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adminDecember 3, 20204min5610

सिंगापुर के लोग अब वैसा मांस खा सकेंगे जिसके लिए जानवरों को मारना नहीं पड़ेगा. इसे ‘क्लीन मीट’ कहा जा रहा है. सिंगापुर ने इसकी मंज़ूरी दे दी है और इस मामले में वो दुनिया का पहला देश बन गया है.

सिंगापुर के इस फ़ैसले से सैन फ़्रांसिस्को स्थित ईट जस्ट स्टार्टअप के लिए रास्ता साफ़ हो गया है.

ईट जस्ट कंपनी लैब में चिकन का मांस तैयार कर बेचने की तैयारी कर रही है. पहले ये मांस नगेट्स के तौर पर मिलेंगे लेकिन कंपनी ने अभी बताया नहीं है कि ये कब से उपलब्ध होंगे. स्वास्थ्य, पर्यावरण और जानवरों के बचाव की चिंताओं के कारण रेग्युलर मांस के विकल्प की मांग बढ़ी है.

फ़ाइनैंशियल सर्विस कंपनी बार्कली के अनुसार वैकल्पिक मांस का बाज़ार अगले दशक में 140 अरब डॉलर का हो सकता है. यानी यह 1.4 ट्रिलियन डॉलर की मांस इंडस्ट्री का 10 फ़ीसदी हिस्सा होगा. सुपरमार्केट और रेस्तरां के मेन्यू में बीऑन्ड मीट के साथ इम्पॉसिबल फूड जैसे प्लांट बेस्ड मीट उत्पादकों के मांस की मांग बढ़ी है.

प्लांट बेस्ड मीट वैसे मांस को कहते हैं जिन्हें तैयार किया जाता है. ये मांस की तरह ही होते हैं और स्वाद भी वैसा ही होता है. ये बर्गर पैटी, नगेट्स और टुकड़ों के रूप में मिलते हैं. लेकिन ईट जस्ट का उत्पाद अलग है क्योंकि यह प्लांट बेस्ड नहीं है. यहां मांस जानवरों की मांसपेशियों की कोशिकाओं से लैब में तैयार किए जाएंगे.

 

अहम खोज

कंपनी का कहना है कि वैश्विक फूड इंडस्ट्री के लिए यह एक अहम खोज है और उसे उम्मीद है कि बाक़ी के देश भी सिंगापुर की तरह इसकी मंज़ूरी देंगे.

पिछले दशक में दर्जनों स्टार्टअप्स की ओर से बाज़ार में संवर्धित मांस लाने की कोशिश की गई. इन्हें उम्मीद है कि ये पारंपरिक मांस खाने वालों का भरोसा अपने इस वादे पर जीत लेंगे कि उनका उत्पाद ज़्यादा असली है.

इसराइल स्थित फ़्यूचर मीट टेक्नॉलजी और बिल गेट्स से जुड़ी कंपनी मेमफिश मीट्स भी लैब में बना मांस बाज़ार में उतारने की कोशिश कर रही हैं. इनका कहना है कि उत्पाद लोगों की जेब पर भारी नहीं पड़ेगा और स्वाद के मामले में भी अव्वल होगा. सिंगापुर की कंपनी शिओक मीट्स लैब में जानवरों के मांस बनाने पर काम कर रही है.

कई लोगों का कहना है कि इससे पर्यावरण को फ़ायदा होगा लेकिन कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि विशेष परिस्थितियों में यह जलवायु परिवर्तन के लिए और घातक साबित होगा.

चुनौतियां अभी बाक़ी हैं

बीबीसी न्यूज़ सिंगापुर की मारिको ओई के मुताबिक़ ईट जस्ट ने कहा है कि यह फूड इंडस्ट्री के लिए मील का पत्थर साबित होगा लेकिन चुनौतियां अभी बाक़ी हैं. प्लांट-बेस्ट मांस उत्पादों की तुलना में लैब में तैयार किया गया मांस बहुत महंगा होगा. ईट जस्ट ने पहले कहा था कि लैब में तैयार चिकन नगेट्स 50 डॉलर में मिलेगा.

अब लागत में कमी आई है तो क़ीमत भी कम होगी लेकिन अब भी आम लोगों की जेब से बाहर का सौदा है. दूसरी चुनौती है कि कंपनी के उत्पाद पर उपभोक्ताओं की प्रतिक्रिया क्या होगी.

लेकिन ईट जस्ट के उत्पाद को लेकर सिंगापुर की मंज़ूरी के बाद दूसरे प्लेयर भी सामने आएंगे और अपना ऑपरेशन शुरू करेंगे. इसके साथ ही दूसरे देश भी इसे लेकर मंज़ूरी देने पर विचार कर सकते हैं.

कितना सुरक्षित

सिंगापुर फूड एजेंसी (एसएफ़ए) ने कहा है कि एक एक्सपर्ट वर्किंग ग्रुप ने ईट जस्ट के डेटा की समीक्षा की है. इसमें मैन्युफैक्चरिंग कंट्रोल और संवर्धित चिकन कितना सुरक्षित है की जाँच की गई.

एसएफ़ए ने कहा है कि जाँच में यह सुरक्षित पाया गया है और सिंगापुर में इन्ग्रीडीअन्ट के तौर पर नगेट्स बेचने की मंज़ूरी दी गई है.

एजेंसी का कहना है कि एक रेग्युलेटरी फ्रेमवर्क बनाया गया है जो इस बात पर नज़र रखेगा कि संवर्धित मांस और अन्य वैकल्पिक प्रोटीन उत्पाद सुरक्षा मानदंडों का पालन कर रहे हैं या नहीं.

ईट जस्ट के सह संस्थापक जोश टेट्रिक ने सिंगापुर के फ़ैसले पर कहा है, ”यह सिंगापुर से शुरुआत है और आने वाले दिनों में उनके लैब के मांस को पूरी दुनिया के लोग पसंद करेंगे.”

ईट जस्ट का कहना है कि मांस तैयार करने की पूरी प्रक्रिया में एंटिबायोटिक्स का इस्तेमाल नहीं किया जाता है. कंपनी के मुताबिक़ पारंपरिक चिकन की तुलना में उनके लैब में बने चिकन के मांस में माइक्रोबायोलॉजिकल तत्व बहुत कम होंगे.

ईट जस्ट ने कहा है, ”सिंगापुर में मिली मंज़ूरी से कॉमर्सियल लॉन्चिंग का रास्ता साफ़ हो गया है. हम उच्च गुणवत्ता का मांस सीधे जानवरों की कोशिका से लैब में तैयार करेंगे और यह इंसानों के लिए बिल्कुल सुरक्षित होगा.”


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adminNovember 27, 20202min4290

साल 1968 में एक फिल्म रिलीज हुई थी. नाम था 2001: A Space Odyssey. फिल्म में इंसान का इवोल्यूशन यानि विकास दिखाया गया था. और ये संभव होता है एक खंबेनुमा आकृति (मोनोलिथ) की मदद से. ये जो खंबेनुमा आकृति है इसको हाल ही में आई सुपरहिट वेब सीरीज ‘मार्वल- एजेंट्स ऑफ शील्ड’ में भी देखा गया था. यही नहीं दर्जनों फिल्मों और उपन्यासों में इस तरह के मोनोलिथ का जिक्र मिलता है. हम आपको ये सब इसलिए बता रहे हैं क्योंकि अमेरिका के एक बियाबान इलाके में एक ऐसा ही मोनोलिथ मिला है.

 

मोनोलिथ क्या होता है?

आपको पूरा वाकया बताएंगे लेकिन उससे पहले जान लीजिए कि साइंस की भाषा में मोनोलिथ किसे कहते हैं. बेहद आसान शब्दों में कहा जाए तो मोनोलिथ एक तराशी हुई बड़ी चट्टान या बड़ा खंबा होता है. कई बार ये प्रकृति निर्मित होता है और कई बार मानव निर्मित होता है. जैसे स्टोनहेंज के बड़े-बड़े पत्थर. या फिर मीनारें. ऐसी चट्टानें जो प्राकृतिक रूप से मीनारों जैसी होती हैं. इनको कुछ लोग ऑब्लिस्क (Obelisk) भी कहते हैं. बहुत से पुराने ऑब्लिस्क शिलालेख जैसे भी होते हैं. खैर, अब आपको बताते हैं कि अमेरिका में क्या मिला है.

 

ये किस धातु का बना है, इसकी जांच की जा रही है. फोटो- AP

 

अमेरिका में क्या मिला?

