सक्सेस स्टोरी

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adminOctober 1, 20201min6260

देश में उद्यमियों के बाद नए आइडिया तो हैं, लेकिन पूंजी की कमी उन इरादों को आगे बढ़ने में बड़ी बढ़ा साबित होती है। फिर भी कुछ उदाहरण ऐसे भी हैं जिन्होने 20 हज़ार रुपये से भी कम निवेश के साथ अपना व्यवसाय शुरू करते हुए करोड़ों की कंपनी खड़ी की।]

भारत देश में उद्यमियों के पास नए आइडिया की कमी नहीं है, हालांकि पूंजी की कमी जरूर इनके रास्ते में बड़ी बाधा के रूप में खड़ी रहती

फंड तक पहुंच भारत में उद्यमिता की सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है। D&B इंडिया के शोध से पता चलता है कि केवल चार प्रतिशत छोटे उद्यमियों और उद्यमों के पास ही वित्त के एक औपचारिक स्रोत तक पहुंच है, इसके अलावा उद्यमियों की बैंक क्रेडिट भी घट रही है।’

उद्यमियों को पहली बार अपना व्यवसाय शुरू करने के लिए परिवार और दोस्तों, व्यक्तिगत बचत या ऋण पर निर्भर रहना पड़ता है। कई मामलों में ये उद्यमी 20,000 रुपये से अधिक नहीं जुटा पा रहे हैं।

पूंजी भले ही छोटी हो सकती है, लेकिन उद्यमियों के सपने बड़े हैं, इसी के साथ सफल होने की उनकी इच्छा और भी बड़ी है।

नीच हम ऐसे ही पाँच उद्यमियों के बारे में आपको बता रहे हैं, जिन्होने 20 हज़ार या उससे भी कम पूंजी के साथ अपना व्यवसाय शुरू किया और आज करोड़ों रुपये मूल्य की कंपनी की स्थापना कर चुके हैं।

 

राहुल जैन – eCraftIndia.com राहुल जैन,

संस्थापक और बिजनेस हेड, eCraftIndia राजस्थान के जयपुर में जन्मे और पले-बढ़े होने के चलते हस्तशिल्पियों ने हमेशा ही राहुल जैन को मंत्रमुग्ध किया, लेकिन जब राहुल ने मुंबई के एक मॉल में कदम रखा तो वह हैरान रह गए कि राजस्थान के हस्तशिल्प की कीमत वहाँ इतनी अधिक थी।

इसी अनुभव ने राहुल को कारीगरों और शिल्पकारों के साथ सहयोग करने और बिचौलियों को काटकर किफायती उत्पाद बेचने के लिए अपनी खुद की ईकॉमर्स कंपनी खोलने के लिए प्रेरित किया। 2014 में, राहुल, अंकित अग्रवाल और पवन गोयल ने eCraftIndia.com की स्थापना मात्र 20,000 रुपये की पूंजी के साथ की थी।

शुरुयात एक छोटे से ऑनलाइन हैंडीक्राफ्ट स्टोर के रूप में हुई और इसका पहला उत्पाद लकड़ी का हाथी था, जिसकी कीमत 250 रुपये थी। कुछ वर्षों में इसका विस्तार हुआ और गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के कलाकार भी इसके साथ जुड़े। फिलहाल eCraftIndia.com ने अपनी विनिर्माण इकाई भी खोल ली है।

आज राहुल की कंपनी के संग्रह में 9,000 से अधिक स्टॉक कीपिंग यूनिट हैं और आज यह भारत के सबसे बड़े हस्तशिल्प ई-स्टोरों में से एक है, जो कि 12 करोड़ रुपये सालाना कारोबार करता है।

आरएस शानबाग – वैल्यूपॉइंट सिस्टम

उद्यमी बनने से पहले, आरएस शानबाग एक छोटे से गाँव से निकले हुए एक इंजीनियर थे। साल 1991 में उनकी जेब में 10,000 रुपये थे और उन्होंने एक छोटी-सी कंपनी शुरू करने के लिए इसका इस्तेमाल किया।

‘वैल्यूपॉइंट सिस्टम्स’ नाम का यह व्यवसाय ग्रामीण लोगों को नौकरी देने के लिए शुरू किया गया था, ताकि उन्हें हरियाली वाले चरागाहों की तलाश में भटकना न पड़े।

उन्होंने इसे बेंगलुरु में शुरू किया, लेकिन जल्द ही इसके तहत छोटे टाउन और कस्बों से स्नातकों को हायर कर उन्हे टेक्नालजी और सेवाओं की ट्रेनिंग देना शुरू कर दिया गया।

जल्द ही कंपनी ने आईटी क्षेत्र की तरफ रुख कर लिया और बड़ी कंपनियों की इन्फ्रास्ट्रक्चर जरूरतों को पूरा करने लगी। आज वैल्यूपॉइंट दक्षिण एशिया की प्रमुख आईटी इन्फ्रास्ट्रक्चर सेवा कंपनी है। कंपनी का बिजनेस जल्द ही 600 करोड़ पार करने वाला है।

 

पुनीत कंसल – रोल्स मेनिया

साल 2009 में 18 वर्षीय पुनीत कंसल ने पुणे में रोल्स मेनिया की शुरुआत की। उन्होंने 20,000 रुपये की पूंजी के साथ काठी रोल व्यवसाय शुरू किया। ये पैसे उन्होंने एक दोस्त से उधार लिए थे। शुरुआती समय में मागरपट्टा शहर के एक रेस्तरां के बाहर एक मेज के आकार का स्टॉल चलाया गया, जहां सिर्फ एक ही शेफ था।

इस दौरान पुनीत ने कुछ ग्राहकों गगन सियाल और सुखप्रीत सियाल से दोस्ती की जो रेस्तरां क्षेत्र में उद्यमी थे। जब उन्होंने पुनीत के व्यवसाय में क्षमता को पहचाना, तो वे रोल्स मेनिया को पंजीकृत करने और 2010 में दूसरा आउटलेट खोलने के लिए पुनीत के साथ आए।

उन्होंने धीरे-धीरे इसकी स्केलिंग शुरू कर दी और ऐसे मौके पर जब डिलीवरी पार्टनर्स न होने पर उन तीनों ने व्यक्तिगत रूप से खाना डिलीवर किया। रोल्स मेनिया कुछ ही वर्षों में चर्चित हो गया। पुनीत ने फ्रैंचाइज़ी मॉडल के लिए दरवाजे खोले और कंपनी का विस्तार 30 शहरों में किया गया।

आज, पुनीत की कंपनी के देश भर में 100 से अधिक आउटलेट हैं, जहां प्रत्येक दिन लगभग 12,000 रोल बेंचे जाते हैं। यह कंपनी 35 करोड़ रुपये का सालाना कारोबार कर रही है।

 

नितिन कपूर – इंडियन ब्यूटीफुल आर्ट

हाथ मिलाने से पहले नितिन कपूर ने एक निजी बैंक में काम कर रहे थे और अमित कपूर ईबे के साथ काम कर रहे थे, इसके बाद दोनों ने मिलकर कुछ नया करने का निश्चय किया। उन्होंने परिधान उद्योग द्वारा बड़े पैमाने पर उत्पन्न कचरे पर ध्यान दिया, साथ ही उन्होंने उद्योग में पानी जैसे बहुमूल्य संसाधनों की बरबादी पर भी ध्यान दिया।

इसने उन्हें 10,000 रुपये के निवेश के साथ एक ईकॉमर्स कंपनी शुरू करने के लिए प्रेरित किया, जो ‘जस्ट इन टाइम’ इन्वेंट्री प्रबंधन पद्धति का पालन करती थी। उनकी कंपनी, इंडियन ब्यूटीफुल आर्ट ने सुनिश्चित किया कि ग्राहक द्वारा ऑर्डर देने के बाद ही कपड़ों का निर्माण किया जाए। नितिन ने यह देखा कि मुद्रण से उत्पाद को भेजने तक की प्रक्रिया 48 घंटों के भीतर पूरी हो और इसमें प्रकृतिक संसाधन बिलकुल भी बरबाद न हो।

उन्होंने अमेरिका और यूके सहित अन्य देशों में बेचने के लिए खंबात, अहमदाबाद, जयपुर, मेरठ, कोलकाता, खुर्जा, मुरादाबाद, लुधियाना, अमृतसर, मुंबई, नई दिल्ली, हैदराबाद और लखनऊ में स्थित निर्माताओं से उत्पाद मंगवाए।

आज, इंडियन ब्यूटीफुल आर्ट वैश्विक स्तर पर भारतीय उत्पादों के ई-कॉमर्स क्षेत्र में सबसे बड़े ऑनलाइन विक्रेताओं में से एक है। कंपनी 30 करोड़ रुपये का सालाना कारोबार करती है।

 

