Movie Review

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adminAugust 31, 20201min3940

1991 में संजय दत्त, पूजा भट्ट और सदाशिव अमरापुरकर को लीड रोल्स में लेकर एक फिल्म बनी थी. महेश भट्ट डायरेक्टेड इस फिल्म का नाम था ‘सड़क’. इस फिल्म की रिलीज़ के 29 साल बाद इसका सीक्वल आया है. ‘सड़क 2’ को किसी फिल्म के सीक्वल की बजाय स्टैंड अलोन फिल्म के तौर पर देखा जाना चाहिए. क्योंकि फिल्म में संजय दत्त के अलावा कोई पुराना कैरेक्टर नज़र नहीं आता. ना ही पिछली फिल्म का कोई हिस्सा या थॉट आपको इस फिल्म में देखने को मिलता है. मगर कहने को ये फिल्म अपनी 29 साल पुरानी कहानी को ही आगे बढ़ा रही है.

इस फिल्म की कहानी शुरू होती है रवि के सुसाइडल रवैए के साथ. अपनी पत्नी पूजा की मौत के बाद उसका जीवन से मन उठ गया है. वो मरकर पूजा के पास पहुंचना चाहता है. ठीक इसी समय में उसकी लाइफ और गैरेज में एंट्री मारती है आर्या. आर्या फर्जी बाबाओं के खिलाफ काम कर रही है. इसलिए एक बाबा उसकी जान के पीछे पड़ा है. आर्या ने तीन महीने पहले कैलाश जाने के लिए रवि की टैक्सी अडवांस में बुक की थी. अब जब कैलाश जाने का समय आया, तो रवि अपनी टैक्सी सर्विस बंद कर चुका है. जैसे-तैसे रवि, आर्या और उसके बॉयफ्रेंड विशाल को कैलाश ले जाने को तैयार हो जाता है. मगर बाबा के लोग रास्ते में कई बार आर्या पर अटैक करते हैं. ये सब देखकर रवि के भीतर का पिता जाग जाता है और वो आर्या को इन सब लोगों से बचाकर सुरक्षित कैलाश पहुंचाना चाहता है. लेकिन ये कहानी सिर्फ इतनी ही नहीं है. इस फिल्म के रास्ते में भी कई टर्न एंड ट्विस्ट आते हैं, मगर वो इसे कहीं पहुंचने नहीं देते.

 

फर्जी बाबा की बड़ी सी होर्डिंग जलाकर उनके भक्तों के सामने अपने इरादे साफ करती आर्या.

 

‘सड़क 2’ बड़ी विचित्र फिल्म है. इसमें संजय दत्त ने रवि, आलिया ने आर्या, आदित्य रॉय कपूर ने विशाल और मकरंद देशपांडे ने फर्जी बाबा का रोल किया है. साथ में जिशू सेनगुप्ता और गुलशन ग्रोवर जैसे एक्टर्स भी हैं. अगर आदित्य को छोड़ दें, तो जिसे भी मौका मिला है, सभी एक्टर्स ने बढ़िया काम किया है. खासकर जिशू सेनगुप्ता ने. लेकिन दिक्कत ये है कि फिल्म में कोई भी कैरेक्टर ढंग से गढ़ा हुआ नहीं है. मुख्य किरदारों को बैकस्टोरी के तौर पर मानसिक विकार दे दिया गया है. किसी की फैमिली उसे पागल साबित करना चाहती है, तो कोई अपनी गुज़र चुकी प्रेमिका से बात करता है. कोई भी, कभी भी, कहीं से भी आ रहा है और कहानी का हिस्सा बनने की कोशिश करने लग रहा है. इससे पहले कि आप उस किरदार को गंभीरता से लें वो गायब हो चुका होता है या पीछे छूट चुका होता है. थोड़े समय में इतने सारे कैरेक्टर्स आ जाते हैं कि आप फिल्म में इंट्रेस्ट खो देते हैं. क्योंकि ये धागे जुड़कर भी कहानी को बांध नहीं पाते. भयानक तरीके का बिखराव और अनमनापन है.

 

संजय दत्त की उन चुनिंदा फिल्मों से जिनमें उन्होंने परफॉर्म किया है. काफी बैलेंस्ड परफॉरमेंस, फिल्म का लेखन जिस पर पानी फेरने का काम करता है.

 

फिल्म की सबसे बड़ी समस्या है इसका टाइम मैनेजमेंट. जब रवि, आर्या और विशाल की कैलाश यात्रा शुरू होती है, तब तक फिल्म के 48 मिनट निकल चुके होते हैं. और आप अब भी प्रॉपर तरीके से फिल्म के शुरू होने का इंतज़ार ही कर रहे हैं. इसलिए फिल्म में आगे जो भी घटता है, वो फास्ट फॉरवर्ड मोड में होता है और उसे कोई कनेक्शन नहीं बन पाता. इस झोल में फिल्म की बुरी एडिटिंग का सबसे बड़ा हाथा लगता है. अगर आप ये समझने की कोशिश करें कि फिल्म क्या कहना चाहती है? तो आपको दो चीज़ें मिलती हैं. पहली, फर्जी बाबा लोग पब्लिक के लिए खतरनाक होते हैं. दूसरी, फादरहुड यानी पितृत्व. मगर दोनों में से कोई भी चीज़ इतनी मजबूती से आपके सामने नहीं रखी जाती कि आप कुछ महसूस कर पाएं. कोई मैसेज क्लीयर तरीके से जनता तक पहुंचाने में ये फिल्म सफल नहीं हो पाती.

 

आदित्य रॉय कपूर, इस कमज़ोर फिल्म की सबसे कमज़ोर कड़ी. इनकी एक छिछली सी बैकस्टोरी है, जो फिल्म में कुछ भी नहीं जोड़ती.

 

जब आप इस फिल्म को समझने की कोशिश कर रहे होते हैं, तब फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर आपका ध्यान भटकाने के काम आता है. वो म्यूज़िक इतना लाउड है कि फिल्म देखने के अनुभव में खलल पैदा करता है. क्योंकि वो उस सिचुएशन को मैच नहीं कर रहा है, जिसके लिए उसका इस्तेमाल हो रहा है. यही चीज़ फिल्म के गानों के साथ भी होती है. भट्ट कैंप की फिल्में अपने गानों के बूते पहचान बनाने के लिए जानी जाती रही हैं. यहां भी आपको ‘तुम से ही’ और ‘इश्क कमाल’ जैसे सुंदर गाने सुनने को मिलते हैं लेकिन फिल्म के साथ उन गानों का कोई तालमेल नहीं है.

 


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adminJuly 31, 20202min4500

‘हासिल’ और ‘पान सिंह तोमर’ जैसी फिल्में बना चुके तिग्मांशु धूलिया की नई फिल्म ‘यारा’ ज़ी5 पर रिलीज़ हो चुकी है. फिल्म की कहानी चार अनाथ बच्चों की है, जो स्मगलिंग करते हुए बड़े होते हैं. इनमें से दो बच्चों की बैकस्टोरी फिल्म दिखाती है और बाकी दो स्मगलिंग में कैसे आए ये आपके लिए गेस करने को छोड़ देती है. खैर, ये चारों लड़के फागुन, मितवा, रिज़वान और बहादुर बड़े होने के बाद भी तकरीबन हर इल्लीगल काम कर रहे हैं. इसी सब के बीच फागुन को सुकन्या नाम की नक्सली लड़की से प्यार हो जाता है. वो सुकन्या की मदद करने के लिए अपने गैंग के साथ आउट ऑफ द वे जाकर सबके रस्ते लगा देता है. चारों को पुलिस नक्सली मानकर धर लेती है. पुराने कुकर्मों की सज़ा के तौर पर उन्हें लंबा समय जेल में गुज़ारना पड़ता है. लेकिन गेम ये है कि पुलिस को नक्सलियों के बारे में खबर कहां से लगी? इसके पीछे किसका हाथ था? ये पूरी फिल्म इसी शक की सूई के इर्द-गिर्द घूमती है. और जब खत्म होती है, तो आपकी शक्ल पर 12 बज रहे होते हैं.

 

बचपन से साथ पले ये चारों लड़के बड़े होने के बाद भी हर तरह का इल्लीगल काम करते हैं.

 

फिल्म में विद्युत जामवाल ने फागुन यानी फिल्म के हीरो का रोल किया है. विद्युत गदर एक्शन करते हैं. उनकी बॉडी भी कतई जबरदस्त है. स्माइल भी एकदम किलर. लेकिन उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं आता. फिल्म के अति-इमोशनल सीन्स में उन्हें देखकर घोर निराशा होती है. मितवा के किरदार में दिखे हैं अमित साध. अभी-अभी ‘ब्रीद’ में एक डार्क कैरेक्टर में नज़र आए थे. यहां भी कमोबेश उनका मामला सेम है. लेकिन जब ‘यारा’ की अच्छी बातों का ज़िक्र होगा, तो उसमें उनकी सधी हुई परफॉरमेंस भी शामिल रहेगी. रिज़वान के रोल में हैं विजय वर्मा. विजय की सबसे शानदार बात ये है कि वो अपने कैरेक्टर को हीरो वाले अंदाज़ में अप्रोच करते हैं. सेकंड लीड या सपोर्टिंग हीरो की तरह नहीं. वो हीरो के पीछे आउट ऑफ फोकस भी हैं, तो अपना कुछ कर रहे हैं. लेकिन इस फिल्म में उनका कैरेक्टर बड़ा दिशाहीन है. कहां से आया है, कहां को जाएगा. किसी को नहीं पता. केनी बासुमत्री ने चौथे दोस्त बहादुर का किरदार निभाया है. उनका रोल ज़्यादा लंबा नहीं है लेकिन बड़ा स्थिर है. फिल्म का ब्रीदर. मसला है श्रुति हासन का. उन्हें फिल्म में एक इंडीपेंडेंट महिला के तौर पर दिखाया गया है, जो आयरनी से भरा हुआ है. फिल्म में वो सिर्फ इसलिए हैं, ताकि फागुन के साथ चार रोमैंटिक गाने में डांस कर सकें. उस किरदार के साथ जो हादसा होता है, वो ‘राम तेरी गंगा मैली’ वाले ज़माने की बात है. फाइनली सुकन्या का किरदार दया का पात्रभर बनकर रह जाता है.

 

पिच्चर के हीरो विद्ययुत जामवाल.

 

‘यारा’ एक पीरियड फिल्म है, जो नॉन-लीनियर फॉरमैट में बनाई गई है. नॉन-लीनियर मतलब ग़ैर-धाराप्रवाह. जैसे ‘रॉकस्टार’ है. ये चीज़ इस फिल्म को कंफ्यूज़िंग बना देती है. लेकिन फ्लैशबैक वाले हर साल को जिस तरह से देश के किसी बड़े इवेंट से जोड़कर ह्यूमनाइज़ किया गया है, उससे समय और दौर का सही अंदाज़ा लगता है. ये छोटी डिटेल्स हैं, जो कॉन्टेंट को रिच बनाने में मदद करती हैं.

 

ये फिल्म किरदारों के बुढ़ापे से शुरू होती है और फिर बचपन से लेकर उनके अब तक के सफर को टटोलती है. फिल्म के एक सीन में बूढ़ा मितवा यानी अमित साध.

