्कि मौत से एक पखवाड़े पहले तक भी वे शब्द उनके ज़ेहन में ताजा थे.


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adminNovember 10, 20204min4560

जब 1982 ख़त्म होते-होते पंजाब के हालात बेक़ाबू होने लगे तो रॉ के पूर्व प्रमुख रामनाथ काव ने भिंडरावाले को हेलीकॉप्टर ऑपरेशन के ज़रिए पहले चौक मेहता गुरुद्वारे और फिर बाद में स्वर्ण मंदिर से उठवा लेने के बारे में सोचना शुरू कर दिया था.

इस बीच काव ने ब्रिटिश उच्चायोग में काम कर रहे ब्रिटिश ख़ुफ़िया एजेंसी एमआई-6 के दो जासूसों से अकेले में मुलाक़ात की थी. रॉ के पूर्व अतिरिक्त सचिव बी रमण ‘काव ब्वाएज़ ऑफ़ रॉ’ में लिखते हैं, “दिसंबर, 1983 में एमआई-6 के दो जासूसों ने स्वर्ण मंदिर का मुआयना किया था. इनमें से कम से कम एक वही शख़्स था जिससे काव ने मुलाक़ात की थी.”

 

भिंडरावाले की एक सभा में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार खुशवंत सिंह

 

इस मुआयने की असली वजह तब स्पष्ट हुई जब एक ब्रिटिश शोधकर्ता और पत्रकार फ़िल मिलर ने क्यू में ब्रिटिश आर्काइव्स से ब्रिटेन की कमाँडो फ़ोर्स एसएएस की श्रीलंका में भूमिका के बारे में जानकारी लेने की कोशिश की. तभी उन्हें वहाँ कुछ पत्र मिले जिससे ये पता चलता था कि भारत के कमाँडो ऑपरेशन की योजना में ब्रिटेन की सहायता ली गई थी.

30 वर्षों के बाद इन पत्रों के डिक्लासिफ़ाई होने के बाद पता चला कि प्रधानमंत्री मार्ग्रेट थैचर एमआई-6 के प्रमुख के ज़रिए काव के भेजे गए अनुरोध को मान गई थीं जिसके तहत ब्रिटेन की एलीट कमाँडो फ़ोर्स के एक अफ़सर को दिल्ली भेजा गया था.

 

ब्रिटिश सरकार की जाँच में आए तथ्य सामने

उस ब्रिटिश अफ़सर से भारत ने सलाह ली थी कि किस तरह स्वर्ण मंदिर से सिख चरमपंथियों को बाहर निकाला जाए.

फ़िल मिलर ने 13 जनवरी, 2014 को प्रकाशित ब्लॉग ‘रिवील्ड एसएएस एडवाइज़्ड अमृतसर रेड’ में इसकी जानकारी देते हुए इंदिरा गांधी की आलोचना की थी कि एक तरफ़ तो वो श्रीलंका में ब्रिटिश खुफ़िया एजेंसी के हस्तक्षेप के सख़्त ख़िलाफ़ थीं. वहीं, दूसरी ओर स्वर्ण मंदिर के ऑपरेशन में उन्हें उनकी मदद लेने से कोई गुरेज़ नहीं था.

ब्रिटिश संसद में बवाल होने पर जनवरी 2014 में प्रधानमंत्री कैमरन ने इसकी जाँच के आदेश दिए थे. जाँच के बाद ब्रिटेन के विदेश मंत्री विलियम हेग ने स्वीकार किया था के एक एसएएस अधिकारी ने 8 फ़रवरी से 14 फ़रवरी 1984 के बीच भारत की यात्रा की थी और भारत की स्पेशल फ़्रंटियर फ़ोर्स के कुछ अधिकारियों के साथ स्वर्ण मंदिर का दौरा भी किया था.

तब बीबीसी ने ही ये समाचार देते हुए कहा था कि ‘ब्रिटिश ख़ुफ़िया अधिकारी की सलाह थी कि सैनिक ऑपरेशन को आख़िरी विकल्प के तौर पर ही रखा जाए. उसकी ये भी सलाह थी कि चरमपंथियों को बाहर लाने के लिए हेलीकॉप्टर से बलों को मंदिर परिसर में भेजा जाए ताकि कम से कम लोग हताहत हों.’

अग़वा करने में होना था हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल

ब्रिटिश संसद में इस विषय पर हुई चर्चा का संज्ञान लेते हुए इंडिया टुडे के वरिष्ठ पत्रकार संदीप उन्नीथन ने पत्रिका के 31 जनवरी, 2014 के अंक में ‘स्नैच एंड ग्रैब’ शीर्षक से एक लेख लिखा था जिसमें उन्होंने बताया था कि इस ख़ुफ़िया ऑपरेशन को ‘ऑपरेशन सनडाउन’ का नाम दिया गया था.

इस लेख में लिखा था, “योजना थी कि भिंडरावाले को उनके गुरु नानक निवास ठिकाने से पकड़ कर हेलीकॉप्टर के ज़रिए बाहर ले जाया जाता. इस योजना को इंदिरा गाँधी के वरिष्ठ सलाहकार रामनाथ काव की उपस्थिति में उनके 1 अकबर रोड निवास पर उनके सामने रखा गया था. लेकिन, इंदिरा गाँधी ने इस प्लान को ये कहकर अस्वीकार कर दिया था कि इसमें कई लोग मारे जा सकते हैं.”

ये पहला मौक़ा नहीं था जब भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने भिंडरावाले को उनके ठिकाने से पकड़ने की योजना बनाई थी. काव उस समय से भिंडरावाले को पकड़वाने की योजना बना रहे थे जब वो चौक मेहता में रहा करते थे और बाद में 19 जुलाई, 1982 को गुरु नानक निवास में शिफ़्ट हो गए थे.

 

काव ने नागरानी को भिंडरावाले को पकड़वाने की ज़िम्मेदारी सौंपी

रॉ में विशेष सचिव के पद पर काम कर चुके और पूर्व विदेश मंत्री स्वर्ण सिंह के दामाद जी.बी.एस सिद्धू की एक किताब ‘द ख़ालिस्तान कॉन्सपिरेसी’ हाल ही में प्रकाशित हुई है जिसमें उन्होंने भिंडरावाले को पकड़वाने की उस योजना पर और रोशनी डाली है.

उस ज़माने में 1951 बैच के आँध्र प्रदेश काडर के राम टेकचंद नागरानी डीजीएस यानि डायरेक्टर जनरल सिक्योरिटी हुआ करते थे. रॉ की एक कमाँडो यूनिट होती थी एसएफ़एफ़ जिसमें सेना, सीमा सुरक्षा बल और केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल से लिए गए 150 चुनिंदा जवान हुआ करते थे. इस यूनिट के पास अपने दो एमआई हैलिकॉप्टर थे. इसके अलावा वो ज़रूरत पड़ने पर एविएशन रिसर्च सेंटर के विमानों का भी इस्तेमाल कर सकते थे.

1928 में जन्में राम नागरानी अभी भी दिल्ली में रहते हैं. ख़राब स्वास्थ्य के कारण अब वो बात करने की स्थिति में नहीं हैं. सिद्धू ने दो वर्ष पूर्व अपनी किताब के सिलसिले में उनसे कई बार बात की थी.

जीबीएस सिद्धू बताते हैं, ”नागरानी ने मुझे बताया था कि दिसंबर, 1983 के अंत में काव ने मुझे अपने दफ़्तर में बुला कर भिंडरावाले का अपहरण करने के लिए एसएफ़एफ़ के हेलीकॉप्टर ऑपरेशन की ज़िम्मेदारी सौंपी थी. भिंडरावाले का ये अपहरण स्वर्ण मंदिर की लंगर की छत से किया जाना था जहाँ वो रोज़ शाम को अपना संदेश दिया करते थे. इसके लिए दो एमआई हेलीकॉप्टरों और कुछ बुलेटप्रूफ़ वाहनों की व्यवस्था की जानी थी ताकि भिंडरावाले को वहाँ से निकाल कर बगल की सड़क तक पहुंचाया जा सके. इसके लिए नागरानी ने सीआरपीएफ़ जवानों द्वारा क्षेत्र में तीन पर्तों का घेरा बनाने की योजना बनाई थी.”

 

स्वर्ण मंदिर के अंदर जासूसी

सिद्धू आगे बताते हैं, ”ऑपरेशन की योजना बनाने से पहले नागरानी ने एसएफ़एफ़ के एक कर्मचारी को स्वर्ण मंदिर के अंदर भेजा था. उसने वहाँ कुछ दिन रह कर उस इलाक़े का विस्तृत नक्शा बनाया था. इस नक्शे में मंदिर परिसर में अंदर घुसने और बाहर निकलने की सबसे अच्छी जगहें चिन्हित की गईं थीं. उसे भिंडरावाले और उनके साथियों की अकाल तख़्त पर उनके निवास से लेकर लंगर की छत तक सभी गतिविधियों पर भी नज़र रखने के लिए कहा गया था.”

”इस शख़्स से ये भी कहा गया था कि वो हेलीकॉप्टर कमांडोज़ द्वारा भिंडरावाले का अपहरण करने के सही समय के बारे में भी सलाह दे. तीन या चार दिन में ये सभी सूचनाएं जमा कर ली गई थीं. इसके बाद स्वर्ण मंदिर परिसर के लंगर इलाक़े और बच निकलने के रास्तों का एक मॉडल सहारनपुर के निकट सरसवा में तैयार किया गया था.”

 

रस्सों के ज़रिए उतारे जाने थे कमाँडो

नागरानी ने सिद्धू को बताया था कि हेलीकॉप्टर ऑपरेशन से तुरंत पहले सशस्त्र सीआरपीएफ़ के जवानों द्वारा मंदिर परिसर के बाहर एक घेरा बनाया जाना था ताकि ऑपरेशन की समाप्ति तक आम लोग परिसर के अंदर या बाहर न जा सकें.

