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adminSeptember 3, 20201min2350

भारतीय मूल के प्रीतम सिंह लोधी ने सिंगापुर की संसद में विपक्ष के नेता का ओहदा हासिल करके इतिहास रच दिया है.

43 वर्षीय प्रीतम सिंह की वर्कर्स पार्टी बीती दस जुलाई को हुए आम चुनावों में 93 में से दस सीटों पर जीत हासिल करके सबसे मजबूत विपक्षी दल के रूप में उभरी है.

इसके बाद बीते सोमवार को सदन की कार्यवाही शुरू हुई और सदन की नेता इंद्राणी राजा ने प्रीतम सिंह को सिंगापुर की संसद में विपक्ष के नेता की जगह दी.

ये पहला मौका है जब किसी शख़्स को बाकायदा सदन में विपक्ष के नेता का ओहदा दिया गया है.

अब तक विपक्षी दलों के शीर्ष नेता इस ज़िम्मेदारी का निर्वाहन किया करते थे लेकिन अब नई व्यवस्था के तहत सिंगापुर में ब्रितानी संसद की माफ़िक नेता प्रतिपक्ष संसद की कार्यवाही में अपनी भूमिका अदा करेगा.

 

स्थानीय कामगारों के हितों की रक्षा ज़रूरी

विपक्ष के नेता बनने के बाद प्रीतम सिंह ने बेहद सावधानी पूर्वक अंदाज़ में कामगारों के हितों की रक्षा की बात की है.

उन्होंने अपने पहले भाषण में जहां एक ओर विदेशी कामगारों के मुद्दों को उठाया तो वहीं दूसरी ओर सिंगापुर में रहने वाले लोगों को मिलने वाले अवसरों को लेकर भी बात की.

सिंगापुर में काम करने वाले प्रवासी कामगारों के जीवन स्तर सुधारने की बात करते हुए उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विदेशी कामगारों का जीवन स्तर सुधरना चाहिए.

उन्होंने कहा कि विदेशी कामगार सिंगापुर की अर्थव्यवस्था में एक अहम भूमिका निभाते हैं लेकिन इसके साथ ही सिंगापुर के कामगारों के हितों के ध्यान रखना भी ज़रूरी है.

 

प्रीतम सिंहइमेज कॉपीरइटSUHAIMI ABDULLAH/GETTY IMAGES

 

विपक्ष के पहले नेता को कौन से अधिकार मिलेगें?

प्रीतम सिंह को सिंगापुर की संसद में विपक्ष के पहले नेता के रूप में सांसदों में सबसे पहले प्रतिक्रिया देने का अधिकार मिलेगा. इसके साथ ही साथ उन्हें नीतियों, अधिनियमों, और संसदीय प्रस्तावों पर संसदीय सवाल जवाब की प्रक्रिया का नेतृत्व करने का मौका मिलेगा.

विपक्ष के नेता के रूप में प्रीतम सिंह को संसद में विपक्ष के कामकाज आदि को संभालना होगा, सरकार भोजों में शामिल होगा और सरकारी एवं सार्वजनिक क्षेत्र के सदस्यों के साथ बैठकों में हिस्सा लेना होगा.

इसके अलावा सिंगापुर की सरकार उन्हें आधिकारिक रूप से अहम एवं गोपनीय मुद्दों पर विश्वास में रखेगी. लेकिन इस सबके बीच एक सवाल अधूरा है कि थिएटर आर्टिस्ट लवलीन कौर से शादी करने वाले पंजाबी मूल के प्रीतम सिंह ने सिंगापुर की राजनीति में कदम कैसे रखा.

और इस सवाल का जवाब उनकी पढ़ाई और उनके रुझानों में स्पष्ट दिखाई देता है. सिंगापुर में नेशनल सर्विसमैन के रूप में सेवाएं देकर मेजर रैंक हासिल करने वाले प्रीतम सिंह कॉम्बेट इंजीनियर भी हैं.

सिंगापुर में नेशनल सर्विसमैन उन लोगों को कहते हैं जो ज़रूरत पड़ने पर अपनी सेवाएं दे सकते हैं. लेकिन पेशे से वह वकील हैं और एक वकील के रूप में ही काम करते हैं.

 

प्रीतम सिंहइमेज कॉपीरइटREUTERS/EDGAR SU

 

राजनीति में कैसे आए प्रीतम सिंह

राजनीति की दुनिया में नाम कमाने से पहले प्रीतम सिंह एक विद्यार्थी के रूप में भी कीर्तिमान हासिल कर चुके हैं. प्रीतम सिंह ने सन् 1999 में इतिहास और राजनीति शास्त्र विषयों में शीर्ष स्थान हासिल करके स्ट्रेट्स स्टीमशिप प्राइज़ जीता था.

इसके बाद उन्होंने सन् 2000 में सिंगापुर की नेशनल सिंगापुर यूनिवर्सिटी से बैचलर ऑफ़ आर्ट्स की डिग्री लेकर इतिहास की पढ़ाई की. लेकिन ये प्रीतम सिंह के लिए बस एक शुरुआत थी. उन्होंने क़ानून की पढ़ाई करने से लेकर युद्ध की रणनीतियों पर लंदन के किंग्स कॉलेज में जाकर पढ़ाई की.

इसके बाद ब्रिटेन में ही प्रीतम सिंह ने अपनी पोस्ट ग्रैजुएशन की परीक्षा पास की. उन्होंने इंटरनेशनल इस्लामिक यूनिवर्सिटी मलेशिया से इस्लामिक स्टडीज़ में भी डिप्लोमा हासिल किया. और ओपिनियन एशिया नाम से सिंडिकेट शुरू किया जो कि एशियाई मुद्दों पर टिप्पणी किया करता था.

इसके बाद साल 2011 में उन्होंने औपचारिक ढंग से राजनीति में कदम रख दिए. साल 2011 के बाद से अब तक वह एक सांसद के रूप में काम कर रहे हैं. वह बीते दो सालों से सिंगापुर की राजनीति में विपक्ष के नेता की भूमिका निभा रहे थे.

लेकिन ये कीर्तिमान हासिल करना उनकी पार्टी और प्रीतम सिंह के लक्ष्यों में शामिल था कि सिंगापुर की संसद औपचारिक रूप से किसी एक शख़्स को विपक्ष के नेता के रूप में स्वीकार्यता दे.

बीते सोमवार जब सदन की नेता इंद्राणी राजा, जो कि स्वयं भी भारतीय मूल की हैं, ने प्रीतम सिंह को सदन में विपक्ष के नेता के रूप में स्वीकार्यता दी है. तो देखना अब ये है कि दो बेटियों के पिता, वकील और कामगारों के हकों की बात करने वाले प्रीतम सिंह विपक्ष के नेता के रूप में क्या मुकाम हासिल करेंगे.

क्योंकि विपक्ष के पहले नेता होने की वजह से उनके कंधों पर इस पद के लिए मानकों और अपेक्षाओं को तय करने की एक बड़ी ज़िम्मेदारी है.


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adminAugust 29, 20201min4930

दो बरस पहले की बात है. साउथ कोरिया के प्योंगचांग में विंटर ओलंपिक खेल हो रहे थे. खेलों से कहीं ज्यादा चर्चा इन खेलों के पीछे चल रही डिप्लोमैसी को लेकर हो रही थी. उत्तरी कोरिया के शासक किम जॉन्ग उन ने अपनी खिलाड़ियों को साउथ कोरिया भेजने की हामी भर दी थी. साउथ कोरिया और नॉर्थ कोरिया के तनावपूर्ण रिश्तों में ये एक उम्मीद वाली खबर थी. अखबार में टिप्पणीकार लिखे रहे थे कि अब दोनों देशों में दोस्ती के नए सफर की शुरुआत होगी. इस उम्मीद वाले माहौल में अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने भी अपनी प्रतिनिधि के तौर पर उप राष्ट्रपति माइक पेंस को दक्षिण कोरिया भेजा था. और फिर दुनिया के अखबारों में ये तस्वीर छपी. स्टेडियम में बैठे माइक पेंस और उनके बगल में कोरियाई मूल की दिख रही एक लड़की. हर नज़र का ये सवाल था कि कौन है ये लड़की जिसे अमेरिका के उप-राष्ट्रपति के बगल में बैठाया गया है. अखबारों में इस लड़की का नाम छपा किम यो जॉन्ग. उत्तर कोरिया के राष्ट्रपति किम जॉन्ग उन की बहन. ये पहला मौका था जब दुनिया ने किसी अंतर्राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम में किम जॉन्ग उन की बहन को हिस्सा लेते देखा था. पहली बार किम यो जॉन्ग की तस्वीरें दुनियाभर में पहुंची थी. उस वक्त मीडिया ने उसे उत्तरी कोरिया की इवांका कहा था. वो इसलिए क्योंकि इवांका ट्रंप की तरह ही उत्तरी कोरिया में किम यो जॉन्ग को प्रभावशाली बताया गया था. यंग, फ्रेंडली एंड कैरिज़मैटिक – ये शब्द अखबारों में किम की बहन किम यो जॉन्ग के लिए लिखे गए थे. तब शायद अंदाजा नहीं था कि दुनिया का सबसे खतरनाक देश कहे जाने वाले उत्तर कोरिया की सत्ता ये ही लड़की संभालेगी. क्योंकि उतर कोरिया के शासक किम जॉन्ग उन की सेहत को लेकर एक और बड़ा खुलासा हुआ है.

 

किम जॉन्ग उन बीमार हैं?

इसी साल अप्रैल में ख़बर आई थी कि किम जॉन्ग उन की मौत हो चुकी है. मौत की ख़बर ही आई थी, मौत हुई है या नहीं ये पता नहीं. क्योंकि उत्तर कोरिया ने तो आधिकारिक तौर पर कुछ कहा नहीं है. उत्तर कोरिया से कोई भी ख़बर बाहर नहीं आती क्योंकि देश में पाबंदी ही इतनी ज्यादा है. तो फिर उत्तर कोरिया का शासक क्या कर रहा है, ठीक है कि नहीं है ये सब खबरें कहां से आती हैं. इसका जवाब है सियोल. दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल. आप गौर करिएगा उत्तर कोरिया या किम जॉन्ग को लेकर जो खबरें आती हैं उनमें से ज्यादातर के सूत्र दक्षिण कोरिया में होते हैं और वहीं से वो दुनिया के हर अखबारों तक पहुंचती हैं. फिर चाहे वो मिसाइल परीक्षण की बात हो या किम की सेहत की. उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया का रिश्ता लगभग वैसा ही जैसा भारत-पाकिस्तान का. तो सियॉल से उत्तर कोरिया की खबरें आने का मतलब ये समझिए कि भारत की खबरें पाकिस्तान दुनिया को बता रहा है. और अगर उतर कोरिया के बारे में हर बात दक्षिण कोरिया से ही दुनिया को मालूम चलेंगी तो वो बातें भी वैसी ही होंगी जैसे दक्षिण कोरिया चाहेगा. यानी प्रोपगेंडा भी होगा.