 

तिग्मांशु को लोकल पॉलिटिक्स का चस्का है, उनकी हर फिल्म में वो एक किरदार के रूप में देखने को मिलता है. और वो इवेंट्स बड़े जमीनी होते हैं, जिसे समझने में ज़्यादा दिमाग नहीं खपाना पड़ता. इस फिल्म में भी नक्सलियों और नक्सल मूवमेंट की बात आती है. लगता है कुछ बड़ा होने वाला है. लेकिन अगले कुछ मिनटों में रिलयलाइज़ होता है कि ज़िक्र आ गया यही बहुत बड़ी बात थी. उस मूवमेंट का क्या हुआ, इस बारे में फिल्म में आगे कहीं कोई बात नहीं होती. इन वजहों से धीरे-धीरे आपका इंट्रेस्ट फिल्म में कम होना शुरू हो जाता है.

 

‘गली बॉय’ से पब्लिक की नज़र में आने के बाद से ये आदमी फुल ऑन मचा रहा है. रिज़वान के किरदार में विजय वर्मा. इस फिल्म में लेजिट बच्चन भक्त बने हैं. 

 

अपने नाम को चरितार्थ करती हुई ‘यारा’ पूरे टाइम चारों दोस्तों के आसपास चक्कर काटती रहती है. इस दौरान कई ऐसी घटनाएं या मोमेंट्स आते हैं, जो बड़े मज़ेदार लगते हैं. लेकिन वो इतने बिखरे हुए कि फिल्म के काम नहीं आ पाते. फिल्म में एक्टर्स के दो लुक हैं. जवानी और बुढ़ापे का. जैसे नितेश तिवारी ‘छिछोरे’ में था. ‘छिछोरे’ में एक्टर्स का बुढ़ापे वाला लुक फिल्म की सबसे ज़्यादा खलने वाली चीज़ थी. लेकिन यहां एक्टर्स का लुक फिल्म की उन चुनिंदा बातों में से है, जिन्हें अच्छा कहा जा सकता है. ‘यारा’ में बहुत सारे गाने हैं, लेकिन उन्हें दोबारा सुनने या याद रख लेने की इच्छा नहीं होती.

 

फिल्म के एक सीन में चारों दोस्त. फागुन, मितवा, रिज़वान और बहादुर.

 

किसी फिल्म को देखने के बाद दिमाग में सबसे पहला सवाल क्या आता है? यही न कि फिल्म कहना क्या चाहती थी. वहां ‘यारा’ की बोलती बंद हो जाती है. क्योंकि एक रेगुलर कॉमर्शियल सिनेमा होने के अलावा इसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है. ना ये किसी थॉट को आगे ले जाती है, ना सिनेमा को. ‘यारा’ धोखे की कहानी है. दो धोखों की. पहली फिल्म में होती है, दूसरी फिल्म देखने वाले के साथ. इस फिल्म से तिग्मांशु अपने ज़ोन में रहते हुए खुद को री-इन्वेंट करने की कोशिश की है. लेकिन उनकी ये कोशिश सिर्फ एक सीख बनकर जाएगी कि क्या नहीं करना चाहिए था. अगर आप एक लाइन में जानने चाहते हैं कि क्या ये फिल्म आपसे ज़ी5 का सब्सक्रिप्शन खरीदवाने का माद्दा रखती है, तो जवाब है- ना.


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adminJuly 27, 20202min4050

सुशांत सिंह राजपूत की आखिरी फिल्म ‘दिल बेचारा’ देख ली गई है. स्ट्रीमिंग प्लैटफॉर्म डिज़्नी+हॉटस्टार पर ये फिल्म फ्री में अवेलेबल है, जिसे बिना किसी सब्सक्रिप्शन के देखा जा सकता है. फिल्म के बारे में बाकी बातें डिसक्लेमर से शुरू करते हैं. आगे हम जो भी कहेंगे, वो सुशांत सिंह राजपूत के बारे में नहीं उनकी फिल्म ‘दिल बेचारा’ के बारे में होगा.

‘दिल बेचारा’ के रिव्यू नहीं लिखे जाएंगे, उसे देखने का अनुभव शेयर किया जाएगा. जिसे शॉर्ट में समेटना चाहें, तो हार्टब्रेकिंग कह सकते हैं.

 

 

जमशेदपुर में किज़ी बासु नाम की एक लड़की रहती है, जिसे थायरॉयड कैंसर है. हर जगह वो अपने साथ ऑक्सीजन सिलिंडर लेकर घूमती है. उसे पता है कि उसके पास ज़्यादा समय नहीं है, इसलिए वो बस अपने दिन गिन रही है. ठीक इसी समय उसकी लाइफ में मुस्कुराता हुआ इमैनुएल राजकुमार जूनियर उर्फ मैनी एंट्री मारता है. मैनी को ऑस्टियोसारकोमा (एक किस्म का बोन कैंसर) था, जिसके ऑपरेशन के बाद वो अपना सपना खो चुका है. लेकिन उसकी खुशमिजाजी कहीं नहीं गई. दिल के सहारे किस्मत से हारे ये दो लोग मिलते हैं और प्यार में पड़ जाते हैं. दोनों को पता है कि उनकी लाइफ लंबी नहीं है, इसलिए वो उसे बड़ी बनाने में लग जाते हैं. इन खुशियों के बीच एक अनकहा सा दुख भी है कि कैंसर किसकी जान पहले लेता है. अगर आपने जॉन ग्रीन की नॉवल ‘द फॉल्ट इन आवर स्टार्स’ या उस पर बेस्ड उसी नाम से बनी हॉलीवुड फिल्म देखी है, तो आपको इस सवाल का जवाब और फिल्म का क्लाइमैक्स दोनों ही पता होगा.

 

अपना सपना छोड़ किज़ी के ख्वाब पूरे करने में लगा मैनी.

फिल्म में सुशांत ने मैनी का रोल किया है. सुशांत सिंह राजपूत हमेशा से मजबूत कैलिबर वाले एक्टर माने जाते रहे हैं. मानव से लेकर मैनी तक वो अपनी इसी इमेज को बरकरार रखे हुए हैं. लेकिन ये फिल्म उनके टैलेंट के साथ न्याय नहीं कर पाती. संजना सांघी किज़ी के किरदार में नज़र आई हैं. सुशांत की आखिरी फिल्म, संजना की पहली है. उनकी परफॉरमेंस बड़ी सटल (Subtle) है. किज़ी के कैरेक्टर के साथ कनेक्शन बनाने में आपको समय नहीं लगता. क्योंकि संजना आपको अपने आसपास नज़र आने वाली किसी आम लड़की की तरह लगती हैं. मैनी के दोस्त जेपी के रोल में हैं साहिल वैद. उस किरदार का कोई ओर-छोर नहीं है. बेसिकली वो हीरो का रेगुलर दोस्त है, जो दो-तीन लाफ्स पाने के लिए कुछ भी करता है. पिछली लाइन में ‘कुछ भी’ पर खास जोर दिया जाए. ‘पाताल लोक’ में दिखीं स्वास्तिका मुखर्जी ने फिल्म में किज़ी की मां का रोल किया है. उनके पास बहुत कुछ करने को नहीं है लेकिन उस किरदार के साथ स्वास्तिका ने जो किया है, वो फिल्म का मेरा सबसे पसंदीदा पार्ट है. ‘दिल बेचारा’ में सैफ अली खान ने गेस्ट अपीयरेंस किया है. उसके बारे में सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि वो ‘डॉली की डोली’ वाले उनके पिछले कैमियो से कहीं बेहतर है. मतलब 1 मिनट की सीन में भी फट पड़ना कोई सैफ से सीखे.

 

अपनी आखिरी फिल्म के सबसे शानदार हिस्से में सुशांत सिंह राजपूत.

सुशांत के अलावा फिल्म की सबसे अच्छी बात है उसके तीनों लीड कैरेक्टर्स का पोट्रेयल. किज़ी, मैनी और जेपी तीनों शारीरिक रूप से बीमार लोग हैं. लेकिन उन्हें बीमार की तरह या नॉर्मल से अलग दिखाने की कोशिश नहीं की गई है. ये छोटी चीज़ें फिल्म की पॉज़िटिविटी में इज़ाफा करती हैं. फिल्म के अलग-अलग हिस्सों में कुछ सीन्स हैं, जो इसे डल या बोरिंग होने से बचाए रखते हैं. ए.आर. रहमान का म्यूज़िक अलग से सुनने में कुछ खास नहीं लगता लेकिन वो फिल्म का मूड सेट करने के काम आता है. खासकर टाइटल ट्रैक और तारे गिन. इन दोनों ही गानों के बोल अमिताभ भट्टाचार्य ने लिखे हैं.

 

मैनी सेे अपनी मुलाकात के दौरान किज़ी.  

 

‘दिल बेचारा’ क्लाइमैक्स तक पहुंचते-पहुंचते काफी ड्रमैटिक और फिल्मी हो जाती है. साफ दिखने लगता है कि आपको जान-बूझकर इमोशनल करने की कोशिश की जा रही है. लेकिन इसका सुशांत की डेथ से कोई लेना-देना नहीं है. क्योंकि ये फिल्म उससे काफी पहले बनकर तैयार हो चुकी थी. बस वो सिनेमैटिक टूल्स के शोषण जैसा लगता है. फिल्म के कुछ हिस्सों में आंखें भर जाती हैं फफक पड़ने का भी मन करता है. लेकिन वो मोमेंट्स फिल्म आपके लिए नहीं बुनती. एक गुज़र चुके एक्टर को आखिरी फिल्म में अपनी मौत की बातें करते सुनना अपने आप में काफी डिप्रेसिंग चीज़ है.

 

स्वास्तिका और सुशांत इससे पहले दिबाकर बैनर्जी डायरेक्टेड फिल्म ‘डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी’ में भी साथ काम कर चुके हैं.

 

सुशांत के लिए ये फिल्म भले ही बड़ी संख्या में देखी जाए लेकिन मुकेश छाबड़ा की बतौर डायरेक्टर पहली फिल्म ‘दिल बेचारा’ औसत ट्रैजिक-रोमैंटिक फिल्म से ऊपर नहीं उठ पाती. ‘फॉल्ट इन आवर स्टार्स’ स्वीट फिल्म भले ही थी लेकिन उसे कभी बहुत शानदार फिल्म के लिए रूप में नहीं देखा गया. सुशांत के लिए सबसे बड़ा ट्रिब्यूट यही होगा कि ‘दिल बेचारा’ को एक आम फिल्म की तरह देखा जाए. सुशांत की आखिर फिल्म की तरह नहीं.


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adminJune 23, 20202min2630

साल 2010 में फिल्म ‘नो प्रॉब्लम’ में नज़र आने के 10 साल बाद सुष्मिता सेन फिर से किसी हिंदी प्रोजेक्ट में नज़र आई हैं. लीड रोल में सुष्मिता और चंद्रचूड़ सिंह के साथ ‘आर्या’ नाम की वेब सीरीज डिज्नी+हॉटस्टार पर रिलीज हो चुकी है. शुक्रवार, 19 जून को.

 

क्या है ‘आर्या’ की कहानी?