एसएफ़एफ़ कमाँडोज़ के दो दलों को बहुत नीचे उड़ते हुए हेलीकॉप्टरों से रस्सों के ज़रिए उस स्थान पर उतारा जाना था जहाँ भिंडरावाले अपना भाषण दिया करते थे. इसके लिए वो समय चुना गया था जब भिंडरावाले अपने भाषण का अंत कर रहे हों क्योंकि उस समय भिंडरावाले के आसपास सुरक्षा व्यवस्था थोड़ी ढीली पड़ जाती थी.

योजना थी कि कुछ कमाँडो भिंडरावाले को पकड़ने के लिए दौड़ेंगे और कुछ उनके सुरक्षा गार्डों को काबू में करेंगे. ऐसा अनुमान लगाया गया था कि भिंडरावाले के गार्ड कमाँडोज़ को देखते ही गोलियाँ चलाने लगेंगे. ये भी अनुमान लगा लिया गया था कि संभवत: कमाँडोज़ के नीचे उतरने से पहले ही गोलियाँ चलनी शुरू हो जाएं.

इस संभावना से निपटने के लिए एसएफ़एफ़ कमाँडोज़ को दो दलों में बाँटा जाना था. एक दल स्वर्ण मंदिर परिसर में ऐसी जगह रहता जहाँ से वो भिंडरावाले के गर्भ गृह में भाग जाने के रास्ते को बंद कर देता और दूसरा दल लंगर परिसर और गुरु नानक निवास के बीच की सड़क पर बुलेटप्रूफ़ वाहनों के साथ तैयार रहता ताकि कमाँडोज़ द्वारा पकड़े गए भिंडरावाले को अपने क़ब्ज़े में लेकर पूर्व निर्धारित जगह पर पहुंचाया जा सके.

हेलीकॉप्टर के अंदर और ज़मीन पर मौजूद सभी कमाँडोज़ को ख़ास निर्देश थे कि भिंडरावाले को किसी भी हालत में हरमंदिर साहब के गर्भ गृह में शरण लेने न दी जाए क्योंकि अगर वो वहाँ पहुंच गए तो भवन को नुक़सान पहुंचाए बिना भिंडरावाले को क़ब्ज़े में लेना असंभव होगा.

नागरानी के अनुसार स्वर्ण मंदिर के मॉडल को मार्च 1984 में एसएफ़एफ़ कमांडोज़ के साथ दिल्ली शिफ़्ट कर दिया गया था ताकि सीआरपीएफ़ के साथ उनका बेहतर सामंजस्य बैठाया जा सके. तब तक ये तय था कि इस ऑपरेशन में सिर्फ़ एसएफ़एफ़ के जवान ही भाग लेंगे. सेना द्वारा बाद में किए गए ऑपरेशन ब्लूस्टार की तो योजना तक नहीं बनी थी.

 

काव और नागरानी ने इंदिरा गांधी को योजना समझाई

अप्रैल, 1984 में काव ने नागरानी से कहा कि इंदिरा गाँधी इस हेलीकॉप्टर ऑपरेशन के बारे में पूरी ब्रीफ़िंग चाहती हैं. नागरानी शुरू में इंदिरा गाँधी को ब्रीफ़ करने में हिचक रहे थे. उन्होंने काव से ही ये काम करने के लिए कहा क्योंकि काव को इस योजना के एक-एक पक्ष की जानकारी थी. बाद में काव के ज़ोर देने पर नागरानी काव की उपस्थिति में इंदिरा गाँधी को ब्रीफ़ करने के लिए तैयार हो गए.

उस ब्रीफ़िंग का ब्योरा देते हुए नागरानी ने जीबीएस सिद्धू को बताया था, “सब कुछ सुन लेने के बाद इंदिरा गाँधी ने पहला सवाल पूछा कि इस ऑपरेशन में कितने लोगों के हताहत होने की संभावना है? मेरा जवाब था कि हो सकता है कि हम अपने दोनों हेलीकॉप्टर खो दें. कुल भेजे गए कमाँडोज़ में से 20 फ़ीसदी के मारे जाने की संभावना है.

 

इंदिरा ने ऑपरेशन को मंज़ूरी नहीं दी

नागरानी ने सिद्धू को बताया कि इंदिरा गाँधी का अगला सवाल था कि इस अभियान में कितने आम लोगों की जान जा सकती है. मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था. ये ऑपरेशन बैसाखी के आसपास 13 अप्रैल को किया जाना था. मेरे लिए ये अनुमान लगाना मुश्किल था कि उस दिन स्वर्ण मंदिर में कितने लोग मौजूद रहेंगे. आख़िर में मुझे ये कहना पड़ा कि इस ऑपरेशन के दौरान हमारे सामने आए आम लोगों में 20 फ़ीसदी हताहत हो सकते हैं.

इंदिरा गाँधी ने कुछ सेकेंड सोच कर कहा कि वो इतनी अधिक तादाद में आम लोगों के मारे जाने का जोख़िम नहीं ले सकतीं. ‘ऑपरेशन सनडाउन’ को उसी समय तिलाँजलि दे दी गई.

‘ऑपरेशन सनडाउन’ को इस आधार पर अस्वीकार करने के बाद कि इसमें बहुत से लोग मारे जाएंगे, सरकार ने सिर्फ़ तीन महीने बाद ही ऑपरेशन ब्लूस्टार को अंजाम दिया जिसमें कहीं ज़्यादा सैनिकों और आमलोगों की जान गई और इंदिरा गाँधी को इसकी बहुत बड़ी राजनीतिक क़ीमत चुकानी पड़ी.


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adminOctober 31, 20201min4720

आदि काव्‍य रामायण के रचयिता ज्ञानी महर्षि वाल्‍मीकि का जन्‍मदिवस देशभर में पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार वैदिक काल के महान ऋषि वाल्‍मीकि पहले डाकू थे. लेकिन जीवन की एक घटना ने उन्हें बदलकर रख दिया. वाल्‍मीकि असाधारण व्यक्तित्व के धनी थे शायद इसी वजह से लोग आज भी उनके जन्मदिवस पर कई विशेष कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं.

 

कब है वाल्‍मीकि जयंती?

महर्षि वाल्मीकि का जन्म अश्विन मास के शुक्‍ल पक्ष की पूर्णिमा यानी कि शरद पूर्णिमा को हुआ था. वाल्‍मीकि जयंती इस वर्ष शनिवार, 31 अक्‍टूबर 2020 को मनाई जाएगी.

 

वाल्मीकि जयंती का शुभ मुहूर्त

30 अक्टूबर शाम 5 बजकर 47 मिनट से 31 अक्टूबर को रात 8 बजकर 21 मिनट तक

 

कौन थे म‍हर्षि वाल्‍मीकि?

कहते हैं कि वाल्मीकि का जन्म महर्षि कश्यप और अदिति की 9वीं संतान वरुण और पत्नी चर्षणी के घर हुआ था. बचपन में भील समुदाय के लोग उन्हें चुराकर ले गए थे और उनकी परवरिश भील समाज में ही हुई. वाल्मीकि से पहले उनका नाम रत्नाकर हुआ करता था. रत्नाकर जंगल से गुजरने वाले लोगों से लूट-पाट करता था.

एक बार जंगल से जब नारद मुनि गुजर रहे थे तो रत्नाकर ने उन्हें भी बंदी बना लिया. तभी नारद ने उनसे पूछा कि ये सब पाप तुम क्यों करते हो? इस पर रत्नाकर ने जवाब दिया, ‘मैं ये सब अपने परिवार के लिए करता हूं’. नारद हैरान हुए और उन्होंने फिर उससे पूछा क्या तुम्हारा परिवार तुम्हारे पापों का फल भोगने को तैयार है. रत्नाकर ने निसंकोच हां में जवाब दिया.

तभी नारद मुनि ने कहा इतनी जल्दी जवाब देने से पहले एक बार परिवार के सदस्यों से पूछ तो लो. रत्नाकर घर लौटा और उसने परिवार के सभी सदस्यों से पूछा कि क्या कोई उसके पापों का फल भोगने को आगे आ सकता है? सभी ने इनकार कर दिया. इस घटना के बाद रत्नाकर काफी दुखी हुआ और उसने सभी गलत काम छोड़ने का फैसला कर लिया. आगे चलकर रत्नाकर ही महर्षि वाल्मीकि कहलाए.


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adminOctober 29, 20203min5530

नाम विजय मर्चेंट, पूरा नाम विजय माधवजी मर्चेंट. आजादी के पहले का सबसे बेहतरीन बल्लेबाज. एकदम सलीके का खेल खेलने वाला. आराम से एक पांव निकालकर ड्राइव करने वाला. लेट कट और प्यारे हुक्स का महारथी. जिसने उसका एक अलग स्टाइल बनाया. दूसरों से एकदम अलहदा. विजय मर्चेंट जिसे अपने वक्त में डॉन ब्रैडमैन और कॉम्पटन जैसे खिलाड़ियों में गिना जाता था. जिनका बर्थडे होता है 12 अक्टूबर को  और बरसी होती है 27 अक्टूबर को. पढ़िए उनके ये किस्से, जो बताते हैं कि उनका करियर कितना शानदार रहा है.

विजय मर्चेंट मुंबई के क्रिकेटर थे. भरे-पूरे परिवार के थे. घर वाले व्यापारी थे. उनकी फैक्ट्रियां भी थीं. ये बात जरूर है कि विजय मर्चेंट को खेलने को ज्यादा मैच नहीं मिले. मर्चेंट अपने इंटरनेशनल करियर में बस 10 मैच ही खेल पाए. उसमें भी बस 18 ओवर. पर उनकी डोमेस्टिक क्रिकेट की बैटिंग शानदार है. और उन्होंने जम के डोमेस्टिक क्रिकेट खेला भी.

 

विजय मर्चेंट

इंग्लिश टीचर के चलते नाम बदल गया

विजय मर्चेंट का नाम विजय ठाकरसे हुआ करता था. एक बार उनकी इंग्लिश टीचर ने उनसे उनके नाम और पापा के प्रोफेशन के बारे में पूछा. विजय ने अपना नाम बताया. फिर पापा का प्रोफेशन ‘मर्चेंट’ बताया. पर टीचर नाम और प्रोफेशन में कंफ्यूज कर गई और विजय का नाम विजय ठाकरसे से विजय मर्चेंट हो गया.