उत्तरी अमेरिका में एक राज्य है जिसका नाम है ऊटा (Utah). ऊटा के एक ओर नेवाडा है, दूसरी ओर कोलाराडो है. ऊटा एक बेहद बियाबान किस्म का इलाका है, जहां कई-कई किलोमीटर तक कुछ नहीं है सिवाय चट्टानों और जंगली जानवरों के. यहां हरियाली कम है और जो पहाड़ हैं उन्हें देख कर लगता है जैसे मंगल ग्रह पर आ गए हों. तो हुआ ये कि Utah Department of Public Safety अपने हेलीकॉप्टर से भेड़ गिन रहा था. इसी दौरान उन्होंने एक चमकीली चीज देखी.

ये एक तिकोना खंबे जैसा था. DPS कर्मचारी उसके पास पहुंचे. वीडियो बनाया. ये वीडियो अब यूट्यूब से लेकर हर जगह पर वायरल है. इस वीडियो में धातु का चमचमाता खंबा दिख रहा है. ये करीब 10 से 12 फीट ऊंचा है. इसका एक सिरा जमीन में गहराई तक धंसा हुआ है. कोई जंग नहीं लगी है. कुछ लिखा नहीं है. अब ये कहां से आया, किसका है, कौन यहां गाड़ गया, कुछ नहीं पता. पता है तो केवल एक सवाल और वो ये कि बेहद बियाबान इलाके में किसी ने ऐसा क्यों किया होगा?

 

इंटरनेट पर लोग इसके बारे में अलग-अलग थ्योरी बता रहे हैं. फोटो- AP

 

चश्मदीद ने क्या कहा?

हेलीकॉप्टर उड़ा रहे पायलट ब्रेट हचिंग्स ने लोकल न्यूज़ चैनल KSL TV से कहा,

“मैंने इससे पहले कभी कोई ऐसी चीज नहीं देखी. एक बायोलॉजिस्ट ने इसे देखा और फिर हम तुरंत इसके ऊपर पहुंच गए. वो बोला- वोआ, पीछे मुड़ो. और मैं बोला- क्या? उसने कहा कि वो पीछे जो चीज़ है, हमें उसे देखना चाहिए. हम वहां पहुंचे. हम हंस रहे थे कि क्या होगा अगर हम में से कोई अचानक गायब हो जाए.”

उसने कहा कि हमें लगा शायद ये नासा का होगा या फिर किसी आर्टिस्ट ने कलाकारी की होगी. या फिर कोई 1968 वाली साइंस फिक्शन Space Odyssey का फैन होगा. DPS ने अब इसकी वीडियो और तस्वीरें अपनी वेबसाइट पर पोस्ट की हैं.

यूएस ब्यूरो ऑफ लैंड मैनेजमेंट इस जमीन का मालिक है. मंगलवार 24 अक्टूबर को मीडिया ने जब उससे इस बारे में बात करनी चाही तो उसने इंकार कर दिया. हालांकि उसकी ओर से कुछ ट्वीट किए गए हैं जिनमें उसने कहा है कि अगर आप इस मोनोलिथ को देखने के लिए यहां आना चाहते हैं तो ना आएं, क्योंकि ये इलाका वाहनों के लिए अच्छा नहीं है.

 

अपने ऑफिशियल स्टेटमेंट में BLM (ब्यूरो ऑफ लैंड मैनेजमेंट) ने कहा,

“जांच जारी है लिहाजा हम इस पर कुछ नहीं कहेंगे लेकिन इतना बता दें कि बिना इजाजत पब्लिक लैंड को इस्तेमाल करना, कब्जा करना, कुछ भी बनाना, अवैध है. भले ही आप किसी भी ग्रह से आए हों.”

वैसे आपको बता दें कि दुनिया इस धातु के खंबे में इतनी इंटरेस्टेड है कि Department of Public Safety की वेबसाइट (dpsnews.utah.gov) भारी ट्रैफिक के कारण क्रैश हो गई है. इस खंबे को लेकर यूट्यूब समेत सारे सोशल मीडिया पर इतनी थ्योरी तैर रही हैं कि आने वाले वक्त में इस पर एक दो फिल्में तो पक्का बनेंगी. खैर, अगर इसके मालिक का कुछ पता चलेगा तो हम वो भी आपको बता देंगे. जानकारी आप तक पहुंचती रहे उसके लिए आप हमारे यूट्यूब चैनल को सब्सक्राइब कर लें और फेसबुक पेज को लाइक कर लें.


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adminNovember 19, 20201min3680

नीड्स नो इंट्रोडक्शन. लाल शॉर्ट्स, बड़े पीले जूते और सफेद दस्ताने पहने चूहे वाले कार्टून कैरेक्टर. भयंकर फेमस. मिकी का आज हैप्पी बड्डे है. 18 नवंबर. आज ही के दिन 1928 में मिकी का डेब्यू हुआ था. जब न्यू यॉर्क के कॉलोनी थियेटर में फिल्म स्टीमबोट विली रिलीज़ हुई थी.

 

कैसे पैदा हुआ मिकी

वाल्टर एलियास ‘वॉल्ट’ डिज़्नी. अमेरिका के प्रॉड्यूसर, डायरेक्टर, एनिमेटर, बिज़नेसमैन, एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के बड़े नाम और न जाने क्या-क्या. दुनिया के सबसे बड़े प्रॉडक्शन हाउस वॉल्ट डिज़्नी की नींव रखने वाले. वाल्टर अब दुनिया में नहीं हैं. 1966 में उनका निधन हो गया.

1927 के अल्ले-पल्ले की बात है. वाल्टर उस समय 26 साल के थे. उन्होंने एक कार्टून कैरेक्टर तैयार किया था- ऑसवाल्ड, द लकी रैबिट. इस पर सीरीज़ भी चल रही थी. सीरीज़ को वाल्टर आगे चलाना चाहते थे, पर प्रोड्यूसर्स ने इसे बंद करने का फैसला किया. वे न्यूयॉर्क गए, प्रोड्यूसर से मिलने. लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. उल्टा ये कह दिया गया कि ऑसवाल्ड का कॉपीराइट प्रॉडक्शन हाउस के पास है, न कि वाल्टर के पास. इसलिए वाल्टर अब कहीं बाहर ये कार्टून कैरेक्टर नहीं बेच सकते. वाल्टर उदास और गुस्से से भरे मन के साथ ट्रेन में वापस लौट रहे थे. लॉस एंजिलिस को.

ट्रेन के एक कोने में शांत बैठे-बैठे उन्होंने एक रफ स्केच सा खींचा. एक चूहा. Rest in History.

“मेरे जेहन में कुछ दिन पहले से ही एक चूहे का कैरेक्टर दौड़ रहा था. आप पूछेंगे चूहा क्यों? क्योंकि चूहे के साथ हम सब एक कनेक्ट महसूस करते हैं. सहानुभूति महसूस करते हैं. लेकिन साथ ही हम चूहे को देखकर डरते या चौंकते भी हैं. मैं खुद चूहे से डरता हूं. इसलिए ये कैरेक्टर लोगों से काफी जुड़ सकता था.” – वाल्टर

 

नामकरण

चूहे वाला ये कार्टून कैरेक्टर जैसे ही कागज पर उतरा, वाल्टर को भा गया. फौरन एक नाम दिया- मॉर्टिमर. कार्टून अपनी बीवी को दिखाया, जो वाल्टर के साथ ट्रेन में ही थीं. उनको भी बहुत पसंद आया. लॉस एंजिलिस उतरने से पहले बीवी ने कहा कि यार ये मॉर्टिमर नाम जम नहीं रहा. इसका नाम रखो- मिकी. मिकी माउस.

 

रिजेक्शन

घर पहुंचते ही वाल्टर ने मिकी के पहले कार्टून पर काम शुरू किया. इसी साल पहला कार्टून तैयार भी हो गया- प्लेन क्रेज़ी. दूसरा कार्टून भी तैयार किया गया- दि गैलोपिन. लेकिन वाल्टर को तब झटका लगा, जब इन दोनों कार्टून को कोई भी प्रॉड्यूस करने को तैयार नहीं हुआ. बताते चलें कि ये दोनों कार्टून म्यूट थे. यानी उनकी आवाज़ नहीं थी.

इसी बीच एक ख़बर आती है. वॉर्नर ब्रदर्स, जो उस समय के भी बड़े प्रॉडक्शन हाउस में से थे, वे अब बोलती फिल्मों में इन्वेस्ट करेंगे. पहली फुरसत में वाल्टर ने मिकी के तीसरे कार्टून पर काम शुरू कर दिया- स्टीमबोट विली. बोलता कार्टून. लेकिन लॉस एंजिलिस में उस समय कोई ऐसा स्टूडियो नहीं था, जहां फिल्म की ऑडियो रिकॉर्डिंग की जा सके. इसके लिए वाल्टर को न्यू यॉर्क जाना पड़ा. फिल्म स्टीमबोट विली तैयार हुई. पहला प्रीमियर हुआ और यहीं से न्यू यॉर्क के कॉलोनी थियेटर ने फिल्म को प्रोड्यूस करने का फैसला ले लिया. रिलीज़ होते ही लोगों ने मिकी को हाथों-हाथ लिया.


