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adminOctober 31, 20201min6060

गंदगी और कम गुणवत्ता वाले पानी की वजह से जिन देशों में हाइजीन का लेवल खराब है, वहां कोविड-19 से मौत का खतरा भी साफ-सुथरे देशों की तुलना में कम है. सेंटर फॉर साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (CSIR) ने अपनी एक रिपोर्ट में ऐसा दावा किया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार भारत को गंदगी से जोड़कर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी. ट्रंप के उस बयान को अगर इस हालिया रिपोर्ट के संदर्भ में देखा जाए तो भारत कोविड-19 के खिलाफ ज्यादा मजबूती से जंग कर सकता है.

CSIR की इस रिपोर्ट के मुताबिक, ‘लो और लो-मिडिल इनकम वाले देशों पर हाई पैरासाइट और बैक्टीरिया से फैलने वाली बीमारियों का बोझ ज्यादा होता है. इसीलिए लोगों के बीच फैलने वाले रोगों का अनुभव उनकी इम्यून ट्रेनिंग का हिस्सा बन जाता है. इस प्रैक्टिस को इम्यून हाइपोथिसिस कहा जाता है.’

एक्सपर्ट कहते हैं कि विकसित देशों में बेहतर हाइजीन और इंफेक्शन के खतरे का घटता स्तर ऑटोइम्यून डिसॉर्डर और एलर्जी की समस्या पैदा करता है. ऑटोइम्यून डिसॉर्डर कोविड-19 से होने वाली मौतों की बड़ी वजह है, क्योंकि बॉडी का अपना हाइपरेक्टिव इम्यून इंफेक्शन को नष्ट करने वाले साइटोकिन बनाता है.

ऑटोइम्यून डिसॉर्डर की समस्या हाई जीडीपी वाले देशों यानी विकसित देशों में ज्यादा देखने को मिली है. इन देशों में मृत्यु दर की उछाल का ये एक बड़ा कारण है सकता है. जबकि भारत में इसके विपरीत परिणाम देखने को मिले हैं. भारत के जिन राज्यों या शहरों का इतिहास किसी इंफेक्शन से जुड़ा रहा है, वहां कोविड-19 से कम मौतें हुई हैं.

CSIR के डायरेक्टर जनरल और इस स्टडी के प्रमुख लेखक शेखर मांडे ने कहा, ‘हमने 25 मापदंडों का विश्लेषण किया है. ये बड़ा विरोधाभासी है कि हाई जीडीपी वाले देशों में कोविड-19 से लोग ज्यादा मर रहे हैं. इन देशों में जीवन प्रत्याशा अधिक है. उनके पास नॉन-कॉम्यूनिकेबल डिसीज ज्यादा हैं, जो कि कोविड-19 से मौतों का बड़ा कारक है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘हमने सैनिटाइजेशन के लेवल की भी जांच की है. भारत में हाइजीन हाइपोथिसिस है. यानी अगर आपके शरीर को बचपन से ही रोगजनक वायरस से लड़ने की आदत है तो आप इस बीमारी को अच्छे से डील कर पाएंगे. कम हाइजीन का मतलब ज्यादा इंफेक्शन का खतरा और इससे लड़ने के लिए आपकी इम्यून सिस्टम बेहतर ट्रेंड होता है. अगर इम्यून इससे लड़ने में सक्षम नहीं है तो वायरस का अटैक इंसान को गंभीर स्थिति में ले जाएगा.’

उदाहरण के तौर पर, बिहार सोशियो-इकोनॉमी के पैमाने पर भारत का एक गरीब राज्य है. लेकिन कोविड-19 से यहां मौत का खतरा सिर्फ 0.5 प्रतिशत है जो कि देश की मृत्यु दर से बहुत कम है. बिहार के अलावा, केरल और असम (0.4), तेलंगाना (0.5), झारखंड और छत्तीसगढ़ (0.9) में भी कोविड-19 का डेथ रेट कम देखा गया है. जबकि महाराष्ट्र और गुजरात जैसे शहरों में डेथ रेट ज्यादा है.


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adminOctober 29, 20202min5760

अगर अर्थ जगत की इस हफ़्ते की सबसे बड़ी ख़बर की बात की जाये तो वो होगी, ‘रिलायंस-फ़्यूचर-अमेज़न विवाद’ वाली ख़बर. जिसका लेटेस्ट स्टेटस ये है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज और फ्यूचर ग्रुप की डील पर सिंगापुर के आर्बिट्रेशन पैनल ने अस्थाई रोक लगाई है.

अब इस खबर के मायने क्या हैं और क्या है रिलायंस-फ़्यूचर-अमेज़न विवाद, आइए आसान भाषा में समझते हैं.

 

# कहानी पूरी फ़िल्मी है-

‘दिल तो पागल है’, ‘कुछ-कुछ होता है’, ‘हम दिल दे चुके सनम’ या ‘जब वी मेट’ जैसी कोई भी प्रेम-त्रिकोण (लव-ट्राएंगल) वाली स्टोरी उठा लीजिए. जिसमें दो पुरुष एक ही स्त्री को या दो स्त्रियां एक ही पुरुष को प्रेम करती हैं. और अंत-अंत तक नहीं पता होता कि कौन किसे मिलेगा या मिलेगी.

ऐसा ही कुछ लव ट्राएंगल वाला एंगल हमारी इस स्टोरी में भी है. जहां फ़्यूचर ग्रुप के साथ सबसे पहले प्रेम का इज़हार किया तो अमेज़न ने था. लेकिन अब फ़्यूचर ग्रुप का विवाह होने जा रहा है रिलायंस से. लेकिन यहीं मूवी ख़त्म नहीं हुई. अब ‘माय बेस्ट फ्रेंड्स वेडिंग’ की तर्ज़ पर ऐन शादी पर आ गया है अमेज़न.

 

हमारी उम्र में ज़्यादा समय नहीं लगता, एक नज़र में पता लग जाता है. (सांकेतिक इमेज)

 

ये है पूरा किस्सा आसान भाषा में. अब आइए समझते हैं रियल में क्या हुआ है.

 

# वो साल दूसरा था-

बात दिसंबर, 2019 की है. ‘अमेज़न‘ ने ‘फ़्यूचर कूपन प्राइवेट लिमिटेड’ नाम की कंपनी के 49% शेयर्स ख़रीदे. लगभग 2,000 करोड़ रुपए में.

‘फ़्यूचर कूपन प्राइवेट लिमिटेड’ उन्हीं की कंपनी है, जिनकी ‘फ़्यूचर रिटेल’ है. यानी किशोर बियानी की. ‘फ़्यूचर रिटेल’ को नहीं जानते तो समझ लीजिए ‘बिग बाज़ार’ वाली कंपनी.

तो इस तरह हमें समझ में आता है कि ‘फ़्यूचर कूपन प्राइवेट लिमिटेड’ और ‘फ़्यूचर रिटेल’ दोनों अलग-अलग कंपनियां बेशक हैं लेकिन इनके मालिक, या यूं कहें प्रमोटर्स, एक ही हैं. साथ ही ‘फ़्यूचर कूपन प्राइवेट लिमिटेड’ के ‘फ़्यूचर रिटेल’ में दस प्रतिशत के क़रीब शेयर हैं.

यूं सीधा गणित है कि जैसे ही जेफ़ बेजोस की कंपनी अमेज़न ने ‘फ़्यूचर कूपन प्राइवेट लिमिटेड’ के 49% शेयर ख़रीदे, वैसे ही उनके पास ‘फ़्यूचर रिटेल’ के भी लगभग पांच प्रतिशत शेयर आ गए. मतलब अमेज़न अब ‘बिग बाज़ार’ वाली कंपनी, यानी फ़्यूचर ग्रुप, की भी पांच प्रतिशत की हिस्सेदार बन गई थी.

साथ ही जब अमेज़न ने ‘फ़्यूचर कूपन प्राइवेट लिमिटेड’ के शेयर्स ख़रीदे, तब डील में कई ऐसी चीज़ें थी जिनको अगर ‘गड़े मुर्दे’ कहा जाए तो आज वही उखड़कर आ रहे हैं.

 

जेफ़ बेजोस. अमेज़न के मालिक. जब दिल्ली आए थे, जनवरी में. (तस्वीर: PTI)

 

चलिए स्टोरी को नॉन लीनियर फ़ॉर्मेट में पढ़ते हैं और लौटते हैं, ‘बैक टू दी फ़्यूचर’.