डॉन ब्रैडमैन के अलावा आज तक कोई आस-पास भी नहीं फटका

मर्चेंट का फर्स्ट क्लास क्रिकेट में एवरेज 71.64 का है. इससे आगे आज तक बस डॉन ब्रैडमैन ही रहे हैं. पर मर्चेंट इतना बेहतरीन खेल रहे थे तो उन्हें खेलने का मौका क्यों नहीं मिला? ये एक वाजिब और बहुत ही जरूरी सवाल है. इसकी वजह थी सेकेंड वर्ल्ड वॉर. जिसके चलते मर्चेंट के कई साल बर्बाद हुए. फर्स्ट क्लास क्रिकेट के 6 सीजन ही मर्चेंट ने खेले. जिसमें से पांच में उनका एवरेज 114, 123, 223, 285 और 117 रहा. मर्चेंट को बचपन से ही बड़े-बड़े स्कोर करने का शौक था.

रणजी में भी मर्चेंट ने 47 इनिंग्स खेलीं और 3639 रन बनाए. दिल थाम के बैठिए दोस्तों. ऐवरेज अविश्वसनीय रूप से 98.75 था.

 

महान बल्लेबाज सर डॉन ब्रैडमैन

गांधी गिरफ्तार थे तो क्रिकेट खेलने से मना कर दिया

विजय मर्चेंट को पहला इंटरनेशनल खेलने का मौका मिला था इंग्लैंड के खिलाफ. इंग्लैंड की टीम पहली बार इंडिया आई थी सीरिज खेलने के लिए.

विजय एक देशभक्त भारतीय थे. उन्होंने पहला टेस्ट खेला, जो कि उद्घाटन मैच था. पर उन्होंने इंग्लैंड के खिलाफ एक सीरिज में खेलने से मना कर दिया था क्योंकि महात्मा गांधी और कई बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था. चार साल बाद वो इंग्लैंड टूर पर जाने को तब तैयार हुए जब सारे नेशनल लीडर जेल से बाहर आ गए थे. इसलिए उनका टेस्ट डेब्यू 1933 में इंग्लैंड टूर पर हो पाया.

इंग्लिश खिलाड़ियों को अपने खेल से कर रखा था दीवाना

अंग्रेज खिलाड़ी विजय मर्चेंट के खेल से बहुत इंप्रेस हुए थे. एक इंग्लिश खिलाड़ी सीबी फ्रे ने कहा था, चलो इसको सफेद रंग से रंग देते हैं और इसे अपने साथ ऑस्ट्रेलिया ओपनर बनाकर ले चलते हैं. आप इससे समझ सकते हैं कि वो बढ़ा-चढ़ाकर नहीं बोल रहे थे क्योंकि विजय ने अपने दो इंग्लैंड टूर पर मिडिल ऑर्डर में खेलते हुए 800 रन जड़ दिए थे.

 

विजय मर्चेंट

डॉन ब्रैडमैन हुए थे बहुत निराश

एक दफे अपनी खराब हेल्थ के चलते मर्चेंट ने अपना ऑस्ट्रेलिया टूर कैंसिल कर दिया था. जिसके बाद ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी बड़े निराश हो गए थे. डॉन ब्रैडमैन ने इसके बाद कहा था: बहुत बुरा. हमें विजय मर्चेंट की झलक भी देखने को नहीं मिली. जिसे पक्का सारे इंडियन खिलाड़ियों में सबसे महान माना जाता है.

अपने करियर के टॉप पर होने के बावजूद भी विजय सेकेंड वर्ल्ड वॉर के चलते दस साल तक इंटरनेशनल टेस्ट क्रिकेट नहीं खेल सके. वो भी उस वक्त जब वो अपने करियर के टॉप पर थे.

आज भी सबसे ज्यादा उम्र में सेंचुरी मारने का रिकॉर्ड इन्हीं के नाम

दिल्ली के कोटला में अपने आखिरी क्रिकेट मैच के दौरान 154 रन बनाए थे. ये भारत की ओर से सबसे ज्यादा उम्र में सेंचुरी मारने वाले खिलाड़ी बन गए. इसी सीरीज़ में उनके कंधे में चोट आई जिसके चलते उनका करियर खत्म हो गया.

1936 के इंग्लैंड टूर में इन्होंने 51 की औसत से 1475 रन बनाए और इसके चलते उनको 1937 का विजडन क्रिकेटर ऑफ द इयर भी चुना गया था.

बैटिंग करते समय विजय

विजय हजारे और विजय मर्चेंट की राइवलरी

बांबे (अब मुंबई) में एक पेंटागुलर टूर्नामेंट हुआ करता था. इसमें मर्चेंट ने 250 रन नॉटआउट बनाकर सीरिज में हजारे का चला आ रहा रिकॉर्ड तोड़ दिया.

हजारे ने भी अगली ही इनिंग्स में 309 रन बनाकर फिर से रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया. पर मर्चेंट भी कम नहीं थे और रणजी में महाराष्ट्र के अगेंस्ट खेलते हुए 359 रन बनाकर फिर से रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया. इन दोनों का ही 30 के दशक से लेकर 50 के दशक तक भारतीय क्रिकेट पर दबदबा रहा. और इसको हमेशा लोगों ने बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया था. पर इससे विजय हजारे और विजय मर्चेंट के आपसी रिश्तों पर कोई असर नहीं पड़ा.

 

विजय हजारे

विजय डायनेस्टी नाम कैसे पड़ा?

विजय मर्चेंट के साथ विजय हजारे और विजय मांजरेकर ने फेमस विजय डायनेस्टी नाम के एक इंडियन क्रिकेट के जुमले की शुरुआत की जिसका 30 के दशक से 60 के दशक तक भारतीय क्रिकेट पर दबदबा रहा.

बाद में सेलेक्टर भी रहे. 1960 में चीफ सेलेक्टर रहे. वही सुनील गावस्कर, एकनाथ सोलकर और गुंडप्पा विश्वनाथ जैसे टैलेंट को क्रिकेट में लाने वाले के रूप में जाने जाते हैं. विविध भारती पर उनका एक शो क्रिकेट विद विजय मर्चेंट भी आया करता था.

27 अक्टूबर, 1987 में विजय मर्चेंट की 76 की उम्र में हार्ट अटैक से मौत हो गई.


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adminOctober 12, 20202min3550

संजय लीला भंसाली ने अपने करियर की शुरुआत बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर की थी. वो विधु विनोद चोपड़ा को असिस्ट करते थे. जब विधु 1994 में ‘1942: अ लव स्टोरी’ बना रहे थे, तब संजय हेलन केलर के बारे में पढ़ रहे थे. वो उनकी कहानी से काफी प्रभावति थे. सोचा था कभी इस पर भी फिल्म बनाएंगे. अपनी पहली फिल्म ‘खामोशी’ के बाद वो इसी सब्जेक्ट पर फिल्म बनाना चाहते थे. लेकिन उन्हें ‘खामोशी’ की रिलीज़ वाले दिन एक फोन आया. इस कॉल के बाद भंसाली ने कुछ महीनों तक किसी का फोन नहीं उठाया. क्योंकि उस दिन फोन उठाते ही उन्हें सुनाई दिया- ‘बैठ गई’. नर्वसाकर पूछा, क्या बैठ गई? जवाब आया, ‘अपनी पिक्चर बैठ गई’. ये फोन ‘खामोशी’ के प्रोड्यूसर का था. इस असफलता ने भंसाली को तोड़ दिया. या यूं कहें कि आगे आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार करना शुरू कर दिया. हालांकि अब उनका वो कॉन्फिडेंस चला गया था कि वो हेलन केलर की लाइफ से प्रेरित कोई फिल्म बनाएं. प्रोड्यूसर झामू सुगंध और सलमान खान से मोटिवेशन पाकर वो वापस खड़े हुए और ‘हम दिल दे चुके सनम’ बनाई. इस फिल्म ने मार्केट में उनकी इमेज ऐसी बदली कि उनका अगला प्रोजेक्ट इंडिया की सबसे महंगी फिल्म थी. ‘देवदास’.

‘देवदास’ की रिलीज़ के दौरान मैगज़ीन मैंज वर्ल्ड को दिए एक इंटरव्यू में भंसाली ने बताया कि वो आगे क्या करने वाले हैं. उन्होंने बताया कि उनकी इच्छा अमिताभ बच्चन के साथ काम करने की है. लेकिन वो उनके साथ किसी ऐसी फिल्म पर काम करना चाहते हैं, जो उनके कद और टैलेंट के साथ न्याय कर पाए. अगली खबर ये आई कि ‘देवदास’ फेम संजय लीला भंसाली अमिताभ बच्चन और रानी मुखर्जी को लेकर ‘ब्लैक’ नाम की एक फिल्म बना रहे हैं. सब लोग हैरान थे कि फ्रेम्स को रंगों से भरने वाला आदमी ‘ब्लैक’ जैसी ऑफबीट फिल्म क्यों बना रहा है. लोगों ने चेताया पैसे डूबेंगे. बर्बाद हो जाओगे. पब्लिक नहीं देखेगी. भंसाली ने अपनी फिल्म की स्क्रिप्ट तैयार की और नासिक चले गए. वहां अमिताभ बच्चन ‘खाकी’ फिल्म की शूटिंग कर रहे थे. भंसाली यहां पहुंचे थे बच्चन को नैरेशन देने यानी अपनी फिल्म की कहानी सुनाने. नैरेशन शुरू हुआ. भंसाली कुछ वाक्य पढ़ने के बाद चुप हो गए. स्क्रिप्ट रखा और अमिताभ से कहा कि वो ये स्क्रिप्ट खुद पढ़ लें. क्योंकि भंसाली को ये लगता था कि वो बहुत बुरे नैरेटर हैं.

 

फिल्म ‘ब्लैक’ की शूटिंग के दौरान संजय लीला भंसाली, आयशा कपूर और अमिताभ बच्चन.

 

बदले में अमिताभ बच्चन ने क्या किया?