जयपुर का एक दबंग परिवार है, जिसका बहुत बड़ा बिजनेस है. फार्मास्यूटिकल कंपनी के मालिक हैं ये लोग. लेकिन ये सिर्फ एक बहाना है. इसके पीछे एक बहुत बड़ा ड्रग बिजनेस चल रहा है. कंपनी के मालिक हैं जोरावर राठौर (जयंत कृपलानी). इनकी पत्नी हैं राजेश्वरी (सोहैला कपूर), उनके तीन बच्चे हैं – सबसे बड़ी- आर्या (सुष्मिता सेन). बेटा संग्राम (अंकुर भाटिया). और सबसे छोटी बेटी सौंदर्या (प्रियाशा भारद्वाज). आर्या अपनी शादी के बाद से ही फैमिली बिजनेस से निकल चुकी है. लेकिन जोरावर राठौर को पैरालिसिस का अटैक आने के बाद से आर्या के पति तेज सरीन (चंद्रचूड़ सिंह) संग्राम के साथ मिलकर बिजनेस संभाल रहे हैं. इसमें उनकी मदद करता है जवाहर (नमित दास). सरीन और राठौर परिवार को प्रोटेक्शन देने वाला और उनके काम में हाथ बंटाने वाला है दौलत (सिकंदर खेर).

 

आर्या और सौंदर्या इस ‘बिजनेस’ से दूर ही रहते हैं. लेकिन तेज, संग्राम और जवाहर एक बड़े मसले में फंस जाते हैं. उनकी जान खतरे में पड़ जाती है. अब वो मसला क्या है, ये जानने के लिए आपको सीरीज देखनी पड़ेगी. लेकिन होता ये है कि सरेआम तेज सरीन को गोली मार दी जाती है. इस वजह से तेज, संग्राम और जवाहर के ऊपर तलवार लटक रही होती है. वो मसला अब पूरी तरह से सरीन परिवार और उसके आस-पास फ़ैल जाता है. बारिश के बादल की तरह. अब इस सिचुएशन से आर्या कैसे डील करती है, क्या वो अपने परिवार को बचाने में सफल होती है, ये सब आने वाले एपिसोड्स में साफ़ होता है. 17 साल पहले ड्रग्स बिजनेस को तिलांजलि दे देने वाली आर्या राठौर, क्या अपने पुराने रूप में वापस आएगी? क्या मामले की जांच करता नारकोटिक्स डिपार्टमेंट का ACP खान (विकास कुमार) कोई सुराग ढूंढ पायेगा?

 

आर्या सरीन और उनके तीनों बच्चे. (तस्वीर साभार: डिज्नी + हॉटस्टार)

 

कैसी है परफॉर्मेंस?

आर्या सरीन के रोल में सुष्मिता बेहद कंट्रोल में दिखाई देती हैं. कई ऐसे सीन हैं, जहां पर सुष्मिता सेन को अपने-आप को संभालना है, क्योंकि वो अपने बच्चों के सामने आपा नहीं खो सकतीं. उनके तीन बच्चे, जिनमें से दो टीनेजर हैं, वो भी काफी नेचुरल लगे हैं सीरीज में. चाहे वो सबसे बड़ा बेटा वीर (वीरेन वज़ीरानी) हो, बेटी अरु (अरुंधती- वीर्ति वघानी) हो, या आदी (आदित्य- प्रत्यक्ष पंवार), तीनों अपने किरदार से कहीं भी बाहर आते हुए नहीं दिखते. इमोशनल सीन्स के दौरान आर्या अपने बच्चों को बच्चा कहते हुए बुलाती हैं और वो सीन्स बेहद अच्छे बन पड़े हैं.

तेज सरीन के किरदार में चंद्रचूड़ सिंह बड़े दिनों बाद स्क्रीन पर दिखे. माचिस और दाग वाले दिन याद आ गए उन्हें देखकर. और उनका पुराने गानों के लिए प्यार. जब भी स्क्रीन पर ‘बड़े अच्छे लगते हैं’ प्ले होगा, आपको भी तेज की याद आएगी. उन्होंने कुछ ऐसा बांधा है.

 

कुछ लोग तो सीरीज देखने के बाद ये भी कह रहे हैं कि शशि थरूर के ऊपर अगर कोई फिल्म बनी तो उसमें थरूर का किरदार चंद्रचूड़ सिंह को ही निभाना चाहिए. 

 

सिकंदर खेर पर दौलत जैसे रोल सूट करते हैं. गंभीर, ज्यादा न बोलने वाला, काम से काम रखने वाला नो नॉनसेंस कैरेक्टर. वही आर्या को मोटिवेट भी करता है कि सिचुएशन को अपने हाथों में ले.

ACP खान को देखते हुए कहीं-कहीं आपको कहानी फिल्म के DIG खान की याद आएगी. मैनेरिज्म से लेकर एटीट्यूड तक. सब कुछ उनकी याद दिलाता हुआ सा लगता है. लेकिन सबसे तगड़े सीन्स में वो संभाल ले जाते हैं खुद को. और यही उनकी यूनिक बात है.

एक बड़ा बिजनेस. जिसका ड्रग का व्यापार नारकोटिक्स वालों को भी खींच ला रहा है. बार-बार घर की तलाशी हो रही है. ऐसे में आर्या अपने बच्चों को इस ट्रॉमा से कैसे बचाती है. कैसे पता लगाती है कि तेज को किसने मारा. और इस पूरे सफ़र में किस-किस को खो देती है. ये सब कुछ कवर करती है ये सीरीज.

 

एक पल में जो हितैषी है, अगले पल उसे पाला बदलते देर नहीं लगती. (तस्वीर साभार: डिज्नी + हॉटस्टार)

 

टांका कहां फंसता है?

सीरीज कहीं-कहीं पर चीज़ें दोहराती हुई सी लगती है. हो सकता है ये डायरेक्टर ने एम्फेसिस देने के लिए किया हो, लेकिन फिर भी ये आउट ऑफ़ प्लेस लगता है. कहीं पर सीरीज बहुत स्लो होती हुई लगती है. लगता है बस इसे खींचने के लिए खींचा जा रहा है, वरना कब की खत्म हो जाती. लेकिन ऐसे पल बहुत कम हैं. यही वजह है कि सीरीज पूरी देखने का इंटरेस्ट बना रहता है. कहीं-कहीं पर डबिंग खलती है शुरुआत में. लेकिन इसे नज़रंदाज़ किया जा सकता है, क्योंकि सीरीज का पोस्ट प्रोडक्शन लॉकडाउन के समय किया गया. लोगों की टीम अपने-अपने घरों में बैठ कर काम कर रही थी.

कई तार हैं, जो कई जगहों से जुड़े हैं. किसी पर भी भरोसा करना अपनी मौत को दावत देना है. बार-बार एपिसोड में रेफरेंस सुनने को मिलता है कि 17 साल पहले वाली आर्या कुछ और थी. इससे हिंट मिलता है कि आर्या की शादी से पहले की जिंदगी बहुत इंटरेस्टिंग थी. ड्रग्स के बिजनेस में उसका रुतबा था. लेकिन उसने परिवार के लिए सब कुछ छोड़ दिया. अब उसके पति की मौत ने उसे जबरन उसी बिजनेस में ला धकेला है. सीरीज जहां पर एंड होती है, वहां इस बात की पूरी गुंजाइश दिखाई देती है कि एक और सीज़न आएगा.

सुष्मिता सेन अपने किरदार में काफी कन्विंसिंग लगी हैं. (तस्वीर साभार: डिज्नी + हॉटस्टार)

और हो सकता है आए भी. जिस डच टीवी शो का ये रीमेक बताया जा रहा है, पेनोज़ा, उसके भी पांच सीजन आ चुके हैं. इसी डच सीरीज पर अमेरिका में भी एक टीवी शो बन चुका है रेड विडो (लाल विधवा) के नाम से. लेकिन वो एक सीजन के बाद कैंसिल कर दिया गया था.

 

देखें तो किसलिए?

इस सीरीज की ख़ास बात ये लगती है कि इसके कैरेक्टर्स चाहे एक छोटे रोल में ही क्यों न हों, उन्हें अपनी साइड एस्टेब्लिश करने का मौका मिलता है. चाहे वो संग्राम की पत्नी हिना (सुगंध गर्ग) हो या फिर जवाहर की पत्नी माया (माया सराव). ड्रग्स बिजनेस का डॉन शेखावत (मनीष चौधरी) हो या उसका गुर्गा संपत (विश्वजीत प्रधान). आम तौर पर थ्रिलर कहानियों में एक विलेन होता है. एक हीरो होता है. कुछ लोग इस तरफ होते हैं, कुछ लोग उस तरफ. ‘आर्या’ देखते हुए वो लाइन ब्लर हो जाती है. जो कि एक बहुत इंटरेस्टिंग टेक है.

सीरीज को लिखा है अनु सिंह चौधरी और संदीप श्रीवास्तव ने. डायरेक्शन है राम माधवानी (नीरजा फेम), संदीप मोदी और विनोद रावत ने. इसे आप डिज्नी प्लस हॉटस्टार पर देख सकते हैं.


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adminJune 13, 20202min4420

ये कहानी है लखनऊ में फ़ातिमा महल नाम की हवेली में रहने वाले मिर्ज़ा चुन्नन नवाब की. 78 साल के बुजुर्ग. हवेली उनकी बेगम के नाम है. फत्तो बी. जो उनसे 17 साल बड़ी हैं. ये हवेली जर्जर हालत में. ईंटे भुरभुरा रही हैं. रेलिंग टूट चुकी हैं. तीन-चार परिवार यहां किराए पर रहते हैं. बहुत कम किराया देते हैं. इनमें सबसे कम किराया देता है बांके. जो अपनी तीन बहनों और मां के साथ रहता है. आटा चक्की चलाता है. बांके सिर्फ 30 रुपये महीना किराया देता है. तीन महीने से तो दिया भी नहीं है.

मिर्ज़ा ज़रा लालची इंसान हैं. पैसे की किल्लत है तो कंजूसी आ ही जाती है. वो बांके से बार बार कहते हैं कि वो किराया बढ़ा दे या घर खाली कर दे. बांके कहता है – “जित्ता दे रहे हैं उत्ता ही ले लो वरना ये भी नहीं देंगे और मकान भी खाली नहीं करेंगे”.

 

बाइक लेकर आटा चक्की जा रहे बांके का रास्ता रोकते मिर्ज़ा, किराए का तकादा करते हुए. (फोटोः Amazon Prime video)

 

मिर्ज़ा हवेली खाली कराने या किराया बढ़वाने के लिए तरह तरह की हरकतें करते हैं. बल्ब निकाल लेते हैं, साइकल की घंटियां निकाल लेते हैं, रात में बिजली काट देते है, लेट्रीन यानी पाख़ाने के ताला लगाकर आगे चारपाई डालकर सो जाते हैं. लेकिन बांके भी जिद्दी है, वो भिड़ा रहता है. मिर्ज़ा को ‘तू’, ‘बुढ़ऊ’, ‘छछुंदर’ कहकर ही संबोधित करता है. इनकी ये तकरार आगे क्या ग़ुल खिलाती है ये फिल्म में दिखता है.

‘गुलाबो सिताबो’ को शुजीत सरकार ने डायरेक्ट किया है. जिन्होंने विकी डोनर, पीकू, अक्टूबर जैसी फिल्में डायरेक्ट की हैं. वे ऋषिकेश मुखर्जी वाली धारा के फिल्ममेकर हैं. उनकी ये सब फिल्में लिखने वाली जूही चतुर्वेदी ने गुलाबो सिताबो भी लिखी है. स्टोरी, स्क्रीनप्ले, डायलॉग तीनों. जूही के लिखे कुछ डायलॉग अच्छे हैं. जैसे –

 

1. बांके का अपनी बहनों से कहना – 

“तुम लोग एक साल में चार साल कैसे बड़ी हो जाती हो, थोड़ा वक्त तो दो पैसा जमा करने के लिए”. ये वो तब बोलता है जब उसे बहनें बताती हैं कि वे काफी आगे की कक्षाओं में आ चुकी हैं और दद्दा को पता भी नहीं होता.