 

# नाइंटीज़ का नॉस्टेल्ज़िया और प्रेजेंट का ‘फ़्यूचर’-

किशोर बियानी. नब्बे के दशक में रिटेल के किंग कहे जाते थे. क्यूं कहे जाते थे? ‘बिग बाज़ार’ नाम के फ़िनॉमिना के चलते. बिग बाज़ार. एक रिटेल चेन. जिसने अपने शुरुआती दिनों में ही कई पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए थे और कई नए बना लिए थे. एक शुरुआती सेल के दौरान बिग बाज़ार के कोलकाता वाले शॉपिंग मार्ट में इतनी बिक्री हो गई थी कि नज़दीक की SBI बैंक की शाखा ने उन पैसों को अपने पास रखने से मना कर दिया. क्यूं? क्यूंकि SBI के पास इतने सारे पैसों को रखने की कोई व्यवस्था नहीं थी. दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया जैसे अख़बार के पहले पन्ने में किसी सेल की सुपर सफलता की खबर (विज्ञापन नहीं) आना भी शायद पहली बार था.

तो किशोर और उनके फ़्यूचर ग्रुप का सालों तक भौकाल रहा. इस कदर कि बिग बाज़ार की गणतंत्र दिवस वाली सेल के दिन इनके स्टोर्स में दंगों सा माहौल बन जाता था. मोबाइल फोन और लैपटॉप जैसे महंगे गेजेट्स भी शेल्फ से ऐसे ग़ायब होते थे, मानो आलू-गोभी हों.

हालांकि 2008 में वैश्विक मंदी की मार इनके बिज़नेस पर भी पड़ी, लेकिन ये और इनका फ़्यूचर ग्रुप फिर से उठ खड़ा हुआ. बाद में, यानी 2012 में बयानी ने अपने सबसे पहले बिज़नेस ‘पैंटलून’ बिरला ग्रुप को बेच दिया. रीज़न वही था, जो अब है. पैसों की कमी.

फिर आया साल 2020. जब इन्होंने स्वीकार किया कि ओवर-डाइवर्सीफ़िकेशन इन्हें ले डूबा. डाइवर्सीफ़िकेशन मतलब, एक से ज़्यादा क्षेत्रों में अपना हाथ आज़माना. और ओवर-डाइवर्सीफ़िकेशन मतलब चादर से लंबे पांव पसार लेना. फिर इन्होंने क़र्ज़ वापस लौटाने में भी डिफ़ॉल्ट किया. क्यूंकि पैसा था नहीं. और फिर आया कोविड 19. मतलब ‘फ़्यूचर ग्रुप’ के लिए ये ‘करेला वो भी नीम चढ़ा’ वाली स्थिति हो गई. लॉक-डाउन के चलते इनके सारे स्टोर्स बंद रहे. और घाटा बढ़ता गया. क्यूंकि रोज़मर्रा के खर्चे तो हो ही रहे थे. सैलरी से लेकर, स्टोर्स का किराया तक.

अब इन्हें पड़ी ज़ल्दी. किस बात की? क़र्ज़ मुक्त होने की. तो आप कैसे हों क़र्ज़मुक्त? ऑफ़-कोर्स अपना बिज़नेस बेचकर. पर इतना भारी ताम-झाम ख़रीदे कौन? रेस्क्यू में आए मुकेश अंबानी. बोले मैं ख़रीदता हूं. उन्हें भी प्रॉफ़िट था. उनका रिलायंस स्टोर दुगना बड़ा हो रहा था. यूं सौदा तय हो गया. 24,700 करोड़ रुपये में.

 

किशोर बियानी. जो ‘It Happened In India’ नाम की किताब के लेखक भी हैं.

 

सब कुछ अच्छा चल रहा था. लेकिन फिर पिक्चर में आया ‘अमेज़न’ और लेकर आया पिछले साल के…

 

# गड़े मुर्दे-

अमेज़न ने जब पिछले साल ‘फ़्यूचर कूपन प्राइवेट लिमिटेड’ के शेयर्स ख़रीदे तो न केवल उसे फ़्यूचर रिटेल में पांच प्रतिशत के क़रीब की हिस्सेदारी मिली, बल्कि कुछ ‘एक्सकल्यूज़िव’ अधिकार भी मिले. क्या थे वो अधिकार? उससे पहले ये समझना ज़रूरी होगा कि, अमेज़न ने फ़्यूचर कूपन के शेयर लिए क्यूं?

ये समझ लीजिए जिस वजह से फ़ेसबुक ने जियो के शेयर्स लिए, ऐसी ही किसी वजह के चलते. मतलब फ़्यूचर ग्रुप और अमेज़न, लगभग एक ही तरह के बिज़नेस में थे. एक ऑनलाइन रिटेल स्टोर, एक ऑफ़लाइन रिटेल स्टोर. अमेज़न का मानना था कि भारत में रिटेल बिज़नेस में अपना पांव पसारने के लिए ये डील ‘एक और एक ग्यारह’ साबित होगी. जिसमें फ़्यूचर ग्रुप अपने प्रोडक्ट अमेज़न स्टोर्स में रख पाएगा और अमेज़न को ये सुविधा मिलेगी कि वो बिग बाज़ार के चलते रोज़मर्रा के सामान, 2 घंटे के भीतर, घर-घर डिलीवर कर पाए. वो जैसे बिग बास्केट करता है, चुनिंदा जगहों पर.

तो अमेज़न के ‘एक्सकल्यूज़िव’ अधिकारों में दो बातें शामिल थीं, जिनके चलते सारा मुद्दा, ‘विवादित’ बन गया है.

# पहली बात, अगर फ़्यूचर ग्रुप 2019 वाली डील के 3 से 10 साल के दौरान कुछ बेचे तो, अमेज़न को उसे ख़रीदने का सबसे पहला अधिकार मिलेगा. हालांकि 3 साल होते, न होते, फ़्यूचर ग्रुप पहले ही बिक गया या बिकने की ओर बढ़ गया.

# दूसरी, अगर फ़्यूचर ग्रुप अमेज़न ने बदले कहीं और बिकेगा तो ऐसा अमेज़न के ‘न’ कहने पर ही संभव हो सकेगा. ये क्लॉज़ था, ‘राईट ऑफ़ फ़र्स्ट रिफ़्यूजल’. मतलब सबसे पहले मना करने का अधिकार.

 

 

Last but not least, हमारी कहानी के तीसरे मुख्य किरदार, रिलायंस के मालिक, मुकेश अंबानी. तस्वीर इसी साल 4 फ़रवरी की है. (PTI)

 

# किसी का प्यार लेके तुम, नया जहां बसाओगे-

तो जब अंबानी-बयानी वाली हालिया डील चल रही थी, तब तो अमेज़न चुप रहा. शायद ‘लोहा गर्म होने पर चोट’ करने की सोच रहा था. और यूं जब डील फ़ाइनल हो गई, और सिर्फ़ रेगुलेटरी अथॉरिटीज़ से ओके आना बाकी रह गया, तब अमेज़न अपने ‘राईट ऑफ़ फ़र्स्ट रिफ़्यूजल’ वाले अधिकार को लेकर सिंगापुर चला गया. कि ये डील इल्लीगल है. अवैध है.

सिंगापुर में इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन सेंटर है. अमेज़न अपना केस लेकर वहां पहुंच गई. आर्बिट्रेशन का शाब्दिक अर्थ मध्यस्थता होता है. यूं जहां अमेज़न गई है, वो कोई कोर्ट नहीं है. साथ ही इस आर्बिट्रेशन सेंटर का कोई फ़ैसला भारत में लागू नहीं होगा. यहां तो भारत का क़ानून ही चलेगा. लेकिन फिर भी अमेज़न का इस इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन सेंटर में जाना तीन कंपनियों के बीच के विवाद की एक शुरुआत तो है ही.

तो अब आर्बिट्रेशन सेंटर का फ़ैसला आया है. उसने रिलायंस इंडस्ट्रीज और फ्यूचर ग्रुप की डील पर अस्थाई रोक लगा दी है. अस्थाई इसलिए, क्यूंकि स्थाई फ़ैसला 90 दिनों के भीतर आएगा. और जैसा कि आपको बताया, ये कोई कोर्ट तो है नहीं, इसलिए जो फ़ैसला लेंगे, वो जज नहीं तीन सदस्य समिति होगी. इस समिति में एक सदस्य फ़्यूचर ग्रुप से एक अमेज़न से और एक तटस्थ होगा.

अब चूंकि इस आर्बिट्रेशन सेंटर का फ़ैसला भी काफ़ी हद तक अनौपचारिक ही होगा, इसलिए देखना है कि फ़ैसला आने के बाद अमेज़न क्या भारतीय कोर्ट का भी दरवाज़ा खटखटाएगी?

उधर मुकेश अंबानी की रिलायंस का कहना है कि ये रिलायंस-फ़्यूचर की ये डील पूरी तरह भारतीय क़ानूनों का पालन करती है और हम जल्द से जल्द ये डील पूरी करना चाहते हैं.