जुबैर रहमान – द फैशन फैक्ट्री

2014 में इलेक्ट्रिकल इंजीनियर जुबैर रहमान तमिलनाडु के तिरुपुर में एक सीसीटीवी ऑपरेटर के तौर पर काम कर रहे थे, लेकिन 21 वर्षीय रहमान ने अपना खुद का व्यवसाय शुरू करने का सपना देख रखा था। इसी बीच एक दिन, उन्हें एक ईकॉमर्स कंपनी के कार्यालय में सीसीटीवी लगाने का अनुरोध मिला।

उन्होंने वहाँ के मैनेजर से बात की और समझा कि कैसे कंपनी ऑनलाइन सोर्सिंग और आइटम बेचकर पैसा कमा रही है। ई-कॉमर्स जुबैर के लिए सही था, क्योंकि उन्हे निर्माण में भारी निवेश नहीं करना था।

इससे प्रेरित होकर उन्होंने सिर्फ 10,000 रुपये के निवेश के साथ अपने घर से एक ईकॉमर्स कंपनी ‘द फैशन फैक्टरी’ शुरू की। उन्होंने तिरुपुर से कपड़ा मंगवाया और इसे फ्लिपकार्ट और अमेज़ॅन पर कॉम्बो पैक तरीके से लिस्ट करना शुरू कर दिया। कॉम्बो पैक में बिकने से कपड़े सस्ते हो गए।

जुबैर ने प्रति बिक्री कम लाभ देखा, लेकिन उनकी प्रति-यूनिट की कम कीमतों ने लोगों ध्यान आकर्षित किया और इसी के साथ उनके पास बड़ी संख्या में ऑर्डर आना शुरू हो गए। जुबैर की रणनीति ने इतनी अच्छी तरह से काम किया कि ‘द फैशन फैक्टरी’ को अब प्रति दिन 200 से 300 ऑर्डर मिलते हैं। उन्होंने अमेज़न पर इन्हे बेचने के लिए एक विशेष सौदे पर भी हस्ताक्षर भी किए हैं। फैशन फैक्ट्री सालाना 6.5 करोड़ रुपये का राजस्व उठा रही है और अगले वर्ष 12 करोड़ रुपये के राजस्व का लक्ष्य निर्धारित है।


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adminSeptember 26, 20201min7700

हम ऐसी दुनिया में रहते हैं, जहां फर्स्ट इंप्रेशन काफी मायने रखता है। पहली मुलाकात के बाद सामने वाला शख्स हमारे बारे में जो राय बनाता है, उसी पर काफी हद तक हमारे रिश्ते का भविष्य टिका होता है। अगर पहली मुलाकात में ही किसी को प्रभावित करना हो तो कपड़ों का रोल काफी अहम हो जाता है। कई बार लोगों कपड़ों के आधार पर ही सामने वाले को जज करते हैं।

चाहे महिलाएं हों, पुरुष हों या फिर बच्चे हों, हर किसी को साफ-सुथरे कपड़े पहनना पसंद होता है। हालांकि, सभी को कभी न कभी अपने धोबी से शिकायत हो जाती है। कई बार दाग सही से साफ न करने को लेकर धोबी से बहस बन जाती है तो कभी कपड़ों का नुकसान इसकी वजह बनता है। संध्या नांबियार ने आम आदमी को इन्हीं परेशानियों से छुटकारा दिलाने के लिए 2017 में इस्तरीपेटी की नींव रखी थी। यहां कपड़ों को ग्राहकों के दिशानिर्देश के मुताबिक काफी सावधानी से धोया जाता है। इस्तरी करते समय भी कपड़ों का खास ख्याल रखा जाता है।

तमिल में इस्तरी पेटी का मतलब एक लोहे का प्रेस होता है, जिसमें कोयला भरकर गर्म करके कपड़ों पर इस्तरी की जाती है। संध्या की इस्तरीपेटी एक प्रोफेशनल आयरनिंग और लॉन्ड्रिंग बिजनेस है। यह बी2बी (बिजनेस टू बिजनेस) और बी2सी (बिजनेस टू कंज्यूमर) दोनों तरह के क्लाइंट्स को सर्विस देता है।

 

संध्या बताती हैं,

‘हम अपने सभी ग्राहकों को सुगंधित इस्तरी किए हुए कड़क और करीने से सजे कपड़े देना चाहते हैं, ताकि उनसे बिल्कुल नए कपड़ों जैसी महक आए। भारत में लॉन्ड्री बड़े पैमाने पर असंगठित क्षेत्र है। हम इस्तरीपेटी के साथ इस काम को आसान बनाना चाहते हैं, जिससे ग्राहक की खुशी और संतुष्टि मिले।’

इस्तरीपेटी का चेन्नई में स्थित है। यह स्टार्टअप कपड़ों को घर, ऑफिस या ग्राहकों की सुविधा के हिसाब से कहीं भी लाता है और फिर उनकी बताई जगह पर डिलीवर कर देता है। इसका मतलब है कि आपको रोजाना अपने धोबी से कपड़ों के धब्बे, बदबू, नकद लेन-देन या समय को लेकर बहस नहीं करनी पड़ेगी।

 

इस्तरीपेटी की शुरुआत की कहानी

हर घर में लोगों को कपड़े धोने और आयरन करने से दिक्कत होती है। हम भारतीयों को परेशानी इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि हम अलग-अलग और नाजुक वेरायटी वाले कपड़ों का इस्तेमाल करते हैं।

 

संध्या बताती हैं,

‘मैं एक वर्किंग प्रोफेशनल थी। मैं भी इस काम से नफरत करती थी। मुझे अक्सर दाग या कपड़े गायब होने को लेकर धोबी से बहस करनी पड़ती थी। इन सबने मुझे सोचने पर मजबूर किया कि हर घर में कपड़े धोने की जरूरत पड़ती है, फिर भी इस काम को पुराने ढंग से चलाया जा रहा है।’

 

संध्या अपने बिजनेस आइडिया के बारे में बताते हुए कहती हैं,

‘हम पहले पड़ोस की किराना दुकानों पर फोन करके समान मंगाते थे। फिर उसमें थोड़ा बदलाव करके एप्लिकेशन का रूप दे दिया गया। मैंने इस आइडिया को कपड़े धोने के कारोबार में भी आजमाने का फैसला किया।’

संध्या एक एचआर प्रोफेशनल्स रह चुकी हैं। उन्होंने लॉन्ड्री सेगमेंट पर रिसर्च करते समय महसूस किया कि यह महत्वपूर्ण सेगमेंट असंगठित है, जिस पर पेशेवर नजरिए से ध्यान नहीं दिया गया है। उन्हें लगा कि अभी इस क्षेत्र में काफी कुछ करने की गुंजाइश है। संध्या ने फिर अपनी तरह के सोच वाले दोस्तों के साथ इस आइडिया पर काम करना शुरू किया।

इस तरह उनके दिमाग की उपज से इस्तरीपेटी का जन्म हुआ। इसे जनवरी 2018 में चेन्नई के नुंगमबक्कम में एक माइक्रो-साइज स्टीम आयरनिंग यूनिट के रूप में शुरू किया गया था। अब यह स्टार्टअप शहर के पल्लीकरनई में स्थापित एक छोटी फैक्ट्री बन गया है। यहां कपड़े धोने और स्टीम आयरन जैसी सुविधाएं मिलती हैं। यह हॉस्पिटैलिटी सेक्टर और रिटेल ग्राहकों को सर्विस देता है। इस्तरीपेटी को सबसे बड़ी कामयाबी तब मिली, जब इसने ओयो और कंपास के साथ कारोबारी समझौता किया।

 

संध्या बताती हैं,

‘हम पूरे शहर में OYO को सर्विस देते हैं। हमें कंपास के जरिए फोर्ड और शेल जैसी मल्टीनेशनल कंपनियों का काम मिला। यह इस्तरीपेटी जैसे स्टार्टअप के लिए काफी शानदार अनुभव है।’

 

कारोबारी चुनौतियां

इस्तरीपेटी को कारोबार जमाने की राह में कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उन्हें लोगों को समझाना पड़ा कि स्टीम आयरनिंग किस तरह से आम आयरनिंग से अलग है। स्टार्टअप के सामने कपड़ों की सुरक्षा और क्वॉलिटी बरकरार रखने का भरोसा देने की चुनौती भी थी। भारत में लोग कीमतों को लेकर काफी संवेदनशील होते हैं। इसलिए इस्तरीपेटी की सर्विस को मध्यम-वर्गीय परिवारों और कामकाजी पेशवरों के लिए किफायती बनाने का चैलेंज भी था। हालांकि, संध्या इन सब चुनौतियों से निपटते हुए अपने स्टार्टअप को अलग पहचान दिलाने में सफल रहीं। हालांकि, संध्या का कहना है कि वह मार्केट को लेकर आशावादी हैं।