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adminNovember 10, 20201min4840

वर्जिन हाइपरलूप. अरबपति रिचर्ड ब्रैनसन की कंपनी. इसने हाई-स्पीड पाॅड सिस्टम की यात्रियों के साथ पहली टेस्टिंग सफलतापूर्वक कर ली है. वर्जिन हाइपरलूप इस टेक्नोलाॅजी की टेस्टिंग करने वाली दुनिया की पहली कंपनी बन गई है. यह टेस्टिंग अमेरिका के नेवाडा राज्य के लाॅस वेगास में की गई. इसकी अधिकतम स्पीड 172 किमी प्रति घंटे थी.

इसमें जिन दो लोगों ने यात्रा की, वो हैं- वर्जिन हाइपरलूप के चीफ टेक्नोलाॅजी ऑफिसर जोश गेगल और पैसेंजर एक्सपीरियंस डायरेक्टर सारा लुचियान. कंपनी के मुताबिक, अगली सवारी पुणे यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग कर चुके और वर्जिन हाइपरलूप कंपनी के कर्मचारी तनय मांजरेकर करेंगे.

बता दें कि यह कंपनी काफी समय से टेस्टिंग कर रही है. बिना यात्री के लगभग 400 बार टेस्टिंग कर चुकी है. इस बार यात्रियों के साथ पहली बार टेस्टिंग की गई है. पहली यात्रा सफल होने पर वर्जिन हाइपरलूप के चेयरमैन सुल्तान अहमद बिन सुलेयम ने कहा कि उनके लिए यह सौभाग्य की बात है कि उन्होंने अपनी आंखों के सामने इतिहास बनता देखा.

आइए जानते हैं कि हाइपरलूप क्या होता है और क्या है इसकी खासियत.

 

क्या होता है हाइपरलूप

हाइपरलूप ट्रांसपोर्टेशन का एक ऐसा नया तरीका है, जिसकी मदद से दुनिया में कहीं भी लोगों को या वस्तुओं को तेजी के साथ सुरक्षित एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाया जा सकता है. हाइपरलूप एक कैप्सूल रूपी मैग्नेटिक ट्रेन है, जो 1000-1300 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से दौड़ सकती है. इस तकनीक को हाइपरलूप इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसमें परिवहन एक लूप के जरिए से होता है, जिसकी स्पीड बहुत अधिक होती है. इसकी सबसे खास बात यह है कि पर्यावरण पर इसका खास प्रभाव भी नहीं पड़ता है.

हाइपरलूप तकनीक का आइडिया टेस्ला मोटर्स कंपनी के सीईओ और सह-संस्थापक इलाॅन मस्क को 2013 में आया था. इलाॅन मस्क ने इसे पांचवा ट्रांसपोर्टेशन मोड बताया था. वहीं ‘वर्जिन हाइपरलूप’ को साल 2014 में पहली बार शुरू किया गया था.

 

हाइपरलूप कैसे काम करता है

# इस तकनीक में विशेष प्रकार से डिजाइन किए गए कैप्सूल या पाॅड्स का इस्तेमाल किया जाता है. सबसे पहले इन पाॅड्स में यात्रियों को बिठाया जाता है या कार्गो लोड किया जाता है. इसके बाद इन पाॅड्स को बड़े-बड़े पाइपों में इलेक्ट्रिकल चुंबक पर चलाया जाता है. चुंबकीय प्रभाव से ये पाॅड्स ट्रैक के कुछ ऊपर उठ जाते हैं. इससे घर्षण कम हो जाता है, जिससे इसकी स्पीड तेज हो जाती है.

# ट्रांसपोर्टेशन की इस तकनीक में बड़े-बड़े पाइपों के अंदर वैक्यूम जैसा वातावरण तैयार किया जाता है. यानी उनमें से हवा को पूरी तरह से निकाल दिया जाता है, ताकि भीतर घर्षण न हो.

# इन वाहनों में पहिए नहीं होते है. वे खाली स्थान में तैरते हुए आगे बढ़ते हैं.

 

क्या है इसकी खासियत

# पायलट की त्रुटि और मौसम संबंधी खतरों से बचने के लिए हाइपरलूप को स्वचालित वाहन के रूप में विकसित किया गया है. यह एक स्वच्छ प्रणाली है, क्योंकि इसमें से कार्बन का उत्सर्जन नहीं होता है. इसके साथ ही इसमें बिजली भी कम खर्च होती है.

# खतरनाक ग्रेड क्राॅसिंग से बचने और वन्यजीवों को हानि से बचाने के लिए इसका निर्माण भूमिगत सुरंगों या जमीन के ऊपर स्तंभों पर किया जाता है.

# अमेरिका में सबसे पहले न्यूयॉर्क और वॉशिंगटन के बीच हाइपरलूप ट्रेन सिस्टम चलाया जाना है. इस ट्रेन सिस्टम के चल जाने के बाद वॉशिंगटन से न्यूयॉर्क का सफर मात्र 30 मिनट में किया जा सकेगा. यह पॉड सिस्टम कमर्शियल जेट फ्लाइट से दोगुना और हाई-स्पीड ट्रेन से 4 गुना तेज है. इसकी स्पीड जापान की बुलट ट्रेन से भी दोगुनी है.

# भारत के लिहाज से बात करें, तो पुणे और मुंबई के बीच अभी 3 से 4 घंटे सफर में लगते हैं. हाइपरलूप ट्रेन से तो ये यात्रा 20-25 मिनट में ही हो जाए.

 

भारत के लिए क्या हैं इसके मायने

सफर को सुगम और जल्द पूरा करने के लिए वर्जिन हाइपरलूप भारत में भी कई रूट पर ऐसी ट्रेन चलाने की योजना बना रही है. इसमें मुंबई-पुणे, बेंगलुरु सिटी-बेंगलुरु एयरपोर्ट, अमृतसर-लुधियाना-चंडीगढ़, भोपाल-इंदौर-जबलपुर रूट शामिल हैं. साल 2019 के अगस्त महीने में महाराष्ट्र सरकार ने वर्जिन हाइपरलूप को मुंबई-पुणे हाइपरलूप  प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी थी. उस वक्त महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस थे. मुंबई-पुणे प्रोजेक्ट के पहले फेज में 11.8 किलोमीटर लंबा ट्रैक बनना था, जिसकी लागत 10 अरब डॉलर थी. इसे बनने में लगभग ढाई साल लगना था. लेकिन महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली गठबंधन सरकार बनने के बाद प्रोजेक्ट को रोक दिया गया था.

महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम अजित पवार ने कहा था-

“सरकार की ऐसी आर्थिक स्थिति नहीं है कि हाइपरलूप जैसे कॉन्सेप्ट को प्रयोग में लाया जा सके. सरकार फिलहाल ट्रांसपोर्ट के दूसरे माध्यम पर विचार कर रही है. इस तरह के काॅन्सेप्ट को कहीं दूसरी जगह आजमाया जाए. अगर वह सफल होता है, तो हम इसकेे बारे में सोच सकते हैं.”

लेकिन इसके बाद भी वर्जिन ग्रुप लगातार भारत से हाइपरलूप प्रोजेक्ट को लेकर बात कर रही है. इस साल की  शुरूआत में भी मुंबई-दिल्ली के बीच हाइपरलूप ट्रेन चलाने को लेकर वर्जिन ग्रुप ने अपना प्रस्ताव केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के सामने रखा था. कोरोना के चलते अब तक इस प्रोजेक्ट पर बात नहीं बढ़ पाई है.


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adminNovember 6, 20203min4880

पोलैंड. यूरोप का एक देश है. वहां पिछले दस दिनों से महिलाएं सड़क पर उतरी हुई हैं. जोरदार विरोध प्रदर्शन हो रहा है. किस बात पर?

पोलैंड के संवैधानिक कोर्ट ने एक हालिया फैसले के खिलाफ. इसमें कहा गया है कि अगर किसी गर्भवती महिला के पेट में पल रहे भ्रूण में कोई विकृति पाई जाती है, तब भी वह गर्भपात नहीं करा सकेगी. प्रेग्नेंसी टर्मिनेट कराने की इजाजत तभी होगी, जब वह रेप की वजह से हो या फिर उसके कारण मां की जिंदगी को खतरा हो.