 

किम जॉन्ग उन की मौत पर दुनिया में झूठी खबरें चलीं?

बहरहाल, हम ये मान लेते हैं कि चाहे दक्षिण कोरिया से ही आई हो किम जॉन्ग की मौत वाली खबर में कुछ सच्चाई है. मौत की खबर पहली बार अप्रैल में आई थी. लेकिन फिर उतरी कोरिया के शासक किम जॉन्ग उन सार्वजनिक रूप से नज़र आए. एक तस्वीर आई जिसमें वो फर्टिलाइज़र फैक्ट्री का उद्घाटन करते दिखे. इस तस्वीर के जरिए उतरी कोरिया ने भी दुनिया को ये बताया कि किम जॉन्ग जिंदा हैं औऱ ठीक हैं. तो क्या किम जॉन्ग उन की मौत पर दुनिया में झूठी खबरें चलीं? ऐसा भी नहीं लगता. क्योंकि दक्षिण कोरिया से ही अब एक नया खुलासा हुआ है.

 

उत्तरी कोरिया की सत्ता कौन संभालेगा?

नई खबर ये है कि किम जॉन्ग उन मरे नहीं हैं. साउथ कोरिया के पूर्व राष्ट्रपति के सलाहकार रहे डिप्लोमैट चांग सोन्ग मिन ने खबर दी है कि किम कोमा में हैं. साउथ कोरियाई डिप्लोमैट के मुताबिक किम जॉन्ग उन मरे तो नहीं लेकिन अब ठीक हो पाएंगे ऐसी उम्मीदें कम ही हैं. चांग सोन्ग मिन ने कोरिया हेराल्ड अखबार को ये भी बताया कि किम के बाद उत्तरी कोरिया की सत्ता कौन संभालेगा इसकी तैयारी हो रही है. किम के कोमा में होने से सत्ता में जो वैक्यूम था उसे भरने का काम किम की बहन किम यो जॉन्ग कर रही हैं. हालांकि अभी पूरी तरह से सत्ता किम यो जॉन्ग को नहीं सौंपी गई है. और चांग को ये बात कहां से मालूम चली. उसे चीन में मौजूद अपने सूत्रों से ये जानकारी हासिल हुई है. तो अगर किम कोमा में ही हैं तो उन तस्वीरों का क्या जो उतरी कोरिया ने जारी की थी और उनमें किम एक फैक्ट्री का उद्घाटन करते दिख रहे थे. दक्षिण कोरियाई डिप्लोमैट के मुताबिक वो सारी तस्वीरें फेक थीं, फर्ज़ी थीं, किम के कोमा में होने की खबर छिपाने के लिए उत्तरी कोरिया तस्वीरें जारी की थी.

किम इस साल बहुत ही कम मौकों पर दिखे. इसलिए ये सवाल उठने लगी कि उसकी सेहत ठीक नहीं है. कयास ये हैं कि किम की हार्ट सर्जरी हुई थी जिसके बाद से या तो वो बेडरिडन है या फिर उसकी मौत हो गई है. साउथ कोरिया की खुफिया एजेंसी के हवाले से किम के बारे में जानकारी आई. जानकारी ये कि किम जॉन्ग की कुछ अहम जिम्मेदारियों उनके करीबियों ने संभाल ली हैं. और उन्हीं जानकारियों में एक जानकारी ये कि अब उत्तर कोरिया की नई शासक किम जॉन्ग उन की बहन किम यो जॉन्ग होगी.

 

तो किसी देश का मुखिया बदल जाने से देश कितना बदल सकता है?

इस सवाल के कई जवाब हो सकते हैं. दुनिया के कई देश हैं जहां लोगों ने अपनी जिंदगी में बदलाव के लिए शासकों को बदलने की लंबी लड़ाइयां लड़ी हैं. मौजूदा उदाहरण बेलारूस का है, वहां राष्ट्रपति के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. लेकिन हम उस शासक की बात कर रहे हैं जिसे दुनिया सनकी तानाशाह मानती है. जिसकी मिसाइल का डर अमेरिका तक महसूस किया जाता है और हर वक्त तबाही का खतरा मंडराता है. और अपने देश के लोगों में भी इतना खौफ कि किम जॉन्ग के भाषण पर अगर कोई ताली भी कम बजाए तो उसे भी सजा हो सकती है. तो क्या शासक बदल जाने से, यानी किम जॉन्ग उन की जगह उनकी बहन के किम यो जॉन्ग के सत्ता संभालने से उत्तर कोरिया बदल जाएगा? दुनिया के राजनयिकों ने ये गणित लगाना शुरू कर दिया है.

 

दादा-पिता-भाई के बाद किम यो जॉन्ग?

उत्तर कोरिया में महिलाओं को सत्ता अभी तक नहीं मिली थी. 1948 से लेकर 1994 तक किम जॉन्ग के दादा किम इल सुन्ग सत्ता पर काबिज रहे. उसके बाद 1994 से लेकर 2011 तक किम के पिता किम जॉन्ग इल ने शासन किया और उनकी मौत के बाद उनके बेटे किम जॉन्ग उन के हाथों में सत्ता आई. उस वक्त किम की उम्र महज 27 साल थी. जब किम ने सत्ता संभाली तो उत्तर कोरिया के ऐसी उम्मीद बांधी गई कि अब शायद उत्तर कोरिया ज्यादा ओपन होगा. बाकी देशों से रिश्ते सुधारेगा. लेकिन ये उम्मीदें जल्दी ही टूट गई. किम जॉन्ग भी अपने दादा और पिता की लाइन पर ही चले. बल्कि उनसे ज्यादा क्रूर शासक साबित हुए. 2013 में उसने अपने चाचा और उसके परिवार को मरवा दिया क्योंकि बगावत का डर था. 2017 में इंडोनेशिया में अपने सौतेले भाई की हत्या करने का आरोप भी किम जॉन्ग उन पर लगा.

इस बीच किम के परिवार में उनकी सबसे करीब मानी जाती रही उनकी बहन किम यो जॉन्ग. किम यो जॉन्ग अभी 32 साल की है और अपने भाई से 4 साल छोटी है. दोनों की पढ़ाई स्विट्जरलैंड में ही हुई. नेशनल इंटरेस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक किम को सबसे ज्यादा भरोसा अपनी बहन पर है. और बहन की राजनीति में दिलचस्पी है ये बात उसके पिता ने 2002 में ही कह दी थी. किम यो जॉन्ग उत्तरी कोरिया की सत्ताधारी वर्कर्स पार्टी ऑफ कोरिया की सीनियर मेंबर हैं. और उत्तरी कोरिया की सबसे ताकतवर महिला मानी जाती हैं. 2014 में उसे Propaganda and Agitation Department की वायस डायरेक्टर बनाया गया था. वो कम ज्यादा कई मौकों पर किम जॉन्ग के साथ दिखती रही लेकिन ज्यादा लाइम लाइट में नहीं आई.

 

किम यो जॉन्ग सबसे सनकी साबित हो सकती है?

तो क्या अब उत्तर कोरिया तानाशाही के दौर से बाहर आ जाएगा. टिप्पणीकार ऐसा नहीं मानते. नॉर्थ कोरिया के तानाशाह किम जॉन्ग की बहन उससे भी ज्यादा सनकी हो सकती है. अमेरिका की नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल में एशियाई मालमों के निदेशक रहे विक्टर चा के मुताबिक किम यो जॉन्ग हार्ड लाइनर हैं. वो साउथ कोरिया और अमेरिका को लेकर और कड़ा रुख अख्तियार करेंगी. वो नॉर्थ कोरिया में और बाहर खुद को मजबूत नेता के तौर पर दिखाने के लिए मिसाइल परीक्षण कराएंगी और ज्यादा आक्रामक रणनीति अपनाएंगी. यानी ऐसा लगता नहीं है कि शासक बदलने से अब उत्तर कोरिया में शासन करने के तरीके में ज्यादा बदलाव आएगा.

लेकिन किम की बहन शासक बनेगी या नहीं ये सब अभी अटकलों का ही हिस्सा है. और ये अटकलें किम जॉन्ग की मौत वाली खबर से शुरू होती हैं. उत्तर कोरिया में कब क्या होता है बाहर ज्यादा मालूम नहीं पड़ता. किम के पिता की मौत की खबर भी तभी बाहर आई थी जब उतर कोरिया ने अंतिम संस्कार के दिन खबर आउट की थी. शायद किम जॉन्ग उन की खबर भी ऐसे ही अचानक बाहर आए. या हो सकता है वो सही सलामत हों उतर कोरिया की कोई और ही रणनीति हो.


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adminAugust 21, 20201min3120

जिंदगी है क्या, एक अरमान सोचिए.
दौलत के पीछे पागल, इंसान सोचिए.
प्लास्टिक का घुटना और शीशे की लैट्रीन,
क्या क्या बना रहा है जापान सोचिए.

ऊपर वाली लाइनें हमारे इनहाउस कवि आशीष ने लिखी है. लेकिन क्यों? और लेट्रीन वाली लाइनें ही क्यों? आप भी सोच रहे होंगे. तो बताए देते हैं कि जापान ऐसा पब्लिक टॉयलेट बनाया है जिसके आर पार दिखाई देता है. मतलब एक तो पब्लिक टॉयलेट, कि नाम सुनकर ही नाक-भौं सिकोड़ने लगे आदमी, ऊपर से ट्रांसपैरेंट. मतलब कोई बड़ी हिम्मत से यहां जाए भी तो दिखने के डर में वापस निकल आए.

पर जापान तो जापान ठहरा. “जो दिखता है वही बिकता है” टाइप की क्लीशे लाइन कहीं पढ़ी होगी. तो ऐसा टॉयलेट ही बना दिया जिसमें अंदर से बाहर और बाहर से अंदर दिखता है. ताकि बाहर से ही दिख जाए कि अंदर साफ है या नहीं. इन पब्लिक टॉयलेट्स में दीवारों और दरवाज़ों के नाम पर केवल रंग-बिरंगी शीशे की दीवारे हैं.

अब ये खबर आई और लोग पूछने लगे, कि भईया अइसे टॉयलेट में जाएगा कौन. सब दिखेगा नहीं? तो इसके लिए डरने की बात नहीं है. अंदर जाने के बाद सिर्फ अंदर से बाहर दिखता है, बाहर से अंदर नहीं. कैसे? ये फोटो देखिए, फिर बताते हैं.

दरवाज़ा बंद करने पर कांच अपारदर्शी बन जाता है.

 

तो कोई अंदर जाएगा तो क्या होगा?