 

2. फत्तो बी का शहदभीगी आवाज़ में कहना – 

“अरे बल्ब नहीं चोरी हुआ, निगोड़ी जयदाद चोरी हो गई”. वो ये तब बोलती हैं जब बांके शिकायत करता है कि रात को किसी ने यानी मिर्ज़ा ने बल्ब चुरा लिए.

 

3. बांके-मिर्ज़ा का संवाद. जब बांके उन्हें लालची कहता है तो मिर्ज़ा बोलते हैं – 

“अव्वल तो ये कि हमने आज तक सुना नहीं है कि कोई लालच से मरा हो. और दूसरा, ये कि हम लालची हैं ही नहीं. हवेली का लालच नहीं है, उल्फत है, मुहब्बत है, हवेली से. बेइंतहा.”

 

4. सबसे फनी डायलॉग और सीन वो लगता जब मिर्ज़ा अपनी बीवी के रिश्तेदार से मिलने जाते हैं और वो रिश्तेदार कहता है – 

“फत्तू बी अभी भी ज़िंदा है?” इस पर सपाट चेहरे और भोलेपन के साथ मिर्ज़ा कहते हैं – “मर ही नहीं रहीं.”

 

कुछ बेदम डायलॉग भी हैं. जैसे, जब बांके आसिफुदौला की कहानी सुनाता है जिन्होंने फैज़ाबाद से आकर लखनऊ शहर को बनाया. वो तीन-चार लाइन का संवाद कोई असर नहीं छोड़ता.

फिल्म के एक्टर्स की बात करें तो मिर्ज़ा का रोल अमिताभ बच्चन ने किया है. उनका प्रोस्थेटिक मेकअप और घुटने झुकाकर चलना पूरी फिल्म में आकर्षण का केंद्र होता है. आयुष्मान ख़ुराना ने बांके का रोल किया है. वे अपने कैरेक्टर की जीभ को एक लिस्प यानी तुतलाहट देते हैं, जैसे 3 ईडियट्स में वीरू सहस्त्रबुद्धे के किरदार की होती है. अटल बिहारी वाजपेयी जैसी. लेकिन ये लिस्प ढंग से विकसित नहीं होती. उनके लखनवी लहज़े की भी कोई खास पहचान या distinctness नहीं है.

विजय राज ने पुरातत्व विभाग में काम करने वाले शुक्ला का रोल किया है. बृजेंद्र काला ने वकील क्रिस्टोफर क्लार्क का, जो मकान खाली करवाता है किराएदारों से.

 

शुक्ला बने विजय राज और वकील के रोल में बृजेंद्र काला.

चार महिला किरदार और उन्हें करने वाली एक्ट्रेस ख़ास याद रहती हैं.

फत्तो बी का रोल करने वाली फारुख़ ज़फर. जिन्हें हम स्वदेश और पीपली लाइव में देख चुके हैं.

बांके की मां का रोल करने वाली एक्ट्रेस.

बांके की बहन गुड्डो का रोल करने वाली सृष्टि श्रीवास्तव.

और फातिमा महल में ही रहने वाली एक महिला जो पूरा झुककर चलती हैं, जिनका बोला समझ नहीं आता. ये पात्र मुझे पाथेर पांचाली की बुजुर्ग महिला इंदीर ठकुराइन की याद दिला गया जो रोल देखते हुए लगा था कि किसी नॉन एक्टर ने किया होगा लेकिन असल में वो पेशेवर एक्ट्रेस चुनीबाला देवी थीं.

 

शुजीत की फिल्म का किरदार, सत्यजीत राय की फिल्म में उस बुजुर्ग का किरदार.

 

गुलाबो सिताबो की सिनेमैटोग्राफी यानी कैमरे का काम अवीक मुखोपाध्याय ने किया है. उन्होंने बंगाली फिल्में ज्यादा की हैं और कुछ हिंदी – जैसे, पिंक, अक्टूबर, बदला, चोखेर बाली, अंतहीन, राजकाहिनी. एडिटिंग चंद्रशेखर प्रजापति की है. वे 2005 में आई फिल्म ‘यहां’ से लेकर गुलाबो सिताबो तक शुजीत की सब फिल्मों के एडिटर रहे हैं. बरेली की बर्फी, निल बटे सन्नाटा की एडिटिंग भी की.

प्रोस्थेटिक्स और मेकअप पिया कॉर्नीलियस का है. वे स्वीडन की हैं. इस फिल्म में मिर्ज़ा के किरदार के लिए बच्चन का प्रोस्थेटिक्स उन्होंने किया है. वे शूजीत की अक्टूबर और शूबाइट भी कर चुकी हैं. शूबाइट में अमिताभ का प्रोस्थेटिक्स भी ऐसा ही आकर्षक था. वो फिल्म बरसों से अटकी हुई है. गुलाबो सिताबो का प्रोडक्शन डिजाइन, आर्ट डायरेक्शन, कॉस्ट्यूम और मेकअप इसकी सबसे आकर्षक चीजों में है.

 

फ़िल्म को देखने की ओवरऑल फीलिंग, विचार कुछ यूं हैं –

1. गुलाबो सिताबो खुलती है इन नामों वाली दो कठपुतलियों के खेल से. कठपुतली वाला कहता है कि वे दोनों बहुत लड़ती हैं. थोड़ा आगे बढ़ते हैं तो बांके की सबसे छोटी बहन टीवी पर टॉम एंड जैरी का कार्टून देख रही होती है. इन दो संकेतों से फिल्म स्पष्ट कर देती है कि वो ऐसे ही लड़ने वाले मिर्ज़ा और बांके की कहानी सुनाने वाली है. कुछ कुछ स्टूज ब्रदर्स, लॉरेल हार्डी वाली लाइन पर. चूहे बिल्ली का वो खेल जो हमने दूल्हे राजा के सिंघानिया और राजा के बीच देखा है या, हाफ टिकट में किशोर कुमार और प्राण के किरदारों के बीच देखा है.

लेकिन कहानी जिस फिजिकल कॉमेडी, ठहाकों या गुदगुदी के इर्द-गिर्द हमें निमंत्रित करती है, उसमें लंबे समय तक मिर्ज़ा़, बांके की किसी बात से हंसी नहीं आती.

2. फिल्म वादा करके भी नहीं हंसा पाती तो ये कोई बुरी बात नहीं. एक फिल्म से सिर्फ एंटरटेनमेंट चाहना, बड़ा अधूरापन है. उस कहानी को सुनने देखने का अनुभव चाहे कितना ही imperfect हो, नया है तो भी बहुत है.

3. इस कहानी की महिलाएं सशक्त हैं. अपने फैसले खुद लेती हैं. बाकी सब मर्दों के मुकाबले ज्यादा स्मार्ट और शिक्षित हैं. वे कंगाल और रुपये के पीछे भाग रहे मर्दों को छोड़कर, उन पुरुषों को चुनती हैं जो बताया जाता है कि उनसे प्यार करते हैं, लेकिन संयोग से उनकी जो सबसे बड़ी क्वालिटी फिल्म दिखा पाती है वो ये कि वे सब पैसे वाले हैं, सबके पास चमचमाती गाड़ियां है. उन पुरुषों के पास भौतिक दुनिया के सब ऐश आराम हैं.

4. जो फिल्म दो लोगों की लड़ाई दिखाकर हंसाने चली थी वो आगे कहीं और मुड़ जाती है. वो प्यार की बात करती है. कहती है कि पुरुष ज़मीन को, मकान को प्यार करते हैं, अपनी औरत को नहीं. लेकिन ऐसे अवगुण वाले पुरुषों यानी बांके-मिर्ज़ा का निर्माण कहानी में किया तो किसी और उद्देश्य के लिए गया था. वो उद्देश्य था टॉम एंड जैरी वाली धूम-धड़ाक निर्मित करना. लेकिन उनके उन्हीं अनिवार्य अवगुणों का इस्तेमाल बाद में एक खास मैसेजिंग या क्लाइमैक्स के फैसलों को सही ठहराने के लिए किया गया. मिर्ज़ा-बांके की नोकझोंक से उठाकर पूरी कहानी का सिरा मिर्ज़ा के लालच पर खड़ा कर देना एक किस्म का छल है. अगर स्क्रिप्ट कुछ और करना चाह रही थी तो वो मेरे लिए स्प्ष्ट नहीं था.

 

बांके और मिर्ज़ा. लिखने वाले के हाथ की कठपुतलियां.

कहानी के इन दो दिशाओं में भागने की कोशिश, इसे देखने के पूरे प्रोसेस को एक तरह की अर्थहीनता या inconsequentiality में तब्दील कर देती है.


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adminMay 19, 20203min2720

अगर आप कुत्ते से प्यार करते हैं तो आप अच्छे इंसान हैं, अगर कुत्ता आपसे प्यार करता है तो आप अच्छे इंसान हैं.

15 मई, 2020 को रिलीज़ हुई 9 एपिसोड की वेब सीरीज़ ‘पाताल-लोक’ में ये डायलॉग सिर्फ़ 2 बार आता है. लेकिन जब आप सवा छह घंटे के लगभग की इस सीरीज़ को पूरा देख चुकते हो तो आपके समझ आ जाता है कि स्क्रिप्ट में इस एक बात, इस एक चीज़ का कितना ज़्यादा महत्व था.

‘पाताल-लोक’ रिलीज़ तो केवल ‘अमेज़न प्राइम वीडियो’ पर हुई है. लेकिन इसका बज़ चारों दिशाओं में फैल चुका है. क्या ये सीरीज़ इतना बज़ डिज़र्व करती है. उत्तर है, बिलकुल.

 

कहानी-

हाथीराम चौधरी दिल्ली के आउटर यमुना पार थाने का इंस्पेक्टर है. ये इलाक़ा कैसा है, इसका अंदाज़ा इसी बात से हो जाता है कि हाथीराम इसे दिल्ली का ‘पाताल लोक’ कहता है. स्वर्ग लोक तो उसके अनुसार ‘लुटियंस दिल्ली’ है. सालों से पुलिस विभाग में बिना तरक़्क़ी के सड़ रहे हाथीराम को लगभग अप्रत्याशित तौर पर एक हाई प्रोफ़ाइल केस मिल जाता है. इस केस में उसे अपने को सिद्ध करने के और प्रमोशन के चांसेज़ दिखते हैं. केस है एक न्यूज़ एंकर संजीव मेहरा की मर्डर कंसपीरेसी को सुलझाना. जिन चार लोगों को इस मर्डर के प्रयास के लिए पकड़ा गया है, उनके ख़िलाफ़ पर्याप्त सबूत हैं. यूं प्रथम दृष्टया ये एक ओपन-एंड-शट केस लगता है. इसलिए ही तो ये हाथीराम जैसे ‘नाकारा’ इंस्पेक्टर को सौंपा गया है.

लेकिन बात इतनी आसान होती तो हाथीराम इस सीरीज़ का मेन लीड न होता. ये एक केस और चार अपराधी, हाथीराम के लिए अवसर नहीं, जी का जंजाल बन जाते हैं.

 

वर्क लाइफ़ बैलेन्स. न हाथीराम चौधरी इसका अर्थ जानता है, न उसके पास ये है.