इस ऑर्डर के बाद से ही पोलैंड में महिलाएं और अबॉर्शन से जुड़े अधिकारों के समर्थक सड़कों पर उतर आए हैं. इन प्रदर्शनों को देखते हुए अब सरकार ने कदम पीछे खींच लिए हैं, और कोर्ट के इस फैसले को लागू करने में देरी कर दी है, जोकि आमतौर पर नहीं होता.

 

प्रोटेस्ट से एक तस्वीर. (तस्वीर: AP)

 

पोलैंड का ये प्रोटेस्ट पहला ऐसा प्रोटेस्ट नहीं है, जिसमें महिलाएं उतरीं और पूरे देश को झकझोर कर रख दिया. इतिहास में कुछ ऐसे विरोध प्रदर्शन भी दर्ज हैं, जिनके बिना आज की दुनिया की तस्वीर कुछ और होती. उन पर बात करेंगे. लेकिन पहले ये समझ लीजिए कि पोलैंड में चल रहा ये विरोध इतना ख़ास क्यों है.

संवैधानिक कोर्ट का ये फैसला लागू होने का मतलब है कि पोलैंड में लगभग सभी गर्भपात गैरकानूनी हो जाएंगे. यूरोप में पोलैंड ऐसा देश है, जहां गर्भपात पर लगी रोक सबसे कड़ी है. अभी तक उन मामलों में ही गर्भपात की इजाजत थी, जिनमें प्रेग्नेंसी जारी रखने या बच्चे को जन्म देने पर बच्चे या मां की जान को खतरा था, या फिर भ्रूण में कोई विकृति थी. लेकिन कोर्ट की रूलिंग के बाद इस पर भी बैन लग जाएगा.

डॉक्टर्स का कहना है कि ये बैन पेशेंट्स को खतरे में डाल सकता है. यही नहीं, विकृत बच्चे के जन्म लेने पर वो किस तरह इससे डील कर पाएंगे, ये दर्द भी डॉक्टर्स को देखना होगा. वो खुद को इसके लिए मजबूर नहीं देखना चाहते.

 

पोलैंड में चल रहे विरोध प्रदर्शनों से एक तस्वीर. (तस्वीर: AP)

 

इस रूलिंग के खिलाफ जिस तरह लाखों लोग सड़कों पर उतरे हैं, उससे सत्ताधारी पार्टी (PiS) भौंचक रह गई है. द गार्डियन की एक रिपोर्ट कहती है कि यही वजह है कि अब सरकार चाह रही है कि बैन में थोड़े बदलाव करके कानून लागू किया जाए. राष्ट्रपति ने सुझाव दिया है कि जान को खतरे में डालने वाली विकृतियों के मामले में अबॉर्शन करने देना चाहिए. डाउन सिंड्रोम के मामलों में अबॉर्शन की अनुमति नहीं देनी चाहिए.

जिस तरह पोलैंड की सरकार को इस विरोध ने पीछे हटने पर मजबूर कर दिया, वैसे ही कुछ प्रोटेस्ट्स के बारे में बताते हैं, जिनकी लीडर महिलाएं थीं और जिन्होंने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींचा:

 

1. मार्च 1911 में महिला कामगारों के लिए प्रदर्शन

25 मार्च 1911 को एक ब्लाउज फैक्ट्री में आग लग गई थी. ये फैक्ट्री न्यूयॉर्क के ग्रीनविच विलेज नाम की जगह पर थी. नाम था ट्राएंगल शर्टवेस्ट फैक्ट्री. आग लगने के बाद फैक्ट्री में काम कर रहे वर्कर्स  ने भागने की कोशिश की. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया, क्योंकि फैक्ट्री मालिकों ने सीढ़ियों और दरवाजों पर ताले लगा रखे थे. कथित तौर पर ऐसा इसलिए था ताकि वर्कर बाहर न घूम सकें और कुछ चुराकर न भाग सकें.

नतीजा ये हुआ कि 146 कर्मचारी मारे गए. इनमें 123  महिलाएं थीं. इसके खिलाफ प्रदर्शन हुए. एक लाख के करीब लोग मार्च करने पहुंचे. पढ़ने को मिलता है कि इसकी वजह से अमेरिका की सबसे बड़ी लेबर यूनियंस में से एक इंटरनेशनल लेडीज गारमेंट वर्कर्स यूनियन की मेम्बरशिप कई गुना बढ़ गई और ये सबसे ताकतवर यूनियन बन गई. यही नहीं, इस घटना के बाद न्यूयॉर्क में प्रशासन ने फैक्ट्रियों में काम करने की परिस्थितियों की जांच करने और उनमें सुधार के लिए कमीशन बनाया. इसकी रिपोर्ट आने के बाद लेबर लॉज़ में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए.

 

न्यूयॉर्क की वह फैक्ट्री जहां आग लगी थी. (तस्वीर: विकिमीडिया कॉमन्स)

 

2. दक्षिण अफ्रीका के प्रेटोरिया में महिलाओं का मार्च

उस वक्त की बात है, जब दक्षिण अफ्रीका में श्वेत और अश्वेत लोगों के बीच भेदभाव काफी बढ़ा हुआ था. पास लॉ नाम का कानून चलता था. इसमें ब्लैक लोगों को अपने साथ एक पास लेकर चलना पड़ता था, जो एक तरह से अंतर्देशीय पासपोर्ट की तरह होता था. पहले ये सिर्फ पुरुषों पर लागू होता था. 1950 के आसपास इसे महिलाओं पर भी थोपने की बात हुई. लेकिन उन्होंने इसके खिलाफ बगावत कर दी.

9 अगस्त 1956 को लगभग 20,000 महिलाएं दक्षिण अफ्रीका के प्रधानमंत्री के पास पहुंचीं और याचिका दी कि इस पास कानून को खत्म किया जाए. उस समय शुरू हुआ विरोध अगले कई सालों तक चलता रहा. ये विरोध मार्च सबसे आइकोनिक प्रतीकों में से एक माना जाता है. पास कानून आखिरकार 1986 में खत्म हुआ. आज भी उनकी इस बहादुरी की याद में 9 अगस्त को वहां राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है.

 

पास के नाम पर नस्लभेद को बढ़ावा देने वाली प्रथा अफ्रीका में 1986 तक चलती रही. (तस्वीर: साउथ अफ्रीकन हिस्ट्री)

 

3. आइसलैंड विमेंस स्ट्राइक

1975 में आइसलैंड की महिलाओं ने भी ऐतिहासिक बंद का आयोजन किया था. उन्होंने घर में खाना बनाने से इनकार कर दिया. काम करने से इनकार कर दिया. बच्चों की देखभाल से इनकार कर दिया. 24 अक्टूबर को हुई इस हड़ताल में आइसलैंड की करीब 90 फीसदी औरतें शामिल हुईं. वे सड़कों-गलियों में निकल आईं. ये दिन आइसलैंड का ‘विमिन्स डे ऑफ’ कहा जाता है.

लोगों ने लिखा कि इस एक दिन ने उनकी आंखें खोल दीं. एक आंदोलन ने वहां महिलाओं को बराबरी हासिल करवाने में बहुत मदद की. 1980 में इसी आइसलैंड में एक तलाकशुदा सिंगल औरत राष्ट्रपति चुनाव जीत गई. नाम था विगडिस फिनबोगादोतिर. तीन पुरुष उम्मीदवारों को हराकर विगडिस इस मुकाम पर पहुंचीं. सिर्फ आइसलैंड की नहीं, बल्कि पूरे यूरोप की पहली महिला राष्ट्रपति बनीं.

 

2016 में भी आइसलैंड की महिलाओं ने समान काम के लिए समान वेतन की मांग करते हुए बड़ा प्रदर्शन किया था.

 

4. महिलाओं का वॉशिंगटन मार्च

ये मार्च साल 2017 में हुआ. अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर डॉनल्ड ट्रम्प के चुने जाने के विरोध में. रिपोर्ट्स की मानें तो तकरीबन 70 लाख लोगों ने पूरी दुनिया में मार्च किया था. सभी व्यक्तियों के लिए मानवाधिकारों, बराबरी और आज़ादी के लिए. इसे ऑर्गनाइज किया गया सोशल मीडिया के माध्यम से. ये अमेरिका का सबसे बड़ा एक दिन का प्रोटेस्ट भी बना. इस प्रोटेस्ट के दौरान गुलाबी रंग की टोपी खूब पॉपुलर हुई. इसे मार्च के दौरान लोगों ने पहना. इसे पुसीहैट कहा गया. ये प्रतीक माना गया डॉनल्ड ट्रम्प के अश्लील कमेंट्स के विरोध का, और महिलाओं के अधिकार का.

 

इन गुलाबी टोपियों को बनाने का काम पुसीहैट प्रोजेक्ट के तहत किया गया.