सेंसर वेंसर टाइप का मामला है. जापान है तो भर-भर के तकनीक भी है इसमें. कोई अंदर जाएगा तो टॉयलेट की जो शीशे की दीवारें हैं वो अंदर से तो पारदर्शी रहेंगी, पर बाहर से ओपेक हो जाएंगे. मतलब बाहर से पारदर्शी नहीं रहेंगी. जैसी ऊपर वाली फोटो में दिख रहा है न, वैसी. लेकिन अंदर बैठे-बैठे आप आराम से देख सकते हैं कि सड़क पर या बाज़ार में क्या हो रहा है.

जापान को टॉयलेट के साथ एक्सपेरिमेंट करने में बड़ा मज़ा आता है. वहां ऐसे कमोड हैं जिनकी सीट बटन दबाने से खुल जाती है, मतलब हाथ से ऊपर-नीचे करने का टेंशन ही नहीं. सर्दियों में गर्म रहती है.

जापान की निपॉन फ़ाउंडेशन ने अपने टोक्यो टॉयलेट प्रोजेक्ट के तहत अलग-अलग टाइप के टॉयलेट कई जगह पर लगाए हैं. इनमे से ही एक ये वाला आइटम है. इसे डिज़ाइन किया है शिगेरू बान ने, जो प्रिट्स्कर प्राइज़ जीतने वाले आर्किटेक्ट हैं. फ़िलहाल इन टॉयलेट को टोक्यो के दो पार्कों में लगाया गया है. पहला लगा है योयोगी फ़ुकामाची मिनी पार्क में और दूसरा लगा है हारु नो ओगावा कम्यूनिटी पार्क में.

 

 

कैसे काम करता है ट्रान्सपैरेंट टॉयलेट का सिस्टम?

जिस स्मार्ट ग्लास का इस्तेमाल इन ट्रान्सपैरेंट टॉयलेट में हुआ है उसका इस्तेमाल प्राइवेसी के लिए काफ़ी टाइम से होता आ रहा है. इसे कई जगह पर ऑफ़िस के मीटिंग रूम में और कुछ जगह पर घरों में शॉवर स्पेस में इस्तेमाल होते हुए देखा गया है. अब ये कैसे काम करता है ये समझने के लिए थोड़ी साइन्स झाड़नी पड़ेगी.

तो होता ये है कि ये ग्लास नॉर्मली ट्रान्सपैरेंट नहीं होता है. अपारदर्शी ही होता है. लेकिन इसके अंदर जब बिजली दौड़ती है जो कांच के क्रिस्टल स्ट्रक्चर को बदल देती है. इससे कांच के आर पार ज़्यादा लाइट पास होने लगती है और ये पारदर्शी हो जाता है. अब बस इसी चीज़ को ऐसे सेट कर दिया जाता है कि दरवाज़ा खुला होने पर इसके अंदर बिजली दौड़े और ये ट्रान्सपैरेंट रहे और जब लॉक होने पर बिजली रुक जाए और ये अपारदर्शी बन जाए.

 

लोगों के मिक्स्ड रीऐक्शन

 

 

ट्रान्सपैरेंट टॉयलेट के पीछे की साइन्स तो ठीक है मगर बात यहां पर काफ़ी प्राइवेसी से जुड़ी हुई है. अगर टेक्नॉलजी फ़ेल हो गई या फिर कुछ गड़बड़ हो गई तब क्या होगा? तब तो अंदर का हाल दुनिया को पता चल जाएगा ना. बस इसी वजह से इस ट्रान्सपैरेंट टॉयलेट को लेकर दो गुट बन गए हैं. एक कह रहा है कि बढ़िया चीज़ है ये, मज़ा आएगा. और दूसरा कह रहा है कि यार इतना रिस्क लेकर तो ठीक से उतरेगी भी नहीं. आपका क्या सोचना है हमें ज़रूर बताएं.


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adminAugust 17, 202010min3960

अमरीकी राष्ट्रपति पद के डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जो बाइडन ने उप-राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के तौर पर सीनेटर कमला हैरिस को चुना है. कमला जानी-मानी ब्लैक नेता हैं. लेकिन उन्होंने अपनी भारतीय जड़ें नहीं छोड़ी हैं.

कमला हैरिस ने 2018 में अपनी आत्मकथा, ‘द ट्रुथ वी टोल्ड’ में लिखा, “लोग मेरा नाम किसी विराम चिन्ह यानी तरह ” Comma-la” बोलते हैं.”

इसके बाद कैलिफोर्निया की सीनेटर कमला अपने भारतीय नाम का मतलब समझाती हैं. कमला भारत में जन्मी मां और जमैका में पैदा हुए पिता की संतान हैं.

कमला कहती हैं, ” मेरे नाम का मतलब है ‘कमल का फूल’. भारतीय संस्कृति में इसकी काफ़ी अहमियत है. कमल का पौधा पानी के नीचे होता है. फूल पानी के सतह से ऊपर खिलता है. जड़ें नदी तल से मज़बूती से जुड़ी होती हैं.”

 

साझा नस्ल की विरासत पर गर्व

कमला और उनकी बहन माया ऐसे घर में बड़ी हुईं जो ब्लैक अमरीकी कलाकारों के संगीत से गूंजता रहता था. उनकी मां एरेथा फ्रैंकलिन की ‘अर्ली गोस्पेल’ गुनगुनाती रहती थीं और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र पढ़ाने वाले पिता जैज के दीवाने थे. उनके टर्नटेबल पर थेलोनियस मॉन्क और जॉन कोल्ट्रेन के रिकार्ड बजते रहते थे.

कमला जब पाँच साल की थीं तो उनकी मां श्यामला गोपालन और पिता डोनाल्ड हैरिस अलग हो गए. कमला और उनकी बहन की परवरिश उनकी सिंगल हिंदू मदर ने ही की. कैंसर रिसर्चर और मानवाधिकार कार्यकर्ता श्यामला और उनकी दोनों बेटियों को ” श्यामला एंड द गर्ल्स” के नाम से जाना जाता है.

कमला की मां ने सुनिश्चित किया कि उनकी दोनों बेटियां अपनी पृष्ठभूमि को अच्छी तरह जानते हुए बड़ी हों.

कमला अपनी आत्मकथा में लिखती हैं. “मेरी मां यह अच्छी तरह जानती थीं कि वह दो ब्लैक बेटियों को बड़ी कर रही हैं. उन्हें पता था कि उन्होंने जिस देश को रहने के लिए चुना है वह माया और मुझे ब्लैक लड़कियों के तौर पर ही देखेगा. लेकिन वह इस बात को लेकर दृढ़ थीं कि वह अपने बेटियों की परवरिश इस तरह करेंगी कि वे आत्मविश्वासी ब्लैक महिला के तौर पर दुनिया के सामने आएं.”

वॉशिंगटन पोस्ट ने पिछले साल लिखा, “हैरिस अपनी भारतीय संस्कृति के साथ पलती हुई बड़ी हुई हैं, लेकिन वह बड़े ही शान से अपनी अफ्ऱीकी-अमरीकी ज़िंदगी जीती हैं.”

2015 में जब वह पहली बार सीनेट की सीट के लिए चुनाव मैदान उतरीं तो ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने लिखा, ” कमला की मां भारतीय और पिता जमैका के हैं. कैंसर रिसर्चर मां और इकनॉमिक्स के प्रोफ़ेसर पिता की संतान कमला सीनेट में जाने वाली पहली अफ्ऱीकी-अमरीकी महिला और कैलिफ़ोर्निया की पहली एशियाई अटॉर्नी जनरल हैं.”

सीनेट की सदस्य 55 साल की कमला कहती हैं कि वह अपनी इस पहचान से जूझने के बजाय ख़ुद को एक अमरीकी कहलाना ही पसंद करती हैं. लेकिन जो लोग कमला को जानते हैं कि वे कहते हैं कि वह दोनों समुदायों में भली-भांति घुलमिल जाती हैं.

 

भारतीय परंपराओं से प्रेम

कमला हैरिस ने राष्ट्रपति पद के लिए अपने अभियान की शुरुआत की थी तो भारतीय मूल की अमरीकी कॉमेडियन और अभिनेत्री मिंडी कैलिंग ने उनके यू ट्यूब पेज पर एक वीडियो पोस्ट किया था. इसमें कमला और कैलिंग भारतीय भोजन बनाती दिख रही हैं. वीडियो में दोनों अपनी साझा दक्षिण भारतीय पृष्ठभूमि के बारे में भी बात करती हुई दिख रही हैं.

कैलिंग कहती हैं कि बहुत से लोग उनकी भारतीय विरासत के बारे में नहीं जानते हैं. जब भी वह भारतीय मूल के अमरीकी लोगों से मिलती हैं वे उन्हें कमला की इस विरासत के बारे में याद दिलाते हैं.

कैलिंग इस वीडियो में कहती हुई दिख रही हैं, “हमें लगता है कि आप हमारी ही तरह हैं. हम राष्ट्रपति पद के लिए शुरू किए गए आपके अभियान से रोमांचित हैं.”

कैलिंग हैरिस से पूछती हैं कि क्या वह दक्षिण भारतीय खाना खाते हुए बड़ी हुई हैं. इस सवाल पर कमला एक के बाद एक दक्षिण भारतीय भोजन का नाम लेती दिखती हैं. वह कहती हैं कि वह ख़ूब सारा चावल और दही, आलू की रसदार सब्जी, दाल और इडली खाते हुए बड़ी हुई हैं.

कमला बताती हैं कि जब एक बार वह भारत में अपने ननिहाल पहुंची थीं तो नानी के घर पर न रहने पर उनके नाना ने धीरे से उन्हें पूछा था कि क्या वह अंडे से बना फ्रेंच टोस्ट खाना पसंद करेंगी? (भारत में अंडे को मांसाहारी खाना समझा जाता है).

अपनी आत्मकथा में कमला लिखती हैं कि कैसे वह घर पर भारतीय बिरयानी और स्पैगेटी बोलोगनीज दोनों बनाती हैं.

(मंगलवार को कैलिंग ने कमला हैरिस की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी का बड़ी गर्मजोशी का स्वागत किया. उन्होंने लिखा, “आज का दिन जबर्दस्त है. ख़ास कर मेरी ब्लैक और भारतीय बहनों के लिए.”)

जब कमला ने 2014 में वकील डगलस एम्पहॉफ से शादी की तो इसमें भारतीय और यहूदी परंपरा दोनों निभाई गई. कमला ने डगलस को फूलों की माला पहनाई, जबकि डगलस ने यहूदी परंपरा के तहत पैर से कांच तोड़ी.

 


अफ्रीकी-अमरीकी राजनीतिक नेता के तौर पर पहचान

इस साझा बैकग्राउंड से अलग कमला हैरिस की छवि एक अफ्रीकी-अमरीकी राजनीतिक नेता के रूप में ज़्यादा मज़बूत दिखती है. ख़ास कर हाल में अमरीका में ब्लैक लाइव्स मैटर्स आंदोलन के दौरान चल रहे विमर्शों में उन्हें अफ्रीकी-अमरीकी राजनीतिक नेता के तौर पर ही देखा गया.