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adminOctober 29, 20201min4740

कभी-कभी सोशल मीडिया पर कुछ ऐसा दिख जाता है कि दिमाग काफी देर तक घूमता रहता है. ऐसा ही एक वीडियो आजकल ट्विटर पर वायरल हो रहा है. इसमें एक लड़की ब्लैक बोर्ड पर लिखे जा रही है. बस उसके लिखने का तरीका ऐसा है कि किसी का भी दिमाग घुमा दे. आइए आपको बताते हैं कि इस वायरल वीडियो में खास क्या है.

 

क्या है इस वीडियो में खास

ट्विटर पर @Sampadananda नाम के हैंडल से एक ट्वीट किया गया है. इसे 15 हजार से ज्यादा लोग लाइक कर चुके हैं. इसमें एक लड़की गजब तरीके से लिखे जा रही है. लिख क्या रही है, जैसे जादू कर रही है. वैसे तो एक ही वाक्य को दोनों हाथों से साथ-साथ लिखना जादू लगता है. फिर दोनों ही हाथों से एक ही टाइम पर अलग-अलग वाक्य लिखना दूसरा जादू. और इतना ही काफी नहीं है, एक और सुपर मैजिक बाकी है. दो वाक्य ब्लैक बोर्ड पर लिखे जा रहे हैं और वह भी मिमर इमेज में. मतलब, जो वाक्य एक हाथ से सीधा लिखा जा रहा है, वही दूसरे हाथ से उल्टी तरफ से लिखा जा रहा है. इतना ही नहीं, ये लड़की आंखों पर पट्टी बांधकर भी लिखती है.

ट्विटर हैंडल में लिखा है-

प्राचीन भारत में एकसाथ कई चीजों पर एकाग्रता बनाने की कला ‘अवधान-कला’ कहलाती थी.

 

 

कौन है ये लड़की

इस लड़की का नाम है आदि स्वरूपा. बेंगलुरु में रहती है. इसकी उम्र है 15 साल. इसका कहना है कि इस तरह से वह 10 बरस की उम्र से ही लिख रही है. इसके अलावा पिछले पांच महीने के लॉकडाउन में उल्टा लिखने से लेकर आंख पर पट्टी बांधकर लिखने में खुद को पारंगत कर लिया है. पेंटिंग से लेकर राइटिंग तक की शौकीन आदि स्वरूपा का सपना राइटर और सिविल सर्वेंट बनने का है.

 

ये ऐसा कैसे कर लेती है

असल में इसे Ambidexterity (एंबीडेक्सटेरिटी) या ‘उभयहस्त’ कौशल कहते हैं. अक्सर यह गॉड गिफ्टेड, माने बचपन से ही कुछ बच्चों में होता है. इसे लिखने के मामले में प्रोडिजी टाइप का ही समझिए. ऐसे बच्चे बहुत तेजी से लिखते हैं और अक्सर दोनों हाथों से लिख सकते हैं. हालांकि सबकुछ प्रैक्टिस पर ही निर्भर करता है. जानकार कहते हैं कि भले ही खास टैलेंट वाले लोग ऐसा तेजी से कर पाते हैं, लेकिन कोई भी शख्स सामान्य तरीके से भी यह कर सकता है. बस इसके लिए प्रैक्टिस की जरूरत होती है.

वैसे यह टैलेंट सिर्फ लिखने तक ही सीमित नहीं है. कई खिलाड़ी भी दोनों हाथों से बेहतरीन खेल दिखा सकते हैं. ऐसे कई क्रिकेट खिलाड़ी हैं, जो दोनों हाथों से बराबर तेजी से थ्रो कर सकते हैं. क्रिकेट लेजेंड सचिन तेंदुलकर लेफ्ट हैंड से लिखते हैं, लेकिन बैटिंग और बोलिंग राइट हैंड से करते हैं. बॉलीबॉल लेजेंड कोबी ब्रायंट भी दोनों हाथों से बॉल को बेहतरीन तरीके से बास्केट कर सकते थे. उनके अलावा कई दूसरे खिलाड़ी भी एंबीडेक्सटर होने की वजह से ऐसा कौशल हासिल कर लेते हैं.

 

क्या यह ऐसी अकेली टैलेंटेड है

इससे पहले भी इस तरह के बच्चे सामने आए हैं. मेरठ की रहने वाली तेजस्वी त्यागी नाम की लड़की 2016 में ऐसे टैलेंट की वजह से खबरों में रही थी. दुनियाभर में इस तरह के हुनर को प्रैक्टिस के जरिए बढ़ाकर कई लोग हैरानी में डालने की महारथ रखते हैं.

 

ऐसे बच्चों का एक खास स्कूल भी है

‘इंडिया टुडे’ की 2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य प्रदेश के सिंगरौली नाम की जगह पर ‘वीणा वादिनी’ नाम का स्कूल है, जिसमें बच्चों को इसी तरह की ट्रेनिंग दी जाती है. ऐसे बच्चों का यह खास स्कूल है, जहां तकरीबन 150 बच्चे ट्रेनिंग लेते हैं.

 


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adminOctober 29, 20201min4550

हार्ले डेविडसन ने एक इलेक्ट्रिक बाइक पेश की है. इसे आप इलेक्ट्रिक साइकिल भी कह सकते हैं. क्योंकि देखने में ये आम साइकिल से ज़्यादा अलग नहीं है.

हार्ले डेविडसन आने वाले समय में अपने e Bike डिविज़न को Serial 1 Cycle कंपनी ने नाम से स्टैब्लिश कर सकती है.

आपको बता दें कि 1903 में हार्ले डेविसन की सबसे पुरानी मोटरसाइकिल का नाम Serial Number One था.  Serial 1 Cycle के लिए कंपनी ने एक अलग टीम तैयार की है.

यही वजह है कि कंपनी ने इसका भी नाम Serial 1 रखा है. इस इलेक्ट्रिक बाइक की बिक्री अगले साल मार्च से शुरू होगी. कंपनी ने फिलहाल इसके स्पेसिफिकेशन्स शेयर नहीं किए हैं.

 

 

Serial 1 में व्हाइट टायर्स दिए गए हैं और आम साइकल की तरह इसमें भी एक सीट है और ट्रेडिशनल चेन के साथ पेडल्स दिए गए है. कंपनी ने Serial 1 Cycle के लिए एक डेडिकेटेड वेबसाइट भी बनाई है.

Harley Davidson Serial 1 Cycle वेबसाइट पर काउंटडाउन टाइमर है जो 16 नवंबर तक के लिए है. यानी कंपनी 16 नवंबर को इसके बारे में और भी जानकारी शेयर कर सकती है.

हार्ले डेविडसन के मुताबिक़ Serial 1 eBucycle किसी को भी दूर, तेज़ और बिना एफर्ट के राइड देगी, जो अर्बन कम्यूट के लिए बेहतरीन सल्यूशन होगा.

अगले महीने कंपनी इस eCycle के बारे में डीटेल्स बताएगी तब साफ़ होगा कि ये कैसे काम करेगी. इसमें इलेक्ट्रिक का यूज कैसे किए जाएगा और इसका मार्केट क्या होगा.

 

 

गौरतलब है कि पिछले कुछ समय से हार्ले डेविडसन भारत से जाने की तैयारी में थी. लेकिन अब कंपनी भारतीय बाइक मेकर हीरो मोटोकॉर्प के साथ पार्टनरशिप की है. यानी कंपनी फिलहाल भारत में रहेगी और हीरो मोटोकॉर्प के साथ मिल कर अपना बिजनेस आगे बढ़ाएगी.


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adminOctober 26, 20201min4320

कोरोना वायरस महामारी की वजह से देश का लक्जरी या महंगी कारों का बाजार पांच से सात साल पीछे चला गया है। जर्मनी की वाहन क्षेत्र की कंपनी ऑडी के एक शीर्ष अधिकारी ने यह बात कही।

ऑडी इंडिया के प्रमुख बलबीर सिंह ढिल्लों ने पीटीआई-भाषा से कहा कि लक्जरी कार के बाजार को फिर से 2014-15 के स्तर पहुंचने के लिए दो से तीन साल लगेंगे।

उन्होंने कहा कि कोविड-19 की वजह से आई दिक्कतों के बाद अब स्थिति सुधर रही है। हालांकि, हमारी बिक्री में अगले साल ही निचले आधार प्रभाव पर वृद्धि देखने को मिलेगी।

ढिल्लों ने कहा, ‘‘हम सभी कह रहे हैं कि बिक्री बढ़ रही है और धारणा सकारात्मक हुई है। हम भी अगले साल वृद्धि दर्ज करेंगे। आधार प्रभाव काफी नीचे चला गया है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘2014-15 में हमने जितनी कारें बेची थीं, हम उस स्तर पर तत्काल अगले साल नहीं पहुंच पाएंगे। ऐसे में महामारी ने हमें पांच से सात साल पीछे कर दिया है।’’ 2014 में भारत में लक्जरी कारों की बिक्री 30,000 इकाई रही थी। 2015 में यह 31,000 इकाई रही थी।

यह पूछे जाने पर लक्जरी कार उद्योग की स्थिति कब तक सुधरेगी, ढिल्लों ने कहा कि निश्चित रूप से यह अगले साल नहीं होगा। हमें उस स्तर पर पहुंचने में दो से तीन साल लगेंगे।

भारत के लक्जरी कार बाजार की शीर्ष पांच कंपनियों में मर्सिडीज, बीएमडब्ल्यू, ऑडी, जेएलआर और वोल्वो शामिल हैं। इन कंपनियों की बिक्री 2019 में 35,500 इकाई रही थी। 2018 में इन कंपनियों की बिक्री 40,340 इकाई रही थी।


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adminOctober 26, 20201min4730

इंडियन प्रीमयर लीग यानी आईपीएल को फैंस मज़ाकिया तौर पर इंडियन पैसा लीग भी कहते हैं. इस लीग में हर रन की कीमत होती है.

