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adminDecember 15, 20201min4170

आमतौर पर सभी घरों में तिल का इस्तेमाल होता है. कई अलग तरह की डिश और डेजर्ट फूड का जायका बढ़ाने के लिए इसे प्रयोग में लाया जाता है. क्या आप जानते हैं सर्दी में इसे खाना सेहत के लिए बड़ा फायदेमंद होता है. दरअसल तिल में मौजूद पॉलीसैचुरेटेड फैटी एसिड, ओमेगा-6, फाइबर, आयरन, कैल्शियम, मैग्नीशियम और फासफॉरस जैसे तत्व पाए जाते हैं, जो शरीर को बड़ा फायदा पहुंचाते हैं.

 

दिल की बीमारियों से राहत

तिल में पाए जाने वाला मोनो-सैचुरेटेड फैटी एसिड हमारी बॉडी में कोलेस्ट्रोल लेवल को कम करता है. दिल से जुड़ी बीमारियों के लिए भी यह बेहद फायदेमंद है. ये हमारा ब्लड प्रेशर भी कंट्रोल रखता है.

 

दिल की मांसपेशियों को रखे दुरुस्त

तिल में कई तरह के लवण जैसे कैल्श‍ियम, आयरन, मैग्नीशियम, जिंक और सेलेनियम होते हैं जो हृदय की मांसपेशि‍यों को सक्रिय रूप से काम करने में मदद करते हैं.

 

हड्डियों की मजबूती के लिए

तिल में कैल्श‍ियम, फॉस्फोरस और मैगनीशियम जैसे तत्व पाए जाते हैं,‍ जिनसे हड्डियों का निर्माण होता है. ऐसे में यदि आप सर्दी के मौसम में तिल खाने की आदत डाल लें तो आपको इस मौसम में हड्डियों का दर्द परेशान नहीं करेगा. दिन में यदि एक बड़ा चम्मच तिल खाया जाए तो इससे दांत भी मजबूत होते हैं. तिल में फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट का स्तर ऊंचा होता है, इसलिए इसे खाने से प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है.

 

बीमारियों से छुटकारा

तिल में सेसमीन नाम का एन्टीऑक्सिडेंट पाया जाता है जो कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने से रोकता है. अपनी इस खूबी की वजह से ही यह लंग कैंसर, पेट के कैंसर, ल्यूकेमिया, प्रोस्टेट कैंसर, ब्रेस्ट कैंसर होने की आशंका को कम करता है. इसके अलावा भी तिल के कई फायदे हैं

 

त्वचा और तनाव

तिल खाने से दिमागी ताकत बढ़ती है. इसमें पाया जाने वाला लिपोफोलिक एंटीऑक्सीडेंट दिमाग पर उम्र का असर जल्दी नहीं होने देते. दरअसल, बुढ़ापे में यादाश्त कमजोर होने लगती है. ऐसे में यदि आप रोजाना तिल या तिल से बनी चीजें खाएं तो आपके मेंटल हेल्थ पर इसका सकारात्मक असर हो सकता है. तिल का तेल त्वचा के लिए बहुत ही फायदेमंद होता है. इसकी मदद से त्वचा को जरूरी पोषण मिलता है और इसमें नमी बरकरार रहती है.


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adminDecember 12, 20202min4210

यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.