 

दूसरा प्लॉट है, न्यूज़ एंकर संजीव मेहरा का. जो अतीत में हीरो हुआ करता था, लेकिन अब उसका करियर ढलान पर है. साथ ही उसने अपने ही कंपनी के मालिक के साथ भी पंगा लिया हुआ है.

तीसरी कहानी है, हाथीराम चौधरी की पर्सनल लाइफ़. जहां उसका बेटा सिद्धार्थ उसकी नहीं सुनता. बीवी रेनू के साथ उसकी रोज़ की खटपट है. साला उसका, उसकी बीवी को नई-नई स्कीम से ठगते रहता है.

चौथी, पांचवी, छठी और सातवीं कहानी है कथित अपराधियों का पास्ट. जो स्टोरी को कभी दिल्ली से पंजाब तो कभी चित्रकूट तक लेकर जाती है. इन चार अपराधियों में चित्रकूट के ‘त्यागी’ की कहानी को सबसे ज़्यादा स्क्रीन-टाइम और महत्व दिया गया है. यूं उसे ‘पाताल-लोक’ के मुख्य किरदारों में से एक माना जा सकता है.

इसके अलावा, हाथीराम चौधरी के साइड किक, सब इंस्पेक्टर इमरान अंसारी की कहानी भी साथ में चलती है. मज़े की बात ये कि उम्र से लेकर एटिट्यूड तक में उल्टा हाथीराम चौधरी, इमरान अंसारी का साइड किक लगता है.

पाताल लोक में इतने ढेर कैरेक्टर्स और उनकी इतनी ढेर सारी कहानियां हैं, लेकिन देखने वालों को न तो ये कनफ़्यूज करती हैं, न ही किसी भी स्टोरी का अंत अधूरा लगता है. साथ ही सारे प्लॉट्स, सब-प्लॉट्स ऐसे एक-दूसरे से गुंथे हुए हैं कि एक भी किरदार, एक भी कहानी, मिसप्लेसड नहीं लगती. अधिक नहीं लगती.

 

पाताल लोक के हर एपिसोड के नाम भी बड़े इंट्रेस्टिंग हैं. जैसे ‘ब्लैक विडो’, ‘स्वर्ग का द्वार’.

 

परफ़ॉर्मेंसेज़-

‘पाताल लोक’ में किरदारों की एक्टिंग से पहले कास्टिंग की बात कर लेनी चाहिए. जैसे फ्योदोर दोस्तोवस्की अपने नॉवल में किसी किरदार को इंट्रड्यूस करते हुए उसका पूरा खाका खींच देते थे. यूं कि आपके सामने किरदार की छवि बन जाती थी. वैसे ही ‘पाताल-लोक’ की कास्टिंग की ख़ूबसूरती ये है कि आपको हर किरदार की एंट्री से ही उसके बैकग्राउंड का काफ़ी हद तक अंदाज़ा हो जाता है. चाहे वो हाथीराम जैसा कोई मध्यमवर्गीय पुलिसवाला हो या फिर संजीव मेहरा जैसा अपर क्लास अधेड़ शख़्स. चाहे वो त्यागी जैसा दुर्दांत अपराधी हो या अंसारी सरीखा आईएएस आकांक्षी.

हाथीराम चौधरी के किरदार में जयदीप अहलवात, हर सीन में चमके हैं. चाहे वो कॉमिक सीन्स हों, जैसे जब उनका किरदार रेनु से थप्पड़ खाता है. या फिर वो टेंस सीन्स हों या एंग्री ओल्ड मेन वाले एक्शन सीन. जयदीप अपनी एक्टिंग, एक्सप्रेशन और हाव भाव से हाथीराम के प्रफ़ेशनल और पर्सनल ज़िंदगी के फ़्रसटेशन को काफ़ी ख़ूबसूरती से स्क्रीन पर उतारने में सफल रहते हैं.

सर आधी ज़िंदगी बाप के सामने **या बना रहा, बाक़ी आधी ज़िंदगी बेटे के सामने **या नहीं बनना चाहता.

जयदीप इतने कनविसिंग तरीक़े से इस बात को कहते हैं कि हाथीराम का पूरा व्यक्तित्व सारगर्भित हो जाता है. आपको आस-पास के कई पिता-पुत्र संबंध एक साथ याद आने लगते हैं.

 

संजीव मेहरा, ग़लत है या सही? आप निश्चित तौर पर नहीं कह सकते. ये ज़रूर कह सकते हैं कि वो रियलटी के काफ़ी क़रीब है.

 

नीरज क़बी ने एक टीवी एंकर संजीव मेहरा का रोल निभाया है. अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने की कोशिश करता संजीव मेहरा बदलते वक्त के साथ अपनी निष्ठाओं और नैतिकताओं को फ़ाइन ट्यून कर रहा है. वो कहता है-

ये शहर अपने विलेंस को बहुत जल्दी भुला देता है, और अपने हीरोज़ को तो और भी ज़ल्दी.

नीरज क़बी कहानी की शुरुआत में अपने उम्दा अभिनय से संजीव मेहरा के लिए दर्शकों की ख़ूब सहानुभूति बटोरते हैं. लेकिन ये अभिनय तब और इंटेस हो जाता है जब इस किरदार में ढेरों शेड्स आने लगते हैं.

विशाल त्यागी का किरदार काफ़ी ‘एजी’ है. इसे अभिषेक बैनर्जी ने प्ले किया है. नेटफ़्लिक्स की सीरीज़ ‘टाइपराइटर’ में भी वो लगभग ऐसा ही किरदार निभा चुके हैं. कोल्ड ब्लडेड मर्डरर के रूप में उन्होंने अपनी आंखों और पोकर फ़ेस का बखूबी इस्तेमाल किया है. त्यागी एक पत्थर दिल क्रिमिनल है जो कुत्तों से बहुत प्यार करता है. उसका पास्ट भी उसके क्रिमिनल बन जाने का ज़िम्मेदार है. ऐसे किरदारों के साथ उसके कई वीभत्स कृत्यों के बावज़ूद दर्शकों को सहानुभूति होने लगती है. जैसे वॉकीन फीनिक्स के ‘जोकर’ वाले किरदार से या नेटफ़्लिक्स की वेब सीरीज़ ‘यू’ के मुख्य किरदार से. सीरीज़ की कास्टिंग भी अभिषेक के ज़िम्मे थी. उन्होंने अपने लिए ये रोल चुनकर सही निर्णय लिया.

 

विशाल त्यागी का किरदार निभाने ने लिए अभिषेक बैनर्जी ने शब्दों से ज़यदा एक्सप्रेशन्स और बॉडी लैंग्जवे का सहारा लिया है.

 

बंगाली सिनेमा की ऐक्ट्रेस स्वास्तिका मुखर्जी ने एक अपर क्लास बंगाली महिला डॉली का किरदार निभाया है. वो संजीव मेहरा की पत्नी हैं. जब डॉली को अपने पति के एक्स्ट्रा मैरिटयल अफ़ेयर के बारे में पता चलता है तो वो बदला लेने के लिए उसी रास्ते पर चल पड़ती है, जिस रास्ते से उसका पति गुज़रा था. लेकिन आधे में ही घबराकर वापस लौट आती है.

ये किरदार कितना वल्नरेबल है, इसका पता सिर्फ़ इसी एक सीन से ही नहीं, कई अन्य चीज़ों से भी चलता है. जैसे 40 साल की उम्र में मां बनने की इच्छा का जागना, या एक स्ट्रीट डॉग में अपने अकेलेपन का सहारा ढूंढना, या अपने पति में पॉज़िटिव ऊर्जा लाने के लिए घर में मंत्रोच्चार करवाना, या अपने पति पर हुए अटैक की ख़बर सुनने के बावज़ूद भी अपने डिप्रेशन को लेकर चिंतित रहना.

हाथीराम की पत्नी रेनु का किरदार गुल पनाग ने निभाया है, उनके कुछ पक्ष अच्छे जान पड़ते हैं. जैसे किसी मध्यम वर्गीय मां का बात-बात में अंग्रेज़ी के टूटे-फूटे शब्दों का इस्तेमाल करना.

 

‘पाताल-लोक’ की कास्टिंग भी इसका एक बहुत बड़ा प्लस पॉईंट है. सारे कलाकार मंझे हुए होते भी किसी स्टीरियोटाइप में क़ैद नहीं हैं. और अगर हैं तो उन्हें वैसा ही किरदार दिया गया है.

 

डीसीपी भगत का रोल विपिन शर्मा ने निभाया है. उन्हें आप कई बार ऐसे रोल निभाते हुए देख चुके हैं. यूं उन्हें इस दौर का इफ़्तेखार अहमद शरीफ़ कहा जा सकता है.

इश्वाक सिंह एक मुस्लिम पुलिस इंस्पेक्टर इमरान अंसारी बने हैं. आप पूछेंगे, हमने पुलिस इंस्पेक्टर के साथ ‘मुस्लिम’ क्यूं स्पेसिफ़ाई किया. तो वो इसलिए क्यूंकि यहां इश्वाक सिंह का किरदार समाज के एक पूरे तबके को रेप्रेज़ेंट करता है. उसके धर्म को ठीक उसी तरह रेखांकित किया गया है जैसे विदेशी फ़िल्मों में अक्सर अफ़्रीकन अमेरिकन किरदारों के नस्लीय पक्ष को किया जाता है. इश्वाक अपने अभिनय से इमरान अंसारी के किरदार के सभी पक्षों को उकेरने में सफल रहते हैं.

इस इंटेंस ड्रामा के बीच अनूप जलोटा को देखकर आपका रिदम टूटता है. उन्होंने एक ब्राह्मण नेता बाजपेयी का किरदार निभाया है, जो दिखाने के लिए दलितों का मसीहा है. उन्हें देखकर लगता है कि शायद वे एक्टिंग की विधा में भी सुर संभाल सकते हैं. हालांकि उनके हिस्से में एक फनी वन लाइनर और एक छोटे से चुनावी भाषण से अलावा ज़्यादा कुछ नहीं आया है.

 

अनूप जलोटा, ‘पाताल लोक’ में भजन गाते नहीं, भाषण देते दिखते हैं.

 

और अंत में-

अगर आप ऑनलाइन कंटेंट देखके के शौक़ीन हैं तो लॉकडाउन में आप इतना कुछ देख रहे होंगे कि आपने ‘बढ़िया कंटेंट’ का बार थोड़ी नीचे पर सेट कर दिया होगा, या अपने अपने आप सेट हो गया होगा. ‘पाताल-लोक’ देखिए ताकि वो ‘बार’, वो पैरामीटर फिर से रीसेट हो जाए. थोड़ा और ऊपर.

दोस्तों हम समझते हैं कि किसी ऑडियो विज़ुअल कंटेट में समीक्षाधीन सिर्फ़ एक्टिंग और स्टोरी ही नहीं होती. तो इस सीरीज़ से जुड़े 12 ऐसे पॉईंट्स हमने एक दूसरी स्टोरी में कंपाइल किए हैं, जिनको पढ़कर आपको यक़ीन हो जाएगा कि ये सीरीज़ मिस करने लायक़ बिलकुल नहीं है.


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adminFebruary 28, 20202min4560

”इट्स जस्ट अ स्लैप. पर नहीं मार सकता.”