‘देवदास’, संजय लीला भंसाली की ‘बॉम्बे वेल्वेट’ थी. उस फिल्म के साथ बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ था. बहुत सारे पैसे. अथाह मेहनत. और भंसाली का करियर. रिलीज़ से पहले प्रोड्यूर्स टेंशन में गोलियां फांकना शुरू कर चुके थे. लेकिन ‘देवदास’ बहुत बड़ी हिट रही. अब भंसाली डायरेक्टर्स की टॉप लीग में आ गए थे. हर बड़ा स्टार उनके साथ काम करना चाहता था. लेकिन भंसाली सबसे बड़ा स्टार चाहते थे. वो अमिताभ बच्चन के साथ काम करना चाहते थे. उन्होंने अमिताभ को ये फिल्म ऑफर की. अमिताभ न सिर्फ माने, बल्कि बिना किसी फीस के उनकी फिल्म की. बाद में बच्चन ने इस बारे में बताया कि वो भंसाली की सभी फिल्में देख चुकने के बाद, बस उनके साथ काम करना चाहते थे. उन्हें ये मौका मिला, यही उनकी फीस थी.

 

फिल्म ब्लैक एक सीन में बच्चन और रानी मुखर्जी. अमिताभ का रोल रानी के टीचर का था.

 

कास्टिंग की बात हो ही रही है, तो एकाध ट्रिविया और जान लीजिए. जब भंसाली ने रानी मुखर्जी को ये फिल्म ऑफर की, तो उन्होंने मना कर दिया. क्योंकि उन्हें लग रहा था कि ये काफी मुश्किल रोल है, जिसे वो नहीं कर पाएंगी. लेकिन फाइनली वो मान गईं. फिल्म में रानी के किरदार मिशेल के कई फेज़ देखने को मिलते हैं. बचपन वाले हिस्से में मिशेल का रोल किया था आयशा कपूर ने. पहले ये रोल आलिया भट्ट करने वाली थीं. 9 साल की आलिया, मां सोनी राजदान के साथ ऑडिशन के लिए आईं. भंसाली ने उनका ऑडिशन लेने से मना कर दिया. उन्हें लगता था कि आलिया में बॉलीवुड हीरोइन बनने के सारे गुण मौजूद हैं. उन्हें ये छोटे-मोटे किरदार नहीं करने चाहिए. फिल्म के एक सीन में रणबीर कपूर भी दिखाई देते हैं. अमिताभ बच्चन उन दिनों बहुत व्यस्त रहते थे, इसलिए जिन सीन्स में बच्चन की पीठ दिखनी होती थी, उसमें रणबीर कपूर को खड़ा कर दिया जाता था. हालांकि ऐसा इक्के-दुक्के सीन्स में ही हुआ था.

 

जब अमिताभ और रानी फिल्म को दोबारा शूट करने की बात करने भंसाली के घर गए

मुंबई फिल्मसिटी में एक नया फ्लोर बना था. फ्लोर का मतलब माला नहीं, वो स्पेस जहां अब सेट बनाया जा सकता था. इस फ्लोर पर बनने वाला पहला सेट संजय लीला भंसाली का था. ‘ब्लैक’ के लिए. उस घर में फिल्म के 70 फीसदी हिस्सों की शूटिंग होनी थी. फिल्मसिटी के दूसरे हिस्से में अमिताभ बच्चन ‘कौन बनेगा करोड़पति’ की शूटिंग कर रहे थे. सेट तैयार होते ही भंसाली ने बच्चन को बुलावा भेजा. बच्चन अपने ब्लॉग में बताते हैं कि उनके सेट पर पहुंचने से पहले भंसाली ने उसे मोमबत्तियों से सजा दिया था. बकौल अमिताभ वो सेट शानदार लग रहा था. फिल्म की शूटिंग शुरू हुई. लेकिन एक दिन शॉर्ट सर्किट से वहां आग लग गई. सेट से लेकर कॉस्ट्यूम और प्रोडक्शन से जुड़े कई सामान जल गए. भंसाली इस फिल्म को छोटे बजट और कम समय में बनाना चाहते थे. लेकिन हालात उनका साथ नहीं दे रहे थे.

ये वही सेट है, जो जल गया था. इस सीन में अमिताभ और आयशा के साथ शरनाज पटेल नज़र आ रही हैं.

 

भंसाली किसी फिल्म को बनाने के दौरान पूरी तरह उस फिल्म में ही होते हैं. सेट जलने की खबर सुनकर वो हताश हो गए. परेशान से चुपचाप अपने घर में बैठे थे. जैसे ही ये बात फिल्म की स्टारकास्ट को पता चली, वो सेट की फिक्र किए बिना सीधा भंसाली के घर पहुंचे. अमिताभ और रानी ने उन्हें दिलासा दिया. और वादा किया, जो सीन इस आग लगने की वजह से खराब हो गए, उन्हें वो दोबारा शूट करेंगे. संजय लीला भंसाली तो वापस ट्रैक पर आ गए. लेकिन उनकी समय और बजट वाली परेशानी जस की तस बनी हुई थी. जिस फिल्म को बनाने के लिए 13.5 करोड़ रुपए का बजट अलॉट हुआ था, उसे बनाने में 21.5 करोड़ रुपए लग गए.

 

भंसाली और उनकी कलात्मकता

‘ब्लैक’ की कहानी एक देख-सुन न सकने वाली लड़की मिशेल और उसके शराबी टीचर देबराज सहाय की है. इस फिल्म की शुरुआत उस सीन से होती है, जहां मिशेल अपनी कहानी लिख रही होती है. आम तौर दो सीन्स के बीच की विज़ुअल खाई को एडिटिंग के दौरान फेड या जंप की मदद से पाटा जाता है. लेकिन यहां मामला अलग था. फिल्म की शुरुआत में स्क्रीन को कुछ देर के लिए ब्लैक कर दिया जाता है. नेपथ्य से रानी की आवाज़ आती है लेकिन दिखता सिर्फ अंधेरा है. शुरुआत के 45 सेकंड फिल्म ऐसे ही चलती है. उस पल में आपको जो अंधेरा दिखता है, वही मिशेल की दुनिया है. उसके अंदर एक विकार है. लेकिन स्क्रीन जब ब्लैक होती है, तब वही दिक्कत आपके साथ होती है. आपकी दुनिया भी ब्लैक हो जाती है.

 

ये वो तस्वीर है, जिसे आप पूरी फिल्म का सार कह सकते हैं. दो अलग लोग, जो अपने जीवन के अलग-अलग फेज़ में तकरीबन एक जैसी सिचुएशन से गुज़रते हैं. और वहां से निकलने में एक-दूसरे की मदद करते हैं.

 

जो बात हम यहां कर रहे हैं, वही बात फिल्म का एक सीन मेटाफर में करता है. देबराज, मिशेल को समझा-पढ़ा रहा होता है. इतने में बत्ती चली जाती है. मिशेल मौका पाते ही केक खाने भाग जाती है. लेकिन देबराज जैसे ही चलने को होता है, गिर पड़ता है. उस समय बच्चन का किरदार कहता है- ‘अंधेरे में आंखें भी किसी काम की नहीं होती’. और आगे से मिशेल को पढ़ाने वाले सिलेबस में वो इस चैप्टर को भी मार्क करके रख लेता है. यहां देबराज और मिशेल के किरदार एक्सचेंज हो जाते हैं. ये फिल्म इतने कॉम्प्लेक्स तरीके से सोची, शूट और एडिट की गई थी. कोई फिल्ममेकर सभी टेक्निकल डिपार्टमेंट को अपनी फिल्म की कहानी में कैसे शामिल और इस्तेमाल करता है, किसी फिल्म या उसे बनाने वाले की इस खूबी को सिनेमैटिक ग्रैमर कहते हैं. ये चीज़ आयशा इक़बाल और विमल मोहन जॉन की किताब ‘बीहाइंड द सीन्स- कंटेम्पररी बॉलीवुड डायरेक्टर्स एंड देयर सिनेमा’ में बड़ी विस्तार से बताई गई है. भंसाली ‘ब्लैक’ को कलात्मक रूप से अपनी सबसे कंप्लीट फिल्म मानते हैं. वहीं उनका मानना है कि ‘देवदास’ में उनसे एक गलती हो गई थी. हालांकि उसे किसी ने पॉइंट आउट नहीं किया, इसलिए वो खुद भी नहीं बताते.

अगर आपको ऊपर बताई गई चीज़ क्लीयर नहीं हुई, तो आप फिल्म के ट्रेलर में स्क्रीन को ब्लैक होते देख सकते हैं. हालांकि यहां सबकुछ फास्ट फॉरवर्ड मोड में है:

 

 

इस फिल्म ने अमिताभ बच्चन के बचपन का सपना पूरा कर दिया

‘ब्लैक’ जब बनकर तैयार हुई, तो इंडस्ट्री वाले दोस्तों-साथियों के लिए इसका प्रीमियर किया गया. यानी रिलीज़ से पहले ‘ब्लैक’ इंडस्ट्री के लोग-बाग को दिखाई गई. फिल्म के खत्म होते-होते ऑडिटोरियम में बैठी सारी जनता रो रही थी. उसी ऑडियंस का हिस्सा दिलीप कुमार भी थे. दिलीप कुमार को अमिताभ बच्चन अपना आइडल मानते हैं. उनका सपना था कि दिलीप साहब उनकी कोई फिल्म थिएटर में बाकी लोगों के साथ बैठकर देखें. ‘ब्लैक’ ने उनकी वो ख्वाहिश पूरी कर दी. लेकिन सपने पूरे होने वाली कहानी का क्लाइमैक्स अभी बाकी था. जैसे ही फिल्म खत्म हुई. बधाइयों का दौर शुरू हो गया. लोग ऑडिटोरियम से निकलने लगे. लेकिन दिलीप साहब थिएटर से बाहर निकलकर खड़े हो गए. उन्होंने अमिताभ का हाथ अपने हाथों में लिया और उनकी आंखों में देखने लगे. दिलीप कुमार वो स्टार थे, जिनके काम ने अमिताभ बच्चन जैसे नए लोगों को फिल्मों में आने के लिए प्रेरित किया था. उस पल के बारे में अमिताभ कहते हैं- ”काश मैं उस लम्हे को उम्र भर रोक पाता”. क्योंकि ये उनकी लाइफ का सबसे स्पेशल मोमेंट था.