लेकिन अमरीका में रहने वाले भारतीय मूल के लोग भी उन्हें अपने ही समुदाय का मानते हैं. उनकी उम्मीदवारी अमरीका में भारतीय और दक्षिण एशियाई समुदायों को मिल रही व्यापक पहचान का सबूत है.

 

 

कमला की ज़िंदगी पर माँ की गहरी छाप

यह बिल्कुल साफ़ है कि कमला की ज़िंदगी में उनकी दिवंगत मां की गहरी छाप है. मां कमला के लिए बड़ी प्रेरणा रही हैं. कमला की मां श्यामला गोपालन का जन्म चेन्नई में हुआ था. मां-बाप की चार संतानों में वह सबसे बड़ी थीं.

कमला की मां ने 19 साल की उम्र में दिल्ली यूनिवर्सिटी से ग्रैजुएशन कर लिया था. इसके बाद उन्होंने बर्कले के ग्रैजुएट प्रोग्राम के लिए आवेदन दिया. एक ऐसी यूनिवर्सिटी के लिए जिसे उन्होंने कभी देखा नहीं था और यह एक ऐसे देश में थी, जहां अब तक वह कभी नहीं गई थीं.

1958 में न्यूट्रीशिन और एंडोक्रनॉलोजी में पीएचडी करने के लिए वह भारत से निकल पड़ीं. बाद में वह ब्रेस्ट कैंसर के फील्ड में रिसर्चर बन गईं.

कमला हैरिस कहती हैं, “मेरे लिए यह कल्पना करना ही मुश्किल है कि नाना-नानी के लिए मेरी मां को भारत से बाहर जाने देने का फ़ैसला कितना कठिन रहा होगा. उस समय कॉमर्शियल हवाई उड़ानें शुरू ही हुई थीं. एक दूसरे से संपर्क में रहना भी काफ़ी कठिन था. फिर भी जब मेरी मां ने कैलिफ़ोर्निया जाने की इजाज़त मांगी तो मेरे नाना-नानी ने मना नहीं किया.”

हैरिस ने लिखा है कि उनकी मां से अपनी पढ़ाई पूरी कर वतन लौटने और यहां मां-बाप की पसंद से शादी कर घर बसाने की उम्मीद थी. लेकिन किस्मत को कुछ और मंज़ूर था.

 

कमला हैरिस को साझा नस्ल की अपनी विरासत पर गर्व क्यों हैं?

 

कमला की मां और पिता की मुलाक़ात बर्कले में हुई. मानवाधिकार आंदोलनों में हिस्सा लेते हुए दोनों एक दूसरे के प्यार में पड़ गए. कमला लिखती हैं, “मेरी मां ने अपने प्रेमी से शादी करने और अमरीका में रहने का फ़ैसला किया. यह आत्मनिर्णय और प्रेम की पराकाष्ठा थी”.

साल 1964 में श्यामला गोपालन ने 25 साल की उम्र में डॉक्टरेट की डिग्री हासिल कर ली. उसी साल कमला हैरिस का जन्म हुआ. कमला हैरिस लिखते हैं कि उनकी मां अपनी दोनों बेटियों की डिलिवरी होने तक काम पर जाती रहीं. वह लिखती हैं, “पहले केस में तो उनके गर्भ का पानी ही निकल गया था. उस वक्त वह लैब में काम कर रही थीं. दूसरे केस में एपल स्ट्रडल बनाते वक़्त ऐसा हुआ.”

भारत में कमला की मां की परवरिश एक ऐसे परिवार में हुआ जो राजनीतिक और नागरिक आंदोलन से जुड़ा रहा.

कमला की नानी हाई स्कूल तक भी नहीं पढ़ी थीं लेकिन वह घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं की मददगार थीं. वह महिलाओं को गर्भ निरोधक उपायों के बारे में बताती थीं. इसमें उन्हें मदद करती थीं. कमला के नाना पी वी गोपालन भारत सरकार में सीनियर राजनयिक थे. जमैका की आजादी के बाद वह यहां भेजे गए थे. उन्होंने शरणार्थियों को बसने में मदद की.

कमला ने अपनी आत्मकथा में भारत की अपनी यात्राओं के बारे में ज़्यादा नहीं लिखा है. लेकिन वह लिखती हैं कि वह अपने मामा और दो मौसियों की नज़दीकी रहीं. उनके साथ फ़ोन और पत्र के ज़रिये उनका संपर्क बरक़रार रहा. कभी-कभार उनसे मिलने के लिए उन्होंने भारत की यात्रा भी की. कमला हैरिस की मां का 2009 में सत्तर साल की उम्र में निधन हो गया.

 

कमला हैरिस को साझा नस्ल की अपनी विरासत पर गर्व क्यों हैं?

 

कमला की उम्मीदवारी से जोश में हैं भारतीय-अमरीकी

शेखर नरसिम्हन जैसे डेमोक्रेटिक पार्टी के कार्यकर्ताओं का कहना है कि कमला की उम्मीदवारी ने भारतीय अमरीकी समुदाय को जोश से भर दिया है. वह महिला हैं. उनका दो नस्लों से संबंध हैं और वह राष्ट्रपति चुनाव में जो बाइडेन की मदद करेंगी. अमरीका के कई समुदायों में उन्हें पसंद किया जाता है और वह वास्तव में स्मार्ट हैं.”

वह कहते हैं आखिर भारतीय मूल के अमरीकियों को कमला पर गर्व क्यों न हो? उनकी उम्मीदवारी बताती है कि अमरूकी समाज में आने वाला वक्त हमारा है.


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adminAugust 12, 20201min4310

आबादी के लिहाज़ से चीन दुनिया का सबसे बड़ा देश है. आर्थिक उन्नति के क्षेत्र में भी वो दुनिया में अपना लोहा मनवा चुका है. बड़ी आबादी के रहने और आर्थिक गतिविधियां सुचारू रूप से चलाने के लिए उसी अनुपात में इमारतों की भी ज़रूरत है. चीन इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर काम कर रहा है.

जानकारों का कहना है कि आने वाले दशक में दुनिया भर में जितनी इमारतें बनेंगी, उनमें से आधी इमारतें सिर्फ़ चीन में होंगी. चीन में पहले ही हर साल दो अरब वर्ग मीटर फ़्लोर स्पेस तैयार होता है. अगर ये इमारतें एक मंज़िला हैं, तो भी इनका कुल क्षेत्रफल पूरे लंदन के क्षेत्रफल के बराबर होगा. कार्बन उत्सर्जन के लिहाज़ से ये एक बहुत बड़ा आंकड़ा है.

आर्थिक गतिविधियां बढ़ाने के साथ ही चीन ने भवन निर्माण को भी रफ़्तार दी है. इसी के साथ इन इमारतों में ऊर्जा का उपयोग भी बढ़ा, जिसने पर्यावरण के लिए चुनौती पैदा कर दी. वर्ष 2001 से 2016 के दरमियान चीन के निर्माण क्षेत्र में एक अरब टन कोयले के बराबर ऊर्जा की खपत हुई है. कच्चे माल की आपूर्ति से लेकर भवन निर्माण तक जितनी ऊर्जा का इस्तेमाल हुआ, वो चीन के कुल कार्बन उत्सर्जन का लगभग पांचवा हिस्सा है. इतने व्यापक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन इंसान और पर्यावरण दोनों के लिए ख़तरे की घंटी है. इस ख़तरे को चीन के लोगों ने महसूस भी किया है, और उसकी क़ीमत भी चुकाई है. इसीलिए अब इमारतें बनाने के ऐसे नए तरीक़ों पर काम किया जा रहा है जिससे कार्बन उत्सर्जन कम हो सके. इसके लिए अभी तक का सबसे कारगर तरीक़ा इमारतों को पौधों से ढक देना है.

 

इटली में सबसे पहले हुआ था प्रयोग

इस तरह का प्रयोग सबसे पहले एक इटैलियन वास्तुकार स्टेफानो बोरी ने इटली के मिलान शहर में किया था. और अब बोरी की टीम यही प्रयोग चीन में भी करने जा रही है. चीन के नानजिंग शहर में ऐसे ही दो ग्रीन टावर तैयार करने पर काम हो रहा है, जो पूरी तरह हरियाली से ढके होंगे. ये टावर साल 2020 के अंत तक तैयार कर लिए जाने थे. लेकिन, महामारी की वजह से समय पर काम पूरा नहीं हो पाएगा. बिल्डिंग के आगे बढ़े हुए हिस्से में 2500 तरह की झाड़ियां, एक हज़ार से ज़्यादा पेड़ और अन्य पौधे लगाए जाएंगे. फिलहाल बिल्डिंग की सामने वाली दीवारों पर लगाने के लिए 600 तरह के स्थानीय पेड़ नर्सरी में तैयार किए जा रहे हैं. जब तक इन्हें बिल्डिंग में लगाया जाएगा इनकी लंबाई 6 से 9 मीटर तक हो जाएगी.

इन पेड़ों को लगाने से पहले इनकी क्षमता जांची जाएगी और इन्हें विंड-टनल से गुज़ारा जाएगा. उसके अनुसार ही पेड़ों को बिल्डिंग के अलग-अलग फ़्लोर पर लगाया जाएगा. चीन के कई प्रांतों में हरियाली को ऊंची इमारतों का ज़रूरी हिस्सा बनाने वाली नीतियां लागू की गई हैं. मिसाल के लिए झेजियांग प्रांत में स्काई गार्डेन बालकनी बनाई गई हैं. लेकिन इन्हें प्लॉट के कुल क्षेत्रफल से छूट दी जाती है. यानि जब प्लॉट का एरिया मापा जाता है, तो ये हरी बालकनी उसमें शामिल नहीं होती. ये एक तरह का बोनस होता है.

किसी बिल्डिंग को हरा भरा बनाने के लिए बहुत प्लानिंग की ज़रूरत होती है. और बढ़ता कार्बन उत्सर्जन नियंत्रित करने के लिए हरियाली ही फ़िलहाल एक मात्र रास्ता है. अगर बिल्डिंगों के बाहर हरियाली रखने का चलन शुरू हो जाए तो चीन में भवन निर्माण उद्योग से होने वाला कार्बन उत्सर्जन काफ़ी हद तक कम हो सकता है.

 

इमारतें

 

वहीं कुछ जानकारों का ये भी कहना है कि बिल्डिंग बनाने में इस्तेमाल होने वाले मैटेरियल में भी सुधार करना होगा. मिसाल के लिए अकेले सीमेंट ही एक साल में दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन का 8 फ़ीसदी का ज़िम्मेदार है. अगर कंस्ट्रक्शन मैटेरियल को रीसाइकिल कर लिया जाए तो कार्बन उत्सर्जन काफ़ी हद तक कम हो जाएगा. इस दिशा में चीन की विनसन कंपनी ने काम शुरू भी कर दिया है. इस काम के लिए ये कंपनी थ्री-डी तकनीक का सहारा ले रही है.