अनुभव सिन्हा की फिल्म ‘थप्पड़’ की ये टैगलाइन है. सिंपल-सपाट. फिल्म में कई सवाल हैं, जिनके जवाब सिर्फ यही एक लाइन देती है. और वो जवाब सही निकलते हैं. तर्क और नैतिकता दोनों के हिसाब से. खैर, कहानी है दिल्ली में रहने वाले कपल विक्रम और अमृता की. विक्रम कॉर्पोरेट जॉब करता है. बहुत एंबीशस है. प्रमोशन पाकर अमृता के साथ इंग्लैंड सेटल होना चाहता है. अमृता उसकी पत्नी है. डांसर बनना चाहती थी लेकिन हाउसवाइफ बन गई. अपनी मर्जी से. स्पॉयरलपूर्ण वजहों से विक्रम अपनी ही प्रमोशन की पार्टी में सबके सामने अमृता को थप्पड़ मार देता है. लेकिन वो थप्पड़ अमृता के गाल के साथ-साथ दिल और दिमाग पर भी लग जाता है. यहां से फिल्म अपना गीयर चेंज कर देती है. इस फैमिली ड्रामा के चक्कर में फिल्म सोशल ड्रामा बन जाती है. उस थप्पड़ के बाद क्या हुआ? जो हो गया, सो हो गया. यहां ये बताया गया है कि क्या होना चाहिए.

 

फिल्म में कई सारे लोगों की कहानियां साथ में चलती रहती हैं, जो आखिर में एक ही पॉइंट पर आकर मिलती हैं. ये फिल्म को सबप्लॉट्स में तोड़ती हैं, जो कुछ खास एंगेजिंग नहीं बन पाए हैं. अमृता की हाउसहेल्प सुनीता वाले ट्रैक को छोड़कर. क्योंकि वो फिल्म के नैरेटिव के ठीक उलट चलती है, जिसकी वजह से फिल्म गंभीर और मज़ेदार दोनों बनती है. खैर, फिल्म में तापसी ने अमृता और पावेल  गुलाटी ने विक्रम का रोल किया है. तापसी ने पिछले दिनों में कर-करा के बता दिया है कि वो कर सकती हैं. इसलिए उन्हें लेकर आप आश्वस्त रहते हैं. लेकिन इस बार वो अपने किरदार में एक चुप्पी लेकर आती हैं, जिसकी चीख आपको भी सुनाई देती है. पावेल नए हैं. और काफी प्रॉमिसिंग भी. वो कहने को तो फिल्म के हीरो हैं लेकिन उनका कैरेक्टर एंटी-हीरो वाला है. उनका एक बड़ा शानदार सीन है, जहां वो तापसी से कहते हैं कि आपस की बात में वो उनके मां-बाप को न घसीटें. अब बहुत सारे सबप्लॉट्स हैं, तो उन्हें निभाने वाले एक्टर्स भी होंगे. जिस सुनीता की बात हम कर रहे थे, उसका रोल किया है ‘सोनी’ फेम गीतिका विद्या ओहल्यान ने. आप इन्हें फिल्म में सबसे ज़्यादा एंजॉय करेंगे. फिल्म की सपोर्टिंग कास्ट भी धांसू है क्योंकि इसमें रत्ना पाठक शाह, तन्वी आज़मी और कुमुद मिश्रा जैसे सीनियर लोगों के नाम शामिल हैं. इनके बारे में कुछ भी कहना छोटा मुंह बड़ी बात होगी. फिल्म में दिया मिर्ज़ा ने भी छोटा सा रोल किया है और उसमें वो अच्छी लगती हैं. भले ही वो कैरेक्टर कहीं पहुंचता हुआ नहीं दिखता.

 

‘थप्पड़’ की सबसे शानदार बात ये है कि ये अपने थीम के साथ फेवी क्विक वाली मजबूती से चिपकी रहती है. फिल्म बहुत सारे सवाल खड़े करती है, जिसका सिर्फ एक ही जवाब होता है- ‘इट्स जस्ट अ स्लैप. पर नहीं मार सकता’. हर जगह से घूम-फिरकर बात यहीं पहुंचती है. बिना बोले. ये फिल्म एक ऐसी बात करना चाहती है, जो आप सुनना ही नहीं चाहते. क्यों- क्योंकि आपसे आज तक किसी ने कहा ही नहीं. आपको लगता है आप जिससे प्यार करते हैं, उसके साथ कुछ भी कर सकते हैं. लेकिन भैया आपको ये चीज़ समझनी होगी कि आप ‘कबीर सिंह’ नहीं हैं. अगर बनना चाहते हैं, तो बैकआउट कर लीजिए या ‘थप्पड़’ देख आइए. अगर आपको लगता है कि आप मर्द हैं, इसलिए तोप हैं, तो आप टोपा हैं.

 

फिल्म में एक सीन है, जहां अमृता को थप्पड़ खाते देखने के बाद उसकी मेड सुनीता अपने घर जाती है. वो अपने अब्यूज़िव हस्बैंड से कहती है- ”मारते तो सभी हैं, मैं तुझे बेकार में गाली देती थी.” फिल्म में ऐसे कई सारे सिंबॉलिक और हार्ड-हिटिंग सीन्स हैं. ये सीन्स आपको सोचने पर मज़बूर करते हैं कि आप अब तक जो सोच रहे थे वो सही था क्या? अगर वो सही था, तो फिर स्क्रीन पर जो दिख रहा है, वो क्या है?

 

फिल्म में सिर्फ एक गाना है, ‘एक टुकड़ा धूप’. अलग-अलग जगहों पर मौका देखकर बजने लगता है. हेवी सा सुनने में. फील में भी. अब उसकी एक लाइन ही ले लीजिए- ”हम थे लिखे दीवारों पे, बारिश हुई और धुल गए”. ये ठीक वही बात है, जो फिल्म की नायिका अपने बारे में सोच रही है. उसका आत्मसम्मान दांव पर है. वो जिसके साथ रहती है, एक पल में उस आदमी के प्रति उसका सारा प्रेम खत्म हो जाता है. और आपको यकीन होता है कि ऐसा वाकई हो जाता होगा. फिर आप उन लोगों के बारे में सोचते हैं, जो इन बातों के बारे में सोचते भी नहीं. जैसे ‘थप्पड़’ का नायक विक्रम. वो अपने बुरे बर्ताव के बाद अपने बॉस को तो सॉरी बोल देता है लेकिन अमृता से माफी मांगने का ख्याल भी उसके जहन में नहीं आता. फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर आपको बार-बार ये ध्यान दिलाता है कि आप जिसे छोटी या आम बात समझ रहे हैं, वो बहुत ज़्यादा गंभीर है. इतनी गंभीर की उस पर पिक्चर बनानी पड़ी.

 

 

‘एक टुकड़ा धूप’ आप यहां सुन सकते हैं:

 

फिल्म की पेस भी थोड़ी स्लो है. लेकिन ‘थप्पड़’ आपको बड़ी बुनियादी, ज़रूरी, मजबूत और प्रासंगिक बात बता रही है. अगर वो बात आपको थोड़ी भी समझ आ रही है, आपके भीतर बदलाव की गुंजाइश पैदा कर रही है, तो वो टाइम वर्थ इट है. और इस फिल्म को देखने के बाद आप ये तो कह ही नहीं सकते कि आपके भीतर कुछ नहीं बदला.

 

इस फिल्म को देखने से पहले आपको पता होता है कि आप क्या देखने जा रहे हैं. क्योंकि पहली बात ये ‘रा-वन’ वाले नहीं ‘मुल्क’ वाले अनुभव सिन्हा की पिक्चर है. और दूसरी, आपने ट्रेलर तो देखा ही है. अनुभव सिन्हा अपने दूसरे वर्जन की तीसरी फिल्म में फिर से खरे उतरे हैं. ऐसा नहीं है कि ये फिल्म आपको झटके पे झटके देती है. वो बड़े आराम से चलती है. आपको अनकफंर्टेबल करते हुए. आपकी सारी बौद्धिकता और ज्ञान को मानते हुए, उन्हें सिर्फ एक वजह से धता बता देती है. मैं अपनी जेनरेशन को बड़ा लकी मानता हूं, जिसे 20-25 की उम्र में इस तरह की फिल्में देखने को मिल रही है, जो आगे चलकर हमारी पर्सनैलिटी का अहम हिस्सा होंगी. ‘थप्पड़’ का मकसद आपको थप्पड़ मारना नहीं, आगाह करना है. इस कॉन्सेप्ट में भरोसा दिलाना, याद करवाना है कि

 

”इट्स जस्ट अ स्लैप. पर नहीं मार सकता है”.


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adminFebruary 22, 20201min1100

फिल्म ‘शुभ मंगल ज़्यादा सावधान’ एक गे लव स्टोरी है. लेकिन बनाई इस मक़सद से गई है कि इसे सिर्फ लव स्टोरी कहा जाए. अमन और कार्तिक नाम के दो लड़कों की कहानी जो दिल्ली में हैं. और एक-दूसरे के साथ प्रेम में भी. वहां ये एक लड़की को घर से भगाते हैं और फिर खुद ही भागकर अमन के घर इलाहाबाद पहुंच जाते हैं. यहां हो रही है अमन की बहन रजनी उर्फ गॉगल की शादी. एक लड़की, मम्मी-पापा ने अमन के लिए भी देखी हुई है. लेकिन अमन शादी में पहुंचता है अपने बॉयफ्रेंड के साथ. पहले तो लोग इन्हें दोस्त समझते हैं. लेकिन एक दिन इनके गे होने की बात सबके सामने आ जाती है. इसके बाद मचता है पूरे घर में कोहराम. मम्मी-पापा और सोसाइटी कार्तिक और अमन की जोड़ी को स्वीकार करती है कि नहीं? यही फिल्म की कहानी है.

 

आयुष्मान खुराना ने फिल्म में कार्तिक नाम के लड़के का रोल किया है. वो जो कर सकते हैं, उस लिहाज़ से अब भी वो अपने कंफर्ट ज़ोन में खेल रहे हैं. लेकिन अच्छा खेल रहे हैं. इस फिल्म में नाक में बढ़िया नोज़रिंग वगैरह डालकर फिज़िकल लेवल पर वो थोड़े ज़्यादा एक्टिव लगते हैं. बाकी स्वैग तो है ही. उनके बॉयफ्रेंड अमन का रोल किया है जीतेंद्र कुमार ने. जीतेंद्र फिल्म को रिलेटेबल बनाते हैं. उनकी पर्सनैलिटी बिलकुल बॉय नेक्स्ट डोर वाली है. उन्हें देखकर लगता है कि ये वाकई किसी भी रेगुलर बंदे की कहानी हो सकती है. साथ में गजराज राव और नीना गुप्ता की हिट जोड़ी भी है. जो बिलकुल बुल्स आई हिट करती है. जिस आदमी को स्क्रीन पर आप सबसे ज़्यादा एंजॉय करेंगे, वो हैं मनु ऋषि चड्ढा. ये भाई साहब पूरी फिल्म कुछ भी कह रहे हों. उस पर आपको हंसी न आए, ऐसा हो नहीं सकता. इन्होंने अमन के चाचा का रोल किया है.