अमित चंडीगढ़ के रहने वाले हैं. 25 साल के हैं. पूरा लॉकडाउन ऑफिस का काम करते हुए निकाल दिया. घन्टों सिस्टम पर बैठकर काम करते रहते थे. कमर के दर्द की शिकायत काफ़ी समय से थी. पर लॉकडाउन में बहुत ज़्यादा बढ़ गई. अब हाल ये है कि बैठने में तकलीफ़ होती है. 15 मिनट सिस्टम पर बैठ के काम कर लें तो लेटने की ज़रूरत पड़ती है. झुकने में तो जान ही निकल जाती है. अब अमित को चाहिए इलाज. तो हमने बात की एक ऑर्थोपेडिक सर्जन से. पता चला कमर का दर्द अब यंग लोगों में बहुत ज़्यादा आम है. उनके ओपीडी में रोज़ कम से कम 2 से 3 युवा तो कमर दर्द की शिकायत लेकर आते ही हैं. ऊपर से ठंड में ये दिक्कत और ज़्यादा बढ़ जाती है. तो आज इस मुसीबत से लड़ते हैं. सबसे पहले बात करते हैं कि युवाओं में कमर दर्द के केसेज़ बढ़ क्यों रहे हैं और कुछ टिप्स जिनका आपको ध्यान रखना चाहिए

 

क्यों बढ़ रहा है युवाओं में कमर दर्द?

ये हमें बताया डॉक्टर नंदन ने.

 

डॉक्टर नंदन मिश्रा, ऑर्थोपेडिक, लखनऊ

 

-कमर दर्द को हम बांट सकते हैं स्पेसिफ़िक और नॉन-स्पेसिफ़िक में

-स्पेसिफ़िक का मतलब या तो वहां चोट लगी हो, इन्फेक्शन, स्लिप डिस्क या कोई और बीमारी

-नॉन-स्पेसिफ़िक का मतलब मांसपेशियों में खिंचाव, मांसपेशियों की कमज़ोरी

-ऑफिस में लंबे समय तक बैठकर काम करना

-एक्सरसाइज़ की कमी

-वर्क प्रेशर

-ज़रूरत से ज़्यादा वज़न उठाना

-जिम में बिना किसी एक्सपर्ट के ट्रेन करना

 

किन बातों का ध्यान रखना है

-लंबे समय तक बैठकर काम न करें

-हर 30 से 40 मिनट में उठकर स्ट्रेचिंग करें

 

झटके से भारी वज़न न उठाएं

 

-आगे झुककर काम न करें

-हर दिन 15 से 20 मिनट सूरज की धूप लें

-कमर की मांसपेशियों की एक्सरसाइज़ करें

वजहें आपको पता चल गईं. कमर दर्द से बचने की टिप्स भी आपने जान लीं. अब बात करते हैं इलाज की.

 

इलाज

-कमर दर्द का इलाज इस पर डिपेंड करता है कि इसका कारण क्या है

-अगर ये किसी ख़ास वजह से है जैसे स्लिप डिस्क तो इस केस में आपको कुछ दिनों के लिए दवा, रेस्ट और उसके बाद एक्सरसाइज़ सिखाई जाती है

-अगर ये दर्द बना रहता है या बढ़ता चला जाता है तो 6 से 8 हफ़्ते के बाद आपको ऑपरेशन की ज़रूरत पड़ सकती है

-अगर कमर का दर्द चोट या इन्फेक्शन के कारण है तो आपको दवा और रेस्ट करने को कहा जाता है. कुछ केसेज़ में ऑपरेशन की ज़रूरत पड़ सकती है

-अगर ये दर्द Ankylosing spondylitis जैसी बीमारी की वजह से है तो आपको दवा दी जाती है और स्ट्रेचिंग एक्सरसाइज़ सिखाई जाती है

 

अगर ये दर्द बना रहता है या बढ़ता चला जाता है तो 6 से 8 हफ़्ते के बाद आपको ऑपरेशन की ज़रूरत पड़ सकती है

 

-अगर कमर का दर्द नॉन-स्पेसिफ़िक कारण से है तो दवा, हीट थरैपी और कमर की मांसपेशियों की एक्सरसाइज़ से इसे ठीक किया जाता है.

-अगर दर्द तीन महीने से भी ज़्यादा रहता है तो multidisciplinary approach लगता है यानी एक से ज़्यादा डॉक्टर से इलाज

कोई भी एक्सरसाइज़ अपने डॉक्टर या फिजियोथेरैपिस्ट की इजाज़त के बिना हरगिज़ न करें.