 

5. पूरी दुनिया में 8 मार्च 2018 को महिलाओं की स्ट्राइक

8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस होता है. 2018 में इसी दिन औरतों ने मिलकर एक स्ट्राइक कर दी. दुनिया के कई देशों की महिलाओं ने अपने-अपने अधिकारों के लिए हड़ताल की. अपनी तरह का ये पहली ‘महिला हड़ताल’ थी. इसका नारा था:

without us, the world stops.
(हमारे बिना दुनिया रुक जाती है.)

फ्रांस हो या इराक या दक्षिण कोरिया, या फिर स्पेन, ब्रिटेन और जर्मनी. 50 से ज्यादा देशों में औरतों ने इस बंद में हिस्सा लिया. स्पेन में तो ये हड़ताल इतनी बड़ी हो गई कि सैकड़ों ट्रेनें बंद करनी पड़ीं. काम रुक गया. इतने विरोध प्रदर्शन हुए कि गिनती नहीं. ये औरतें मांग क्या रही थीं? बहुत बुनियादी चीजें. जो उन्हें दी जानी चाहिए, मगर दी नहीं जातीं. बराबरी. समान काम के लिए समान वेतन. वगैरह वगैरह. जैसे ‘मीटू’ कैंपेन के हैशटैग दुनियाभर में छाए रहे थे, वैसा ही ग्लोबल प्रोटेस्ट. इस बंद का मतलब था पुरुषों को महिलाओं के होने की अहमियत का एहसास कराना. स्कूल मत जाओ, कॉलेज मत जाओ, दफ्तर मत जाओ, किसी दुकान से कुछ न खरीदो. महसूस कराओ औरों को कि औरतों के न होने से क्या होता है. इस स्ट्राइक ने लोगों की आंखें खोल दीं, और दिखाया कि अब भी कितना कुछ है, जो बदलना बाकी है.

 

2018 में बराबरी के लिए महिलाओं ने ऐतिहासिक प्रदर्शन किया था.

 

पोलैंड में इस वक़्त चल रहा प्रदर्शन बानगी भर है. पिछले कुछ दशकों में महिलाओं ने अपने अधिकारों और एक बेहतर दुनिया के लिए लगातार आवाज़ उठाई है. इसमें उन्हें भरपूर साथ भी मिला है लोगों का. देखना ये है कि पोलैंड में महिलाओं का ये विरोध उनके अबॉर्शन के अधिकारों के लिए कितना काम आ पाता है.


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adminOctober 26, 20203min5500

चीन के शंघाई शहर में इंजीनियरों ने 7,600 टन की एक विशालकाय इमारत को उसकी जगह से खिसकाकर दूसरी जगह ले जाने का कारनामा कर दिखाया है.

उन्होंने 1935 में बनी शंघाई के लागेना प्राथमिक विद्यालय की पाँच मंज़िला इमारत को उसकी जगह से उठाया और तकनीक के इस्तेमाल से उसे कुछ दूरी पर ले गए.

स्थानीय प्रशासन के अनुसार, इस पुरानी इमारत के पास ही एक नए प्रोजेक्ट पर काम शुरू होना है जिसके लिए जगह थोड़ी पड़ने पर इस बिल्डिंग को उसकी जगह से खिसकाने का निर्णय लिया गया.

चीन के इंजीनियरों के पास इस इमारत को गिराने का विकल्प भी था, मगर उन्होंने इस ऐतिहासिक इमारत को उसकी जगह से उठाकर दूसरी जगह शिफ़्ट करने का निर्णय लिया.

 

BBC
BBC

 

चीन के सरकारी मीडिया के अनुसार, इंजीनियरों की एक टीम ने तकनीक की मदद से बिल्डिंग को उठाया और 198 रोबोटिक टाँगों की मदद से उसे कुछ दूर ले गए.

स्थानीय मीडिया के अनुसार, कंक्रीट से बनी हज़ारों टन की इस इमारत को उसकी मूल जगह से क़रीब 62 मीटर खिसकाया गया है.

चीन सरकार द्वारा नियंत्रित सीसीटीवी न्यूज़ नेटवर्क के अनुसार, इमारत को एक जगह से दूसरी जगह शिफ़्ट करने का काम 18 दिनों में पूरा किया गया. बताया गया है कि 15 अक्तूबर को बिल्डिंग शिफ़्ट करने का काम पूरा कर लिया गया था.

न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, स्थानीय प्रशासन ने अब इस ऐतिहासिक इमारत को संरक्षित रखने का निर्णय लिया है और उसी लिहाज़ से इमारत की मरम्मत का काम किया जा रहा है.

इमारतों को एक जगह से दूसरी जगह शिफ़्ट करने के यूँ तो कई तरीक़े हैं, मगर आमतौर पर इंजीनियर ऐसी इमारतों को बड़े प्लेटफ़ॉर्म की मदद से शिफ़्ट करते हैं जिन्हें ज़्यादा क्षमता वाली रेल या क्रेन से खींचा जाता है.

लेकिन इस बार चीनी इंजीनियरों ने रोबोटिक लेग्स (रोबोट द्वारा नियंत्रित मज़बूत पाये) इस्तेमाल किये जिनके नीचे पहिये लगे थे. चीनी इंजीनियरों द्वारा पहली बार इस तरीक़े को अपनाया गया है.

हालांकि, ग़ौर करने वाली बात यह है कि शंघाई के इंजीनियरों के पास बिल्डिंगों को इस तरह शिफ़्ट करने का पुराना तजुर्बा है.

साल 2017 में, 135 साल पहले बने और क़रीब दो हज़ार टन वज़न वाले ऐतिहासिक बौद्ध मंदिर को उसकी मूल जगह से लगभग 30 मीटर खिसकाया गया था और इस मंदिर को 30 मीटर खिसकाने में 15 दिन लगे थे.

इस साल की शुरुआत में भी चीन के इंजीनियरों ने बिल्डिंग निर्माण के क्षेत्र में एक कीर्तिमान स्थापित किया था. चीन के हूबे प्रांत में स्थित वुहान शहर में कोरोना संक्रमण तेज़ी से फ़ैलने के बाद चीनी इंजीनियरों ने दस दिन में हज़ार बेड का अस्पताल बनाकर दिखाया था. वुहान वही शहर है जहाँ सबसे पहले कोविड-19 संक्रमण की आधिकारिक पुष्टि की गई थी.

 


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adminOctober 16, 202017min6850

भारत की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) इस साल -10.3 प्रतिशत जा सकती है, जब से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ़ का ये अनुमान सामने आया है, देश में भारत की जीडीपी से ज़्यादा चर्चा बांग्लादेश की जीडीपी की चल रही है.

आईएमएफ़ का अनुमान ये भी है कि प्रति व्यक्ति जीडीपी में आने वाले दिनों में बांग्लादेश भारत को पीछे छोड़ कर आगे निकल जाएगा. इसी मुद्दे पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बुधवार को एक ट्वीट भी किया.

उन्होंने ट्विटर पर लिखा, “बीजेपी सरकार के पिछले छह साल के नफ़रत भरे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की सबसे ठोस उपलब्धि यही रही है: बांग्लादेश भी भारत को पीछे छोड़ने वाला है.”

 

 

इस ग्राफ़ में साल 2020 के लिए बांग्लादेश में प्रति व्यक्ति जीडीपी 1876.5 डॉलर दिखाया गया है और भारत के लिए 1888.0 डॉलर दिखाया गया है.

इस पर जाने माने अर्थशास्त्री कौशिक बासु ने ट्विटर पर लिखा, “आईएमएफ़ के अनुमान के मुताबिक़ प्रति व्यक्ति जीडीपी में बांग्लादेश भारत को 2021 में पीछे छोड़ देगा. उभरती हुई अर्थव्यवस्था वाले देश इतना अच्छा कर रहे हैं, ये अच्छी ख़बर है. लेकिन भारत के लिए ये आँकड़े चौंकाने वाले हैं. पाँच साल पहले तक बांग्लादेश भारत से 25 फ़ीसदी पीछे था. देश को बोल्ड राजकोषीय/ मौद्रिक नीति की ज़रूरत है.”

 

भारत, बांग्लादेश के जीडीपी की तुलना कितनी सही

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भारत की जीडीपी का अनुमान -10.3 प्रतिशत लगाया है, वहीं बांग्लादेश के लिए ये अनुमान 3.8 प्रतिशत का है. बांग्लादेश के अलावा चीन और म्यांमार की जीडीपी के बारे में पॉज़िटिव अनुमान लगाया गया है.

अर्थव्यवस्था के लिहाज से चीन, भारत से हमेशा बेहतर स्थिति में रहा है. इसलिए लोग अब बांग्लादेश के साथ ही भारत की तुलना करने में लगे हैं.