 

वह बताती हैं,

‘हमें बी2बी और बी2सी दोनों सेगमेंट में काफी संभावनाएं नजर आती हैं। पिछले कुछ वर्षों में हॉस्पिटैलिटी और अकोमोडेशन (आवास) इंडस्ट्री ने काफी ग्रोथ की है। इसके अलावा आईटी पार्क, इंस्टीट्यूशंस और मेडिकल फैसिलिटीज में बढ़ोतरी से भी बी2बी और बी2सी सेगमेंट में लॉन्ड्री बिजनेस के लिए ग्रोथ के दरवाजे खुले हैं।’

स्टैटिस्टा के मुताबिक, 2019 में लॉन्ड्री केयर सेगमेंट का कारोबार तकरीबन 3.96 अरब डॉलर का है। इसके 2023 तक सालाना 3.7 प्रतिशत बढ़ने की संभावना है। संध्या की इस्तरीपेटी लॉन्ड्री मार्केट में पिकमायलॉन्ड्री, अर्बन धोबी, टूलर जैसे स्टार्टअप के साथ मुकाबला कर रही है। हालांकि, संध्या का कहना है कि इस्तरीपेटी की सर्विस की क्वॉलिटी, डिलीवरी टाइम और डिस्काउंट इसे दूसर स्टार्टअप से अलग करते हैं।

 

और ऐसे बढ़ते गए नंबर

इस्तरीपेटी ने 2018 में सिर्फ दो कर्मचारियों के साथ कारोबार शुरू किया था। फिलहाल, स्टार्टअप के साथ 15 कर्मचारी काम करते हैं। इसके पास अभी 350 से अधिक ग्राहक हैं। यह 3 किलो कपड़ों की धुलाई के लिए 200 रुपये लेता है। वहीं, 3 किलो कपड़ों की धुलाई और इस्तरी का चार्ज 300 रुपये है। इस्तरीपेटी में एक फैमिली पैकेज भी है। इसमें 15 किलो कपड़ों की धुलाई 900 रुपये में होती है।

 

संध्या निवेश के बारे में बात करते हुए कहती हैं,

‘इस्तरीपेटी की शुरुआत 2 लाख रुपये के निवेश के साथ हुई थी। उस वक्त हम सिर्फ स्टीम आयरनिंग सर्विस देते थे। हालांकि, हमें बाद में लगा कि कपड़े धोने जैसी सेवाओं की मांग बढ़ रही है तो हमने उसे भी शुरू किया। हम एक एंजेल (फरिश्ता) इनवेस्टर की मदद से वॉशिंग इक्विपमेंट खरीदने के लिए 11 लाख रुपये जुटाने में कामयाब रहे। हम शहर के भीतर और बाहर कारोबार बढ़ाने के लिए निवेशक तलाश रहे हैं।’

इस्तरीपेटी ने 2017 में 4.2 लाख रुपये का कारोबार किया था। अब यह हर महीने औसतन 4 लाख रुपये कमाती है। यह अपनी मौजूदा सुविधाएं के साथ औसत मासिक बिक्री को 5 लाख रुपये करने का लक्ष्य लेकर चल रही है। संध्या कहती हैं कि हमें अपने स्टार्टअप को लेकर लोगों से शानदार रिस्पॉन्स मिल रहा है। इसलिए इस्तरीपेटी अगले साल तक शहर के मुख्य स्थानों पर कुछ और रिटेल यूनिट खोलने की योजना बना रही है।

 

संध्या ने अपनी बात खत्म करते हुए कहा,

‘हम लॉन्ग टर्म विजन के तौर पर कारोबार में शारीरिक या मानसिक रूप से कमजोर लोगों को भी रोजगार देकर उनके लिए फ्रेंचाइजी बनाना चाहते हैं। इससे न केवल उन लोगों को रोजगार के मौके मिलेंगे, बल्कि यह समाज में उन्हें स्वीकार करने की दिशा में एक बड़ी पहल होगी।’


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adminSeptember 22, 20201min6030

गीता सिंह ने नई दिल्ली में 10×10 फीट के छोटे से कमरे से महज 50,000 रुपये में TYC कम्युनिकेशन की स्थापना की। आज, वह विभिन्न डोमेन से 200 से अधिक क्लाइंट्स को सेवा देती है।

अपने परिवार के अधिकांश सदस्यों के सेना में या सरकारी नौकरियों में काम करने के चलते गीता सिंह अधिकांश पहलुओं में एक बाहरी व्यक्ति बन गईं।

जैसा कि वह हमेशा अपने सपनों का पीछा करते हुए कुछ अलग करना चाहती थी, मेरठ की इस 33 वर्षीय उद्यमी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में मास्टर की पढ़ाई पूरी करने के बाद JIMMC, नोएडा से मास कम्युनिकेशन एंड जर्नलिज्म में डिप्लोमा किया।

इसके बाद उन्होंने प्रतिष्ठित मीडिया हाउस, पीआर एजेंसियों, विज्ञापन, क्रिएटिव और ब्रांडिंग एजेंसियों के साथ काम किया, जिनका मानना ​​है कि उन्होंने उनके पारस्परिक कौशल और संचार को बढ़ाने में मदद की।

वह याद करते हुए बताती हैं, “इन कंपनियों के साथ काम करते हुए, मैंने संचार उद्योग के बारे में बहुत कुछ सीखा, और इसने मुझे अपनी कंपनी शुरू करने के लिए एक नींव दी। इसने मुझे रणनीतियों, क्रिएटिविटी, इवेंट मैनेजमेंट, ब्रांड मैनेजमेंट और किसी भी संगठन की आवश्यकताओं के बारे में जानने में मदद की। इसके अलावा, विभिन्न समुदायों और लोगों के साथ मेरे शुरुआती अनुभव ने मुझे एक अच्छा नेटवर्क स्थापित करने में मदद की है।”

गीता ने महज 50,000 रुपये के साथ छोटे से कमरे से वर्ष 2011 में ट्रांसलेशन और कंटेंट डेवलपमेंट के क्षेत्र में एक प्रोपराइटरशिप फर्म के रूप में TYC कम्युनिकेशन की शुरुआत की।

 

क्या काम करती है कंपनी?

2014 में, TYC कम्युनिकेशन एक बड़े संचार और ब्रांड इमेज परसेप्शन के साथ प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में विकसित हुई, ऑफ़लाइन और ऑनलाइन परिदृश्य में।

गीता कहती हैं, “मैंने दोस्तों और परिवार से 50 हजार रुपये एकत्र किए और ऑफिस के लिए 8×10 फीट का एक कमरा था। शुरुआत काफी धमाकेदार थी और मेरे अलावा, केवल एक अन्य कर्मचारी था, और हमारे पास केवल एक क्लाइंट था। तब हमारा काम फैलने लगा और हमें और अधिक ग्राहक मिलने लगे और व्यवसाय फलने-फूलने लगा।”

गीता ने काम के बोझ को संभालने के लिए अधिक कर्मचारियों को काम पर रखा और चीजें ठीक हो रही थीं फिर अंदर से किसी ने कंपनी को धोखा देने का फैसला किया।

गीता बताती हैं, “फिर उन्होंने कंपनी छोड़ दी और अपने साथ अधिकांश कर्मचारियों को दूर ले गए। यह एक बड़ा झटका था, लेकिन हम दृढ़ और समृद्ध रहे। लेकिन मुझे अब कोई शिकायत नहीं है; उसके लिए जीवन बहुत छोटा है मैं केवल उस घटना को यात्रा के एक हिस्से के रूप में देखती हूं और अगर कुछ भी हो, तो इसने मुझे और भी मजबूत बना दिया है।”

 

अलग-अलग डोमेन में सेवाएं देना

शुरूआती असफलता के बावजूद, TYC कम्युनिकेशन तेजी से बढ़ा है और विभिन्न डोमेन से 200 से अधिक ब्रांडों की सेवा की है। 50 लोगों की एक टीम के नेतृत्व में, TYC कम्युनिकेशन मीडिया मैनेजमेंट, कंटेंट रिसर्च एंड क्रिएशन, मीडिया ट्रेनिंग, क्लाइंट सर्विसिंग और क्राइसिस मैनेजमेंट सहित सेवाओं की सरगम ​​प्रदान करता है।

गीता का कहना है कि प्रत्येक ग्राहक का औसत कार्यकाल चार साल का रहा है और इस सूची में मोबाइल डॉट कॉम, पतंजलि योगपीठ, आईआईआईटी दिल्ली, ज़ेबिया अकादमी ग्लोबल, मित्सुबिशी इलेक्ट्रिक इंडिया, पायनियर इंडिया, द जज ग्रुप, पीयरसन ग्रुप, FENA, Acreaty, Steelbird International, Aks क्लोदिंग, PayMe India, आदि जैसे बड़े नाम शामिल हैं।