 

फिल्म ‘ब्लैक’ के प्रीमियर के मौके पर अमिताभ और रानी के साथ संजय लीला भंसाली. और दूसरी तस्वीर में प्रीमियर अटेंड करने पहुंचे दिलीप कुमार को रिसीव करती रानी मुखर्जी.

 

‘ब्लैक’ थिएटर्स में 4 फरवरी, 2005 को रिलीज़ हुई. फिल्म एक्सपर्ट लोगों की भविष्यवाणी को साइड पर रखकर खूब देखी गई. फिल्म ने पैसे और इज़्जत दोनों कमाए. इसके लिए अमिताभ बच्चन को चौथी बार बेस्ट एक्टर का नेशनल अवॉर्ड मिला. फिल्म भी नेशनल अवॉर्ड जीती. ‘ब्लैक’ ने 2005 फिल्मफेयर अवॉर्ड्स में रिकॉर्ड 11 अवॉर्ड्स अपने नाम किए. भंसाली अपनी काबिलियत तो ‘खामोशी’ में ही साबित कर चुके थे. लेकिन इस फिल्म ने उन्हें रिस्क लेना सीखा दिया. रिलीज़ के 15 साल बाद भी ‘ब्लैक’ लोगों की फेवरेट फिल्म वाली लिस्ट में अपनी जगह बचाए हुए है. इस फिल्म में बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर काम करने वाले रणबीर कपूर और सोनम कपूर को भंसाली ने ‘सांवरिया’ (2007) से लॉन्च किया. खबर ये थी कि वो सलमान और आलिया को लेकर ‘इंशाअल्लाह’ नाम की फिल्म बना रहे हैं. वो फिल्म फिलहाल नहीं बन रही. लेकिन भंसाली आलिया के साथ ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ नाम की फिल्म बना रहे हैं.


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adminSeptember 17, 202013min5310

पहाड़ी रास्तों पर दो दिन लगातार चलने के बाद ब्रिगेडियर परशुराम जॉन दालवी को एक खुली सी जगह नज़र आई. वो सबसे आगे चल रहे थे. उनके पीछे उनके सात साथी थे.

वो ज्यों ही संकरे से रास्ते पर दाख़िल हुए उन्होंने अपने आप को एक चीनी इन्फ़ैंट्री कंपनी के बीच पाया. उसी समय उन्होंने देखा कि क़रीब एक दर्जन बंदूकों की नालें उन्हें घूर रही हैं.

 

ब्रिगेडियर दालवी

 

ब्रिगेडियर दालवी ने अपनी घड़ी पर नज़र डाली. 22 अक्टूबर 1962 की सुबह के ठीक 9 बजकर 22 मिनट हुए थे. वो और उनके सात साथी चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी के बंदी बन चुके थे. अब वो चेहरे पर चेचक के दाग वाले एक कड़क चीनी कैप्टन के रहम पर थे.

ब्रिगेडियर दालवी अपनी किताब ‘हिमालयन ब्लंडर’ में लिखते हैं, ”पिछले 66 घंटों से मैंने कुछ नहीं खाया था. मैं 10500 फ़ुट की ऊँचाई से और ऊपर 18500 फ़ुट तक चढ़ा था और फिर 10500 फ़ुट नीचे एक जलधारा की तरह उतर आया था. मैं थक कर चूर हो गया था और भूखा था. मेरी दाढ़ी बढ़ी हुई थी. झाड़ियों के बीच चलते रहने और काँटेदार ढलानों पर फिसलने के कारण मेरे कपड़े तार तार हो गए थे.”

 

ब्रिगेडियर दालवी को एकांत वास में रखा गया

ब्रिगेडियर दालवी को चीनियों ने तिब्बत में सेथाँग कैंप में भारतीय सैनिकों से अलग बिल्कुल एकांत वास में रखा था. हमेशा महफ़िलों की शान रहने वाले दालवी कुछ दिनों में ही डिप्रेसन के शिकार हो गए थे.

चीनी कभी-कभी उनके साथ टेबिल-टेनिस, ताश और शतरंज खेलते थे. चीनियों के पास उन्हें पढ़ने देने के लिए कोई भी अंग्रेज़ी किताब नहीं थी. हफ़्तों बाद उन्हें एक कलम और लिखने के लिए कुछ कागज़ दिए गए थे.

उनके बेटे माइकल दालवी बताते हैं, ”मेरे पिता उन काग़ज़ों पर उन किताबों के नाम लिखा करते थे जिन्हें वो पढ़ चुके हैं. वो उन फ़िल्मों के नाम भी लिखते थे जिन्हें वो देख चुके हैं. वो उन सारे अभिनेताओं और अभिनेत्रियों के नाम लिखते थे जो उन्हें याद थे. हर हफ़्ते चीनी कमिश्नर आकर उन कागज़ों को फाड़ देता था.

खाने में उन्हें दिन के दोनों समय आलू दिया जाता था. हाँ क्रिसमस की रात को उन्हें चिकन खाने को दिया गया था. उन्होंने वो चिकन चीनी सैनिकों के साथ बाँट कर खाया था. महीने में एक बार उनके बाल काटे जाते थे. उनकी हज़ामत बनाने के लिए रोज़ एक नाई आता था. चीनियों को उन पर इतना विश्वास नहीं था कि वो उन्हें ख़ुद अपनी हज़ामत बनाने दें. अप्रैल 1963 में सारे भारतीय युद्धबंदियों को बीजिंग शिफ़्ट कर दिया गया.

चीनी सरकार की कोशिश थी कि उन बंदियों को मे डे की परेड में हथकड़ियों और बेड़ियों के साथ चीनी जनता को दिखाया जाए. ब्रिगेडियर दालवी के कड़े विरोध के बाद चीनियों ने ये विचार छोड़ दिया.’

 

कर्नल केके तिवारी की बेइज़्ज़ती

ब्रिगेडियर दालवी के तरह कर्नल के के तिवारी इतने भाग्यशाली नहीं थे.

बाद में मेजर जनरल बने कर्नल तिवारी ने अपनी मौत से पहले अपने पॉण्डिचेरी के घर में उस लड़ाई को याद करते हुए मुझे बताया था, ”एक चीनी अफ़सर ने मेरी वर्दी पर लगे रैंक को देख लिया था और वो मुझसे बहुत बेइज़्जती से पेश आ रहा था. मेरे पास ही पड़े एक घायल गोरखा सैनिक ने मुझे पहचान कर कहा, ”साब पानी.” मैं कूद कर उसकी मदद करने के लिए आगे बढ़ा.”

”तभी चीनी सैनिक ने मुझे मारा और अपनी सीमित अंग्रेज़ी में मुझ पर चिल्लाया, ‘बेवकूफ़ कर्नल बैठ जाओ. तुम क़ैदी हो. जब तक मैं तुमसे कहूँ नहीं तुम हिल नहीं सकते, वर्ना मैं तुम्हें गोली मार दूँगा.’ थोड़ी देर बाद हमें नामका चू नदी के बगल में एक पतले रास्ते पर मार्च कराया गया. पहले तीन दिनों तक हमें कुछ भी खाने को नहीं दिया गया. उसके बाद पहली बार हमें उबले हुए नमकीन चावल और सूखी तली हुई मूली का खाना दिया गया.”

 

पुआल को गद्दे की तरह किया इस्तेमाल

मेजर जनरल तिवारी ने मुझे आगे बताया, ”मुझे पहले दो दिनों तक एक अँधेरे और सीलन भरे कमरे में अकेले रखा गया. इसके बाद कर्नल रिख को मेरे कमरे में लाया गया जो बुरी तरह से घायल थे. हमें नाश्ता सुबह सात से साढ़े सात बजे के बीच मिलता था. दोपहर के खाने का समय था साढ़े दस से ग्यारह बजे तक. रात का खाना तीन से साढ़े तीन बजे के बीच दिया जाता था.”

”जिन घरों में हमें ठहराया गया था, उनकी खिड़कियाँ और दरवाज़े ग़ायब थे. शायद चीनियों ने उनका इस्तेमाल ईंधन के तौर पर कर लिया था. जब हमें अंदर लाया जा रहा था तो हमने देखा कि वहाँ पुआल का ढ़ेर लगा हुआ था. हमने चीनियों से पूछा कि क्या हम इनका इस्तेमाल कर सकते हैं. उन्होंने हमारी गुज़ारिश मान ली. इसके बाद तो हमने उस पुआल को गद्दे के तौर पर भी इस्तेमाल किया और कंबल के तौर पर भी.’

 

लता मंगेश्कर का गाना और बहादुरशाह ज़फ़र की गज़लें

चीनी जेलों में अपने दिनों को याद करते हुए मेजर जनरल तिवारी ने बताया, ”चीनी अक्सर पब्लिक एड्रेस सिस्टम पर भारतीय संगीत बजाते थे. एक गाना बार-बार बजाया जाता था, वो था लता मंगेश्कर का ‘आजा रे मैं तो कब से खड़ी इस पार’ ये गाना सुन कर हमें घर की याद सताने लगती थी. हमें उस समय बहुत आश्चर्य हुआ जब एक दिन एक चीनी महिला ने आ कर हमें बहादुरशाह ज़फ़र की कुछ गज़लें सुनाईं. शायद ये उर्दू बोलने वाली महिला लखनऊ में कई सालों तक रही होंगी.”

1962 के युद्ध में चीन ने 3942 भारतीयों को युद्धबंदी बनाया था जबकि भारत के हाथ चीन का एक भी युद्धबंदी नहीं लगा था.

भारत ने 1951 में युद्धबंदियों से संबंधित जेनेवा समझौते पर दस्तख़त किए थे जबकि चीन ने जुलाई 1952 में इस समझौते को मान्यता दी थी.