नई इमारत बनाने के लिए बेकार सामग्री को पीस कर इस्तेमाल करने से भी ज़्यादा बेहतर है कि जो चीज़ें पहले से मौजूद हैं उनका इस्तेमाल किया जाए. ग्रीन आर्किटेक्चर डिज़ाइन एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर ल्यू हेंग कुछ ऐसा ही कर रहे हैं. उन्होंने एक पुरानी फ़ैक्ट्री के बेकार पड़े हिस्से को पुराने कांच और सीमेंट के टुकड़ों की मदद से नया रूप देकर अपने लिए तैयार कर लिया. उन्होंने कॉरिडोर के चारों तरफ़ पर्दे वाली ऐसी दीवारें बनाईं जो बाहर की गर्म हवा को अंदर नहीं आने देतीं और अंदर का तापमान नियंत्रित रहता है. ल्यू कहते हैं कि थ्री-डी प्रिंटिंग इस काम में काफ़ी कारगर साबित हो सकती है. इससे मज़दूरी और मटेरियल दोनों की बचत भी हो जाएगी.

 

इमारतें

 

चीन में ऐसी इमारतें बनाने पर भी काम किया जा रहा है, जिन्हें बिना किसी यांत्रिक साधन के ठंडा या गर्म रखा जा सकता है. इसका प्रयोग सबसे पहले 2005 में बीजिंग की पेकिंग यूनिवर्सिटी की इमारत में हुआ था. इस इमारत के गलियारे इस तरह डिज़ाइन किए गए हैं कि वो सर्दी में गर्म और गर्मी में ठंडे रहते हैं साथ ही क़ुदरती रोशनी भी भरपूर रहती है और बिजली की खपत नहीं के बराबर होती है. क्लासरूम में बिजली का सिस्टम भी कुछ ऐसे विकसित किया गया है कि वहां किसी की मौजूदगी में ही लाइट जलती हैं.

वास्तुकला क्षेत्र के लोगों को उम्मीद है कि जिस तरह इमारतों के लिए नए डिज़ाइन बनाए जा रहे हैं, वो बहुत स्थाई हैं और चीन की सरकार उन्हें आगे बढ़ाने में मदद करेगी. 2018 तक चीन में दस हज़ार से ज़्यादा ग्रीन प्रोजेक्ट को हरी झंडी दी जा चुकी है. 2017 में चीन ने तय किया था कि 2020 तक जितनी इमारतें बनाई जाएंगी, उनमें से 50 फ़ीसद ग्रीन बिल्डिंग होंगी.

चीन में शहरी विकास की दर तेज़ है. लिहाज़ा यहां बदलाव की रफ़्तार भी तेज़ होगी. अगर इस दशक में दुनिया के कुल बनने वाली इमारतों में से आधी अगर चीन में बनने वाली है तो इस नए तरीके एक बहुत बड़ा बदलाव आएगा. अगर चीन अपने यहां 50 फ़ीसदी इमारतें भी हरियाली से भरपूर कर लेता है तो दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन में भारी गिरावट आ जाएगी.

 


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adminJuly 31, 20201min4310

एक बेहद दुर्लभ और बड़ा जीव ऑस्ट्रेलिया के तट पर लोगों को देखने को मिला. इसे देखकर वहां के पर्यटक हैरान रह गए. क्योंकि इस जीव की शक्ल एलियन जैसी दिखती है. इसे ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया प्रांत के दक्षिण-पश्चिम तट पर स्थित केनेट नदी के मुहाने पर पाया गया.
एलियन जैसे दिखने वाले इस जीव का नाम है ओशन सनफिश (Ocean Sunfish). इस सनफिश को खोजा कैथ रैम्पट्न और उनके हसबैंड टॉम ने जो उस समय उस तट पर छुट्टियां मना रहे थे. दोनों जानवरों के डॉक्टर हैं. दोनों ने कहा कि उन्होंने इससे पहले कभी ऐसा जीव नहीं देखा.
कैथ रैम्पट्न ने बताया कि यह मछली करीब 2 मीटर लंबी और इतनी ही ऊंची थी. लेकिन बाद में पता किया तो जानकारी मिली कि ये अपनी प्रजाति की छोटी मछली है. इस प्रजाति में इससे दोगुनी बड़ी आकार की मछलियां होती हैं.

इसके बाद इस मछली को टूरिस्ट टिम रॉथमैन और जेम्स बरहैम ने देखा. इन दोनों ने भी कहा कि ये मछली पूरी तरह से एलियन जैसी दिखती है. इन्होंने कहा कि इससे पहले कभी ऐसा जीव इन लोगों ने नहीं देखा था. पिछली साल दक्षिण ऑस्ट्रेलिया में एक मछुआरे ने भी सनफिश को पकड़ा था.

 

ऑस्ट्रेलिया के तट पर मिला एलियन जैसा जीव, देखकर हो जाएंगे हैरान

 

एक स्वस्थ और वयस्क सनफिश 3 मीटर लंबी, 4.2 मीटर ऊंची और करीब 2.5 टन वजनी हो सकती है. ये खतरनाक हमलावर हो सकती हैं. साथ ही बेहद प्यारी दिखती है. इसलिए इन्हें कुछ एक्वेरियम में भी रखा गया है.

ऑस्ट्रेलिया के तट पर मिला एलियन जैसा जीव, देखकर हो जाएंगे हैरान

 

फिश एक्सपर्ट राल्फ फोस्टर बताते हैं कि यह मछली तभी तट पर आई होगी, जब इसे किसी बड़े नाव से चोट लगी होगी. कई बार ये प्लास्टिक की थैलियों को जेली फिश समझ कर खा जाती हैं. इससे भी इनकी मौत हो जाती है

राल्फ फोस्टर बताते हैं कि ये सनफिश अक्सर दक्षिण ऑस्ट्रेलिया के समुद्री तटों पर बहकर आ जाती हैं. लेकिन ये ज्यादातर गहरे समुद्र में रहती हैं. जापान, कोरिया, ताइवान जैसे देशों में इस मछली को खाया भी जाता है.


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adminJuly 8, 20201min2790

कैरोलीना मारीन. पूरी दुनिया के लिए स्पेन से आने वाली बैडमिंटन लेजेंड. हमारे लिए वो लड़की, जो अक्सर पीवी सिंधु का रास्ता काट जाती है. यही मारीन एक बार फिर से चर्चा में हैं. मारीन ने हाल ही में कोविड-19 से लड़ रहे स्वास्थ्यकर्मियों से बात की है. इस बातचीत के दौरान उन्होंने रहा कि वह कोविड से लड़ रहे स्वास्थ्यकर्मियों को धन्यवाद स्वरूप अपने सारे मेडल्स देने को तैयार हैं.

मारीन ने साल 2016 के रियो ओलंपिक में पीवी सिंधु को हराकर गोल्ड मेडल जीता था. इसके अलावा उनके पास तीन वर्ल्ड चैंपियनशिप गोल्ड मेडल्स भी हैं. इतना ही नहीं मारीन ने चार बार यूरोपियन चैंपियनशिप का टाइटल भी जीता है. इन बड़े खिताबों के साथ उनके पास तमाम अन्य मेडल्स भी हैं. इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए मारीन ने कहा,

‘उनसे बातचीत के दौरान मैंने अपने सारे मेडल उन्हें ऑफर किए क्योंकि असलियत में वही स्पेन के असली हीरो हैं. वे हर तारीफ डिजर्व करते हैं. यह प्रेरणादायक था. मैं सिर्फ उन्हें धन्यवाद कहना चाहती थी. इन हालात में वे लोग स्पेन के बीमार लोगों का ख्याल रखने में जो भी एफर्ट लगा रहे, इसके लिए वे असली हीरो हैं.

उन्होंने कमाल का काम किया है और मैं उन तमाम फ्रंटलाइन वॉरियर्स को शुक्रिया कहना चाहती हूं जो हर दिन अपनी जान दांव पर लगाकर हमारे जैसे लोगों की सेवा कर रहे हैं.’

 

# भारतीय फैंस को संदेश

शुरुआत में स्पेन कोविड 19 से सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में से एक था. लेकिन उन्होंने लॉकडाउन और सरकार द्वारा जारी सख्त हेल्थ गाइडलाइंस का पालन कर बीमारी को काफी हद तक कंट्रोल कर लिया है. इधर भारत में शुरुआत में मामले कम थे लेकिन अब हालात तेजी से खराब हो रहे हैं. कोविड-19 से सबसे ज्यादा ग्रस्त देशों में भारत अब तीसरे नंबर पर पहुंच गया है.

अपने भारतीय फैंस को संदेश देते हुए मारीन ने कहा,

‘यह महामारी अभूतपूर्व है, इसके बाद भी हमारे पास ऐसी तमाम प्रेरणादायक कहानियां हैं जो मुझे ज्यादा से ज्यादा समाज को लौटाने पर मजबूर करती हैं. कोर्ट पर जाना और जीतने के लिए खेलना ही इन स्वास्थ्यकर्मियों के प्रति आभार जताने का तरीका होता. मुझे उम्मीद है कि भारत के लोग जल्दी ही इससे उबर जाएंगे.’

 


मारीन ने सबसे पहले स्पेन की राजधानी मैड्रिड के वर्जेन डेल मर हॉस्पिटल के स्टाफ से बात की. उन्होंने वीडियोकॉल के जरिए इन लोगों से चर्चा की. यह चर्चा काफी देर तक चली. मारीन ने इसके अलावा बार्सिलोना के सैनितास सिमा हॉस्पिटल के स्टाफ से भी बात की. यहां मारीन ने हॉस्पिटल स्टाफ को असली चैंपियन बताया. मारीन ने 100 साल के आदमी को ठीक करने के लिए उनकी जमकर तारीफ की.


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adminJune 23, 20201min3070

बयान में कहा गया कि इस साल केवल सऊदी अरब में रह रहे लोगों को हज की इजाजत होगी. हालांकि, सरकार ने ये नहीं बताया कि कितने लोगों को अनुमति होगी.

सऊदी अरब ने कहा है कि वह इस साल हज का आयोजन करेगा. लेकिन कोरोना वायरस के कारण केवल सऊदी अरब में रहने वाले लोग ही हज कर सकेंगे. सऊदी अरब सरकार के हज और उमरा मामलों के मंत्रालय ने सोमवार को बयान जारी करके बताया कि कोरोना वायरस के चलते इस बार सीमित हाजियों को ही हज करने की इजाजत होगी.