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adminDecember 3, 20201min5450

इस महामारी को रोकने के लिए सारी दुनिया में लॉकडाउन का तरीका अपनाया गया. लोग घरों में क़ैद हो गए. बाहर की दुनिया पूरी तरह बंद हो गई.

उत्पादन रुक गया तो खाने की आपूर्ति भी प्रभावित हुई. ऐसे में लोगों ने, खास तौर से जो घरों से दूर पीजी या हॉस्टल में रह रहे थे, उनका एक ही सहारा था पैक्ड फूड या डिब्बाबंद खाना, या फिर रेडी टू ईट फूड. अगर ये खाना भी ख़राब हो जाता तो क्या होता?

जानकार कहते हैं कि यदि खाने को अच्छी तरह से संरक्षित किया जाए तो इसे सालों साल तक उसके सभी पोषक तत्वों के साथ सही-सलामत रखा जा सकता है.

कोई भी खाना उसमें कीटाणु पनपने की वजह से ही खराब होता है. अगर खाने में बैक्टीरिया पैदा ही ना होने दिए जाएं, तो उसे कभी भी इस्तेमाल किया जा सकता है.

 

कैसे रख सकते हैं खाना सुरक्षित?

इंसान सदियों से फूड प्रिज़र्वेशन यानी खाने पीने की चीज़ों को लंबे समय तक बचाकर रखने के लिए तरह तरह के नुस्खे आजमाता आया है. जैसे कि, खाने को सुखाकर, उसमें नमक लगाकर, चीनी की तह लगाकर, केमिकल के ज़रिए या फिर, एयर टाइट डिब्बों में संरक्षित किया जाता रहा है.

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में फूड एक्सपर्ट माइकल सुलु का कहना है कि खाने को सुखाकर रखना सबसे बेहतरीन तरीक़ा है. खाना सुखा लेने से उसमें जीवाणु पैदा होने की गुंजाइश ही खत्म हो जाती है.

वहीं, एयर टाइट डिब्बों में खाने रखने से उसमें कई ऐसे जीवाणु पैदा हो सकते हैं, जो हवा की कम सप्लाई में ही पनपते हैं. मिसाल के लिए मांस को एनोरोबिक वर्ग के जीवाणु ख़राब करते हैं. और ये कीटाणु कम ऑक्सीजन में ही फलते फूलते हैं.

खाने में नमक लगाकर भी संरक्षित किया जा सकता है. लेकिन ये तरीक़ा बहुत कारगर नहीं है, और हर तरह के खाने पर इसका इस्तेमाल भी नहीं किया जा सकता. लेकिन मांस को सुखा कर और नमक लगाकर लंबे समय के लिए संरक्षित किया जा सकता है.

चीनी की मोटी परत लगाकर भी खाने को लंबे समय के लिए रखा जा सकता है.

दरअसल, ख़ालिस चीनी किसी भी तरह के जीवाणु को पनपने नहीं देती. यही वजह है कि टॉफी, चॉकलेट या ज़्यादा मीठी चीजें लंबे समय तक रह पाती हैं. लेकिन चीनी के साथ जैसे ही अन्य चीज़ें, जैसे मेवे, दूध, स्टार्च या अंडा आदि शामिल किया जाएगा, तो खाने की उम्र उतनी ही कम होती जाएगी.

अब भी हज़ारों साल पुराना तरीका

आइसलैंड में मैकडॉनल्ड्स का बिग मैक बर्गर ही शायद संरक्षित खाने का सबसे मशहूर और इकलौता उदाहरण है. वहाँ बर्गर को कांच के ऐसे बक्से में रखा गया था जो हवा की मात्रा को सीमित करता है. साथ ही इसमें ऐसे प्रिज़र्वेटिव्स डाले गए थे जो जीवाणु को पनपने ही नहीं देते थे.