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर रहे सुरेंद्र चोपड़ा ने ‘इंडियन जर्नल ऑफ़ पॉलिटिकल साइंस’ के अक्टूबर, 1968 के अंक में ‘साइनो – इंडियन बॉर्डर कॉन्फ़्लिक्ट एंड द ट्रीटमेंट ऑफ़ प्रिज़नर ऑफ़ वार’ शीर्षक से एक लेख लिखा था जिसमें उन्होंने चीन में रहे एक भारतीय युद्धबंदी को कहते हुए बताया, ”जिस दिन मुझे पकड़ा गया, वहाँ मेरे साथ 15-16 और घायल सैनिक थे. उनको डॉक्टरी सहायता की तुरंत ज़रूरत थी. वो दर्द में चिल्ला रहे थे लेकिन चीनियों ने उनकी तरफ़ कोई ध्यान नहीं दिया. किसी भी घायल को पहले 48 घंटों में खाने के लिए कुछ भी नहीं दिया गया. उनकी दर्द भरी अपील के बावजूद उन्हें पानी की एक बूँद तक नहीं दी गई. ये जेनेवा समझौते की धारा 12-15 का घोर उल्लंघन था.’

 

चीनियों ने ली अतिरिक्त जानकारी

यही नहीं जेनेवा समझौते की धारा 17 के अनुसार बंदी बनाए जाने के बाद युद्धबंदी से सिर्फ़ उसका नाम, सेना रेजिमेंटल नंबर, पद नाम और जन्मतिथि पूछी जा सकती है. लेकिन चीनियों ने भारतीय युद्धबंदियों से एक फ़ॉर्म भरवाया जिसमें पूछा गया था-

1. आपके पास कितनी ज़मीन है?

2. आपके कितने घर हैं?

3. आपकी वार्षिक आय क्या है?

4. आपके परिवार में कितने सदस्य हैं?

5. आप किस राजनीतिक दल के समर्थक हैं?

6. आपने कितने देशों का दौरा किया है?

सुरेंद्र चोपड़ा लिखते हैं कि ‘जब भारतीय सैनिकों ने ये जानकारी लेने का विरोध किया तो चीनियों ने कहा कि ये जानकारी आपकी अपनी सरकार ने आपकी पहचान के लिए मंगवाई है. इसके अलावा सैनिकों से सेना की तैनाती, उनके हथियारों और उनके अफ़सरों के बारे में भी पूछा गया जोकि जेनेवा समझौते का साफ़ उल्लंघन था.’

 

जवानों को अफ़सरों की बेइज़्ज़ती के लिए उकसाया गया

जेनेवा समझौते की धारा 11 में कहा गया है कि युद्धबंदियों को दिया जाने वाला भोजन मात्रा, गुणवत्ता और भिन्नता में बंदी बनाने वाले देश के सैनिकों के समकक्ष होना चाहिए. लेकिन चीन में भारतीय युद्धबंदियों को प्रतिदिन 1400 कैलोरी से अधिक भोजन नहीं मिला जबकि वो भारत में प्रतिदिन 2500 कैलोरी भोजन के आदी थे.

इसके अलावा वरिष्ठ अधिकारियों की हर जगह बेइज़्ज़ती की गई. एक वरिष्ठ अधिकारी ने एक हलफ़नामे में कहा, ”चीनियों ने हमसे बार-बार कहा कि अब हम अफ़सर नहीं रहे. उन्होंने हमारे जवानों से कहा कि उन्हें अपने अफ़सरों को सलाम करने की कोई ज़रूरत नहीं. बल्कि उन्होंने जवानों को अपने अफ़सरों के प्रति सम्मान दिखाने के लिए बढ़ावा दिया. जब भी हमारे जवान हमें सलाम करते चीनी उन पर चिल्लाते और कहते कि इनमें और तुममें कोई फ़र्क़ नहीं है. ये भी तुम्हारी तरह युद्धबंदी हैं. इसका एकमात्र उद्देश्य था हमारे सैनिकों में अनुशासनहीनता को बढ़ावा देना. हमसे हमारे जवानों के सामने राशन, ईंधन और पानी उठवाया जाता और कैंप में झाड़ू लगाने के लिए कहा जाता. कुछ जवानों पर चीनियों की इस मुहिम का असर भी पड़ा.”

 

भारतीय युद्धबंदी

 

ख़ून से सनी पट्टियों को धोकर दोबारा इस्तेमाल

2 राजपूत यूनिट के मेजर ओंकार नाथ दुबे को नामका छू की लड़ाई में 16 गोलियाँ लगी थीं. घायल हो जाने के बाद चीनियों ने उन्हें बंदी बना लिया था. उनके साथ 70 जवान लड़ रहे थे जिसमें से सिर्फ़ तीन जीवित बचे थे. इस समय वाराणसी में रहे मेजर दुबे को तिब्बत में ल्हासा के पास मार्माँग कैंप में युद्धबंदी के तौर पर रखा गया था.

उन दिनों को याद करते हुए मेजर ओंकारनाथ दुबे बताते हैं, ”टूटे हुए घरों में ही अस्पताल बना दिया गया था. वो नाम का ही अस्पताल था. वहाँ एक्स रे की कोई सुविधा नहीं थी. वहीं मेरे शरीर से 15 गोलियाँ निकाली गईं. जब मैं जनवरी 1963 में भारत वापस लौटा तो 16वीं गोली भारतीय सेना के डॉक्टरों ने निकाली. चीन में मेरे घाव में लगी ख़ून से सनी पट्टियों को पानी में उबालने और सुखाने के बाद दोबारा हमारे शरीर पर लगा दिया जाता था. उनके पास ताज़ी पट्टियाँ और रुई तक नहीं थी.”

 

मेजर ओंकार नाथ दुबे
मेजर ओंकार नाथ दुबे

 

मेजर दुबे आगे बताते हैं, ”हमें सोने के लिए एक चटाई दी गई थी जिस पर बिछाने के लिए बहुत पतला गद्दा दिया गया था. हमारी रज़ाइयाँ भी बहुत गंदी थीं और एक रज़ाई से हम कई लोग काम चलाते थे. खाना बहुत ही ख़राब था. चावल के साथ वहाँ की एक घास की सब्ज़ी दी जाती थी.’

मेजर ओंकारनाथ दुबे बताते हैं कि ”चीनियों का व्यवहार गोरखा सैनिकों के प्रति हम लोगों की तुलना में बेहतर था. उनको खाना भी हमसे बेहतर मिलता था.”

चीनी उनसे कहा करते थे कि नेपाली और चीनी भाई-भाई हैं. उन्होंने नेपाल को सीधे इन गोरखा युद्धबंदियों को वापस भेजने की पेशकश की थी जिसे नेपाल ने अस्वीकार कर दिया था.

 

मेजर ओंकार नाथ दुबे
मेजर ओंकार नाथ दुबे

 

हिंदी चीनी भाईभाई का गाना

ब्रिगेडियर अमरजीत बहल 1962 में सेकेंड लेफ़्टिनेंट के पद पर काम कर रहे थे.

ब्रिगेडियर बहल ने मुझे बताया था, ”हमारी सारी गोलियाँ ख़त्म हो गई थीं. इसलिए हमें न चाहते हुए भी युद्धबंदी बनना पड़ा. चीनी सैनिकों ने मेरे सिर पर पिस्तौल का बट मारा और मेरी पिस्तौल छीन ली. फिर मुझे शेन ई युद्धबंदी शिविर में पहुंचाया गया. इस कैंप में करीब 500 युद्धबंदी थे. भारतीय जवान ही हमारा खाना बनाते थे. इसका एक फ़ायदा मुझे ये हुआ कि मुझे सुबह सुबह फीकी ब्लैक टी मिल जाती थी. खाने में हमें दोनों वक्त रोटी, चावल और मूली की सब्ज़ी ही दी जाती थी. वहाँ हर समय ‘गूँज रहा है चारों ओर, हिंदी चीनी भाई भाई’ – ये गाना बजता रहता था. ये गाना सुन सुन कर हमारे कान पक गए थे.”

 

सेकेंड लेफ़्टिनेंट अमरजीत बहल
दांएं से दूसरे सेकेंड लेफ़्टिनेंट अमरजीत बहल

 

ब्रिगेडियर बहल ने आगे कहा, ‘युद्धबंदी के तौर पर सैनिकों के साथ सख्तियाँ भी होती हैं और मार पिटाई भी. मेरे साथ भी ऐसा हुआ लेकिन मैं उस समय जवान था इसलिए मैंने इसे गंभीरता से नहीं लिया.

चीनी सैनिक अधिकारी अनुवादक की मदद से भारतीय युद्धबंदियों से बात करते थे और उन्हें ये समझाने की कोशिश करते थे कि भारत अमरीका का पिट्ठू है लेकिन हम पर उसका कोई असर नहीं हुआ.

‘फिर वो दिन भी आया जब बहल और उनके साथियों को छोड़ने का ऐलान हुआ. ‘

 

बहल

अमरजीत बहल सात महीने बाद चीनी युद्धबंदी शिविर से स्वदेश लौटे थे

 

बहल याद करते हैं, ‘ये सुन कर हमें इतनी खुशी हुई कि समय काटे नहीं कटता था. अगले बीस दिन बीस महीने की तरह लगते थे. हमें गुमला में छोड़ा गया. सीमा पार करते ही हमने भारत की धरती को चूमा और बोला ‘मातृभूमि ये देवतुल्य ये भारत भूमि हमारी.’

बहल ये बताते हुए काफ़ी भावुक हो गए और उनका गला रुंध गया. उन्होंने कहा भारत में कदम रखने के बाद उन्हें दुनिया की सबसे अच्छी चाय मिली. इसमें दूध भी था और चीनी भी और वो चाय उनके लिए अमृत की तरह थी.

 


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adminAugust 31, 20201min3540

लगातार तीन बार भारत को ओलंपिक गोल्ड मेडल्स दिलाने वाले मेजर ध्यानचंद. वही ध्यानचंद जिन्हें आज़ादी से पहले बच्चा-बच्चा जानता था. लेकिन बाद के दिनों में जिन्हें हर किसी ने भुला दिया.

जीवन के अंतिम दिनों में रिटायर्ड मेजर ध्यानचंद को बहुत सी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं ने घेर लिया था. बीमारी, लोगों द्वारा भुला दिए जाने की तकलीफ ने मिलकर मेजर को चिड़चिड़ा कर दिया था. उन्हें देशवासियों, सरकारों और हॉकी फेडरेशन से मिल रहे ट्रीटमेंट पर बहुत कोफ्त होती थी.