बयान में कहा गया कि इस साल केवल सऊदी अरब में रह रहे लोगों को हज की इजाजत होगी. हालांकि सरकार ने ये नहीं बताया कि कितने लोगों को अनुमति होगी. बयान में आगे कहा गया कि लोगों में कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए दूसरे तमाम सुरक्षात्मक प्रावधान भी अपनाए जाएंगे.

सऊदी अरब ने राष्ट्र की स्थापना के बाद से लगभग 90 वर्षों में कभी भी हज को रद्द नहीं किया है. एक अनुमान के मुताबिक, यहां हर साल 2 मिलियन लोग हज करने के लिए आते हैं.

इससे पहले सऊदी अरब की ओर से लोगों से अपील की गई थी कि लोग इस बार हज के लिए ना आएं या फिर अपने कार्यक्रम को आगे बढ़ा दें. कोरोना वायरस के संकट को देखते हुए पहले ही मक्का और मदीना शहर को विदेशियों के लिए बंद कर दिया गया था.



सऊदी में कोरोना के केस

बता दें कि इस साल दुनिया में कोरोना वायरस का संक्रमण फैला हुआ है. इस संक्रामक से सऊदी अरब भी अछूता नहीं रहा है. सऊदी अरब में हर रोज कोरोना वायरस के नए मरीजों की पुष्टि हो रही है. सऊदी में अब तक 1,61,005 कोरोना मरीजों की पुष्टि हो चुकी है. यहां पर 1307 लोगों की कोरोना से मौत हो चुकी है.


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adminJune 12, 20201min5030


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adminJune 10, 20202min4700

जो बाइडन को दुनिया के सबसे तजुर्बेकार राजनेताओं में से एक माना जाता है. लेकिन, वो अपने भाषणों में भयंकर ग़लतियां करने के लिए भी कुख्यात हैं.

हालांकि, डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव के उम्मीदवार चुने गए बाइडन के बारे में आपके लिए बस इतना जानना पर्याप्त है कि वो इस साल नवंबर में होने वाले चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी के प्रत्याशी डोनाल्ड ट्रंप को चुनौती देंगे.

जो बाइडन वो इंसान हैं, जो अमरीका की सत्ता के केंद्र व्हाइट हाउस में डोनाल्ड ट्रंप के अगले चार बरस बिताने के ख़्वाब की राह में खड़ी इकलौती बाधा हैं.

बराक ओबामा के शासन काल में उप-राष्ट्रपति रहे बाइडन को औपचारिक रूप से डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव का प्रत्याशी चुन लिया गया है.

अपने समर्थकों के बीच में जो बाइडन, विदेश नीति के विशेषज्ञ के तौर पर मशहर हैं. उनके पास वॉशिंगटन डी. सी. में राजनीति करने का कई दशकों का तजुर्बा है. वो मीठी ज़ुबान बोलने वाले नेता के तौर पर मशहूर हैं, जो बड़ी आसानी से लोगों का दिल जीत लेते हैं. बाइडन की सबसे बड़ी ख़ासियत ये है कि वो बड़ी सहजता से आम आदमी से नाता जोड़ लेते हैं. अपनी निजी ज़िंदगी में बाइडन ने बहुत से उतार चढ़ाव देखे हैं और बहुत सी त्रासदियां झेली हैं.

वहीं, विरोधियों की नज़र में जो बाइडन ऐसी शख़्सियत हैं, वो अमरीकी सत्ता में गहरे रचे बसे इंसान हैं, जिनमें कमियां ही कमियां हैं. बाइडन के बारे में उनके विरोधी कहते हैं कि वो अपने भाषणों में झूठे दावे करते हैं. साथ ही उनकी एक और आदत को लेकर भी अक्सर चिंता जताई जाती है कि उन्हें महिलाओं के बाल सूंघने की बुरी लत है.

बड़ा सवाल ये है कि क्या बाइडन में वो ख़ासियत है कि वो नवंबर के राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप को व्हाइट हाउस से बाहर का रास्ता दिखा सकें?

 

तेज़ वक्ता

जो बाइडन का चुनाव प्रचार से बड़ा पुराना नाता रहा है. अमरीका की संघीय राजनीति में उनके करियर की शुरुआत, आज से 47 बरस पहले यानी 1973 में सीनेट के चुनाव से हुई थी. और उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में भागीदारी के लिए पहला दांव आज से 33 साल पहले चला था.

ऐसे में अगर ये कहें कि बाइडन के पास वोटर को लुभाने का क़ुदरती हुनर है, तो ग़लत नहीं होगा. मगर, बाइडन के साथ सबसे बड़ा जोखिम ये है कि वो कभी भी कुछ भी ग़लत बयानी कर सकते हैं, जिससे उनके सारे किए कराए पर पानी फिर जाए.

जनता से रूबरू होने पर जो बाइडन अक्सर जज़्बात में बह जाते हैं. और इसी कारण से राष्ट्रपति चुनाव का उनका पहला अभियान शुरू होने से पहले ही अचानक ही ख़त्म हो गया था (बाइडन तीसरी बार राष्ट्रपति बनने का प्रयास कर रहे हैं).

जब 1987 में बाइडन ने राष्ट्रपति चुनाव में प्रत्याशी बनने के लिए पहली बार कोशिश करनी शुरू की थी, तो उन्होंने रैलियों में ये दावा करना शुरू कर दिया था कि, ‘मेरे पुरखे उत्तरी पश्चिमी पेन्सिल्वेनिया में स्थित कोयले की खानों में काम करते थे.’ और बाइडन ने भाषण में ये कहना शुरू कर दिया कि उनके पुरखों को ज़िंदगी में आगे बढ़ने के वो मौक़े नहीं मिले जिसके वो हक़दार थे. और बाइडन ये कहा करते थे कि वो इस बात से बेहद ख़फ़ा हैं.

मगर, हक़ीक़त ये है कि बाइडन के पूर्वजों में से किसी ने भी कभी कोयले की खदान में काम नहीं किया था. सच तो ये था कि बाइडन ने ये जुमला, ब्रिटिश राजनेता नील किनॉक की नक़ल करते हुए अदा किया था (इसी तरह बाइडन ने कई अन्य नेताओं के बयान अपने बना कर पेश किए थे). जबकि नील किनॉक के पुरखे तो वाक़ई कोयला खदान में काम करने वाले मज़दूर थे.

और ये तो बाइडन के तमाम झूठे जुमलों में से महज़ एक था. उनके ऐसे बयान अमरीकी राजनीति में ‘जो बॉम्ब’ के नाम से मशहूर या यूं कहें कि बदनाम हैं.

2012 में अपने राजनीतिक तजुर्बे का बखान करते हुए बाइडन ने जनता को ये कह कर ग़फ़लत में डाल दिया था कि, ‘दोस्तो, मैं आपको बता सकता हूं कि मैंने आठ राष्ट्रपतियों के साथ काम किया है. इनमें से तीन के साथ तो मेरा बड़ा नज़दीकी ताल्लुक़ रहा है.’ उनके इस जुमले का असल अर्थ तो ये था कि वो तीन राष्ट्रपतियों के साथ क़रीब से काम कर चुके हैं. मगर इसी बात को उन्होंने जिन लफ़्ज़ों में बयां किया, उसका मतलब ये निकलता था कि उनके तीन राष्ट्रपतियों के साथ यौन संबंध रहे थे.

 

Joe Biden

 

जब बराक ओबामा ने जो बाइडन को अपने साथ उप-राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाया, तो बाइडन ने ये कह कर लोगों को डरा दिया था कि इस बात की तीस फ़ीसद संभावना है कि ओबामा और वो मिलकर अर्थव्यवस्था सुधारने में ग़लतियां कर सकते हैं.

जो बाइडन को क़िस्मत का धनी ही कहा जा सकता है कि उन्हें अमरीका के पहले काले राष्ट्रपति ने अपना उप-राष्ट्रपति बनाया था. क्योंकि, इससे पहले बाइडन ने ओबामा के बारे में ये कह कर हलचल मचा दी थी कि, ‘ओबामा ऐसे पहले अफ्रीकी मूल के अमरीकी नागरिक हैं, जो अच्छा बोलते हैं. समझदार हैं. भ्रष्ट नहीं है और दिखने में भी अच्छे हैं.’

अपने इस बयान के बावजूद, इस बार के राष्ट्रपति चुनाव के प्रचार अभियान के दौरान, जोसेफ बाइडन अमरीका के अफ्रीकी-अमरीकी समुदाय के बीच बहुत लोकप्रिय हैं. लेकिन, हाल ही में एक काले होस्ट के साथ चैट शो के दौरान जो बाइडन ने ऐसा कुछ कह दिया था जिससे बहुत बड़ा हंगामा खड़ा हो गया था. काले अमरीकी होस्ट शार्मलेन था गॉड के साथ बातचीत में बाइडन ने दावा किया था कि, ‘अगर आपको ट्रंप और मेरे बीच चुनाव करने में समस्या है, तो फिर आप काले हैं ही नहीं.’

बाइडन के इस इकलौते मुंहफट बयान से अमरीकी मीडिया में तूफ़ान सा आ गया था. जिसके बाद बाइडन के प्रचार अभियान की कमान संभाल रही टीम को लोगों तक ये संदेश पहुंचाने में बड़ी मशक़्क़त करनी पड़ी थी कि बाइडन, अफ्रीकी-अमरीकी मतदाता को हल्के में बिल्कुल नहीं ले रहे हैं.

 

Joe Biden

 

जो बाइडन के ऐसे बेलगाम बयानों के कारण ही न्यूयॉर्क मैग़ज़ीन के एक पत्रकार ने लिखा था कि, ‘बाइडन की पूरी प्रचार टीम बस इसी बात पर ज़ोर दिए रहती है कि कहीं वो कोई अंट-शंट बयान न दे बैठें.’

 

प्रचार अभियान के पुराने तजुर्बेकार

यूं तो बाइडन एक अच्छे वक्ता हैं. मगर, उनकी भाषण कला का एक पहलू और भी है. आज जब दुनिया में रोबोट जैसे नेताओं की भरमार है, जो सधे हुए बयान देते हैं. बस लिखा हुआ पढ़ देते हैं. लेकिन, बाइडन ऐसे वक्ता हैं जिन्हें सुन कर ऐसा लगता है कि वो दिल से बोल रहे हैं.

बाइडन कहते हैं कि बचपन में हकलाने की आदत की वजह से उन्हें टेलिप्रॉम्पटर की मदद से पढ़ना नहीं आता है. वो जो भी बोलते हैं, दिल से बोलते हैं.