लेकिन अगर टीम को अपने किसी खिलाड़ी का एक-एक रन ही 12 लाख रुपये का पड़े, तो सौदा घाटे का ही कहा जाएगा.

ग्लेन मैक्सवेल जैसे धुआंधार बल्लेबाज़ का बल्ला आईपीएल 2020 में बिलकुल खामोश है.

और वो सिर्फ अकेले ऐसे खिलाड़ी नहीं है जिन्हें कोई टीम मोटी रकम में लेकर पछता रही हो.

इस सीज़न में ऐसे महँगे खिलाड़ियों की भरमार है जो अपनी फ्रैंचाइज़ी की उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पाए हैं.

 

ग्लैन मैक्सवेल

मैक्सवेल को पंजाब ने आईपीएल 2020 के लिए 10 करोड़ 75 लाख रुपये की भारी भरकम बोली लगाकर खरीदा था. लेकिन इस खिलाड़ी ने अब तक किंग्स इलेवन टीम को अपने दम पर एक भी मैच नहीं जिताया है. उनका बैटिंग ऑर्डर चेंज कर टीम ने अपनी किस्मत बदलने की भरपूर कोशिश की, लेकिन जो नहीं बदला वो है मैक्सवेल का खराब फ़ॉर्म.

खेल पत्रकार विजय लोकपल्ली के मुताबिक, “ग्लेन मैक्सवेल को पंजाब टीम ने उनकी एक्सप्लोसिव बैटिंग के लिए खरीदा था. साथ ही वो गेंद से भी कॉन्ट्रीब्यूट करने की क्षमता रखते हैं. आईपीएल के पिछले सीज़न्स में भी वो कई दमदार पारियां खेल चुके हैं, साथी ही वो इंग्लैंड के खिलाफ सिरीज़ में भी अच्छा परफॉर्म करके आए थे. लेकिन इस बार शायद यूएई की स्लो पिचों पर वो खुद को ढाल नहीं पाए हैं.”

इस सीज़न के शुरुआती 10 मैचों में मैक्सवेल ने 15 के मामूली औसत से 90 रन ही बनाए. इसमें उनका सर्वाधिक स्कोर 32 रन का रहा है. मज़े की बात ये है कि इस खिलाड़ी के बल्ले से इस सीज़न में अब तक एक छक्का तक नहीं निकला है. कीमत के हिसाब से उनका बनाया एक रन टीम को करीब 12 लाख रुपये का पड़ रहा है. गेंद से भी वो सिर्फ दो ही विकेट निकाल सके हैं.”

 

केदार जाधव

चेन्नई सुपरकिंग्स के लिए टी-20 लीग का ये सीज़न किसी बुरे सपने की तरह रहा है. टीम को लगातार 3 मैचों में हार मिली.

इन हार में केदार जाधव को बड़ा कारण माना गया. केदार जाधव को चेन्नई ने साढ़े सात करोड़ रुपये की कीमत में अपने साथ जोड़ा था.

लेकिन उन्होंने भी दाम बड़े और दर्शन छोटे ही दिए.

केदार ने इस सीज़न में चेन्नई के लिए आठ मैचों में 20.66 के औसत से सिर्फ 62 रन ही बनाए हैं.

 

पैट कमिंस

कोलकाता के सिर पर इस सीज़न के प्लेऑफ से बाहर होने का खतरा मंडरा रहा है तो इसके काफी हद तक ज़िम्मेदार उसके बल्लेबाज़ पैट कमिंस भी हैं. कमिंस को कोलकाता ने बड़ी उम्मीदों के साथ साढ़े पंद्रह करोड़ रुपये में अपने साथ जोड़ा था.

आईपीएल में किसी विदेशी खिलाड़ी को मिलने वाली ये सबसे बड़ी कीमत है. लेकिन कमिंस इस कीमत पर खरे नहीं उतरे. आईपीएल 2020 में उन्होंने शुरुआती 10 मैचों में 26 के औसत से 130 रन ही बनाए .गेंद से भी वो कुछ खास नहीं कर सके और केवल तीन विकेट की निकाल पाए.

खेल पत्रकार आदेश कुमार गुप्त कहते हैं, “भारत से बाहर लीग का होना इन खिलाड़ियों की खराब परफॉर्मेंस का कुछ हद तक कारण हो सकता है. चेन्नई की टीम अपने घर पर शेर थी, वहां स्पोर्टर्स भी होते थे, पिच भी अपने तरीके से तैयार कराई जाती थी. ऊपर से यूएई की गर्मी से ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी परेशान रहे, खासकर पैट कमिंस.”

 

आंद्रे रसेल

पैट कमिंस के बाद कोलकाता के लिए फ्लॉप कड़ी रहने वाले आंद्रे रसेल दूसरे महंगे खिलाड़ी हैं. पिछले सीजन में 510 रन बनाने वाले रसेल से इस साल भी धुआंधार प्रदर्शन की उम्मीद थी.

रसेल से कोलकाता की फ्रैंचाइजी एक फिनिशर की भूमिका की उम्मीद करती है जिसपर वो अभी तक खरे नहीं उतर सके हैं. रसेल ने कोलकाता के लिए इस सीज़न के शुरुआती 9 मैचों में 11.05 के औसत से सिर्फ 92 रन बनाए हैं. गेंदबाज़ी में उन्होंने ज़रूर 6 विकेट झटके हैं, लेकिन इसका फ़ायदा टीम को ज़्यादा नहीं हुआ है.

विजय लोकपल्ली कहते हैं, “रसेल का परफॉर्म ना करना टीम को बहुत चुभा है. वो एक ऐसे खिलाड़ी है जो अपने दम पर मैच पलट देते हैं. लेकिन उनका गेंद और बल्ले से फ्लॉप रहना, लीग में कोलकाता की स्थिति बताता है.”

 

शेल्डन कॉट्रेल

2019 विश्व कप में वेस्टइंडीज़ के लिए सर्वाधिक विकेट लेने वाले कॉट्रेल का ये पहला आईपीएल सीज़न है. नीलामी में पंजाब ने उन्हें 8.5 करोड़ रुपये देकर बड़े अरमानों से अपने साथ जोड़ा था.

लेकिन जितने शानदार तरीके से वो बल्लेबाज़ों को सेंड ऑफ देते हैं, उतने ही खराब इस सीज़न में उनके आंकड़े हैं. अपने शुरुआती छह मैचों में कॉट्रेल सिर्फ छह विकेट ही निकाल पाए हैं. पंजाब की टीम अपने पहले छह मैच हारी तो इसमें कॉट्रेल की भी भूमिका रही.

पूर्व क्रिकेटर अशोक मलहोत्रा का कहना है, “मेरे लिए सबसे ज़्यादा निराशाजनक ये कि आप किसी गेंदबाज़ को 12-15 करोड़ में नहीं खरीद सकते. कोई दिन खराब होने पर गेंदबाज़ों पर लाठी चलती है. उनका चार में से एक ओवर तो खराब जाता ही है. जितने भी नामी खिलाड़ी इस लीग में खेल रहे हैं, चाहे मैक्सवेल, कॉट्रेल, या पैट कमिंस हों, टीमों के लिए महंगी दुकान और फीका पकवान जैसे रहे हैं.”

इस सीज़न में कोलकाता के सुनील नारायन (8.5 करोड़), करुण नायर (5.6 करोड़) और चेन्नई के पीयूष चावला (6.5 करोड़) का प्रदर्शन भी उनकी कीमत के अनुसार नहीं रहा है.


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adminOctober 26, 202081min4500

रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जो बाइडन चुनौती दे रहे हैं. दोनों नेता शुक्रवार को नैशविल में आख़िरी प्रेसिडेन्शियल डिबेट में हिस्सा लेंगे.