मेजर की मौत से लगभग 6 महीने पहले उनके एक दोस्त पंडित विद्यानाथ शर्मा ने उनके लिए एक वर्ल्ड टूर का प्रोग्राम बनाया. शर्मा को लगा था कि इससे मेजर का यूरोप के हॉकी प्रेमियों के साथ दोबारा मिलना हो जाएगा और यह लेजेंड फिर से लोगों की नजर में आ जाएगा. इस टूर के लिए सारी तैयारियां हो चुकी थीं, एयर टिकट्स खरीद लिए गए थे लेकिन मेजर इस टूर पर जाने की हालत में नहीं थे.

 

# बदहाल थे मेजर और उनका परिवार

मेजर के विदेशी दोस्तों ने बेहतर इलाज के लिए उनसे यूरोप आने की गुहार लगाई. लेकिन मेजर ने यह कहते हुए जाने से इनकार कर दिया कि उन्होंने दुनिया देख ली है.

साल 1979 के आखिर में जब एक बार मेजर के बेटे अशोक कुमार हॉकी खेल रहे थे, उन्हें उनके पिता की गंभीर हालत के बारे में बताया गया. इधर मेजर को ट्रेन के जरिए झांसी से दिल्ली लाया गया. लेकिन यहां उन्हें एम्स के जनरल वॉर्ड में धकेल दिया गया. अपने आखिरी दिनों में भी मेजर हॉकी की ही बात करते थे. उन्होंने अपने परिवार को याद दिलाया कि उनके मेडल्स का ध्यान रखा जाए. उन्होंने सख्त लहजे में हिदायत दी कि इस बात का ध्यान रखें कि कोई उनके मेडल्स ना चुरा पाए.

दरअसल कुछ दिन पहले ही किसी ने उनके कमरे में घुसकर कुछ मेडल्स चुरा लिए थे इसलिए मेजर सतर्क थे. इससे पहले भी झांसी में एक प्रदर्शनी के दौरान उनके ओलंपिक मेडल्स चोरी हो गए थे और मेजर इस घटना की पुनरावृत्ति नहीं चाहते थे.

 

2013 में दिल्ली में जूनियर हॉकी वर्ल्ड कप के दौरान 16 टीमों के कप्तानों ने मेजर की प्रतिमा के साथ तस्वीर खिंचवाई थी.

 

मेजर भारतीय हॉकी के गिरते स्तर से भी खफा थे. जब एक बार उनके डॉक्टर ने उनसे भारतीय हॉकी के भविष्य के बारे में पूछा तो मेजर ने कहा,

‘भारत की हॉकी खत्म हो चुकी है’ डॉक्टर ने कहा, ‘ऐसा क्यों?’ मेजर ने जवाब दिया, ‘हमारे लड़के सिर्फ खाना चाहते हैं। वो काम नहीं करना चाहते’

यह कहने के कुछ दिन बाद 3 दिसंबर, 1979 को उनकी मृत्यु हो गई. क्लियरेंस मिलने में आई शुरुआती दिक्कतों के बाद झांसी हीरोज के ग्राउंड में उनका अंतिम संस्कार हुआ. यह मेजर का ही बनाया हुआ हॉकी क्लब था. अंतिम संस्कार के समय मेजर की बटालियन पंजाब रेजिमेंट ने उन्हें पूरा मिलिट्री सम्मान दिया.

 

# अशोक का संन्यास

मिलिट्री ने तो अपना काम पूरा किया लेकिन सरकारों और उनकी जी-हज़ूरी करने वालों द्वारा मेजर और उनके परिवार का अपमान यहीं नहीं रुका. इंडियन हॉकी ऑफिशल्स ने मेजर के बेटे अशोक कुमार को साल 1980 मॉस्को ओलंपिक के लिए लगे कैंप में शामिल नहीं होने दिया. दरअसल अशोक अपने पिता की मौत के बाद के संस्कारों और सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाने के चलते कैंप के लिए लेट हो गए थे. और हॉकी इंडिया के अधिकारियों ने इसे अनुशासनहीनता मानते हुए उन्हें कैंप अटेंड करने से रोक दिया. इस भारी बेइज्जती से आहत अशोक ने तुरंत प्रभाव से हॉकी से संन्यास ले लिया.

अपनी मौत से दो महीने पहले मेजर कहा था,

‘जब मैं मरूँगा, पूरी दुनिया रोएगी लेकिन भारत के लोग मेरे लिए एक आंसू नहीं बहाएंगे, मुझे पूरा भरोसा है.’

भारत देश, हॉकी इंडिया, सरकार सभी उनके भरोसे पर खरे उतरे.


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adminAugust 29, 20202min2950

18वीं सदी का मध्यकाल था. यूरोप में धर्म का वितंडा अपने प्रचंड रूप में विद्यमान था. चर्च और पोप के शब्द ही कानून थे. उसे राज्य सत्ता का वरदहस्त हासिल था. फ्रांस का कुलीन वर्ग अपने एश्वर्य में डूबा हुआ क्रांति के सपने देख रहे राजनीतिक चिंतकों की सोच का उपहास उड़ाता. फ्रेंच नोबेलिटी को लगता था कि यथास्थिति बदल ही नहीं सकती है. ब्रेड और सस्ती शराब की जुगाड़ में जुटा एक आम फ्रांसीसी दैवतुल्य राजा के खिलाफ बागी हो जाएगा. इसका अंदाजा उसे नहीं था.

लेकिन बदलाव तो शुरू हो चुका था. फ्रांस में बौद्धिक नवजागरण की हवा चलने लगी थी. लोगों में अकुलाहट थी. इसी सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में पेरिस में अवतरण हुआ रूसो का. पूरा नाम था ज्यां जाक रूसो.

रूसो का जन्म जिनेवा में हुआ था, लेकिन बौद्धिक स्पंदन की चिंगारी उन्हें फ्रांस में मिली. फ्रांस का तत्कालीन समाज, बहुसंख्यकों की गरीबी और कुलीनों की विलासिता ने रूसो के मन में मंथन पैदा कर दिया.

 

एक निबंध से इंटेलेक्चुअल बन गए रूसो

रूसो जब युवा थे तो फ्रांस में कला, विज्ञान आधुनिकता पर खूब बहस हो रही थी. रूसो को एक निबंध प्रतियोगिता की जानकारी मिली. इस प्रतियोगिता का विषय था ‘विज्ञान और कला का विकास सामाजिक शुचिता को निखारती है अथवा नैतिक भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है?’

इस प्रतियोगिता ने अप्रत्याशित रूप से रूसो को पहली बार यूरोप के बौद्धिकों में स्थापित कर दिया. इस निबंध में रूसो ने कहा कि सभ्यताएं और विकास ने मानव की स्थिति में सुधार नहीं किया है. रूसो ने तर्क देते हुए कहा कि अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान के विकास ने उस मनुष्य का नैतिक पतन किया है जो कभी खुश था और संतुष्ट जीवन जीता था.

बाद में रूसो की ये विचारधारा उनके दर्शन का मूल चरित्र बन गई. यूरोप के प्रगतिवादियों ने रूसो की तीखी आलोचना की, लेकिन अपने तर्कों के दम पर रूसो इस बौद्धिक सर्किल में पहली बार घुसपैठ कर चुके थे.

 

गरीबी ईश्वरीय न्याय नहीं है

फ्रांस की जनता को अपनी दुर्दशा का भान तो था पर इसे वो ईश्वरीय न्याय या फिर हमारे अपने शब्दों में कहें तो भाग्य का फेर मानकर चुप बैठा हुआ था. चर्च भी उसे कुछ ऐसा ही सिखाता था.

लेकिन रूसो ने अपनी रचनाओं से इस धारणा को झिंझोड़ कर रखा दिया. उन्होंने ब्रेड की चिंता में जकड़े नागरिकों के मन में अधिकारों और हक के लिए स्फूरण पैदा किया. उन्होंने गरीबों को बताया कि उन्हें अपने हाल में शर्मिंदा होने की कोई जरूरत नहीं है. ये भेद कृत्रिम है और इसे राज और धर्म सत्ता ने अपने फायदे के लिए बनाया है. स्टेट इस यथास्थिति को बरकार रखने के लिए धार्मिक नैतिकता और कई दूसरे वितंडे का सहारा लेता है. उन्होंने युवा-युवतियों के दिलों में बदलाव की आग जलाई और कहा कि या तो इस स्थिति को बदल देना है या फिर इस कोशिश में न्योछावर हो जाना है. अपनी पुस्तक Discourse on Inequality में उन्होंने इस पर विस्तार से चिंतन किया है.

 

प्रजातंत्र, स्वतंत्रता और समानता के पैरवीकार

इस प्रक्रिया में रूसो प्रजातंत्र, स्वतंत्रता और समानता के पैरवीकार बन जाते हैं. उन्होंने राज्य के दैवीय सिद्धांत को चुनौती दी, जो कहता है कि राज्य ईश्वर द्वारा स्थापित संस्था है, और राजा ईश्वर का प्रतिनिधि है, इसलिए वह सिर्फ ईश्वर के प्रति उत्तरदायी है, राजाज्ञा का पालन हर नागरिक का धार्मिक कर्तव्य है. इस सिद्धांत में राजसत्ता पैतृक है, अर्थात पिता के बाद पुत्र सत्ता का अधिकारी होता है.

 

सोशल कान्ट्रैक्ट में दैवीय सिद्धांत की खिल्ली

साल 1762 में रूसो की युगांतकारी रचना The Social Contract (सामाजिक समझौता) छपी. इस किताब में रूसो ने मनुष्य में निहित संप्रभुता को सर्वोपरि माना. सोशल कान्ट्रैक्ट के माध्यम से रूसों ने कहा कि राजा का पद कोई दैवीय वस्तु नहीं है.

रूसो कहते हैं कि जनता ने कभी राज्य को अपना अधिकार सरेंडर किया ताकि राजा जनता को शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करने में सहायता कर सके. पर यदि शासक अपने अधिकारों का दुरूपयोग करता है तो जनता को अधिकार है कि वह ऐसे निरंकुश राजा के विरूद्ध विद्रोह करे.