जो बाइडन के भाषण में वो दिलकशी है कि वो अमरीका के ब्लू-कॉलर कामकाजी लोगों की भीड़ में अचानक अपने भाषण से जोश भर देते हैं. इसके बाद वो बड़ी सहजता से उस भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं. लोगों से मिलते हैं. हाथ मिलाते हैं उन्हें गले लगाते हैं. लोगों के साथ सेल्फ़ी लेते है. ठीक उसी तरह जैसे कोई बुज़ुर्ग फ़िल्म स्टार हो, जो अचानक अपने फ़ैन्स के बीच पहुंच गया हो.

अमरीका के पूर्व विदेश मंत्री और राष्ट्रपति चुनाव के उम्मीदवार रहे जॉन केरी ने न्यूयॉर्कर मैगज़ीन से बातचीत में बाइडन के बारे में कहा था कि, ‘वो लोगों को अपनी ओर खींच कर उन्हें गले लगा लेते हैं. कई बार तो लोग उनकी बातों से ही उनकी ओर खिंचे चले आते हैं और कई बार वो लोगों को ख़ुद ही अपने आगोश में भींच लेते हैं. वो दिल को छू लेने वाले राजनेता हैं. और उनमें कोई बनावट नहीं है. वो कोई ढोंग नहीं करते. बड़े सहज भाव से लोगों में घुल मिल जाते हैं.’

 

बाइडन पर लगे गंभीर आरोप

पिछले साल आठ महिलाओं ने सामने आकर ये आरोप लगाया था कि जो बाइडन ने उन्हें आपत्तिजनक तरीक़े से छुआ था, गले लगाया था या किस किया था. इन महिलाओं के आरोप लगाने के बाद कई अमरीकी न्यूज़ चैनलों ने बाइडन के सार्वजनिक समारोहों में महिलाओं से अभिवादन करने की नज़दीकी तस्वीरें दिखाई थीं. इनमें कई बार बाइडन को महिलाओं के बाल सूंघते हुए भी देखा गया था.

इन आरोपों के जवाब में बाइडन ने कहा था कि, ‘भविष्य में मैं महिलाओं से अभिवादन के दौरान अतिरिक्त सावधानी बरतूंगा.’

लेकिन, अभी इसी साल मार्च महीने में अमरीकी अभिनेत्री तारा रीड ने इल्ज़ाम लगाया था कि जो बाइडन ने तीस साल पहले उनके साथ यौन हिंसा की थी. उन्हें दीवार की ओर धकेल कर उनसे ज़बरदस्ती करने की कोशिश की थी. उस वक़्त तारा रीड, बाइडन के ऑफ़िस में एक सहायक कर्मचारी के तौर पर काम कर रही थीं.

जो बाइडन ने तारा रीड के इस दावे का सख़्ती से खंडन किया था और एक बयान जारी करके कहा था कि, ‘ऐसा बिल्कुल भी नहीं हुआ था.’

अपनी पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का बचाव करते हुए, बाइडन के समर्थक ये कह सकते हैं कि दर्जन भर से ज़्यादा महिलाओं ने अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर सार्वजनिक रूप से यौन हिंसा करने के इल्ज़ाम लगाए हैं. पर, सवाल ये है कि क्या आप ऐसे बर्ताव का राजनीतिक विरोधी के ऐसे कृत्यों की तुलना करके जवाब दे सकते हैं?

 

Charlamagne Tha God and Joe Biden

 

जब से अमरीका में #MeToo आंदोलन शुरू हुआ है, तब से जो बाइडन समेत डेमोक्रेटिक पार्टी के कई नेता ज़ोर देकर ये कहते रहे हैं कि समाज को महिलाओं पर यक़ीन करना चाहिए. ऐसे में अगर बाइडन पर लग रहे ऐसे आरोपों को कम करके बताने की कोशिश होती है, तो ऐसे किसी भी प्रयास से महिला अधिकारों के लिए काम कर रहे लोगों को निराशा ही होगी.

हाल ही में एक इंटरव्यू में तारा रीड ने कहा था कि, ‘बाइडन के सहयोगी मेरे बारे में भद्दी-भद्दी बातें कहते रहे हैं. और सोशल मीडिया पर भी मुझे लेकर अनाप शनाप बोल रहे हैं. ख़ुद बाइडन ने तो मुझे कुछ भी नहीं कहा. मगर, बाइडन के पूरे प्रचार अभियान में एक पाखंड साफ़ तौर पर दिखता है कि उनसे महिलाओं को बिल्कुल भी ख़तरा नहीं है. सच तो ये है कि बाइडन के क़रीब रहना कभी भी सुरक्षित नहीं था.’

जो बाइडन की प्रचार टीम ने तारा रीड के इन आरोपों का खंडन किया है.

 

पुरानी ग़लतियों से बचने की कोशिश

भले ही आम लोगों से बाइडन की ये नज़दीकी पहले उनके लिए मुसीबत बनती रही हो. लेकिन, इस बार उनके समर्थक ये उम्मीद कर रहे हैं कि उनका जो लोगों से नज़दीकी बनाने का ख़ास स्टाइल है, आम लोगों से जो गर्मजोशी है, उसकी मदद से वो अपनी पुरानी ग़लतियों के भंवर में दोबारा नहीं फंसेंगे. वो डेमोक्रेटिक पार्टी के पुराने राष्ट्रपति चुनाव के प्रत्याशियों जैसी ग़लती नहीं दोहराएंगे. इस बार सावधानी बरतेंगे.

जो बाइडन को अमरीका की संघीय राजनीति में काम करने का लंबा अनुभव रहा है. वो वॉशिंगटन में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं. अमरीकी संसद के ऊपरी सदन यानी सीनेट में बाइडन ने तीन दशक से अधिक समय गुज़ारा है. इसके अलावा वो बराक ओबामा के राज में आठ साल तक उप-राष्ट्रपति रहे हैं. सियासत में इतना लंबा अनुभव काफ़ी काम आता है. मगर, हालिया इतिहास बताता है कि ऐसा हमेशा हो, ये भी ज़रूरी नहीं.

अल गोर (अमरीकी संसद के निचले सदन हाउस ऑफ़ रिप्रेज़ेंटेटिव्स में आठ साल का अनुभव, सीनेट में आठ साल का तजुर्बा और उप-राष्ट्रपति के तौर पर आठ साल का वक़्त) हों, जॉन केरी हों (सीनेट में 28 साल का अनुभव) या फिर हिलेरी क्लिंटन (देश की प्रथम महिला के तौर पर आठ वर्ष का तजुर्बा और सीनेट में आठ साल का अनुभव, विदेश मंत्री के तौर पर चार बरस का तजुर्बा), डेमोक्रेटिक पार्टी के ये सभी अनुभवी राजनेता, अपने से कम तजुर्बा रखने वाले रिपब्लिकन पार्टी के प्रत्याशी के हाथों शिकस्त खाने को मजबूर हुए.

जो बाइडन के समर्थक ये मानते हैं कि एक ज़मीनी नेता के तौर पर उनका अनुभव, उन्हें कम अनुभवी ट्रंप के हाथों परास्त होने से बचा लेगा.

अमरीका के वोटरों ने कई बार ये साबित किया है कि वो ऐसे नेताओं को राष्ट्रपति चुनने को तरजीह देते हैं, जो ये दावा करता है कि वो वॉशिंगटन की राजनीति का हिस्सा नहीं है. बल्कि, वो इसलिए राष्ट्रपति बनना चाहते हैं ताकि वो वॉशिंगटन की मौजूदा व्यवस्था को जड़ से उखाड़ फेंकें. उसमें आमूल चूल बदलाव ले आएं. अक्सर ऐसे नेता अमरीकी जनता को पसंद आते हैं, जो ख़ुद को ‘आउटसाइडर’ यानी वॉशिंगटन से बाहर वाला कहते हैं.

लेकिन ये एक ऐसा दावा है जो जो बाइडन क़त्तई नहीं कर सकते. क्योंकि उन्होंने अमरीका की शीर्ष राजनीति में लगभग पचास साल का वक़्त गुज़ारा है.

और, वॉशिंगटन की राजनीति में उनके लंबे तजुर्बे को बाइडन के ख़िलाफ़ चुनाव में भुनाया जा सकता है.

 

बाइडन का लंबा सियासी इतिहास

अमरीका के राजनीतिक इतिहास में पिछले कुछ दशकों में जो कुछ भी बड़ा उतार चढ़ाव देखने को मिला है, उसमें बाइडन किसी न किसी रूप में ज़रूर शामिल रहे हैं. और बाइडन ने इस दौरान जो भी फ़ैसले लिए हैं, वो शायद राष्ट्रपति चुनाव अभियान के दौरान उनके हक़ में काम न आएं.

1970 के दशक में उन्होंने अमरीकी बच्चों के बीच नस्लीय भेदभाव कम करने के लिए उन्हें एक साथ पढ़ाने का विरोध करने वालों का साथ दिया था. तब दक्षिण के अमरीकी राज्य इस बात के ख़िलाफ़ थे कि गोरे अमरीकी बच्चों को बसों में भर कर काले बहुल इलाक़ों में ले जाया जाए. इस बार के चुनाव अभियान के दौरान, बाइडन को उनके इस स्टैंड के लिए बार-बार निशाना बनाया गया है.

रिपब्लिकन पार्टी के उनके विरोधी अक्सर, ओबामा प्रशासन में रक्षा मंत्री रहे रॉबर्ट गेट्स के उस बयान का हवाला देत हैं, जिसमें गेट्स ने कहा था कि, ‘जो बाइडन को नापसंद करना क़रीब क़रीब नामुमकिन है. मगर दिकक़्त ये है कि पिछले चार दशकों में अमरीका की विदेश नीति हो या फिर घरेलू सुरक्षा से जुड़े मसले, इन सभी मामलों में बाइडन हमेशा ग़लत पक्ष के साथ ही खड़े रहे हैं.’

अब जैसे-जैसे चुनाव का प्रचार अभियान तेज़ होगा, तो तय है कि बाइडन को ऐसे सियासी बयानों के ज़रिए निशाना बनाया जाएगा.

 

बाइडन की पारिवारिक त्रासदियां

ये बाइडन के लिए अफ़सोस की बात है. मगर, एक ऐसा मसला है जिस मामले में वो किसी अन्य राजनेता के मुक़ाबले अमरीकी जनता के ज़्यादा क़रीब दिखाई देते हैं. और वो है मौत.

जब, जो बाइडन, पहली बार अमरीकी सीनेट का चुनाव जीत कर शपथ लेने की तैयारी कर रहे थे, तभी उनकी पत्नी नीलिया और बेटी नाओमी एक कार हादसे में मारी गई थीं. इस दुर्घटना में उनके दोनों बेटे ब्यू और हंटर भी ज़ख़्मी हो गए थे.

बाद में ब्यू की 46 साल की उम्र में 2015 में ब्रेन ट्यूमर से मौत हो गई थी.