इस डिबेट को चुनाव प्रचार का बेहद अहम पड़ाव माना जाता है जब दोनों नेता मतदान के कुछ दिन पहले जनता के सामने अपनी बातें रखते हैं.

जो बाइडन, पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के उप-राष्ट्रपति के तौर पर ज़्यादा मशहूर हैं. हालांकि बाइडन, अमरीका की राजनीति में 1970 के दशक से ही सक्रिय रहे हैं.

जैसे-जैसे मतदान का दिन क़रीब आता जा रहा है, वैसे-वैसे चुनावी सर्वे करने वाली कंपनियाँ इस कोशिश में जुटी हैं कि वो लोगों से उनकी पसंद के उम्मीदवार के बारे में पूछ कर, असली नतीजे आने से पहले जनता का मूड भाँप सकें.

हम, चुनाव से पहले होने वाले इन सभी सर्वेक्षणों पर नज़र बनाए रखेंगे. हमारी कोशिश ये पता लगाने की होगी कि इन ओपिनियन पोल के ज़रिए चुनाव का रुख़ भाँप सकें. हम ये भी जानने की कोशिश करेंगे कि ये पोल, अमरीकी जनता के मूड के बारे में क्या बता सकते हैं और क्या नहीं बता सकते.

 

राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रपति पद के दोनों उम्मीदवार कैसी छाप छोड़ रहे हैं?

अमरीका में राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले ओपिनियन पोल, इस बात का पता लगाने का अच्छा माध्यम हैं कि पूरे देश में कौन सा उम्मीदवार कितना लोकप्रिय है. लेकिन, यहाँ ध्यान देने वाली बात ये है कि इससे राष्ट्रपति चुनाव के असली नतीजों का संकेत नहीं मिलता.

मिसाल के तौर पर, 2016 में राष्ट्रीय स्तर के लगभग सभी चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में हिलेरी क्लिंटन, डोनाल्ड ट्रंप से क़रीब 30 लाख वोटों से आगे चल रही थीं.

लेकिन, असली नतीजे आए, तो वो ट्रंप से हार गई थीं. ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि अमरीका में इलेक्टोरल कॉलेज का सिस्टम है. इसलिए, जनता के ज़्यादा वोट हासिल करने के बावजूद कोई राष्ट्रपति चुनाव जीत ही जाए, ये ज़रूरी नहीं है.

इस शर्त को हटा दें, तो जो बाइडन इस साल के अधिकतर राष्ट्रीय सर्वेक्षणों में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से आगे रहे हैं. हाल के कुछ हफ़्तों की बात करें, तो बाइडन को लगभग 50 प्रतिशत मतदाताओं का समर्थन मिलता दिख रहा है.

राष्ट्रपति ट्रंप पर उन्हें कम से कम 8 अंकों की बढ़त इन ओपिनियन पोल में मिल रही है. लेकिन, पिछले कुछ दिनों में डोनाल्ड ट्रंप केअमरीकी राष्ट्रपति चुनाव 2020: ट्रंप आगे या बाइडन? समर्थकों की संख्या भी बढ़ी है.

है.

 

राष्ट्रीय सर्वेक्षणों में कौन है आगे?

 

नव॰चुनाव का दिन 8 दिन बाकी 24 अक्तू॰ट्रेंंड43%51%

विभिन्न सर्वेक्षणों के आधार पर वोट डालने के इरादे का औसत

 

इस चार्ट को छोड़ दें

तारीख़
बाइडन
ट्रंप
Oct 24 51 43
Oct 24 51 43
Oct 23 51 42
Oct 23 51 42
Oct 22 51 43
Oct 22 51 43
Oct 21 51 43
Oct 21 51 43
Oct 20 51 43
Oct 20 51 43
Oct 20 51 43
Oct 20 51 43
Oct 20 51 43
Oct 19 52 42
Oct 19 52 42
Oct 19 52 42
Oct 19 52 42
Oct 18 52 42
Oct 18 52 42
Oct 18 52 42
Oct 18 52 42
Oct 17 52 42
Oct 17 52 42
Oct 17 52 42
Oct 16 52 42
Oct 16 52 42
Oct 15 52 42
Oct 15 52 42
Oct 15 52 42
Oct 14 52 42
Oct 14 52 42
Oct 13 53 42
Oct 13 53 42
Oct 13 53 42
Oct 13 53 42
Oct 13 53 42
Oct 13 53 42
Oct 13 53 42
Oct 12 52 42
Oct 12 52 42
Oct 12 52 42
Oct 12 52 42
Oct 11 53 42
Oct 11 53 42
Oct 10 52 42
Oct 10 52 42
Oct 09 52 42
Oct 09 52 42
Oct 08 52 42
Oct 07 52 42
Oct 06 52 42
Oct 06 52 42
Oct 06 52 42
Oct 06 52 42
Oct 06 52 42
Oct 06 52 42
Oct 05 51 42
Oct 04 51 42
Oct 04 51 42
Oct 04 51 42
Oct 04 51 42
Oct 03 51 43
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Oct 02 51 42
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Oct 01 51 43
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Sep 30 51 43
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Sep 29 51 43
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Sep 27 50 43
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Sep 26 50 43
Sep 25 50 43
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Sep 24 50 43
Sep 24 50 43
Sep 24 50 43
Sep 23 51 43
Sep 23 51 43
Sep 22 51 43
Sep 22 51 43
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Sep 21 51 43
Sep 21 51 43
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Sep 16 51 43
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Sep 15 50 43
Sep 15 50 43
Sep 15 50 43
Sep 15 50 43
Sep 14 51 43
Sep 14 51 43
Sep 13 51 43
Sep 12 51 43
Sep 12 51 43
Sep 11 51 43
Sep 10 51 43
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Sep 08 51 43
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Sep 08 51 43
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Sep 05 51 43
Sep 04 51 42
Sep 04 51 42
Sep 03 51 42
Sep 02 51 43
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Jul 28 49 41
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Jul 26 51 41
Jul 25 51 41
Jul 24 51 41
Jul 23 51 41
Jul 22 50 41
Jul 21 50 41
Jul 21 50 41
Jul 20 50 41
Jul 19 51 41
Jul 18 51 41
Jul 17 50 41
Jul 16 50 41
Jul 15 50 41
Jul 15 50 41
Jul 14 50 40
Jul 14 50 40
Jul 13 51 40
Jul 12 51 40
Jul 12 51 40
Jul 11 49 40
Jul 10 49 40
Jul 09 49 40
Jul 08 49 40
Jul 07 50 41
Jul 07 50 41
Jul 06 49 41
Jul 05 49 40
Jul 04 49 40
Jul 03 49 40
Jul 02 49 40
Jul 01 50 41
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May 19 48 43
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May 14 49 43
May 14 49 43
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May 11 48 43
May 10 48 43
May 09 47 42
May 08 48 42
May 07 48 42
May 06 48 42
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May 04 48 42
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May 02 48 42
May 01 48 42
Apr 30 48 42
Apr 29 48 42
Apr 28 48 42
Apr 28 48 42
Apr 27 49 42
Apr 26 49 42
Apr 25 49 42
Apr 24 48 42
Apr 23 48 42
Apr 22 48 42
Apr 21 48 42
Apr 20 48 43
Apr 19 49 43
Apr 18 49 43
Apr 17 49 42
Apr 16 49 42
Apr 15 48 42
Apr 14 48 42
Apr 13 48 42
Apr 12 48 42
Apr 11 48 42
Apr 10 48 42
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Apr 08 48 42
Apr 07 48 42
Apr 07 48 42
Apr 07 48 42
Apr 06 49 42
Apr 06 49 42
Apr 06 49 42
Apr 05 48 43
Apr 04 48 43
Apr 03 48 43
Apr 02 48 43
Apr 01 49 44
Mar 31 49 45
Mar 30 49 45
Mar 29 49 45
Mar 28 49 45
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Mar 26 49 45
Mar 25 49 44
Mar 24 49 43
Mar 24 49 43
Mar 23 50 44
Mar 22 50 44
Mar 21 52 42
Mar 20 52 43
Mar 19 52 43
Mar 18 52 42
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Mar 09 51 42
Mar 08 51 42
Mar 07 50 43
Mar 06 49 45
Mar 05 49 45
Mar 04 49 45
Mar 03 49 45
Mar 02 49 45
Mar 01 50 45
Feb 29 50 45
Feb 28 50 45
Feb 27 50 44
Feb 26 50 45
Feb 25 50 45
Feb 24 50 45
Feb 23 50 45
Feb 22 50 45
Feb 21 50 44
Feb 20 50 44
Feb 19 50 44
Feb 18 50 44
Feb 17 51 44
Feb 17 51 44
Feb 16 50 44
Feb 15 50 43
Feb 14 50 43
Feb 13 50 43
Feb 12 50 46
Feb 11 50 44
Feb 10 50 44
Feb 09 50 44
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Feb 04 50 45
Feb 03 50 45
Feb 02 50 45
Feb 01 50 44
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Jan 30 50 44
Jan 29 50 44
Jan 28 50 44
Jan 27 50 45
Jan 26 50 45
Jan 25 50 45
Jan 24 50 46
Jan 23 50 46
Jan 23 50 46
Jan 22 50 44
Jan 21 51 45
Jan 20 51 45
Jan 19 51 45
Jan 18 48 46
Jan 17 48 46
Jan 16 48 46
Jan 15 48 46
Jan 14 48 46
Jan 13 48 46
Jan 12 48 46
Jan 11 48 46

39 days until चुनाव का दिन

कौन से अमरीकी राज्य इस चुनाव के नतीजे तय करेंगे?