वह कहती हैं, “इनमें से कुछ स्टार्टअप पहले ही दिन से हमारे साथ हैं और हम उनकी ओर से मीडिया मैसेजिंग को प्रभावी ढंग से संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं – यही कारण है कि वे इतने लंबे समय से हमारे साथ बने हुए हैं। उन्हें हमारी आंखों के सामने बढ़ता हुआ देखना और उनकी सफलता में योगदान देना बहुत ही सुखद अनुभव है।”

 

एक अलग मुकाम

हालांकि COVID-19 ने वास्तव में संचार उद्योग को उतना नहीं बदला हैं, लेकिन संचालन ने अब एक अलग मोड़ ले लिया है।

वह कहती हैं, “लॉकडाउन लागू होने के बाद, हमने घर से काम का मॉडल अपनाया। मार्केटिंग के संदर्भ में, लॉकडाउन के दौरान प्रचार सामग्री की मांग कम हो गई है और मूल्य-आधारित सामग्री के लिए आसमान छू गया है। हम अपने ग्राहकों के साथ परामर्श कर रहे हैं और इस अवसर का लाभ उठाने के लिए रणनीति बना रहे हैं। लोगों के लिए कठिन समय हैं और उन्हें मूल्यवान सामग्री प्रदान करके, हम विश्वास और सद्भावना पैदा कर सकते हैं, जो एक सफल व्यवसाय चलाने के लिए महत्वपूर्ण हैं।”

व्यवसाय चलाना अपने आप में चुनौतियों का सेट है, और गीता अलग नहीं थी।

वह बताती हैं, “सबसे पहले, अगर आपके पास व्यावसायिक पृष्ठभूमि नहीं है, तो भारत में व्यवसाय चलाना बहुत मुश्किल है। दूसरा, यदि आप एक महिला हैं और व्यक्तिगत रूप से चीजों को संभाल रही हैं, तो कभी-कभी लोग आपको गंभीरता से नहीं लेते हैं। संगठन में अच्छे कर्मचारियों को बनाए रखने के लिए एक अच्छे उम्मीदवार को काम पर रखने से; और इसी तरह, उन ग्राहकों को बनाए रखने के लिए एक अच्छा ग्राहक प्राप्त करना, हमें बड़ी एजेंसियों की तुलना में 200 प्रतिशत में रखना होगा। उद्योग में सात साल के बाद भी, हमें अस्वीकार कर दिया जाता है क्योंकि हम नए हैं और कोई और सौदा करता है क्योंकि वे एक एमएनसी हैं।”

भविष्य की योजनाओं के लिए, गीता एस्टोनिया में अपनी पहली विदेशी परियोजना के बारे में आशावादी है। “मेरा दीर्घकालिक लक्ष्य TYC कम्युनिकेशन को दुनिया की शीर्ष पांच डिजिटल और पीआर एजेंसियों में से एक बनाना है, और मुझे कोई संदेह नहीं है कि हम इसे पूरा करेंगे।”

 


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adminSeptember 19, 20201min8180

हमारे सामने कारोबार के बहुत सारे ऑप्शन होते हैं, मगर अकसर हम उन पर ध्यान नहीं देते या कम मुनाफे वाला समझ कर छोड़ देते हैं। पर ऐसे बहुत से बिजनेस आइडिया हैं जो आपको लाखों रु का मुनाफा करवा सकते हैं। इन्हीं में एक है दूध का कारोबार। कोरोना संकट के दौरान रोजगार संकट नौकरीपेशा और बिजनेस करने वाले दोनों वर्गों के लोगों के सामने आया है। ऐसे में अगर आप कोई नई शुरुआत करना चाहते हैं तो हम आपको बताएंगे दूध के कारोबार के बारे में। दूसरे ये भी बताएंगे कि कैसे दूध के कारोबार से एक महिला साल में 1 करोड़ रु से ज्यादा की इनकम कर रही है।

 

ये महिला कमा रही सालाना 1 करोड़ रु से ज्यादा

ये कहानी है बनासकांठा जिला (गुजरात) की वडगाम तहसील के नगाणा गांव की एक महिला की। ये महिला दूध के कारोबार से हर महीने 9 लाख रु की इनकम हासिल कर रही है। यानी साल में 1.08 करोड़ रु। इस महिला का नाम है नवलबेन चौधरी। सबसे बड़ी बात ये है कि नवलबेन ने मैनेजमेंट या बिजनेस की कोई पढ़ाई नहीं की है। बल्कि वे अपनी समझ और समय के साथ हासिल किए तजुर्बे से रोज 750 लीटर बेचती हैं। उनके पास दूध देने वाले 195 पशु हैं, जो उनके बिजनेस की रीढ़ हैं।

 

भारी संख्या में हैं गाय और भैंस

नवलबेन के पास पशुओं की जो तादाद है उनमें 150 भैंस और 45 गाय हैं। अपने प्रोफिट के साथ-साथ नवलबेन ने 10 लोगों को रोजगार भी दे रखा है। उन्हें वे हर महीने 10-10 हजार रु सैलेरी देती हैं। खास बात ये है कि नवलबेन की चर्चा पूरे राज्य में दूर-दूर तक है। अब उन्हें देख कर और भी महिलाएं इसी कारोबार में हाथ आजमा रही हैं। नवलबेन अब इस बिजनेस में अकेली नहीं रहीं। बल्कि उनके 4 बेटे भी उनका हाथ बंटाते हैं। उनके बेटे शिक्षित हैं, मगर बावजूद इसके वे अपनी मां के साथ बिजनेस में लगे हुए हैं। अब ये उनका पारिवारिक कारोबार बन गया है।

 

1 साल में कितने दूध का कारोबार

नवलबेन रोजाना 750 लीटर दूध सप्लाई करती हैं। यानी वे 1 साल में करीब 2.21 लाख टन दूध का कारोबार करती हैं। एक लोटल पोर्टल के मुताबिक नवलबेन गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन लिमिटेड के अंतर्गत बनासकांठा जिले में चलने वाली बनास डेयरी को दूध बेचती हैं। इस डेयरी की तरफ से उन्हें दूध बिजनेस से कमाई के मामले में पहल स्थान मिला है।

 

कैसे हुई कारोबार की शुरुआत

नवलबेन की रोज की कमाई 30,000 रु है, जो 1 साल में 1.08 करोड़ रु बनती है। इस भारी इनकम के बावजूद नवलबेन के अनुसार वे आत्मनिर्भर भारत में योगदान दे रही हैं। गौरतलब है कि उन्होंने अपने इस कारोबार की शुरुआत 15-20 पशुओं से थी। ये पशु उनके अपने नहीं बल्कि उनके ससुराल के थे। मगर नवलबेन ने अपनी मेहनत और समझ से कारोबार को बढ़ाया। अब ये कारोबार उनके परिवार की पहचान बन गया है। अब वहां और भी महिलाएं इस कारोबार से जुड़ रही हैं।

 

आप कैसें करें ये कारोबार

अगर आप दूध का कारोबार करना चाहते हैं तो बता दें कि सरकार पशु किसान क्रेडिट कार्ड देती है। इस कार्ड के जरिए आपको पशु खरीदने के लिए लोन मिलेगा। लोन पर आपको काफी कम ब्याज देना होगा, क्योंकि सरकार इस कार्ड से लिए गए लोन पर ब्याज सब्सिडी देती है। कार्ड पर ब्याज दर 7 फीसदी है, मगर इसमें 3 फीसदी ब्याज पर सब्सिडी मिलती है। इसलिए आपको सिर्फ 4 फीसदी ब्याज देना होगा।

 

 


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adminSeptember 16, 20201min6220

कोरोनाकाल में जहां एक ओर युवा अपने भविष्य और हाथ से फिसलती नौकरी को बचाने के लिए परेशान है तो वहीं उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के तीन पढ़े-लिखे युवा कोरोना काल में नौकरी छोड़कर चर्चा में हैं. ये तीनों नए जमाने की कृषि के जरिए पीएम मोदी के आत्मनिर्भर भारत के सपने को पूरा करने में जुटे हैं.

दरअसल, वाराणसी के चिरईगांव ब्लॉक के चौबेपुर क्षेत्र का गांव नारायनपुर इन दिनों तीन दोस्तों की वजह से खासा चर्चा में हैं, क्योंकि ये तीनों यहां के ग्रामीणों को नए युग की कृषि सिखा रहे हैं. गांव के ही अपने मकान के बाहर खुद से बनाए गए छोटे तालाबों में युवा पढ़े-लिखे किसान श्वेतांक, रोहित और अमित सीप की खेती कर रहे हैं. इसके अलावा तीनों ही मधुमक्खी पालन और बकरी पालन भी कर रहे हैं.