ऐसे में ये जानना ज़रूरी है कि ये तुलना कहीं सेब और संतरे के बीच की तुलना तो नहीं है.

 

ग्राफ़

 

राहुल गांधी के ट्वीट के बाद भारतीय मीडिया में सरकारी सूत्रों के हवाले से ख़बर छपी कि भारत की जनसंख्या बांग्लादेश के मुक़ाबले 8 गुना बड़ी है. दूसरी बात ये कि 2019 में भारत की पर्चेज़िंग पावर पैरिटी यानी ख़रीदने की क्षमता 11 गुना अधिक थी. मतलब ये कि बांग्लादेश के ये आँकड़े ‘अस्थायी’ बात है, इससे भारत को घबराने की ज़रूरत नहीं है.

प्रति व्यक्ति जीडीपी यह बताती है कि किसी देश में प्रति व्यक्ति के हिसाब से आर्थिक उत्पादन कितना है. इसकी गणना किसी देश के कुल सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी को उस देश की कुल जनसंख्या का भाग देकर निकाला जाता है.

स्पष्ट है कि जिस देश की जनसंख्या ज़्यादा होगी, उस देश के लिए आँकड़ा कम होगा. ये सीधा गणित है.

प्रोफ़ेसर प्रबीर डे इंटरनेशनल ट्रेड और इकोनॉमी के जानकार हैं. भारत में रिसर्च एंड इंफ़ॉर्मेशन सिस्टम फ़ॉर डेवलपिंग कंट्री (आरआईएस) में प्रोफ़ेसर हैं.

 

ग्राफ़

 

वो कहते हैं, “इन आँकड़ों को केवल राजनीति से प्रेरित हो कर पेश किया जा रहा है. वो मानते हैं कि भारत की गिरावट अस्थायी है. थोड़े समय बाद इसमें सुधार देखने को मिलेगा. ऐसा इसलिए कि बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था भारत के मुक़ाबले छोटी है. बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था फ़िलहाल 250 बिलियन अमरीकी डॉलर के आसपास की है, जबकि भारत की अर्थव्यवस्था तकरीबन 2.7 ट्रिलियन डॉलर की है.”

वो कहते हैं कि सबसे पहले ये जान लीजिए कि आईएमएफ़ ये आँकड़े ख़ुद से नहीं निकालता, बल्कि संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश अपने जीडीपी के आँकड़े उनसे साथ साझा करते हैं, जिसके आधार पर वो अनुमान निकालते हैं.

दूसरी बात ये कि कोरोना की वजह से पहली तिमाही के दौरान दक्षिण एशियाई देशों में भारत की जीडीपी सबसे ज़्यादा प्रभावित थी. ये (माइनस) -23.9 प्रतिशत तक पहुँच गई थी. जबकि बांग्लादेश और चीन की जीडीपी में गिरावट भारत के मुक़ाबले काफ़ी कम थी. भारत में जिस स्तर का लॉकडाउन लगाया गया था, वैसा दूसरे देशों में नहीं था. इसका भी असर आईएमएफ़ के ताज़ा अनुमान में देखने को मिला है.

लेकिन प्रबीर डे साथ ही ये भी कहते हैं कि बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था तेज़ी से उभर रही है, इसमें कोई दो राय नहीं हैं.

 

सांकेतिक तस्वीर

बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था

1971 में पाकिस्तान से आज़ादी के बाद बांग्लादेश ने कई त्रासदियों को झेला है. 1974 में भयानक अकाल देखा, भयावह ग़रीबी, प्राकृतिक आपदा और अब शरणार्थी संकट से बांग्लादेश जूझ रहा है. लाखों की संख्या में रोहिंग्या मुसलमान पड़ोसी बर्मा से अपना घर-बार छोड़ बांग्लादेश में आ गए हैं.

बांग्लादेश की जनसंख्या तकरीबन 17 करोड़ के आसपास है.

बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था में दो बातों का सबसे बड़ा योगदान है. पहला कपड़ा उद्योग और दूसरा विदेशों में काम करने वाले लोगों का भेजा पैसा.

मैन्युफ़ैक्चरिंग सेक्टर में बांग्लादेश तेज़ी से प्रगति कर रहा है. कपड़ा उद्योग में बांग्लादेश चीन के बाद दूसरे नंबर पर है. बांग्लादेश में बनने वाले कपड़ों का निर्यात सालाना 15 से 17 फ़ीसदी की दर से आगे बढ़ रहा है.

2018 में जून महीने तक कपड़ों का निर्यात 36.7 अरब डॉलर तक पहुँच गया. प्रधानमंत्री शेख़ हसीना का लक्ष्य है कि 2021 में बांग्लादेश जब अपनी 50वीं वर्षगांठ मनाए, तो यह आँकड़ा 50 अरब डॉलर तक पहुँच जाए.

दूसरी तरफ़ भारत में मैन्युफ़ैक्चरिंग सेक्टर में पिछले दिनों सबसे ज़्यादा गिरावट देखने को मिली है. पहली तिमाही में मैन्युफ़ैक्चरिंग सेक्टर ग्रोथ -39.3 फ़ीसदी रहा था.

बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था में विदेशों में काम करने वाले क़रीब 25 लाख बांग्लादेशियों की भी बड़ी भूमिका है. विदेशों से ये जो पैसे कमाकर भेजते हैं, उनमें सालाना 18 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हो रही है और 2019 में ये राशि 19 अरब डॉलर तक पहुँच गई.

लेकिन कोरोना महामारी की वजह से दोनों ही क्षेत्रों में नकारात्मक असर पड़ा है.

 

सांकेतिक तस्वीर

बांग्लादेश में कोरोना का हाल

बांग्लादेश में कोरोना का पहला मामला 8 मार्च 2020 को आया. 23 मार्च 2020 को वहाँ की सरकार ने एलान किया कि 26 मार्च से 30 मई तक सरकारी छुट्टी रहेगी. बैंक कम समय के लिए ही सही, वहाँ काम कर रहे थे. 8 अप्रैल को रोहिंग्या कैम्प में भी सरकारी पाबंदियाँ लगा दी गई थी. 31 मई से बांग्लादेश में ज़्यादातर चीज़े खुल गई थी.

जबकि भारत में जनवरी के अंत में कोरोना का पहला मामला सामने आया था. 24 मार्च 2020 से पूरे देश में संपूर्ण लॉकडाउन लगाया गया. उससे पहले ही कई राज्यों ने अपने-अपने स्तर पर दूसरी पाबंदियाँ लगानी शुरू कर दी थी.

पहली बार लॉकडाउन के दौरान 15 अप्रैल 2020 से कुछ इलाक़ों में आर्थिक गतिविधियों की छूट दी गई. वहीं 30 सितंबर तक कई चीज़ों पर कोरोना महामारी की वजह से कुछ न कुछ पाबंदियाँ लगी ही रही.

आईएमएफ़ के मुताबिक़ बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था कोरोना के दौर में दो वजहों से सबसे ज़्यादा प्रभावित हुई है. पहला है रेमिटेंस (विदेशों में काम करने वाले देश में जो पैसा भेजते हैं) में कमी. रेमिटेंस का पैसा उनके देश की कुल जीडीपी का 5 प्रतिशत हिस्सा है.

दूसरी वजह है उनके रेडीमेड कपड़ों के निर्यात में कमी. रेडीमेड कपड़ों का निर्यात, बांग्लादेश के कुल निर्यात का 80 फ़ीसदी है. इसके अलावा बारिश और बाढ़ ने भी कृषि को वहाँ काफ़ी नुक़सान पहुँचाया है.

वहीं भारत के लिए आईएमएफ़ ने जीडीपी में भारी गिरावट की वजह कोरोना महामारी और देशभर में लगे लॉकडाउन को बताया है.

 

कैसे फल फूल रही है बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था

बांग्लादेश के कपड़ा उद्योग के लिए साल 2013 में राना प्लाज़ा आपदा किसी बड़े झटके से कम नहीं थी. कपड़ों की फ़ैक्टरी की यह बहुमंज़िला इमारत गिर गई थी और इसमें 1,130 लोग मारे गए थे. इसके बाद कपड़े के अंतरराष्ट्रीय ब्रैंड कई तरह के सुधारों के लिए मजबूर हुए.

उसके बाद से बांग्लादेश सरकार ने नियम क़ानून में कई तरह के बदलाव किए, फ़ैक्टरियों को अपग्रेड किया गया और इसमें काम करने वाले कामगारों की स्थिति में बेहतरी के लिए कई क़दम उठाए गए.