आज कल किसी भी सोशल मसले पर बनी फिल्म में हर बात वन-लाइनर हो जाती है. कभी-कभी वो वन-लाइनर्स क्लिक करते हैं, तो कई बार रह जाते हैं. जिस फिल्म में इस कॉमिक एलीमेंट के साथ थोड़ी गंभीरता रहती है, वो फिल्म दूसरे लेवल पर चली जाती है. अगर आप शूजीत सरकार की ‘अक्टूबर’ देखेंगे, तो ये चीज बेहतर तरीके से पकड़ में आएगी. ‘शुभ मंगल…’ में ये बात थोड़ी सी खलती है. लेकिन आप एंजॉय करते हैं. आपकी एंजॉयमेंट में खलल डालता है फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर. ऐसा लगता है, वो हर पंचलाइन के बाद आपको बताता है कि इस पर हंसना था. कम से कम ये तो हमें तय करने दीजिए कि कहां हंसना है. फिल्म का म्यूज़िक काफी औसत है. यहां भी टोटल चार में से दो रीमिक्स गाने हैं. जिसमें से ‘अरे प्यार कर ले’, फिल्म के माहौल से मैच करता है.

कुछ चीज़ें फिल्म देखते वक्त समझ नहीं आती हैं. जैसे फिल्म का ओपनिंग सीक्वेंस. यहां दो लड़के एक लड़की को भगा रहे हैं. उसके पीछे कि क्या कहानी थी या आगे क्या हुआ, ये बताने का लोड ही नहीं लिया गया. ऐसे में वो सीन फिल्म में एक्स्ट्रा और बेमाना लगता है. वो भी तब जब उस लड़की रोल में आपने एक बड़े नाम को कास्ट किया है. फिल्म में काली गोभी का अविष्कार करने वाले सबप्लॉट का क्या मतलब था? पता चले तो बताइएगा. ये फिल्म इलाहाबाद में बेस्ड है. लेकिन रेलवे स्टेशन के अलावा कैमरा आपको कहीं ये महसूस नहीं होने देता. इलाहाबाद में कई सारी जगहें हैं, जो तिग्मांशु धुलिया ने पहले ही पॉपुलर कर रखी हैं. यहां कैमरा घर से बाहर निकलता ही नहीं है. और घर में भी फ्रेम लोगों से पटा पड़ा रहता है.

ये फिल्म एक ज़रूरी और प्रासंगिक मुद्दे को पब्लिक में ले जाना चाहती है. ताकि उस पर और बात हो. जैसे फिल्म में एक सीन है, जहां अमन और कार्तिक बाइक पर जा रहे होते हैं. उनकी गाड़ी रेड लाइट पर रुकती है. उनकी बगल में एक दूसरा कपल भी बाइक पर है. ये बहुत ही प्यारा सीन है. कुछ एक सीक्वेंस काफी रियल और फनी लगते हैं. जैसे एक सीन में मनु ऋषि शर्ट पहनते हुए कमरे से बाहर निकलते हैं और गजराज को आवाज़ लगाकर कहते हैं- ”भाई साहब, बाहर लाठीचार्ज होने वाला है, आइए देखने चलते हैं”. इस फिल्म को देखने के बाद ‘परेशानी’ शब्द का मतलब मेरे लिए बदल चुका है.

 

‘शुभ मंगल ज़्यादा सावधान’ अपने नाम की ही तरह बहुत सारी सावधानियां बरतती हुई चलती है. इसे गेशिप या होमोसेक्शुएलिटी का मुद्दा भी अच्छे से कैरी करना है. और उसे बहुत बड़ी जनता तक भी पहुंचाना है. इस फिल्म की तुलना आप हितेश केवल्या की ही लिखी हुई फिल्म ‘शुभ मंगल सावधान’ से कर सकते हैं. यहां का सेट अप भी काफी सेम है. छोटे शहर की फैमिली, जिसके लिए सबसे बड़ा इशू ये है कि चार लोग क्या कहेंगे. भरा-पूरा परिवार. रोज सुबह-शाम का फैमिली ड्रामा. ये सब यहां भी है. लेकिन पिछले वाक्य में जो ‘भी’ है, सारी बात वहीं आकर अटकती है. लेकिन ये फिल्म जो करना चाहती थी, वो कर देती है. आपको हंसाना. हंसाते हुए बताना कि गे होना कोई बीमारी या अप्राकृतिक चीज़ नहीं है. जैसे आप आईएएस ऑफिसर बनते हैं, वैसे आप गे नहीं बन सकते. आप अपनी उन्मुखता लेकर पैदा होते हैं. सिर्फ किसी के कह देने या मान लेने से कोई बात गलत नहीं हो जाती. अगर फिर भी कोई नहीं मानता, तो उन्हें इस गाने का स्पॉटिफाई लिंक भेजकर चिल मारिए!


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adminFebruary 15, 20201min1550

2009 में इम्तियाज़ अली ने एक फिल्म बनाई थी ‘लव आज कल’. 2020 में दूसरी ‘लव आज कल’ लेकर आए हैं. लेकिन नाम में ये बताने का जहमत नहीं उठाया कि ये दूसरी ‘लव आज कल’ है. इम्तियाज़ का ये भी मानना है कि अगर वो इस सीरीज़ को कभी आगे बढ़ाते भी हैं, तो उसका नाम ‘लव आज कल’ ही होगा. क्योंकि उनकी वो फिल्म उस दौर में घटने वाले प्रेम की बात करेगी. अब जब शेक्सपियर की ‘What’s in a name?’ यानी नाम में क्या रखा है को ‘अनकोट’ कर ही दिया है, तो इस फिल्म के नाम से जुड़ी एक और बात जान ही लेते हैं. ये वाली ‘लव आज कल’ भी आज और बीते हुए कल में हुए लव की बात करती है. ओरिजिनल/पहली फिल्म की ही तरह.

 

कहानी

‘लव आज कल’ की कहानी दो कपल्स के बारे में बारे है. आज के टाइम में ज़ोई और वीर. दिल्ली में. और 90 के दशक में उदयपुर में रघु और लीना. इन दोनों जोड़ों की लव स्टोरी कभी बाहरी, तो कभी भीतरी वजहों से खटाई में पड़ती रहती है. दुनिया, दिमाग और करियर इनके प्रेम कहानी पर ब्रेक मारती रहती है. और फाइनली इसमें से एक लव स्टोरी अधूरी ही रह जाती है. जब मैंने ‘रॉकस्टार’ देखी थी, उसके ठीक बाद कहीं से मेरे सोशल मीडिया टाइमलाइन पर ‘सिंपल प्लॉट. कॉम्लेक्स कैरेक्टर्स’ लिखी हुई टाइप की एक चीज़ दिखी. मैंने उसका स्क्रीनशॉट निकाला और अपने डेस्क पर लगा लिया. घेर-घार के जैसे-तैसे निकलने वाली लाइफ इतनी जल्दी अपना घेरा पूरा करके वहीं लौट आएगी, ये तो मैंने कतई नहीं सोचा था. और शायद इम्तियाज़ ने भी नहीं. इस फिल्म के किरदार हर समय इमोशनली चार्ज्ड रहते हैं. हमेशा भारी-भरकम बातें ही करते हैं. बस उन्हें देखकर आपको ये नहीं लगता कि वो वाकई ये फील कर रहे हैं. बस यहीं ये फिल्म मैच हार जाती है.

 

परफॉरमेंस

और इसके ज़िम्मेदार हैं फिल्म के एक्टर्स और खुद इम्तियाज़ अली. कार्तिक ने डबल रोल किया है. 90 के दशक में स्कूलबॉय रघु वाला हिस्सा अगर छोड़ भी दें, तब भी कार्तिक फिल्म को हल्का और कम विश्वास करने लायक बनाते हैं. क्योंकि वीर वाले टाइम में उनकी इंटेंसिटी फर्जी लगती है. उन्होंने बहुत कोशिश की है लेकिन उस कोशिश का दिखाई देना, उनके खिलाफ चला गया. दूसरी तरफ हैं सारा अली खान. उनकी वजह से खिंचती हुई फिल्म चलने लायक बन पाती है. मुंहफट और मॉडर्न लेकिन कंफ्यूज़्ड. क्योंकि एक तरफ वो करियर की बात करती है और दूसरी तरफ प्रेम की. प्यार को हमेशा अपनी सेकंड प्रायोरिटी मानने वाली लड़की उसकी वजह से अपने करियर के साथ कॉम्प्रोमाइज़ कर लेती है. आरुषी शर्मा बहुत सिंपल लगती हैं और मजबूत भी. अगर उनसे स्टॉकिंग को रोमैंटिसाइज़ नहीं करवाया गया होता, तो मामला थोड़ा और बेहतर होता. अब आते हैं फिल्म की सबसे बड़ी कास्टिंग गूफ अप पर. फिल्म में रणदीप हुड्डा ने राज/रघु नाम के एक जीवन देख चुके अनुभवी आदमी का रोल किया है. और फिल्म में उनकी हालत ये है कि उनका रोल भी कार्तिक आर्यन ही कर रहे हैं. खैर, वो जितने भी सीन में हैं, वो फिल्म का बेस्ट एक्टिंग वाला चंक है. खासकर क्लाइमैक्स में, जब वो अपनी लव स्टोरी का क्लाइमैक्स बता रहे होते हैं.

 

डायलॉग्स

इम्तियाज़ की फिल्में हम क्यों देखने जाते हैं. क्योंकि हमें लगता है कि कोई आदमी है, जो थोड़ा-बहुत इंसानों को समझता है. क्योंकि उन्होंने अपनी फिल्मों में बहुत सारी बातें कही हैं, जिससे सुनने या देखने वाला कनेक्ट कर पाता है. ‘लव आज कल’ से ये वाली चीज़ ही गायब है. आप रुमी और कबीर को कोट करिए लेकिन उनकी भाषा में बात मत करिए. आपकी लाइनें इतनी भारी हैं कि एक्टर ही उसके नीचे दबा हुआ फील कर रहा है. 10 साल में प्यार इतना बदल गया कि उसे दिखाने के लिए पिक्चर बनानी पड़ी. कुछ बदलाव तो भाषा में भी आया ही होगा.

 

म्यूज़िक

अगर आप एक बार को भूलने की कोशिश करते हैं कि ‘लव आज कल’ का 2009 में आई किसी फिल्म से कोई लेना-देना नहीं है. आपको ये फिल्म ही बार-बार याद दिलाती रहती है कि इसका हमारे साथ कुछ पुराना है. यहां इसकी नीयत पर शक होने लगता है. इसका उदाहरण हैं फिल्म के गाने, जो दिखने को तो चार हैं लेकिन ‘शायद’ एक मात्र ऐसा गाना है, जो ओरिजिनल है और अच्छा लगता है. हालांकि उसके लिरिक्स यूनिवर्सल न होकर सिर्फ फिल्म के लिए हैं. ‘ये दूरियां’ और ‘ट्विस्ट’ पिछली फिल्म में भी थे, यहां भी हैं. नया क्या है? बीट्स. और थोड़े से एक्ट्रा लिरिक्स. जो अच्छे लगते हैं. खासकर ‘हां मैं गलत’ वाली बात. बैकग्राउंड में भी यही बजते हैं. मतलब फिल्म के म्यूज़िक के बारे में सिर्फ यही कहा जा सकता है कि ‘नादान परिंदे’ इम्तियाज़, ‘फिर से उड़’ नहीं पाए हैं.