युवा किसानों में से एक सीप की खेती की बागडोर संभालने वाले श्वेतांक ने बताया कि ये दूसरी खेती की तरह है, लेकिन पारंपरिक खेती से थोड़ी अलग मोती की खेती है. एक कृषि उद्यम के जरिए और उनकी मदद से ये मोती की खेती कर रहे हैं. एमए- बीएड होने के बावजूद श्वेतांक की रूचि सीप की खेती में ही थी. इसलिए इंटरनेट के जरिए वे इसके बारे में जानकारी लेने लगे और एक जगह से ट्रेनिंग भी ली. रोज नए लोग जुड़ते जा रहें हैं. उन्होंने बताया कि सीप से मोती निकालने के काम में तीन गुना तक मुनाफा होता है.

मधुमक्खी पालन की देखभाल करने वाले मोहित आनंद पाठक ने बताया कि बीएचयू से बीए करने के बाद वे पारंपरिक खेती के बजाए कुछ नया करने की चाह में दिल्ली गांधी दर्शन से प्रशिक्षण लेने के बाद मधुमक्खी पालन करने लगे. जिसके तहत बनारस में खुद काम शुरू किया तो बनारस के बाहर भी अन्य किसानों की मदद की. वे खुद दूसरों को भी प्रशिक्षित कर रहे हैं. अब उनसे शहद बेचने वाली कंपनियां और औषधालय भी शहद ले जा रहे हैं.

वहीं तीनों दोस्तों में से रोहित आनंद पाठक एक हैं जो एक समिति कृषि उद्यम से पहले तो खुद एक प्रतिनिधि के रूप में जुड़े थे और अब खुद के और दो दोस्तों को साथ लेकर नई शुरूआत की है. कोरोनाकाल में एक बड़ी कंपनी के रीजनल हेड की नौकरी छोड़कर वे अपनी सरजमी वाराणसी में आ गए.

इस तरह की खेती ये तीनों दोस्त खुद कर रहे हैं, इसके अलावा दो सौ लोगों को और इस साल जोड़ने का लक्ष्य है. उनका कहना है कि कोरोना महामारी ने काफी कुछ सिखा दिया है, क्योंकि आने वाले दिनों में परिवेश काफी तेजी से बदल रहा है और ऐसे ही काम के जरिए ना केवल हम खुद के लिए आय का जरिया पैदा कर रहे हैं, बल्कि खुद को नए वातावरण में ढाल भी रहे हैं.

तीनों दोस्तों की इस मुहिम से खुश होकर यूपी सरकार के कैबिनेट मंत्री और इलाके के विधायक अनिल राजभर भी उनकी हौसलाअफजाई करने उनके गांव पहुंचे और उनके काम करने के तरीकों को भी जाना. उन्होंने बताया कि अपनी अच्छी नौकरी छोड़कर ये युवा न केवल खुद, बल्कि अन्य लोगों को भी आत्मनिर्भर बनाने की मुहिम में जुड़े हुए हैं.


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adminSeptember 11, 20201min6520

ऑफिस जाने से पहले टिफिन के लिए हर रोज सलाद तैयार करना बड़ा उबाऊ लगता था, ऐसा लगता था कि लंच टाइम में यदि कोई फ्रेश सलाद दे दे तो कितना अच्छा हो। फिर सोचा क्यों न ये काम मैं ही करूं। न इसमें कोई इन्वेस्टमेंट करना था और न ही कोई रिस्क। 3 हजार रुपए से काम शुरू किया था, लॉकडाउन के पहले तक महीने की इनकम 75 हजार से 1 लाख रुपए तक पहुंच गई थी। पुणे की मेघा ने अपने स्टार्टअप की पूरी कहानी बताई…

 

मेघा ने स्टार्टअप शुरू किया, लेकिन जॉब नहीं छोड़ी। वे एक रियल एस्टेट कंपनी में 15 सालों से नौकरी कर रही हैं।
मेघा ने स्टार्टअप शुरू किया, लेकिन जॉब नहीं छोड़ी। वे एक रियल एस्टेट कंपनी में 15 सालों से नौकरी कर रही हैं।

 

मेरा नाम मेघा बाफना है। पुणे में रहती हूं। पिछले 15 सालों से रियल एस्टेट सेक्टर में काम कर रही हूं। सलाद तैयार करना, उसमें एक्सपेरिमेंट करना मुझे बीते कई सालों से पंसद है। 2017 में सोचा कि क्यों न अपने टेस्ट से दुनिया को रूबरू करवाया जाए। बस यही सोचकर मैंने चार लाइन का एक क्रिएटिव ऐड तैयार किया और उसे वॉट्सऐप पर अपने फ्रेंड्स के ग्रुप में शेयर कर दिया।

पहले दिन मुझे 5 पैकेट का ऑर्डर मिला था। तब पैकेजिंग, डिलीवरी, क्वांटिटी का कोई आइडिया नहीं था। लेकिन, मुझे अपने सलाद के टेस्ट पर बहुत यकीन था। मैं सुबह साढ़े चार बजे उठती थी और साढ़े छह बजे तक सलाद की पैकिंग से पहले की तैयार करती थी। फिर सब्जियां लेने मार्केट चली जाती थी, तब तक जो मसाला तैयार करके जाती थी वो ठंडा होता था। साढ़े सात बजे से सब्जियों को साफ करने और काटने का काम शुरू करती थी और साढ़े नौ बजे तक पैकिंग हो जाती थी।

 

मेघा प्लास्टिक कंटेनर में सलाद पैक करके देती हैं। पैकिंग का कोई आइडिया नहीं था, सब एक्सपेरिमेंट करते-करते सीखा।
मेघा प्लास्टिक कंटेनर में सलाद पैक करके देती हैं। पैकिंग का कोई आइडिया नहीं था, सब एक्सपेरिमेंट करते-करते सीखा।

 

शुरूआत 5 तरह के सलाद से की थी। इसमें चना चाट, मिक्स कॉर्न, बीट रूट, पास्ता सलाद शामिल थे। घर में जो मेड काम करने आती थीं, उन्हीं के बेटे को डिलीवरी के लिए रख लिया था। मैं पैकिंग करके मार्केट चली जाती थी, फिर दस बजे तक डिलीवरी बॉय आता था जो अगले 2 घंटे में सलाद कस्टमर तक पहुंचा देता था। एक हफ्ते तक 6 पैकेट ही जाते रहे, फिर मेरे दोस्तों से उनके दोस्तों को पता चला। सभी को टेस्ट पसंद आ रहा था, तो अगले हफ्ते 25 पैकेट जाने लगे। तीसरे हफ्ते में 50 हो गए। फिर अगले 5 महीने तक यही चलता रहा।

फिर मैंने फेसबुक पर पुणे की लेडीज के एक ग्रुप पर अपने सलाद की फोटोज और मैन्यू को शेयर किया। वहां से मुझे बहुत अच्छा रिस्पॉन्स मिला। कई कंपनियों, स्कूलों और घरों से फोन आए। मुझे सीधे 60 से 70 नए क्लाइंट मिल गए और करीब 150 कस्टमर्स बन गए। शुरुआत में मुझे क्वांटिटी की कोई नॉलेज नहीं थी। कभी सलाद बहुत कम पड़ जाता था, तो कभी बहुत ज्यादा बन जाता था। फिर मैंने क्वांटिटी लिखनी शुरू की, मेजरमेंट बनाया। कुछ दिनों में आइडिया होने लगा कि कितने पैकेट के लिए कितना मसाला तैयार करना है।

 

अब मेघा ने 19 लोगोंं को रोजगार दे रखा है। महिलाएं चॉपिंग करती हैं, पुरुष डिलीवरी करते हैं। हालांकि, लॉकडाउन में सब बंद रहा।
अब मेघा ने 19 लोगोंं को रोजगार दे रखा है। महिलाएं चॉपिंग करती हैं, पुरुष डिलीवरी करते हैं। हालांकि, लॉकडाउन में सब बंद रहा।

 

पैकिंग की भी कोई नॉलेज नहीं थी। शुरुआत में पेपर कंटेनर में डिलीवरी देती थी। उसमें लीकेज की प्रॉब्लम आती थी। फिर मार्केट में जाकर खोजबीन की और प्लास्टिक कंटेनर में डिलीवरी देनी शुरू की। पहले मैंने सलाद के दो प्राइज रखे थे, एक 59 और दूसरा 69। नो प्रॉफिट, नो लॉस पर शुरूआत करने का सोचा था, लेकिन डेढ़ महीने बाद ही मुझे प्रॉफिट होने लगा। हर महीने 5 से 7 हजार रुपए बचने लगे। धीरे-धीरे कस्टमर बढ़े तो प्रॉफिट बढ़ने लगा। लॉकडाउन के पहले तक मेरे पास 200 कस्टमर्स हो गए थे और महीने की बचत 75 हजार से 1 लाख रुपए तक थी। चार साल में इस स्टार्टअप से मैंने करीब 22 लाख रुपए जोड़े।