बांग्लादेश में कपड़ों की सिलाई का काम व्यापक पैमाने पर होता है और इसमें बड़ी संख्या में महिलाएँ भी शामिल हैं. 2013 के बाद से अब ऑटोमेटेड मशीनों का इस्तेमाल हो रहा है.

प्रोफ़ेसर प्रबीर डे का मानना है कि कई कारण है, बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था के फलने फूलने के.

 

सांकेतिक तस्वीर

 

पहली बात है कि बांग्लादेश अभी विकासशील देशों की लिस्ट में हैं. मतलब अभी विकास की गुंजाइश बची है.

दूसरी बात बांग्लादेश में भारत जैसे मतभेद नहीं है. भारत में केंद्र सरकार एक बात कहती है, तो कभी महाराष्ट्र सरकार इसका विरोध करती है, तो कभी पंजाब तो कभी दिल्ली.

बांग्लादेश में प्रधानमंत्री ने जो बोल दिया, वो सब मानते हैं. राजनीतिक विरोध वहाँ भी होते हैं, लेकिन डोमिसाइल, जाति, भाषा, राज्य के आधार पर वहाँ विभाजन भारत जैसा नहीं हैं.

तीसरी बात अर्थ शास्त्री कौशिक बसु कहते हैं. वहाँ महिलाओं का सशक्तिकरण भी तेज़ी से हो रहा है. बांग्लादेश की सियासत में दो महिलाओं शेख हसीना और पूर्व प्रधानमंत्री ख़ालिदा ज़िया का प्रभुत्व रहा है. कपड़ा उद्योग में भी महिलाओं की भागीदारी ख़ूब है. समाज में महिलाएँ जब आगे रहती हैं, तो समाज में प्रगति बेहतर होती है. प्रबीर डे भी ऐसा मानते हैं.

चौथी बात जो बांग्लादेश के पक्ष में है, वो है उनकी मार्केट वैल्यू. दुनिया भर में मेड इन बांग्लादेश कपड़ों की अलग और अच्छी पहचान है. इसके लिए बांग्लादेश सरकार के गवर्नेंस सिस्टम को श्रेय दिया जाना चाहिए. एक बार जिस देश को बांग्लादेश सामान बेचता है, वो देश दोबारा बांग्लादेश के पास जाता है.

बांग्लादेश सरकार का शिक्षा, स्वास्थ्य और भोजन पर ख़र्च बेहतर है. इस बात की तस्दीक अलग-अलग ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स भी करते हैं, जिसमें बांग्लादेश भारत से आगे हैं.

किसी भी देश की जीडीपी इस बात पर निर्भर करती है कि लोगों और सरकार के पास पैसा ख़र्च करने के लिए कितना है. वहाँ की सरकार ने अलग-अलग योजनाएँ चला कर पानी, बिजली, ग्रामीण इलाक़ों में बैंक, इन सब व्यवस्थाओं पर कितना ध्यान दिया है.

इस ख़र्च को सरकार ने अपने अकाउंट में दिखाया और उसी वजह से जीडीपी के आँकड़े बेहतर हैं.

 

सांकेतिक तस्वीर

हालाँकि प्रबीर डे कहते हैं, “एफडीआई’ और ‘ईज़ ऑफ़ डुइंग बिज़नेस’ में बांग्लादेश थोड़ा पीछे है. परियोजनाओं के लिए वहाँ फ़ास्ट ट्रैक क्लियरेंस की सुविधा नहीं है. बांग्लादेश में केस टू केस आधार पर सरकार अनुमति देती है. फिर भी कोरोना के दौर में चीन से निकल कर 16 जपानी कंपनियों ने बांग्लादेश में अपनी इंडस्ट्री लगाई है. ढाका से 30 किलोमीटर की दूरी पर होंडा कंपनी ने अपना एक प्लांट हाल ही में लगाया है. ये सभी बातें बताती है कि वहाँ की सरकार के साथ बिज़नेस करने के लिए दूसरे देश इच्छुक हैं. लोकल कंपनियाँ को वहाँ ‘भूमिपुत्र’ की संज्ञा दी जाती है. ऐसी कंपनियाँ भी वहाँ काफ़ी बड़ी संख्या में फल फूल रही हैं.”

बांग्लादेश की जीडीपी ग्रोथ भारत से बेहतर कैसे? इसका जवाब एक लाइन में प्रबीर देते हैं.

“बांग्लादेश की सरकार ने अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए सीढ़ी के रास्ते ऊपर चढ़ने की कोशिश की है, ना कि भारत की तरह लिफ़्ट का रास्ता चुना. लिफ़्ट में तकनीकी ख़राबी से आप एक जगह रुक सकते हैं, लेकिन सीढ़ी हो तो उतरना-चढ़ना ज़्यादा आसान होता है.”

यही है दोनों देश की अर्थव्यवस्था में बुनियादी फ़र्क.


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adminSeptember 25, 20208min4030

राज्यसभा में सरकार की तरफ से दी गई जानकारी पर्यटकों के लिए खुशखबरी लेकर आई है. एक प्रश्न के लिखित जवाब में विदेश राज्यमंत्री वी. मुरलीधरन ने बताया कि दुनिया के 16 देशों में भारतीय पासपोर्ट पर वीज़ा-फ्री यात्रा की सुविधा उपलब्ध है. इतना ही नहीं, विदेश राज्यमंत्री ने ये भी बताया कि 43 देश ऐसे हैं जो भारतीयों को वीज़ा ऑन अराइवल की सुविधा देते हैं जबकि 36 ऐसे देश जो भारतीय पासपोर्ट रखने वालों को ई-वीज़ा की सुविधा देते हैं. हालांकि, अभी कोरोना वायरस की वजह से कई देशों ने यात्रा प्रतिबंध लगा रखा है लेकिन ये पाबंदी हटते ही आप इन देशों की सैर बिना वीजा के झंझट के कर सकते हैं. आइए जानते हैं कौन से हैं वो 16 देश जहां भारतीय बिना वीज़ा के घूम सकते हैं.

 

मालदीव्स

 

मालदीव्स- द्वीपों का देश मालदीव्स भी भारतीय पर्यटकों को वीज़ा-फ्री यात्रा की सुविधा देता है.

 

मॉरीशस

 

मॉरीशस- भारतीय पासपोर्ट धारकों को मॉरीशस भी वीज़ा फ्री एंट्री देता है और यह 90 दिनों के लिए वैध होता है. पर्यटकों के पास रिटर्न टिकट और पर्याप्त बैंक बैलेंस जरूर होना चाहिए.

 

भूटान

 

भूटान- भारत का पड़ोसी देश भूटान पर्यटकों की पसंदीदा जगह है. भारतीयों को भूटान जाने के लिए वीज़ा की जरूरत नहीं पड़ती है. पासपोर्ट या कोई दूसरी वैध आईडी ही पर्याप्त है.

 

बारबाडोस

 

बारबाडोस- बारबाडोस देश प्रकृति की गोद में बसा एक खूबसूरत देश है. यहां भारतीयों को बिना वीज़ा घूमने की सुविधा है.

 

हॉन्ग कॉन्ग एसएआर

 

हॉन्ग कॉन्ग एसएआर- हॉन्ग कॉन्ग एसएआर में कई ऐसे दर्शनीय स्थल हैं जिसे देखने के लिए पर्यटक दूर-दूर से आते हैं. भारतीयों के लिए यहां बीना वीज़ा के घूमने की सुविधा है.

 

डोमिनिका

 

डोमिनिका- डोमिनिका भी दुनिया के सबसे खूबसूरत देशों में से एक है. यह देश कैरेबियन सागर में स्थित है.

 

सर्बिया

 

सर्बिया- सर्बिया जाने के लिए भारतीयों को केवल पासपोर्ट और फ्लाइट टिकट की जरूरत है.

 

ग्रेनाडा

 

ग्रेनाडा- ग्रेनाडा कई सारे छोटे-छोटे द्वीपों से मिलकर बना है. इस खूबसूरत देश में भारतीयों को वीज़ा-फ्री यात्रा की सुविधा है.

 

हैती

 

हैती- हैती कैरेबियन देशों में एक देश है. ये देश अपनी प्राचीन संस्कृति और परंपराओं की वजह से जाना जाता है.

 

मोंटेसेराट

 

मोंटेसेराट- मोंटेसेराट दुनिया के लोकप्रिय जगहों में से एक है. अगर आपको रोमांच पसंद है तो यहां जरूर जाएं. भारतीय यहां बिनी वीज़ा के जा सकते हैं.

 

नेपाल

 

नेपाल- हिमालय की गोद में बसे नेपाल घूमने के लिए वीज़ा की जरूरत नहीं है. भारतीय नेपाल में बिल्कुल फ्री होकर घूम सकते हैं.