इसकी तुलना में 2016 में ये पोल इतने स्पष्ट नतीजे देने वाले नहीं थे. उस समय डोनाल्ड ट्रंप और उनकी प्रतिद्वंदी हिलेरी क्लिंटन के बीच कुछ ही अंकों का फ़ासला दिखता था. ख़ास तौर से जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आते गए, पोल में ये मुक़ाबला काफ़ी क़रीबी होता गया था.

जैसा कि 2016 में हिलेरी क्लिंटन को चुनाव में हारने के बाद अंदाज़ा हुआ था. कोई प्रत्याशी कितने वोट जीतता है, ये बात कम अहम है. असल बात जो नतीजे तय करती है, वो ये है कि ये वोट उसे किस राज्य से मिलते हैं.

ज़्यादातर राज्य हर राष्ट्रपति चुनाव में एक ही तरह से मतदान करते हैं. इसका अर्थ ये होता है कि कुछ गिने-चुने राज्य हैं, जहाँ पर किसी प्रत्याशी के जीतने की संभावना होती है. यही वो राज्य होते हैं, जो ये तय करते हैं कि राष्ट्रपति चुनाव में कौन जीतेगा और कौन हारेगा. इन्हें अमरीकी राजनीति में बैटलग्राउंड स्टेट्स कहा जाता है..

 

 

अमरीकी चुनाव

 

 

अमरीका अपने जिस इलेक्टोरल कॉलेज सिस्टम के ज़रिए अपना राष्ट्रपति चुनता है, उसके तहत हर अमरीकी राज्य को उसकी आबादी के हिसाब से इलेक्टोरल कॉलेज के वोट दिए जाते हैं. देश में इलेक्टोरल कॉलेज के 538 वोट होते हैं. इसलिए, राष्ट्रपति चुनाव जीतने के लिए किसी भी उम्मीदवार के लिए इलेक्टोरल कॉलेज के 270 वोट जीतना ज़रूरी होता है.

 

बैटलग्राउंड स्टेट्स में कौन आगे है?

इस समय बैटलग्राउंड स्टेट्स में जो बाइडन को बढ़त मिलती दिख रही है. लेकिन, अभी भी असली मतदान में काफ़ी समय है. और हालात बड़ी तेज़ी से बदल सकते हैं. ख़ास तौर से तब और जब हम ये जानते हैं कि चुनाव के मैदान में डोनाल्ड ट्रंप जैसे उम्मीदवार हैं.

जैसा कि पोल इशारा कर रहे हैं, मिशिगन, पेन्सिल्वेनिया और विस्कॉन्सिन में जो बाइडन को ज़्यादा बढ़त हासिल है. 2016 में ट्रंप ने इन औद्योगिक राज्यों में हिलेरी क्लिंटन पर बमुश्किल जीत हासिल की थी. इन राज्यों में उन्हें हिलेरी के मुक़ाबले एक प्रतिशत (या इससे भी कम) ही अधिक वोट मिले थे.

 

बैटलग्राउंड स्टेट्स में ताज़ा पोलिंग औसत

 
राज्य बाइडन ट्रंप साल 2016 में कौन जीता था
आयोवा 47.2% 46.4% ट्रंप + 9.5%
एरिज़ोना 48.8% 46.4% ट्रंप + 3.6%
ओहियो 46.2% 46.8% ट्रंप + 8.2%
जॉर्जिया 47.5% 46.3% ट्रंप + 5.2%
टेेक्सस 45.5% 49.5% ट्रंप + 9.1%
नेवाडा 49.0% 43.8% क्लिंटन + 2.4%
नॉर्थ कैरोलिना 49.2% 47.7% ट्रंप + 3.7%
न्यू हैंपशर 53.4% 42.4% क्लिंटन + 0.4%
पेन्सिल्वेनिया 49.6% 44.5% ट्रंप + 0.7%
फ़्लोरिडा 48.6% 47.1% ट्रंप + 1.2%
मिनेसोटा 48.0% 42.0% क्लिंटन + 1.5%
मिशिगन 50.4% 42.6% ट्रंप + 0.2%
वर्जिनिया 51.7% 40.3% क्लिंटन + 5.4%
विस्कॉन्सिन 49.3% 44.7% ट्रंप + 0.8%

स्रोत: US Census जब आखिरी बार आंकड़े अपडेट किए गए: 23/10

 

लेकिन, ध्यान देने वाली बात ये है कि 2016 में डोनाल्ड ट्रंप ने इन्ही बैटलग्राउंड राज्यों में भारी जीत हासिल की थी. और आज की तारीख़ में उनकी चुनावी टीम को इसी की अधिक चिंता हो रही होगी.

2016 में आयोवा, ओहायो और टेक्सस में ट्रंप की जीत का अंतर 8-10 प्रतिशत था. लेकिन, इस बार कम से कम इस समय तो इन तीनों ही राज्यों में ट्रंप और जो बाइडन के बीच कांटे की टक्कर दिख रही है.

पोल के इन नतीजों से ये बात अपने आप समझ में आ जाती है कि आख़िर ट्रंप ने क्यों अपने फिर से चुनाव जीतने के अभियान की टीम के मैनेजर को जुलाई महीने में बदला था. और वो बार-बार इन सर्वेक्षणों को ‘फ़ेक पोल्स’ कहते रहते हैं.

हालाँकि, जहाँ तक सट्टा बाज़ार की बात है, तो वहाँ पर अभी भी ट्रंप की हार पर दाँव नहीं लगाया जा रहा है. अभी के भाव के अनुसार अब भी दाँव लगाने वाले तीन के मुक़ाबले एक वोट से ये मान कर चल रहे हैं कि तीन नवंबर को ट्रंप ही राष्ट्रपति चुनाव जीतेंगे.

कोरोना वायरस के प्रकोप का ट्रंप की लोकप्रियता पर असर पड़ा है?

कोरोना वायरस की महामारी इस साल की शुरुआत से ही अमरीका में सुर्ख़ियों में बनी हुई है. और इससे निपटने के राष्ट्रपति ट्रंप के तौर तरीक़ों को लेकर अमरीकी जनता पार्टी लाइन पर बँटी नज़र आती है.

जब मार्च महीने के मध्य में ट्रंप ने राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा की थी और राज्यों को वायरस का प्रकोप फैलने से रोकने के लिए 50 अरब डॉलर की मदद का एलान किया था. तब उनके क़दम की लगभग 55 प्रतिशत अमरीकी लोगों ने सराहना की थी. उसका समर्थन किया था.

लेकिन, उसके बाद से कम से कम डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थक तो उनके साथ इस मामले में खड़े नहीं दिखते. हालाँकि, कोरोना वायरस के मामले में रिपब्लिकन पार्टी के समर्थक अपने राष्ट्रपति के साथ मज़बूती से खड़े हैं.

 

अमरीकी चुनाव

 

हालांकि, कोरोना वायरस से निपटने के बारे में अमरीकी जनता की राय बताने वाला सबसे हालिया सर्वेक्षण ये कहता है कि अब तो राष्ट्रपति ट्रंप के समर्थकों ने भी उनके तौर तरीक़ों पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं.

क्योंकि, अमरीका के दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों को दोबारा से इस महामारी के प्रकोप से निपटना पड़ रहा है. जुलाई के शुरुआती हफ़्ते में ट्रंप को इस मामले में रिपब्लिकन समर्थकों का समर्थन भी घट कर 78 प्रतिशत ही रह गया था.

इन आँकड़ों से ही ये बात समझ में आ जाती है कि क्यों राष्ट्रपति ट्रंप हाल के दिनों में कोरोना वायरस के प्रकोप को लेकर बहुत ज़्यादा उम्मीद जताने वाले बयान नहीं दे रहे हैं. बल्कि वो तो चेतावनी दे रहे हैं कि ‘अमरीका में हालात बेहतर होने से पहले और ख़राब हो सकते हैं.’

हाल ही में ट्रंप को पहली बार फ़ेस मास्क लगाकर जनता के बीच देखा गया. यही नहीं ट्रंप ने अमरीकी जनता से भी अपील की कि वो मास्क पहने, क्योंकि ‘इसका अच्छा प्रभाव पड़ेगा’ और यही, ‘देशभक्ति’ है.

वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों की ओर से तैयार एक हालिया मॉडल के अनुसार एक नवंबर, यानी अमरीका में मतदान से ठीक दो दिन पहले तक, अमरीका में कोरोना वायरस से 2 लाख 30 हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी होगी.

क्या हम इन पोल्स/सर्वेक्षणों पर भरोसा कर सकते हैं?

चुनाव पूर्व हो रहे इन ओपिनियन पोल्स को ये कह कर ख़ारिज करना बहुत आसान है कि, 2016 के चुनाव में ये पोल बिल्कुल ग़लत साबित हुए थे. राष्ट्रपति ट्रंप तो बार-बार यही दावा करते हैं. लेकिन, ये बात पूरी तरह से सच नहीं है.

2016 में ज़्यादातर राष्ट्रीय सर्वेक्षणों में हिलेरी क्लिंटन को कुछ प्रतिशत अंकों से आगे दिखाया था. लेकिन, इसका ये मतलब नहीं कि वो ग़लत थे. ये बात इस तथ्य से स्पष्ट है कि हिलेरी क्लिंटन ने ट्रंप के मुक़ाबले 30 लाख वोट ज़्यादा हासिल किए थे.

हालाँकि, 2016 में ओपिनियन पोल करने वालों के साथ कुछ दिक़्क़त तो थी. इन सर्वेक्षणों में बिना कॉलेज की डिग्री वाले वोटर का उचित तरीक़े से प्रतिनिधित्व नहीं दर्शाया गया था.

इसका ये मतलब था कि कई बैटलग्राउंड राज्यों में ट्रंप की बढ़त को इन ओपिनियन पोल्स में काफ़ी दिनों तक दर्ज नहीं किया गया था. और कुछ ओपिनियन पोल में तो ट्रंप के इन समर्थकों का प्रतिनिधित्व आख़िर तक नहीं दर्ज किया गया. लेकिन, ज़्यादातर पोलिंग कंपनियों ने अपनी इस कमी को इस बार सुधार लिया है.

लेकिन, इस साल के अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में पिछली बार से भी अधिक अनिश्चितता है. इसकी वजह कोरोना वायरस की महामारी और इसका अर्थव्यवस्था पर प्रभाव है.

अब ये ठीक-ठीक अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता है कि कोरोना वायरस के प्रकोप का, नवंबर में लोगों के वोटिंग पैटर्न पर कैसा और कितना असर पड़ेगा. इसीलिए, चुनाव से पहले अमरीका में हो रहे इन सभी ओपिनियन पोल को एक हद तक शक से देखना ही बेहतर होगा. ख़ास तौर से तब जबकि अभी चुनाव तीन महीने दूर हैं.


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adminOctober 26, 20201min4610

केरल सरकार, सीबीआई को दी गई सामान्य सहमति वापस लेने पर विचार कर रही है. केरल में इस वक्त LDF, CPI (M) और CPI की गठबंधन सरकार सत्ता में है. गठबंधन में शामिल दल चाहते हैं कि सीबीआई पर उसी तरह नियंत्रण की जरूरत है जैसा कुछ अन्य राज्यों में किया गया है. इस मामले में विपक्ष के नेता रमेश चेन्निथला वे कहा कि राज्य में सीबीआई पर अंकुश लगाने का कदम आत्मघाती है और इसके जरिए सरकार लाइफ मिशन योजना के भ्रष्टाचार को ढकने की कोशिश कर रही है.

अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक राज्य के कानून मंत्री और CPI(M) के वरिष्ठ नेता एके बालन ने कहा,

“कई राज्यों ने पहले ही मामलों की जांच के लिए सीबीआई को दी गई आम सहमति वापस ले ली है. CPI(M) और CPI की मांग के बाद केरल भी इस पर विचार कर रहा है. राज्यों ने उन दिनों सीबीआई को समान्य सहमति दी थी जब एजेंसी के पास विश्वसनीयता थी.”

बालन ने आगे कहा,

“हम केंद्रीय एजेंसी की ताकत पर कोई सवाल नहीं कर रहे हैं. दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के सेक्शन 6 के अनुसार सीबीआई को मामला दर्ज करने से पहले संबंधित राज्यों से सहमति लेनी होगी. हम राज्य सरकारों के लिए उस सुरक्षा को बनाए रखना चाहते हैं. पहले के वक्त में एक एक्जीक्यूटिव ऑर्डर के माध्यम से सीबीआई को मामलों की जांच के लिए राज्यों द्वारा एक सामान्य सहमति दी गई थी. कई राज्यों ने उस सहमति को वापस ले लिया है, और यह विकल्प अब केरल सरकार के सामने भी है.”

 

ये है मामला

इससे पहले सीबीआई ने कांग्रेस विधायक अनिल अकारा की एक शिकायत के आधार पर, राज्य सरकार की संस्था लाइफ मिशन द्वारा कथित विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) उल्लंघन के एक मामले में एक FIR दर्ज की थी. लाइफ मिशन ने इस FIR को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी जिसने इस महीने की शुरुआत में सीबीआई जांच पर रोक लगा दी थी. हाईकोर्ट ने कहा कि लाइफ मिशन FCRA सेक्शन 3 के दायरे में नहीं आता है, जो विदेशी योगदान स्वीकार करने पर रोक लगाता है.

बालन ने कहा कि लाइफ मिशन प्रोजेक्ट के मामले में सीबीआई एक ऐसे क्षेत्र में घुस गई जो उसके अधिकार में नहीं है. उन्होंने कहा,

“जब सीबीआई ऐसी चीजों में हस्तक्षेप करती है तब हम उन्हें चुनौती देने को मजबूर होते हैं. केरल सरकार को उस मामले में हाईकोर्ट से राहत मिल चुकी है.”

 

सीबीआई का दुरुपयोग?

CPI(M) के स्टेट सेक्रेटरी कोडिएरी बालाकृष्णन ने कहा कि पार्टी चाहती थी कि सरकार, राजनीतिक हथियार के रूप में सीबीआई के दुरुपयोग को रोकने के लिए कानूनी विकल्पों पर गौर करे. उन्होंने कहा,

“कांग्रेस सांसद राहुल गांधी भी सीबीआई के राजनीतिक हथियार के रूप में दुरूपयोग को रोकने के पक्ष में हैं. संघीय सिद्धांतों के अनुसार राज्यों को राज्य-स्तरीय मुद्दे में जांच एजेंसी पर फैसला लेने का पूरा अधिकार है”

CPI के राज्य सचिव कनम राजेंद्रन ने कहा,

“हम सीबीआई के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन एजेंसी को केवल राज्य की सहमति से मामले उठाने चाहिए.”

विपक्ष के नेता रमेश चेन्निथला कहते हैं,

“CPI(M) को अंदाजा है कि जांच हुई तो सीएम पिनाराई विजयन भी सीबीआई जांच के घेरे में आ जाएंगे. इस योजना में जो भ्रष्टाचार हुआ है उसकी जानकारी सीएम को भी थी. दूसरे राज्यों में हो सकता है कि सीबीआई का राजनीतिक इस्तेमाल किया जा रहा हो लेकिन केरल में तो एजेंसी को भ्रष्टाचार की जांच से रोका जा रहा है. जांच को रोकने की ये कोशिश केरल के लोगों को चुनौती है.”

आपको बता दें कि इस मामले में शनिवार 24 अक्टूबर को कांग्रेस और भाजपा ने केरल सरकार की आलोचना की. दोनों पार्टियों ने एक स्वर में आरोप लगाया कि सरकार भ्रष्टाचार को छुपाना चाह रही है. कांग्रेस के प्रदेश प्रमुख मुल्लापल्ली रामचंद्रन ने कहा कि सरकार जांच से डरी हुई है.

 

सामान्य सहमति होती क्या है?

दरअसल सीबीआई का अधिकार क्षेत्र केंद्र सरकार के विभाग और कर्मचारी हैं. राज्य सरकार से जुड़े किसी मामले की जांच अगर सीबीआई करना चाहे तो उसे राज्य सरकार से इजाजत लेनी होगी. एक सहमति किसी खास केस से जुड़ी होती है और दूसरी सहमति सामान्य होती है. सामान्य सहमति खत्म होने का अर्थ है कि किसी सीबीआई वाले को जो अधिकार मिले हैं वो राज्य में घुसते ही खत्म हो जाते हैं और वह एक साधारण नागरिक बन जाता है. हाल ही में महाराष्ट्र ने ऐसा कदम उठाया था. उससे पहले पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और सिक्किम भी सामान्य सहमति सीबीआई से वापस ले चुके हैं.