 

मेघा कहती हैं कि मेरी रेसिपी तो आपको गूगल पर भी नहीं मिलेगी।
मेघा कहती हैं कि मेरी रेसिपी तो आपको गूगल पर भी नहीं मिलेगी।

 

अब फ्रेंचाइजी देने का प्लान है। बहुत लोगों की इंक्वायरी आ रही है। हालांकि जब तक ये महामारी खत्म नहीं होगी, तब तक फ्रेंचाइजी नहीं दूंगी। मुझे मेरे परिवार से बहुत सपोर्ट मिला। पति और सास-ससुर ने हर चीज में सपोर्ट किया, तभी मैं ये सब कर पाई। अगस्त से काम फिर शुरू किया है। जॉब भी साथ में चल रही है। मैंने एक्सपेरिमेंट करना अब भी बंद नहीं किया। कुछ न कुछ नया करती रहती हूं। पानी पुरी वाले फ्लेवर में पानी पुरी का ही टेस्ट आए, इसके लिए बहुत मेहनत की। मेरी ये रेसिपी गूगल पर भी नहीं मिलेंगी, क्योंकि ये मैंने खुद इन्वेंट की हैं और मेरे टेस्ट के चलते ही कस्टमर्स का रिस्पॉन्स मिला।

अब मैं 300 ग्राम क्वांटिटी का पैक देती हूं। इसे खाने के बाद लंच करने की जरूरत भी नहीं पड़ती। प्राइज 100 और 110 रुपए है। 500 रुपए में वीकली पैकेज भी देती हूं। मेरी सफलता का राज यही है कि, मैंने वो काम चुना जिसे करने में मुझे बहुत मजा आता है। सलाद के फ्लेवर इधर-उधर से कॉपी करने के बजाए खुद इन्वेंट करता गई, जिससे कस्टमर्स बढ़ते गए। लॉकडाउन के पहले तक 10 डिलीवरी बॉय और 9 महिलाओं को मैं काम दे रही थी। कोरोनावायरस खत्म होने के बाद काम फिर से रफ्तार पकड़ लेगा।


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adminSeptember 9, 20201min6630

फर्श पर पड़ा कोई असफल व्यक्ति कभी नजर नहीं आता, हर कोई उगते सूरज को सलाम करता है। और कहीं वह दोपहर के सूरज की तरह तप रहा हो, सबकी आंखें चौंधिया देता है। ऐसी ही एक कामयाब शख्सियत का नाम है गौतम अडानी, जिनका जन्म निम्न मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ, कभी घर की माली हालत खराब होने से बीच ही में पढ़ाई छोड़नी पड़ी, आज गिनती विश्व के चुनिंदा सौ अरबपतियों में है।

एक सबसे सफल बिजनेसमैन के इस सफर में गौतम अडानी को यह सफलता कोई आसानी से हासिल नहीं हुई है। खास तौर से नरेंद्र मोदी के देश का प्रधानमंत्री बनने के बाद से उनको तरह-तरह के उलाहनों और आरोपों का भी सामना करना पड़ रहा है।

गौतम अडानी का जन्म 24 जून 1962 को अहमदाबाद के गुजराती जैन परिवार में हुआ था। अपने सात भाई-बहनों में एक अडानी के पिता कभी आजीविका के लिए थराड़ कस्बे से गुजरात के इस उत्तरी हिस्से में आ बसे थे। अडानी कहते हैं, ‘आज हमारे पास चार हेलिकॉप्‍टर हैं। गुजरात सरकार के मुख्यमंत्री भी उनके चॉपर का इस्‍तेमाल करते हैं। इसके लिए वह भुगतान करते हैं। जहां तक भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सवाल है, वह भी उनका हेलिकॉप्‍टर कोई फ्री में नहीं, शुल्क अदा कर इस्‍तेमाल करते हैं।’

बात सन् 1980 के दशक की है। उस वक्त अडानी अपने अहमदाबाद शहर में बचपन के साथी मलय महादेविया के स्कूटर पर पीछे बैठे लोगों को दिख जाया करते थे। इस दोस्ती की एक खास वजह अडानी को कमजोर लेकिन महादेविया की अच्छी इंग्लिश भी रही। बाद में महादेविया उनके बिजनेस पार्टनर हो गए। अडानी भारत के उन गिने-चुने कामयाब उद्योगपतियों में एक हैं, जिन्होंने फर्श से उठकर अर्श पर पहुंचने की ‘अरबपति कामयाबी’ हासिल की है। माली हालत खराब होने से ही उनके पिता अहमदाबाद के पोल इलाके की शेठ चॉल में रहते थे। आज उनका कारोबार पूरी दुनिया के कोयला व्यापार, खनन, तेल एवं गैस वितरण, बंदरगाह, मल्टी मॉडल लॉजिस्टिक, बिजली उत्पादन-पारेषण तक फैला हुआ है।

इस वक्त वह लगभग दस अरब डॉलर की संपत्ति के स्वामी हैं। उनके पास देश की सबसे बड़ी एक्सपोर्ट कंपनी है। उन्होंने खुद का बीचक्रॉफ्ट जेट 2005 में और हॉकर जेट 2008 में खरीदा था। उनको यह सब महज साढ़े तीन दशक में हासिल हुआ है। अडानी ने हाल ही में उत्तर प्रदेश में 35 हजार करोड़ के निवेश का एलान किया है। उनकी पत्नी प्रीति पेशे से डेंटिस्ट हैं और अडानी फाउंडेशन की हेड भी। उनके दो पुत्र करण और जीत हैं।

हमारे देश में शीर्ष अंबानी साम्राज्य के जनक आज के उद्योगपति मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी नहीं, बल्कि उनके पिता धीरू भाई अंबानी रहे हैं। इसी तरह टाटा-बिड़ला का साम्राज्य भी उनके पुरखों का बनाया हुआ है लेकिन गौतम अडानी खुद के बूते इस मोकाम पर पहुंचे हैं। जिस समय वह गुजरात यूनिवर्सिटी में बीकॉम की पढ़ाई के लिए दाखिल हुए, उन्हीं दिनो घर के सामने रोजी-रोटी का संकट आ खड़ा हुआ। चिंताजनक स्थितियों में पढ़ाई छूट गई। वह कॉलेज से मुंह मोड़कर पैसा कमाने के चुनौतीपूर्ण सफर पर निकल पड़े। अपना शहर छोड़कर मुंबई चले गए और वहां एक डॉयमंड कंपनी में बड़ी मामूली सी पगार पर नौकरी करने लगे।

वह शुरू से ही मेहनती और प्रतिभा संपन्न थे, बमुश्किल उस कंपनी डायमंड सॉर्ट महिंद्रा ब्रॉस में साल-दो-साल ही उनके पांव थमे, नौकरी छोड़कर झावेरी बाजार में उन्होंने खुद का डायमंड ब्रोकरेज आउटफिट खोल लिया। वर्ष 1981 में मनसुखभाई ने प्लाटिक की एक यूनिट अहमदाबाद में लगाई तो गौतम अडानी को कंपनी चलाने के लिए कहा। इसके बाद उन्होंने बड़े भाई की पीवीसी यूनिट संभाली और धीरे-धीरे कारोबार आगे बढ़ाया। वर्ष 1988 में उन्होंने एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट कंपनी अडानी इंटरप्राइजेज की स्थापना की। ऐसा भी कहा जाता है कि जिस अडानी ने मारुति-800 से अपना व्यावसायिक सफर शुरू किया था और आज उनके पास बीएमडब्ल्यू गाड़ियों का झुंड है, फरारी है, कुल तीन हेलिकॉप्टर, तीन बोम्बार्डियर, बीचक्राफ्ट विमान हैं।

एक सबसे सफल बिजनेसमैन के इस सफर में गौतम अडानी को यह सफलता कोई आसानी से हासिल नहीं हुई है। खास तौर से नरेंद्र मोदी के देश का प्रधानमंत्री बनने के बाद से उनको तरह-तरह के उलाहनों और आरोपों का भी सामना करना पड़ रहा है। कहा जाता है कि नरेंद्र मोदी ने अप्रैल, 2014 में जब प्रधानमंत्री का पद संभाला था, अडानी की पर्सनल वेल्थ लगभग पांच अरब डॉलर थी, जो आज ब्लूमबर्ग बिलेनायर इंडेक्स के मुताबिक 63 हजार करोड़ रुपए हो चुकी है।