 

निउए आइलैंड

 

निउए आइलैंड- ये जगह किसी स्वर्ग से कम नहीं है. दूर-दूर से लोग इस शांत और खूबसूरत जगह पर छुट्टियां मनाने आते हैं.

 

सेंट विसेंट

 

सेंट विसेंट- भारतीयों के लिए सेंट विसेंट वीज़ा फ्री डेस्टिनेशन है. आप यहां एक महीने तक स्टे कर सकते हैं.

 

समोआ

 

समोआ- यहां भारतीयों को बिना वीज़ा प्रवेश की सुविधा है. समोआ अपनी खूबसूरती के साथ-साथ लजीज पकवानों के लिए भी जाना जाता है.

 

सेनेगल

 

सेनेगल- सेनेगल में घूमने के लिए आपको वीज़ा की जरूरत नहीं है और आप यहां 90 दिनों के लिए रुक सकते हैं. बस एक बात का ध्यान रखें कि आपका पासपोर्ट आपके पहुंचने की तारीख से 3 महीने तक वैध होना चाहिए.

 

त्रिनिदाद ऐंड टोबैगो

 

त्रिनिदाद ऐंड टोबैगो- पार्टी करने वालों के लिए त्रिनिदाद ऐंड टोबैगो बेस्ट डेस्टिनेशन है. यहां भी घूमने के लिए भारतीयों को वीज़ा की जरूरत नहीं है. आप यहां 90 दिनों के लिए स्टे कर सकते हैं.

 


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adminSeptember 22, 20201min4680

कहते हैं उम्र बस एक नंबर है अगर आपके अंदर कुछ कर गुजरने का जज्बा है तो आप किसी भी उम्र में कुछ भी हासिल कर सकते हैं. कुछ ऐसा ही कर दिखाया है, स्कॉटलैंड में जन्मे 60 साल के पॉल मार्क्स ने. लॉकडाउन के दौरान मार्क्स की नौकरी चली गई थी और बढ़ती उम्र की वजह से उन्हें कहीं काम भी नहीं मिल रहा था. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और वो 60 साल की उम्र में कितने फिटे हैं यह साबित करने लिए उन्हें सोशल मीडिया पर पुशअप करने वाला वीडियो शेयर किया. फिर उनके पास नौकरी की लाइन लग गई.

लंकाशायर के रहने वाले पॉल मार्क्स पांच महीने पहले तक दुबई के क्रियोल ग्रुप में मुख्य संचालन प्रबंधक के पद पर काम कर रहे थे. लेकिन लॉकडाउन में कंपनी ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया. इसके बाद मार्क्स ने भारत, यूएई, ब्रिटेन और स्पेन जैसे देशों में नौकरी के लिए आवेदन दिया. लेकिन उम्र के चलते उन्हें कहीं काम नहीं मिला.

Paul Marks (Photo Video Grab Kennedy News and Media)

 

पॉल मार्क्स को यह साबित करना था कि वो 60 की उम्र में भी पूरी तरह से फिट हैं. फिर उन्होंने लिंक्डइन पर एक वीडियो पोस्ट किया. जिसमें वो सूट-बूट पहनकर पुशअप लगा रहे हैं. इस वीडियो के वायरल होती है उनके पास ढेरों नौकरी के ऑफर आने लगे.

मार्क्स रोज का कहना है कि वो रोज 50 पुशअप और हफ्ते में 30 किलोमीटर दौड़ते हैं. उनका मानना है कि उम्र कभी काबिलियत या उत्पादकता का पैमाना नहीं हो सकती है और जरूरी यह नहीं कि 60 पार हर व्यक्ति अखबार पढ़कर या टीवी  देखकर अपना दिन गुजारे.

लिंक्डन पर मार्क्स के इस वीडियो को कई लाख लोग देख चुके हैं. कई नियोक्ताओं ने उन्हें जॉब की पेशकश की है, जबकि वीडियो डालने से पहले 50 से ज्यादा कंपनियों ने उनका सीवी ठुकरा दिया था.

 


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adminSeptember 14, 20201min5280

योशिहिदे सुगा. ये वो नाम है जिसे अगले कुछ दिनों में जापान के प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी मिलने जा रही है. सुगा इस समय जापान की सरकार में मुख्य कैबिनेट सचिव हैं. वे पीएम पद छोड़ चुके शिंजो आबे के विश्वासपात्र हैं और नए पीएम की रेस में उन्हें आबे का वरदहस्त हासिल है.

जापान में नए प्रधानमंत्री की खोज तब शुरू हुई जब अगस्त महीने के आखिर में शिंजो आबे ने स्वास्थ्य कारणों से पीएम की कुर्सी छोड़ने की घोषणा की थी.

बता दें कि जापान में अभी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (LDP) सत्ता में है. शिंजो आबे की पद छोड़ने की आसमयिक घोषणा के बाद एशिया के इस शक्तिशाली देश में हलचल मच गई. इस घोषणा का असर पूरी दुनिया पर दिखा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी शिंजो आबे को निजी रूप से फोन किया और उनकी सेहत का हालचाल लिया.

इस बीच जापान में नए नेता की खोज में योशिहिदे सुगा सबसे आगे निकल गए. आज यानी कि 14 सितंबर को जापान की सत्ताधारी पार्टी में नए नेता के चुनाव पर वोट हुआ. इस चुनाव में सुगा जीत गए हैं.

एक बार जब LDP अपना नया नेता चुन लेती है तो फिर बुधवार को जापान की संसद में एक बार फिर मतदान होगा, वहां ही बहुमत में रहने की वजह से LDP के नेता का जीतना तय माना जा रहा है. इसके बाद जीते हुए शख्स की ताजपोशी प्रधानमंत्री के तौर पर की जाएगी. जापान की मौजूदा संसद का कार्यकाल सितंबर 2021 तक है.

 

सुगा का राजनीतिक सफर

भारत में सुगा तोते को कहा जाता है. अगर 71 साल के सुगा जापान के प्रधानमंत्री बनते हैं तो यह एक राजनेता के असाधारण रूप से सर्वोच्च पद पर पहुंचने की रोमांचक कहानी बन जाएगी.

 

कार्डबोर्ड फैक्ट्री में नौकरी की, मछली भी बेची

योशोहिदे सुगा एक किसान के बेटे हैं, उनके पिता स्ट्राबेरी की खेती करते थे. सुगा का जन्म जापान के अकिता में हुआ. वहां पर हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे टोक्यो आ गए. सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक यहां पर जीविका चलाने के लिए उन्हें कभी कार्डबोर्ड फैक्ट्री में नौकरी करनी पड़ी तो कभी मछली बाजार में मछली बेचनी पड़ी. दरअसल सुगा काम के साथ ही विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रहे थे, यहां नौकरी कर उन्हें यूनिवर्सिटी का खर्चा चलाने में मदद मिल जाती थी.

 

नहीं भाई सैलरी वाली नौकरी 

ग्रेजुएशन करने के बाद सुगा जापान के तेज रफ्तार कॉरपोरेट वर्ल्ड में शामिल हो गए और अच्छी तनख्वाह पर नौकरी करने लगे. लेकिन सियासत का संघर्ष उनका इंतजार कर रहा था.

 

चुनाव प्रचार में घिस गए 6 जोड़ी जूते

आखिरकार नौकरी में उनका मन नहीं लगा और वे योकोहामा सिटी काउंसिल के लिए चुनाव लड़ने उतर गए. सीएनएन के मुताबिक तब न उनका कोई राजनीतिक कनेक्शन था और न ही सियासत का अनुभव. लेकिन सुगा अपने दम पर चुनाव लड़ने उतर पड़े. घर घर जाकर उन्होंने अपने प्रचार अभियान की शुरूआत कर दी.  वे एक दिन में 300 घरों में जाते. एलडीपी के मुताबिक जबतक चुनाव प्रचार खत्म हुआ वो लगभग 30000 घरों में जा चुके थे. पार्टी के मुताबिक जब चुनाव खत्म हुआ तब तक सुगा 6 जोड़ी जूते पहनकर फाड़ चुके थे.

जापान के राजनीतिक विशेषज्ञ कहते हैं कि सुगा सेल्फ मेड मैन हैं, उनके पीछे संघर्ष की कहानी है.

 

2012 से हैं आबे के साथ 

सुगा और आबे का साथ साल 2012 से है. सुगा अब शिंजो आबे के दाहिना हाथ माने जाते हैं. जापान में सुगा व्यावहारिक नेता माने जाते हैं और उनके बारे में धारणा है कि वे पर्दे के पीछे रहकर डील तय करते हैं. राजनीतिक पर्यवेक्षक कहते हैं कि कोई भी काम को करवाने के लिए अगर सुगा हां कर देते हैं तो उनपर भरोसा किया जा सकता है.



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