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adminOctober 17, 20201min4460

ज़िंदगी में बहुत से फ्रस्ट्रेटिंग मौक़े आते हैं. कभी नहाते टाइम टंकी में पानी खत्म हो जाता है, तो है कभी-कभी किसी गाने के बोल नहीं याद आते हैं. हां, बस हल्की-सी धुन याद आती रहती है. गूगल बाबा ने आपकी समस्या का संज्ञान ले लिया है और निवारण भी प्रदान कर दिया है. अरे टंकी में पानी भरने का नहीं, भूला हुआ गाना याद दिलाने का.

गूगल का मेन सर्च वाला जो ऐप है ना, उसमें एक नया फीचर आया है. “Hum to search” यानी गुनगुना कर गाना ढूंढने का. बस गूगल बाबा से पूछो, “what’s this song”. माने कि “ये गाना कौन सा है?” और बाबा सुनने लग जाएंगे. फ़िर 10-15 सेकंड इनके सामने गाना गुनगुना दीजिए और ये ढूंढकर ला देंगे. हमने खुद ट्राय करके देखा. आप नीचे लगे हुए स्क्रीन शॉट देख सकते हैं:

 

 

गूगल से बोलकर पूछने की जगह पर ऐप में “Search a song” वाला बटन दबाकर भी इस फीचर का इस्तेमाल किया जा सकता है. अब चूंकि ये फीचर मेन सर्च ऐप में है, तो गूगल असिस्टेन्ट में भी होना ही था.

और हां, गुनगुनाने के अलावा आप अपने आजू-बाजू बजने वाले गाने के बारे में भी गूगल से पूछ सकते हैं कि ये कौन-सा गाना है. सेम वही Shazam (शज़ैम) ऐप वाला काम. ये फीचर तो पहले से था, पर इसी से रिलेटेड है, तो सोचे बताते चलें. नीचे लगा हुआ स्क्रीनशॉट देखिए:

 

गूगल असिस्टेंट इस तरह से गाना ढूंढेगा.

 

गूगल का कहना है कि ये फीचर अभी आईफोन पर सिर्फ इंग्लिश लैंग्वेज में ही मौजूद है, मगर एंड्रॉयड पर 20 से ज़्यादा भाषाओं में अवेलेबल है. इन्होंने कहा है कि जल्द ही दूसरी भाषाओं में भी इसको चालू करेंगे. वैसे एंड्रॉयड फ़ोन पर गूगल का सर्च ऐप तो हिन्दी में “ये कौन-सा गाना है” पूछे जाने पर चकरा गया, मगर गूगल असिस्टेन्ट हिन्दी में पूछने पर भी हमारी बात समझ गया और गाना सुनने लग गया.

 

कैसे काम करता है ये गुनगुनाने वाला फीचर

हर गाने की एक मेलोडी होती है, जो फिंगरप्रिन्ट की ही तरह यूनीक होती है. गूगल का कहना है कि इसने एक मशीन लर्निंग मॉडल बनाया है, जो हमारे गुनगुनाने को, सीटी को या फ़िर गाना गाने को ही असली वाली मेलोडी से मिलान करके ढूंढ निकालता है. ये मॉडल गुनगुनाहट की आवाज़ को नंबर-बेस्ड सीक्वेंस में बदल देता है. इसके बाद इस सीक्वेंस को दुनियाभर के हजारों-लाखों गानों के ‘फिंगरप्रिन्ट’ से मिला लिया जाता है. जिसके साथ मैच बैठता है, वो सर्च में आ जाता है.


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adminOctober 16, 20201min5710

आपने तमाम ऐसे छोटे बच्चे देखे होंगे, जो फेसबुक, इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स पर एक्टिव रहते हैं. कुछ भी पोस्ट करते रहते हैं. कुछ को तो इतनी भी समझ नहीं होती कि उनकी पोस्ट की गई किस इन्फॉर्मेशन के जरिए उन्हें निशाना बनाया जा सकता है. साइबर अपराधी ऐसे बच्चों को आसानी से शिकार बना लेते हैं. उन्हें डरा-धमकाकर ऐसे-ऐसे काम करा लेते हैं, जो बच्चों के लिए ही नहीं, उनके पैरंट्स के लिए भी मुसीबत बन जाते हैं. ऐसे ही केसों की बढ़ती संख्या को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका डाली गई है. मांग की गई है कि नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर पाबंदियों का खाका तैयार किया जाए. ये पाबंदियां ऐसी हों, जो वाकई कारगर हों.

 

याचिका में कहा गया है कि भारत में सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने के लिए मिनिमम उम्र का कोई कानून नहीं है.

 

ये याचिका हाल में चीफ जस्टिस एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच के सामने आई. अदालत ने इस पर केंद्र सरकार से जवाब दाखिल करने को कहा है. इस याचिका में कहा गया है कि भारत में सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने के लिए मिनिमम उम्र का कोई कानून नहीं है. इस वजह से सोशल मीडिया पर नाबालिगों की पहुंच बढ़ी है. इसे नियंत्रित करने के लिए कानून बनाया जाए. यूजर्स के प्रोफाइल को वेरिफाई किया जाए. सोशल मीडिया से आपत्तिजनक कंटेंट हटाने का भी निर्देश दिया जाए.

सोशल मीडिया रेग्युलेट करने का कानून नहीं

भारतीय कानून के मुताबिक, जिस व्यक्ति की उम्र 18 साल पूरी हो चुकी है, वह बालिग कहलाएगा, और 18 साल से कम के बच्चे नाबालिग. लेकिन सोशल मीडिया यूज करने के लिए उम्र का कोई कानून नहीं है. भारत के उलट अमेरिका जैसे देशों में चिल्ड्रेंस ऑनलाइन प्राइवेसी एक्ट है, जिसके तहत 13 साल से कम उम्र के बच्चों से जुड़ी जानकारियां इकट्ठा करते समय उनके पैरंट्स की सहमति ली जाती है. हालांकि फेसबुक ने अकाउंट खोलने वालों के लिए 13 साल या उससे ज्यादा उम्र वालों की सीमा तय कर रखी है. लेकिन अक्सर बच्चे इस नियम को बाईपास करके अकाउंट खोल लेते हैं. छोटी उम्र में बहुत से बच्चों को प्राइवेसी जैसी बातों की जानकारी नहीं होती. और वे ऑनलाइन शोषण, साइबर गुंडागर्दी, धमकी, वसूली और बाल अपराधों के भी शिकार हो जाते हैं.

 

छोटी उम्र में बहुत से बच्चों को प्राइवेसी जैसी बातों की जानकारी नहीं होती जिससे खतरा और बढ़ जाता है.

 

बॉम्बे हाई कोर्ट के वकील दीपक डोंगरे कहते हैं,

भारत में सोशल मीडिया को रेग्युलेट करने के लिए वैसे तो साल 2000 में इन्फॉर्मेशन टेक्नॉलजी एक्ट बना है. इसके साथ सोशल मीडिया से जुड़े अपराधों के लिए भारतीय दंड संहिता (IPC), 1860 में भी सजा के प्रावधान हैं. लेकिन सोशल मीडिया को रेग्युलेट करने और इसके उपयोग को लेकर कोई अलग से कानून नहीं है.

आईटी एक्ट क्या कहता है?

#IT Act, 2000 के मुताबिक, अगर किसी व्यक्ति के डिजिटल डॉक्यूमेंट्स के साथ छेड़छाड़ की जाती है तो धारा-65 के तहत 3 साल जेल और 2 लाख रुपए जुर्माना हो सकता है.

#अगर कोई इंटरनेट पर पोर्नोग्राफी या बच्चों के अश्लील चित्र या वीडियो अपलोड करता है तो इसी कानून की धारा-64B के तहत 3 साल की जेल और जुर्माने का प्रावधान है.

#किसी दूसरे के नाम से अकाउंट बनाना और उसका फोटो इस्तेमाल करना भी गैरकानूनी है. ऐसा करने पर धारा-66C के तहत 3 साल जेल और 5 लाख तक जुर्माना भरना पड़ सकता है.

#किसी दूसरे के अकाउंट के साथ छेड़छाड़ करना और उसका अकाउंट हैक करना IT Act की धारा-67 के तहत अपराध की श्रेणी में आता है. 3 साल तक की जेल हो सकती है.

IPC में कितनी सजा का प्रावधान है?.

अगर कोई संस्था या व्यक्ति किसी भी तरह की गलत खबर या आपत्तिजनक समाचार दिखाकर अशांति फैलाता है तो उसे IPC, 1860 की धारा-468 और 469 के तहत 7 साल जेल और जुर्माना हो सकता है. कोई अगर जानबूझकर किसी धर्म के बारे में आपत्तिजनक बातें सोशल मीडिया पर फैलाता है तो धारा-295A के तहत मुकदमा दर्ज किया जाता है. दोषी पाए जाने पर 3 साल की जेल हो सकती है.



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