देश के बाहर भी कई मोरचों पर उनके सामने कठिन हालात आज भी बने हुए हैं। उनको ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड में सबसे बड़ी करीब 16.6 अरब डॉलर की लागत वाली कोयला खदान से खनन का अवसर मिला, जिसके लिए उन्हें ऑस्ट्रेलिया सरकार ने लगभग एक अरब डॉलर का कर्ज भी दिया लेकिन प्रोजेक्ट विवादों में आ गया। ऑस्ट्रेलिया के पर्यावरणवादी कहने लगे कि ये प्रोजेक्ट पर्यावरण के लिए नुकसानदायक है। इस प्रोजेक्ट पर केंद्रित विवाद आज भी थमा नहीं है। इसी तरह मध्य प्रदेश में उनका एक हीरा खदान का प्रोजेक्ट भी आजकल मीडिया की सुर्खियों में है। बताया जा रहा है कि अडानी ग्रुप और अरबपति अनिल अग्रवाल के नियंत्रण वाले वेदांता रिसोर्सेज ग्रुप मिलकर 59 हजार करोड़ के डायमंड प्रोजेक्ट के लिए बिड लगाने वाले हैं।

आगामी नवंबर में इसके लिए बिड्स आमंत्रित किए जा सकते हैं। इस खदान में 3.2 करोड़ कैरेट डायमंड होने का अनुमान है। सचाई तो यह बताई जाती है कि अडानी पर नरेंद्र मोदी से नजदीकियों का भले आरोप लगे लेकिन ओडिशा, हरियाणा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान में अपने उद्योग-धंधों का विस्तार करने के दौरान कांग्रेस नीत सरकारों में उनके कई दोस्त रहे हैं। शरद पवार और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ से भी उनकी नजदीकियां बताई जाती रही हैं।

 


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adminSeptember 4, 20201min4420

शीला के. कोच्चि के प्रमुख व्यवसायी परिवार से ताल्लुक रखती हैं, लेकिन उन्होंने अपने बिज़नेस वेंचर वी-स्टार क्रिएशन्स को शून्य से उठाकर सफलता के मुक़ाम पर पहुंचाया है। वी-स्टार क्रिएशन्स की फ़ाउंडर का इनरवियर मार्केट में अच्छा नाम है। शीला ने एक घरेलू महिला से व्यवसाई बनने के अपने सफ़र को योरस्टोरी के साथ कुछ इस तरह साझा किया।

शीला के पति के. चिट्टिलपिल्ली वी-स्टार ग्रुप (वी गार्ड इलेक्ट्रॉनिक्स, वंडरला थीम पार्क्स आदि) के मालिक हैं। जब शीला ने उन्हें बताया कि वह अपना स्टार्टअप शुरू करना चाहती हैं तो उनके पति ने उनके सामने दो शर्तें रखीं। पहली यह कि शीला को फ़ंड्स के लिए बैंक से लोन लेना होगा और उनकी ओर से शीला को सिर्फ़ एक ख़ाली ऑफ़िस मिलेगा और शीला को हर महीने किराया भी देना होगा।

इस तरह से 1995 में वी-स्टार क्रिएशन्स की शुरुआत हुई। शीला बताती हैं कि उनके परिवार के पास काफ़ी पैसा था और इसलिए जब उन्होंने अपने स्टार्टअप की बात सामने रखी तो लोगों को काफ़ी आश्चर्य हुआ।

उन्होंने बताया,

“मेरे पिता का टेक्स्टाइल और जूलरी का बिज़नेस था। फ़ैब्रिक के साथ मेरा काफ़ी समय गुज़रा था। हमारे घर में सिलाई मशीन थी और मैं छोटी ड्रेसेज़ बनाया करती थी।”

शीला ने 10 लोगों की टीम के साथ अपने सफ़र की शुरुआत की। उन्होंने सलवार कमीज़ जैसे भारतीय परिधानों के साथ वी-स्टार क्रिएशन्स शुरू किया। पांच सालों बाद एक कॉन्फ़्रेंस में शीला से पूछा गया कि वह इनरवियर सेगमेंट में काम क्यों नहीं करती क्योंकि केरल इनरवियर्स के लिए अच्छे ब्रैंड मौजूद नहीं थे।

उन्होंने इस सवाल को एक चुनौती के रूप में लिया मुंबई से अच्छी क्वॉलिटी के ब्रा और पैंटी का स्टॉक ख़रीदा और उनकी सिलाई खोल दी ताकि वह शुरुआत से उन्हें बनाना सीख सकें।

वह बताती हैं,

“इस समय तक मेरे पास कोई पैटर्न मेकर नहीं था, जो सब्जेक्ट को समझ सके। मुझे यह ख़ुद ही सीखना था और दूसरों को सिखाना भी था। इस तरह से ही मैं लॉन्जरी बिज़नेस में आई।”

शुरुआत में, शीला को जो भी मुनाफ़ा होता था, वह उसे वापस बिज़नेस में ही लगा देती थीं। वह बताती हैं,

“केरल में काम करने अच्छा माहौल नहीं है। हम स्टिचिंग का काम कॉनवेंट्स की नन को देते थे। उनके पास पैसा था, जगह थी और वे ज़रूरतमंद परिवारों से आने वाली महिलाओं को आजीविका का साधन भी दे सकती थीं। इन महिलाओं ने इससे पहले तक कभी सिलाई मशीन नहीं देखी थी और इन्हें मूलभूत तरीक़े से सबकुछ सिखाया गया। आज हमारे पास 16 यूनिट्स हैं, जहां पर 1 हज़ार से ज़्यादा महिलाएं काम करती हैं।” 

एक विमिन ऑन्त्रप्रन्योर होने के नाते उन्हें किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा, इस बारे में बात करते हुए शीला बताती हैं,

“बतौर महिला मुझे इस क्षेत्र में किसी भी चुनौती का सामना नहीं करना पड़ा। मुझे एक व्यवसाई के तौर पर अच्छे काम करने वाले लोगों को ढूंढने में काफ़ी मेहनत करनी पड़ी। “

वी-स्टार क्रिएशन्स महिलाओं के लिए लॉन्जरी, लेगिंग्स और रेडी-मेड ब्लाउज़ आदि बनाता है। इसके अलावा पुरुषों के लिए वेस्ट्स भी बनाता है। कंपनी केरल में अपने प्रोडक्ट्स बेचती है और कुछ खाड़ी देशों में निर्यात भी करती है। पिछले साल कंपनी ने 100 करोड़ रुपए रेवेन्यू का आंकड़ा छुआ है।

शीला मानती हैं कि उनके पति ने उनके सामने जो शर्तें रखी थीं, उनकी बदौलत शीला ने अपने बिज़नेस में बहुत सोच-समझकर फ़ैसले लिए। वह बताती हैं कि उनके पति अपने बिज़नेस में अपने स्टाफ़ को बोनस देते थे और उन्होंने शीला से ऑपरेशन्स शुरू होने के पहले साल के भीतर ही अपने कर्मचारियों को बोनस देने की सलाह दी। शीला ने बताया कि कर्मचारियों को बोनस देने के लिए उन्हें एक और लोन लेना पड़ा।

शीला ने जानकारी दी कि रेडीमेड ब्लाउज़ उनका लेटेस्ट क्रिएशन है और यह मार्केट में उपलब्ध रेंज से बहुत अलग है। इन्हें तैयार करने में 95 प्रतिशत विस्कोज़ और 5 प्रतिशत लाइक्रा का इस्तेमाल किया गया है और इस वजह से पहनने के बाद ये आपको ठंडक भी देते हैं और साथ ही, स्ट्रेचबल होने की वजह से आरामदायक भी होते हैं।

 


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adminSeptember 2, 20202min5450

कुछ लोग होते हैं जो बड़ी-बड़ी कंपनियों में काम करते हैं पर उन्हें काम में सुकून नहीं मिलता. लेकिन वो अपनी कुछ ज़िम्मेदारियों के चलते उस जॉब को करते रहते हैं. बहुत कम लोग ही ऐसे होते हैं जो इस तरह की नौकरी छोड़ वो करते हैं जिसमें उन्हें Job Satisfaction मिलता है. आज हम आपको एक ऐसे शख़्स से मिलवाएंगे जिसने काम में संतुष्टि न मिलने पर भारी-भरकम सैलरी वाली नौकरी को छोड़ कर एक चाय का स्टॉल लगा लिया.

एम.पी के छिंदवाड़ा ज़िले में रहने वाले इंजीनियर अंकित नागवंशी ने ये चाय का स्टॉल लगाया है. उनके इस स्टॉल का नाम ‘इंजीनियर चायवाला’ है. उनकी ये स्टोरी सोशल मीडिया पर काफ़ी वायरल हो रही है.

 

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Source: whatshot

 

इसे आईएएस ऑफ़िसर अवनीश शरण ने भी अपने ट्विटर अकाउंट पर शेयर किया है. उन्होंने अंकित की ईमानदारी की तारीफ़ करते हुए लिखा- ‘आज के समय में इतनी ईमानदारी कहां दिखती है… सब कुछ साफ़-साफ़ बता दिया इन्होंने! ‘इंजीनियर चायवाला’ With Job Satisfaction.’