रूसो ने मानव के अधिकारों की घोषणा की और स्वतंत्रता और समानता को मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार बताया. उन्होंने कहा कि इन अधिकारों की प्राप्ति लोकतांत्रिक व्यवस्था में ही मुमकिन है. हालांकि रूसो अपनी किताब में Representative democracy की बजाय  Direct democracy की चर्चा करते हैं. प्रत्यक्ष लोकतंत्र शासन की वो पद्धति है जहां नीति निर्माण में जनता की प्रत्यक्ष रूप से भागीदार होती है.

 

मनुष्य को सामाजिक समझौता करने की जरूरत क्यों पड़ी?

रूसो ने इस किताब में बहुत खूबसूरती से बताया है कि मनुष्य को सामाजिक समझौता करने की जरूरत क्यों पड़ी. पहले तो रूसो ये मानते हैं कि आदिम मनुष्य का स्वभाव निछोह और निष्पाप है. वह स्वभाविक रूप से निर्दोष है. रूसो के मुताबिक मनुष्य प्राकृतिक अवस्था में स्वाभाविक रूप से स्वतंत्र और पशुतुल्य था. रूसो प्राकृतिक अवस्था के मनुष्य के लिए Noble savage (भद्र वनवासी) शब्द का प्रयोग करते हैं. इस दौर का मनुष्य अपने आप में संतुष्ट था और वो उसकी इच्छा किसी का अहित करने की नहीं था. इस समय वह एक अज्ञानी होकर सुखी जीवन गुजारता था. उसकी जिंदगी में क्लेष न थे.

इस स्थिति में बदलाव तब आया जब कृषि का आविष्कार हुआ. सीमित जमीन पर मालिकाना हक जमाने की होड़ शुरू हुई. मनुष्य ज्यादा से ज्यादा भूमि पर अधिकार जताने लगा. इसके मनुष्य के शांतिमय जीवन में बड़ी भारी बाधा आई.

 

मनुष्य जन्मा स्वतंत्र जरूर है, लेकिन हर जगह  बेड़ियों में कैद है

दरअसल रूसो ‘सोशल कान्ट्रैक्ट’ के शुरुआत में ही लिखते हैं, “मनुष्य स्वतंत्र पैदा होता है, किंतु वह सर्वत्र जंजीरों से जकड़ा हुआ है.”

रूसो दरअसल कहना चाहते हैं कि मनुष्य स्वभावत: अच्छा है लेकिन समाज का निर्माण और वहां से पैदा हुई संपत्ति और प्रभुत्व की इच्छा ही मानवीय अच्छाई में बाधक बनती है.” मानव के अज्ञानता और बर्बरता से सभ्यता और समृद्धि के सफर में रूसो की ये पंक्तियां मनुष्य के लिए हमेशा प्रकाश साबित हुई हैं.

 

समाज की स्थापना के लिए संपत्ति उत्तरदायी

रूसो समाज की स्थापना के लिए बड़ी रोचक प्रक्रिया बताते हैं. रूसो लिखते, “वह पहला व्यक्ति नागरिक समाज का वास्तविक जन्मदाता और निर्माता था जिसने एक भू-भाग को घेरकर ऐलान किया कि ‘यह मेरी जमीन है’ और उसे अपने इस कथन पर विश्वास करने वाले सरल व्यक्ति मिल गए.”

जमीन पर आधिपत्य और उत्तरोत्तर महात्वाकांक्षा में वृद्धि की इसी प्रक्रिया में मनुष्य का प्राकृतिक दशा का आदर्श रूप नष्ट हो गया और संघर्ष पैदा होने लगे. इस वातावरण का अंत करने के लिए व्यक्तियों ने पारस्परिक समझौते द्वारा समाज की स्थापना का निर्णय किया.

इसी प्रक्रिया में रूसो ने लोकप्रिय संप्रभुता के सिद्धांत का प्रतिपादन किया. जिसका अर्थ है कि अंतिम शक्ति जनता में निहित है. शासक वर्ग शासन का संचालन जनहित के लिए करेगा न कि अपने स्वार्थों के लिए, इसके अलावा इसके राज करने का अधिकार तबतक है जब तक उसे जनता का भरोसा हासिल है. राज्य की संप्रभुता के लिए उन्होंने ‘सामान्य ‘इच्छा’ शब्द का प्रयोग किया. रूसो ‘सामान्य इच्छा पर आधारित एक ऐसे समाज के निर्माण की कल्पना करते हैं, जो स्वतंत्रता, समानता तथा भ्रातृत्व पर आधारित हो.

रूसो की पुस्तक द सोशल कॉन्ट्रैक्ट को तत्कालीन यूरोपीय समाज में जबर्दस्त प्रसिद्धि मिली. किताब की प्रतियां धड़ाधड़ बिकने लगी. किताब के अर्थ और संदेश ने फ्रांसीसी समाज में खलबली मचा दी. इस किताब से पहले ही रूसो अपने विचारों के लिए सरकार की आंखों में खटकने लगे थे. इस किताब के आते ही फ्रांस और जिनेवा की सरकार ने इस किताब पर रोक लगा दी.

 

सोशल कॉन्ट्रैक्ट के आने के 27 साल बाद ही हुई फ्रांस की क्रांति

फ्रांस का राजनीतिक तापमान चढ़ने लगा. लुई वंश की राजशाही और तानाशाही के खिलाफ लोग मुखर होने लगे. फ्रांस में क्रांति की आंच सुलगती रही. ये पुस्तक 1762 ईस्वी में आई थी, इसके 27 साल बाद 1789 में फ्रांस की क्रांति हुई और दुनिया का राजनीतिक-सामाजिक स्वरूप हमेशा-हमेशा के लिए बदल गया. इस क्रांति के साथ ही शासन की लोकतांत्रिक अवधारणा का जन्म हुआ. स्वतंत्रता, समानता और बधुंत्व को इस शासन का आधार बनाया गया.

फ्रांस की क्रांति पर रूसो के प्रभाव का अंदाजा नेपोलियन बोनापार्ट के एक कथन लगाया जा सकता है कि जिन्होंने कहा था कि यदि रूसो न हुआ होता, तो फ्रांस की क्रांति भी नहीं हुई होती.

 

9 दिन में मां चल बसी, 10 साल में पिता

रूसो के दर्शन के निखरने में उनके बचपन का बिखरना शामिल है. रूसो 28 जून 1712 को जेनेवा में पैदा हुए थे, जब 9 दिन के ही थे तब मां चल बसी. रूसो ने आगे चलकर इसे अपना पहला दुर्भाग्य कहा. पिता मामूली घड़ीसाज थे. बालक रूसो का पालन-पोषण मामा-मामी ने किया. रूसो जब 10 साल के हुए तो पिता भी उनको छोड़कर चले गए.

माता-पिता के स्नेह लाड से वंचित किशोर रूसो अस्थिर प्रकृति के बन गए. अस्थिरता और आवेग उनके स्वभाव का हिस्सा बन गया. इस बीच रूसो जिनेवा से फ्रांस आ गए. यहां पर वे अपने आयु में 12 वर्ष बडी लुइस दि वार्न नाम की महिला के संपर्क में आए और दोनों प्रेम के बंधन में बंध गए. इस वक्त रूसो की आयु 17 साल थी.

जीवन में स्थिरता आते ही रूसो धर्म की ओर आकर्षित हुए, वे कैथोलिक रीति-रिवाज को मानने लगे. इस महिला के साथ रूसो का संबंध उतार-चढ़ाव भर रहा. 1744 में रूसो थेरेसा लेवाशियर नाम की एक दूसरी महिला के संपर्क में आए.
इस रिश्ते से दोनों के पांच बच्चे हुए.

 

पांचों बच्चों को अनाथालय भेजा

यहां रूसो की जिंदगी का एक विचित्र पहलू सामने आया. जो रूसो एमिली नाम की अपने पुस्तक बच्चे का सहज पालन पोषण और बाल अधिकारों की पैरवी करते हैं उन्होंने अपने खुद के पांच बच्चों को पालन-पोषण के लिए चर्च के अनाथालय भेज दिया. रूसो के विरोधियों जैसे वाल्तेयर ने इस काम के लिए जीवन भर उनकी आलोचना की.


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adminAugust 18, 20201min3510

एमएस धोनी. इंटरनेशनल क्रिकेट को हमेशा के लिए अलविदा कह गए हैं. हालांकि आईपीएल में वो अब भी फैंस को दिखते रहेंगे. लेकिन संन्यास के बाद धोनी की पुरानी जीत, उपलब्धियां और बहुत-सी चीज़ों की बातें हो रही हैं. इसी बीच सोशल मीडिया पर एक पुराना स्कोरकार्ड भी वायरल हो रहा है.

ये स्कोरकार्ड है बिहार अंडर-25 और तमिलनाडु अंडर 25 के एक मैच का. साल 2002-03 में नेशनल अंडर 25 नाम का टूर्नामेंट खेला गया. इसका एक मैच बैंगलोर में खेला गया. धोनी बिहार की तरफ से इस मैच का हिस्सा बने.

 

इस स्कोरकार्ड में धोनी ने अनोखा कमाल किया

इसमें बिहार की पारी का स्कोरकार्ड दिखाया गया है, जिसमें बिहार की टीम ने 60.4 ओवर बैटिंग की और 244 रन बनाए. इस स्कोरकार्ड में धोनी सबसे बड़े स्कोरर रहे. उन्होंने 64 गेंदों में 66 रन बनाए. अब आप सोच रहे होंगे कि इसमें कौन-सी बड़ी बात है, धोनी के लिए 66 रन बनाना तो एक मामूली-सा काम है.

लेकिन खास बात ये है कि पहला तो धोनी इस मैच में पारी ओपन करने उतरे. दूसरा ये कि उन्होंने जो 66 रन बनाए, इसमें 15 चौके एक छक्का लगाया. अब समझिए 15 x 4 होता है 60 रन और जमा एक छक्का हो गए 66 रन. यानी के धोनी इस पारी में एकदम ‘वन मैन आर्मी’ की तरह खेले. ओपन करते हुए उन्होंने अपने साथी स्ट्राइकर को एक बार भी स्ट्राइक नहीं दी.



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