इतनी युवावस्था में इतने क़रीबी लोगों को गंवा देने के कारण, आज जो बाइडन से बहुत से आम अमरीकी लोग जुड़ाव महसूस करते हैं. लोगों को लगता है कि इतनी बड़ी सियासी हस्ती होने और सत्ता के इतने क़रीब होने के बावजूद, बाइडन ने वो दर्द भी अपनी ज़िंदगी में झेले हैं, जिनसे किसी आम इंसान का वास्ता पड़ता है.

लेकिन, बाइडन के परिवार के एक हिस्से की कहानी बिल्कुल अलग है. ख़ास तौर से उनके दूसरे बेटे हंटर की.

 

सत्ता, भ्रष्टाचार और झूठ?

जो बाइडन के दूसरे बेटे हंटर ने वकालत की पढ़ाई पूरी करके लॉबिइंग का काम शुरू किया था. इसके बाद उनकी ज़िंदगी बेलगाम हो गई. हंटर की पहली पत्नी ने उन पर शराब और ड्ग्स की लत के साथ-साथ, नियमित रूप से स्ट्रिप क्लब जाने का हवाला देते हुए तलाक़ के काग़ज़ात अदालत में दाख़िल किए थे. कोकीन के सेवन का दोषी पाए जाने के बाद हंटर को अमरीकी नौसेना ने नौकरी से निकाल दिया था.

एक बार हंटर ने न्यूयॉर्कर पत्रिका के साथ बातचीत में माना था कि एक चीनी ऊर्जा कारोबारी ने उन्हें तोहफ़े में हीरा दिया था. बाद में चीन की सरकार ने इस कारोबारी के ऊपर भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच की थी.

अपनी निजी ज़िंदगी का हंटर ने जैसा तमाशा बनाया उससे बाइडन को काफ़ी सियासी झटके झेलने पड़े हैं. अभी पिछले ही साल हंटर ने दूसरी शादी एक ऐसी लड़की से की थी, जिससे वो महज़ एक हफ़्ते पहले मिले थे. इसके अलावा हंटर की भारी कमाई को लेकर भी बाइडन पर निशाना साधा जाता रहा है.

हंटर का नशे का आदी होना एक ऐसी बात है, जिससे बहुत से अमरीकी लोगों को हमदर्दी हो सकती है. लेकिन, जिस तरह हंटर ने अक्सर मोटी तनख़्वाहों वाली नौकरियों पर हाथ साफ़ किया है. उससे ये बात भी उजागर होती है कि अगर कोई जो बाइडन जैसे किसी बड़े सियासी नेता की औलाद है, तो नशेड़ी होने के बावजूद उन्हें मोटी तनख़्वाहों वाली नौकरियां आसानी से मिल जाती हैं. उनकी ज़िंदगी नशे के शिकार किसी आम अमरीकी नागरिक की तरह मुश्किल भरी नहीं होती.

 

महाभियोग का भय

हंटर ने मोटी सैलेरी वाली जो नौकरियां कीं, उनमें से एक यूक्रेन में भी थी. बाइडन के बेटे की इसी नौकरी के चलते अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ने यूक्रेन के राष्ट्रपति पर इस बात का दबाव बनाया था कि हंटर के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच करें.

यूक्रेन के राष्ट्रपति को की गई इसी फ़ोन कॉल के कारण हाल ही में ट्रंप के ख़िलाफ़ महाभियोग की शुरुआत हुई थी. हालांकि, ये सियासी मुहिम ट्रंप को राष्ट्रपति पद से हटाने में नाकाम रही थी. हालांकि, ये एक ऐसा सियासी दलदल था, जिसे लेकर शायद बाइडन ये सोच रखते हों कि काश वो इस झंझट में न पड़े होते.

 

विदेशी मामले

कूटनीति का लंभाव अनुभव, जो बाइडन की बड़ी सियासी ताक़त है. ऐसे में विदेश से जुड़ा हुआ कोई भी सियासी स्कैंडल उन्हें ख़ास तौर से सियासी नुक़सान पहुंचाने वाला हो सकता है. जो बाइडन, पहले सीनेट की विदेशी मामलों की समिति के अध्यक्ष रह चुके हैं. और वो ये दावा बढ़ चढ़कर करते रहे हैं कि-‘मैं पिछले 45 बरस में कम-ओ-बेश दुनिया के हर बड़े राजनेता से मिल चुका हूं.’

भले ही, अमरीकी मतदाताओं को बाइडन के इस दावे से तसल्ली होती हो कि उनके पास राष्ट्रपति बनने का पर्याप्त अनुभव है. लेकिन, ये कहना मुश्किल है कि उनके इस अनुभव के आधार पर कितने लोग बाइडन को राष्ट्रपति पद के लिए चुनना चाहेंगे.

उनके लंबे सियासी अनुभव की तरह ही इस मामले में भी यही कहा जा सकता है कि इस मामले में उनका मिला जुला अनुभव ही रहेगा.

जो बाइडन ने 1991 के खाड़ी युद्ध के ख़िलाफ़ वोट दिया था. लेकिन, 2003 में उन्होंने इराक़ पर हमले के समर्थन में वोट दिया था. हालांकि, बाद में वो इराक़ में अमरीकी दख़ल के मुखर आलोचक भी बन गए थे.

ऐसे मामलों में बाइडन अक्सर संभलकर चलते हैं. अमरीकी कमांडो के जिस हमले में पाकिस्तान में ओसामा बिन लादेन को मार गिराया गया था, बाइडन ने ओबामा को ये हमला न करने की सलाह दी थी.

मज़े की बात ये है कि अल-क़ायदा के नेता ओसामा बिन लादेन को जो बाइडन की कोई ख़ास परवाह नहीं थी. सीआईए द्वारा ज़ब्त किए गए जो दस्तावेज़ जारी किए गए हैं, उनके मुताबिक़, ओसामा बिन लादेन ने अपने लड़ाकों को निर्देश दिया था कि वो राष्ट्रपति बराक ओबामा को निशाना बनाएं. लेकिन, लादेन ने बाइडन की हत्या का कोई फ़रमान नहीं जारी किया था.

जबकि उस वक़्त बाइडन, अमरीका के उप-राष्ट्रपति थे. ओसामा बिन लादेन को लगता था कि, ओबामा की हत्या के बाद बाइडन को ही अमरीका की कमान मिलेगी. मगर लादेन के मुताबिक़, ‘बाइडन राष्ट्रपति पद की ज़िम्मेदारियां उठाने के लिए क़त्तई तैयार नहीं थे. और अगर वो राष्ट्रपति बनते हैं तो अमरीका में सियासी संकट पैदा हो जाएगा.’

कई मामलों में जो बाइडन के ख़यालात ऐसे हैं, जो डेमोक्रेटिक पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं से मेल नहीं खाते. डेमोक्रेटिक पार्टी के इन युवा समर्थकों को बर्नी सैंडर्स या एलिज़ाबेथ वॉरेन जैसे नेताओं के कट्टर युद्ध विरोधी विचार अधिक पसंद आते हैं. मगर, बहुत से अमरीकी नागरिकों को ये भी लगता है कि जो बाइडन कुछ ज़्यादा ही शांति दूत बनते हैं.

ये वही अमरीकी नागरिक हैं, जिन्होंने इस साल जनवरी में एक ड्रोन हमले में, ईरान के जनरल क़ासिम सुलेमानी की हत्या करने का आदेश देने पर राष्ट्रपति ट्रंप का खुल कर समर्थन किया था.

विदेश नीति से जुड़े ज़्यादातर मामलों में बाइडन का रवैया मध्यमार्गी रहा है. इससे हो सकता है कि डेमोक्रेटिक पार्टी के बहुत से कार्यकर्ताओं में जोश न भरे. लेकिन, बाइडन को लगता है कि बीच का ये रवैया अपना कर वो उन मतदाताओं को अपनी ओर खींच सकते हैं, जो अभी ये फ़ैसला नहीं कर पाए हैं कि ट्रंप और उनके बीच, वो किसे चुनें.

और नवंबर में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान, उन्हें पसंद करने वालों को बहुत ज़ोर शोर से उनका साथ देने की ज़रूरत नहीं होगी. उन्हें बस बाइडन के हक़ में बिना कोई शोर गुल किए हुए, वोट डालना होगा.

 

Barack Obama and Joe Biden

 

सब कुछ या कुछ भी नहीं

चुनाव से पहले के तमाम सर्वे, व्हाइट हाउस की इस होड़ में जो बाइडन को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से पाँच से दस अंक आगे बताते रहे हैं. लेकिन, नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव अभी भी कई महीने दूर हैं. और तय है कि अभी आगे बाइडन के लिए कई सख़्त इम्तिहान बाक़ी हैं.

दोनों ही पार्टियों के प्रत्याशी पहले ही काले लोगों के ख़िलाफ़ पुलिस की हिंसा के विरोध में अमरीका में हो रहे विरोध प्रदर्शन को लेकर टकरा चुके हैं. इसके अलावा जिस तरह से अमरीकी सरकार ने कोरोना वायरस के संकट से निपटने की कोशिश की है, उसे लेकर भी ट्रंप और बाइडन में भिड़ंत हो चुकी है.

यहां तक कि फ़ेस मास्क भी ट्रंप और बाइडन के बीच सियासी झड़प का कारण बन चुके हैं. ऐसा लगता है कि जो बाइडन कई बार सार्वजनिक रूप से मास्क पहन कर दिखने के लिए ज़रूरत से ज़्यादा प्रयास करते हैं, वहीं, राष्ट्रपति ट्रंप, मास्क पहनने से बार-बार परहेज़ करते आए हैं.

लेकिन, कई बार इमेज चमकाने की इन छोटी मोटी कोशिशों से इतर राजनीतिक चुनाव प्रचार के प्रबंधन में कई बड़ी चीज़ें दांव पर लगी होती हैं.

अगर, जो बाइडन राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतते हैं, तो वो अपने लंबे और उतार चढ़ाव भरे राजनीतिक करियर के शिखर पर पहुंच जाएंगे. लेकिन, अगर वो चुनाव नहीं जीत पाते हैं, तो इससे वो व्यक्ति चार और वर्षों के लिए अमरीका का राष्ट्रपति बन जाएगा, जिसके बारे में बाइडन का कहना है कि, ‘उसमें अमरीका का राष्ट्रपति बनने की बिल्कुल भी क़ाबिलियत नहीं है. वो एक ऐसा इंसान है, जिस पर क़त्तई भरोसा नहीं किया जा सकता है.’

 

Joe Biden

 

आज से चार साल पहले, 2016 में जब जो बाइडन इस बात की दुविधा में थे कि राष्ट्रपति चुनाव की रेस में दाख़िल हों या नहीं, तब उन्होंने कहा था कि, ‘मैं इस बात की तसल्ली लेकर ख़ुशी से मर सकता हूं कि मैं राष्ट्रपति नहीं बन सका.’

लेकिन, अब बात इससे बहुत दूर तलक चली गई है.



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