 

Source: twitter

 

अवनीश शरण ने ट्विटर पर अंकित के टी-स्टॉल की एक तस्वीर भी शेयर की है. इस पर अंकित की पूरी कहानी लिखी है. इसमें लिखा है- ‘वैसे तो मैं सॉफ़्टवेयर इंजीनियर हूं. मैं कई कंपनियों जैसे विप्रो, बिज़नेस इंटेलिजेंस, ट्रस्ट सॉफ़्टवेयर में काम कर चुका हूं. जहां पैसे तो मिलते थे लेकिन सुकून नहीं. मैं हमेशा से ही बिज़नेस करना चाहता था. हर रोज़ मेरे टेबल पर चाय आती थी पर मुझे कभी बेहतरीन चाय नहीं मिली. मैं हमेशा से ही चाय का शौक़ीन रहा हूं, मैं चाहता था कि लाजवाब चाय पीने को मिले. तो मैंने चाय से ही अपने बिज़नेस की छोटी शुरुआत की और मैं बन गया… इंजीनियर चायवाला.’

 

 

अंकित की ईमानदारी और हिम्मत की लोग ट्विटर पर जमकर तारीफ़ कर रहे हैं. आप भी देखिए उनकी प्रतिक्रियाएं:

 

 


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adminAugust 31, 20201min1540

महज 8 महीनों के भीतर ‘एनआरआई चायवाला’ ने 1.2 करोड़ रुपये का मुनाफा अर्जित करने का दावा किया है।

चाय देश में सबसे अधिक पसंद किया जाने वाला पेय है। भारत में उगाई जाने वाली चाय आज पूरे विश्व में पहचानी जाती है, लेकिन अब देश के कुछ स्टार्टअप इस चाय को नए रंग और कलेवर के साथ लोगों के सामने पेश कर रहे हैं, जिसे बड़े पैमाने पर पसंद भी किया जा रहा है।

ऐसा ही कुछ कर दिखाया है जगदीश कुमार ने, जिन्होने न सिर्फ चाय को कई नए फ्लेवर के साथ लोगों के सामने पेश किया है, बल्कि इसी चाय के जरिये कम समय में बड़ा मुनाफा भी कमाया है। अपने देश वापस आने से पहले जगदीश न्यूज़ीलैंड में व्यवसाय कर रहे थे और उनके पास वहाँ का ग्रीन कार्ड भी था, लेकिन वह अपने वतन में रहकर कुछ करना चाहते थे।

 

अपने शुरुआती दिनों की बात करते हुए जगदीश बताते हैं,

“जब करीब एक साल पहले मैं न्यूज़ीलैंड से भारत वापस आया था तब मैंने अपनी चाय के साथ कॉर्पोरेट्स ऑफिस में काफी प्रयास किया कि मुझे प्रवेश मिल जाए, लेकिन मुझे वहाँ से निराशा ही मिली। बस इसके बाद ही मैंने चाय बनाने के लिए जरूरत के सामान को इकट्ठा कर उनके ऑफिस के बाहर ही चाय की दुकान लगाना शुरू कर दिया। मेरी चाय को खूब पसंद किया जा रहा था। फिर कुछ दिन बाद मैंने अपनी दुकान में ‘NRI चायवाला’ का बैनर लगाया, जो लोगों के बीच कौतूहल का विषय बन गया।”

लोगों की दिलचस्पी जगदीश और उनकी दुकान दोनों में ही बढ़ने लगी और इस दौरान लोगों ने उन्हे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित भी किया।

जगदीश के अनुसार न्यूज़ीलैंड में वो करीब 15 सालों से रह रहे थे, जहां उनका अपना व्यवसाय भी था, लेकिन उनके इस कदम के बाद लोग भी आश्चर्यचकित रह गए। संस्थापक के अनुसार उन्हे भारत के चाय बाज़ार में अभी बड़ी प्रतिस्पर्धा का माहौल नहीं है। देश में यह बाज़ार अभी पारंपरिक ढंग से ही चल रहा है, जिससे इस क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ने के काफी मौके हैं।

 

चाय के साथ इनोवेशन

NRI चायवाला ने बड़ी ही अनूठे ढंग से अपनी विभिन्न फ्लेवर वाली चाय के नाम रखे हैं। मम्मी के हाथ वाली चाय, प्यार मोहब्बत वाली चाय और उधार वाली चाय, ये कुछ फ्लेवर के अनूठे नाम हैं, जिन्हें इनके नामों के अनुसार ही तैयार किया गया है। चाय की इन सभी वैराइटी में कुछ खास मसाले भी डाले जाते हैं, जो जगदीश के अनुसार ‘सीक्रेट’ हैं।

 

इस बारे में बात करते हुए जगदीश कहते हैं,

“हम अभी कई और तरह की चाय पर आर एंड डी कर रहे हैं और जल्द ही हम नए फ्लेवर्स के साथ आएंगे। चाय की नई वैराइटी में हम त्वचा को स्वस्थ रखने वाले प्राकृतिक तत्वों का भी उपयोग करने वाले हैं।”

जगदीश का दावा है कि उनके पास इम्यूनिटी बूस्टर चाय भी है, जिसमें मुलेठी, अदरख, हल्दी और काढ़ा आदि का उपयोग किया जाता है। जगदीश का कहना है कि कोरोना वायरस की शुरुआत के साथ ही उन्होने इस दिशा में आर एंड डी पर काम तेजी से शुरू कर दिया था और देश में कोरोना बढ़ने के साथ उनकी इस चाय को खूब पसंद भी किया गया है।

 

सामने आईं चुनौतियाँ

जगदीश बताते हैं कि वो एक निम्न-मध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते हैं, जहां कभी किसी ने पहले व्यापार नहीं किया है। उनके अनुसार उन्हे शुरुआत से ही अपने फैसले खुद लेने पड़े, क्योंकि उन्हे कोई गाइड करने वाला कोई नहीं था। शुरुआती दिनों की बात करते हुए जगदीश कहते हैं,

“होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई पूरी करने के बाद मेरी नौकरी अच्छी सैलरी पर पीवीआर में लग गई थी, जो मेरे घर से महज 5 किलोमीटर दूरी पर था, लेकिन मैंने उसे ठुकराते हुए महज 34 सौ रुपये की एक दूसरी नौकरी ली, क्योंकि मुझे वहाँ सीखने के लिए काफी कुछ मिल रहा था।”

जगदीश ने मिडिल ईस्ट में भी नौकरी की, लेकिन न्यूज़ीलैंड में व्यापार सेट होने और पूरे परिवार के पास ग्रीन कार्ड होने के बावजूद उनके भारत आने के बाद लोग उन्हे अचरज भरी निगाहों से देखते थे।

आज स्टार्टअप कई ब्रांड के साथ जुड़ा हुआ है और लगातार बेहतर राजस्व की तरफ कदम बढ़ा रहा है। अपनी इसी चाय के दम पर जगदीश ने बीते 8 महीनों में 1.2 करोड़ रुपये का लाभ कमाया है।

कोरोना प्रभाव और भविष्य जगदीश इस बात पर ज़ोर देते हुए कहते हैं कि कोविड महामारी के दौरान हर व्यापार ने मुश्किलों का सामना किया है, लेकिन यह जरूरी है कि इसे अलग नजरिये से भी देखा जाए। उनके अनुसार स्टार्टअप के लिए यह एकदम सही समय है।

जगदीश कहते हैं,

“कोरोना के चलते शुरू हुए लॉकडाउन ने हमें सोचने और प्लान तैयार करने के लिए पर्याप्त समय दिया है, जिसका सकारात्मक परिणाम अब दिखाई देना चाहिए।”

अपने इस स्टार्टअप के साथ आगे बढ़ते हुए जगदीश भारत की चाय इंडस्ट्री को ग्लोबल स्तर पर एक ऊंचे मुकाम पर देखना चाहते हैं।

वो दुनिया को चाय के अधिक से अधिक फ्लेवर देना चाहते हैं।

स्टार्टअप अब पूरे भारत में अपने कैफे खोलने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है।

इसी के साथ जगदीश अब टी लीफ को भी भारत और वैश्विक बाज़ार में उसे लांच करने की ओर बढ़ रहे हैं।

स्टार्टअप द्वारा तैयार की गई योग माया चाय में 35 तरह की हर्ब्स और स्पाइस का मिश्रण डाला गया है, इसी के साथ स्टार्टअप निरोग्य चाय और बच्चों के लिए भी खास तरह की किड्स चाय को भी विकसित करने का काम किया है।

जगदीश का दावा है कि इस चाय को लोगों को शारीरिक तौर पर लाभ देने के लिए तैयार किया गया है।



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