 

अच्छी बातें

फिल्म की सबसे अच्छी बात है कि ये अच्छी दिखती है. फुल चकाचक. आधी से ज़्यादा फिल्म एक कैफे में निकलती है और बाकी खत्म होने के इंतज़ार में. लेकिन इस दौरान कुछ चीज़ें ऐसी भी रहती हैं, जो आपका ध्यान खींचती हैं. जैसे फिल्म में सारा अली खान का एक सीक्वेंस है, जब वो एक इंटरव्यू अपनी शर्ट का एक बटन खोलकर जाती हैं और उसे डिफेंड कर ले जाती हैं. वो कहती हैं-

”शर्ट का बटन खोलना मुझे अट्रैक्टिव लगता है. और जब मैं अट्रैक्टिव लगती हूं, तो कॉन्फिडेंट फील करती हूं.”

फेयर एनफ. ये वाली चीज़ सुनकर थोड़ी लॉजिकल लगती है. रोहित शेट्टी कार से खेलते हैं और इम्तियाज़ प्यार से. इसलिए इनकी फिल्मों में लॉजिक ढूंढना पड़ता है. ये लोग रखते नहीं हैं.

 

बुरी बातें

फिल्म में आज से ज़्यादा इंट्रेस्टिंग 90 के दशक वाली लव स्टोरी है. उसके बारे में आप थोड़ा और जानना चाहते हैं. लेकिन फिल्म को मिलेनियल्स की कहानी में ज़्यादा इंट्रेस्ट है. इसलिए फोकस भी वहीं. बहुत सारी दिक्कत वाली बातें भी हैं, जिन्हें प्यार कहकर साइड कर देना खतरनाक है. इसमें स्टॉकिंग एक बड़ी समस्या है, जो फिल्म में दोनों ही दौर के नायक करते हैं. फिल्म फिलॉसफी वाले लेवल को बहुत ऊपर लेकर जाना चाहती है. लेकिन फिल्म और उसके किरदारों के बीच सामंजस्य की भारी कमी है. आप फिल्म के साथ कनेक्ट नहीं फील करते क्योंकि ये बहुत कॉम्प्लिकेटेड है. बेसिकली ये ‘रॉकस्टार’ और ‘तमाशा’ की मिक्सचर है, जिसे ‘लव आज कल’ वाले फॉर्मैट में बनाया गया है. लेकिन उन फिल्मों के पास परफॉरमेंसेज़ थीं, जिन्हें आप बार-बार देख सकते हैं. मच्योरिटी और डेप्थ की सही मात्रा थी. यहां नहीं है.

”जो तुम न हो, रहेंगे हम नहीं. जो तुम न हो, तो हम भी हम नहीं.”.

 

‘शायद’ गाने की ये लाइनें दो फिल्मों के मिक्सचर वाली बात की तस्दीक कायदे से करती हैं. इस एक लाइन में ही जॉर्डन और वेद दोनों को समेट लिया गया है. लेकिन पिक्चर नई है!

 

ओवरऑल एक्सपीरियंस

ये फिल्म अच्छे नोट पर शुरू होती है. और उसी स्टाइल में बढ़ती चली जाती है. ये चीज़ आगे दिक्कत का सबब बन जाती है. हालांकि आपको इसमें इम्तियाज़ का रेगुलर फ्लेवर भी मिलेगा. जैसे सही-गलत, अच्छा-बुरा जैसी चीज़ें दुनियावी हैं. वो अंदर से आने वाला कनेक्शन. प्रेम के सहारे खुद को ढूंढना. एक-दूसरे को कंप्लीट करना. और वो बने रहना, जो हैं. बस इसमें फील की थोड़ी सी कमी रह गई. अब जो फिल्म खुद ही इन कॉन्सेप्ट्स को ही तज कर बैठी है, उसके बारे में आप वही बात कैसे कर सकते हैं. फिल्म के बारे में जो चीज़ थी, वो आपको बता दी गई है. बाकी अपने विवेक और इम्तियाज़ प्रेम के हिसाब से सोच-समझकर फैसला लें.


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adminJanuary 10, 20201min1340

दीपिका पादुकोण की ‘छपाक’ शुक्रवार को थिएटर्स में लग चुकी है. और देख भी ली गई है. अब वो बात जो हम यहां करने आए हैं. फिल्म की बात. फिल्म लक्ष्मी अग्रवाल नाम की एसिड अटैक सर्वाइवर की लाइफ पर बेस्ड है. कैरेक्टर्स के नाम वगैरह बदल दिए गए हैं, थोड़ी फिल्मी बातें डाल दी गई हैं. ये सब करने के बाद फिल्म की कहानी ये बनती है कि माल्ती नाम की 12वीं में पढ़ने वाली एक लड़की है. एक दिन उसके ऊपर, उसका एक जानने वाला सनकी लड़का तेजाब डाल देता है. इस केस की छानबीन होती है. कोर्ट में मामला चलता है. लेकिन माल्ती की लाइफ रुक जाती है. थोड़े मोटिवेशन के बाद वो लड़ना शुरू करती है. कोर्ट केस, बीमार मानसिकता से, भारत के कानून से, तेजाब की खुलेआम बिक्री से और खुद से. अब वो हारती हैं कि जीतती, ये अगर आपने लक्ष्मी की स्टोरी फॉलो की होगी, तो पता होगा.

फिल्म में दीपिका ने लक्ष्मी से प्रेरित माल्ती का किरदार निभाया है. इस तरह की फिल्मों में मेकअप कैरेक्टर को एस्टैब्लिश करने में बहुत मदद करता है. फिल्म के पहले हाफ में आपको कभी अंदाज़ा नहीं लगता है कि जो लड़की स्क्रीन पर दिख रही है, वो माल्ती नहीं दीपिका पादुकोण हैं. कभी किसी एसिड अटैक सर्वाइवर से रूबरू होने का मौका नहीं मिला लेकिन माल्ती को देखने के बाद लगता है कि वो भी कुछ ऐसी ही होती होंगी. नॉर्मल. हंसने वाली, गाने वाली, हर दूसरी बात पर पार्टी करने वाली. दूसरी तरफ हैं विक्रांत मैस्सी. इन्होंने अमोल नाम के उस शख्स का रोल किया है, जो एसिड अटैक सर्वाइवर्स की मदद के लिए एक एनजीओ चलाता है. बाद में जो माल्ती के साथ प्रेम में भी पड़ जाता है. वो एसिड अटैक को लेकर इसकी शिकार लड़कियों से भी ज़्यादा चिंतित रहता है. शायद उसे ये गिल्ट है कि माल्ती और तमाम लड़कियों के साथ घिनौनी हरकत करने वाले भी उसी के जेंडर से आते हैं. और उसकी चिंता कितनी जेनुइन है, वो विक्रांत का चेहरा और हाव-भाव आपको बताता है. माल्ती की वकील अर्चना के रोल में मधुरजीत सरगी का परफॉर्मेंस के मामले में स्पेशल मेंशन करना चाहिए.

 

कोर्ट में अपने बॉयफ्रेंड राजेश को उसके रिलेशनशिप को झूठलाते हुए देखती माल्ती.

जब आप फिल्म देखने बैठते हैं, तब माल्ती का कैरेक्टर उतने देर के लिए ज़रूरी रहता है, जब उनके साथ वो घटना होती है. बाकी के समय ये कैरेक्टर सिर्फ एक माध्यम भर रहता है. इस तरह के क्राइम, उसे करने वाली मानसकिता, एक्ज़ीक्यूट करने की हिम्मत, फिर लड़की की लंबी कानूनी लड़ाई और खुद को वापस पाने के प्रोसेस की तह में पहुंचकर उसे टटोलने का. इस तरह की चीज़ों को रोकने-खत्म करने की कोशिश का माध्यम. इस फिल्म को आप सिर्फ एंटरटेनमेंट के लिए नहीं देख सकते. क्योंकि ये वो है नहीं. आप इतने विचलित अवस्था में एंजॉय नहीं कर सकते. इसलिए आपको वो समझना पड़ेगा, जो फिल्म कह रही है. फिल्म अपने मसले से जुड़े बहुत सारे फैक्ट्स बताती है. उससे जुड़े कानूनों की बात करती है. साथ में एक एसिड सर्वाइवर के रिहैबिलिटेशन (अगर कहना चाहें तो) की कहानी भी दिखाती है. और मेरा यकीन करिए ये प्रोसेस इतना ज़्यादा मुश्किल है कि आप एक फिल्म की मदद से सिर्फ ये बात ही जान सकते हैं. एसिड अटैक सर्वाइवर्स की फिज़िकल और मेंटल कंडिशन नहीं समझ सकते. इसका नैरेटिव काफी इनक्लूसिव है. बहुत सारी चीज़ें गुथी हुई हैं. जेंडर से लेकर जाति तक. सबका अपना मर्म है. एक बार को थोड़ा सा ‘आर्टिकल 15’ वाला फील भी आ जाता है. यहां महिलाओं की और सिर्फ महिलाओं की ही बात होती है. यहां विक्टिम महिला है. इस घटना को अंजाम देने वाली भी एक महिला. पीड़िता के लिए लड़ने वाली वकील भी महिला. और कोर्ट की जज भी महिला. कुछ समझने की भी कोशिश कर रहे हैं कि बस पढ़कर आगे निकले जा रहे हैं.

इस फिल्म की भयावहता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि इंटरवल के बाद जो होता, उसके साथ पानी भी गले से नीचे नहीं उतरता. ये आंख जो देख रहा है, उसकी वजह से नहीं होता. दिमाग जो सोच रहा है, उस वजह से होता है. फिल्म के डायलॉग्स काफी इन योर फेस हैं. जैसे कोर्ट से एक पक्ष में फैसला आने के बाद माल्ती अपनी एनजीओ वाली टीम के साथ पार्टी कर रही होती है. अमोल आता है और गाना बंद कर देता है कहता है, ये बहुत छोटी जीत है. इसकी खुशी नहीं मना सकते. जवाब में माल्ती कहती है- ”एसिड अटैक मुझ पर हुआ था और मुझे पार्टी करने का मन है.” ये सुनने के बाद आप सोचते हैं फिल्मों में ऐसे बात करना अलाउड है क्या? पहले ऐसा कुछ क्यों नहीं सुना. फिल्म में वैसे तो तीन गाने हैं. दो गानों का फिल्म में होना न होना बराबर था. लेकिन फिल्म का टाइटल ट्रैक जो है, वो कान को अच्छा लगता है और दिमाग खराब करके छोड़ देता है.

‘छपाक’ एक ऐसी फिल्म है, जिसके बारे में हम ये चाहेंगे कि इसकी प्रासंगिकता जल्द से जल्द खत्म हो जाए. लेकिन आज के समय में ये काफी रेलेवेंट है. इसकी गवाही दे रही है खुद फिल्म ‘छपाक’. क्योंकि उसे बनाया ही इस तरह के क्राइम को कम करने के मकसद से गया है. एक चीज़ जो फिल्म को हद से ज़्यादा यादगार बना देती है, वो है उसका एंड. ‘सैराट’ टाइप कुछ, जो पूरी फिल्म से ज़्यादा डरावना है. लेकिन वो फिल्म से नहीं कॉन्सेप्ट से जुड़ा हुआ है. और यही चीज़ आपके दिमाग में अटकी रह जाती है. जैसे ऑरेंज इज़ न्यू ब्लैक, वैसे ही ये फिल्म खूबसूरती का पैमाना बदलने वाली है. ब्यूटी की लोकेशन चेहरे से चेंज करके दिल और दिमाग वाली साइड पर कहीं शिफ्ट करना होगा. इसके लिए हमें एसिड वाला छपाक अवॉयड करने और ये वाली ‘छपाक’ देखने की ज़रूरत है.

 



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