इन्हें मांग पूरी करने के लिए सुपरमार्केट में लंबे समय के लिए रखा जा सकता था. इसीलिए इन खानों में ऐसे फूड प्रिज़र्वेटिव्स डाले जाते हैं जो खाने को सड़ने नहीं देते.

चीनी से बना ट्विंकी एक ऐसा स्नैक है, जो काफ़ी पसंद किया जाता है और लंबे समय तक घर में रखकर इस्तेमाल किया जा सकता है.

इसकी शेल्फ लाइफ़ कुछ हफ़्तों की है. लेकिन इस स्नैक के चाहने वालों ने खास तरह की तिकड़म लगाकर इसे 44 साल तक संरक्षित करके दिखाया है. यू-ट्यूब पर एक वीडियो मौजूद है, जिसमें 27 साल पुरानी ट्विंकी काटते दिखाया गया है.

शहद के तो कहने ही क्या. ये तो सारी उम्र खराब ही नहीं हो सकता. क्योंकि इसमें पानी की मात्रा लगभग ना के बराबर होती है और इसमें ख़ुद ऐसे प्राकृतिक संरक्षक मौजूद हैं, जो उसमें जीवाणु पैदा ही नहीं होने देते.

दुनिया के सबसे पुराने शहद का नमूना मिस्र में तूतेनखामन की क़ब्र और जॉर्जिया में बड़प्पन के मकबरे में मिले हैं. ये 3,000 साल पुराने हैं. खाना संरक्षित करने का तरीक़ा आज भी कमोबेश वही है, जो अब से हज़ारों साल पहले था.

 

ज़मीन में दबाकर और बर्फ़ में रखकर…

ज़्यादा वसा वाली चीज़ें जैसे तेल, मक्खन, घी वग़ैरह भी लंबे समय के लिए संरक्षित किए जा सकते हैं. बॉग बटर खमीर किया हुआ एक खास तरह का मक्खन होता है.

आयरलैंड और स्कॉटलैंड में इस बटर के 4,000 साल पुराने कंटेनर पाए गए हैं, जिन्हें दलदली जमीन में दबा कर रखा गया था.

माना जाता हा कि प्राचीन लोग किसी सिद्धांत या मान्यता के तहत मक्खन या एनिमल फैट को दफनाया करते थे. या ये भी हो सकता है कि इस वसा को चोरों से बचाने या इसे लंबे समय तक इस्तेमाल करने के इरादे से दलदली जमीन में दफन कर दिया जाता था.

शराब के बारे में तो कहा भी जाता है कि शराब जितनी पुरानी हो उतनी ही अच्छी होती है.

जर्मनी के स्पायर के एक प्राचीन रोमन मक़बरे में दुनिया की अब तक की सबसे प्राचीन शराब की बोतल पाई गई है. ये बोतल क़रीब 17 सौ साल पुरानी है. लेकिन इस बोतल की शराब को आज तक चखा नहीं गया है. इसके अलावा शैंपेन की सबसे पुरानी बोतलें 200 साल पुरानी हैं जिनका ज़ायक़ा आज भी लज़ीज़ है.

मांस को अगर काफ़ी कम तापमान में ठंड और बर्फ में रखा जाए तो ये काफ़ी लंबे समय तक खाने योग्य रह सकता है.

पहाड़ों की बर्फ़ में ऐसे बहुत से विशालकाय हाथियों, मैमथ और अन्य जीवों के शव मिले हैं जो कई सदियों से बर्फ़ में ही दबे रहे. और जब उन्हें निकाला गया तो उनका मांस बिल्कुल सही था. यहां तक कि उसका रंग भी नहीं बदला था लेकिन जैसे ही बर्फ़ पिघल कर हटी, उसमें परिवर्तन होने लगा.

मछली को बर्फ़ में लंबे समय तक रख पाना ज़रा मुश्किल होता है.

बर्फ़ में ज़्यादा समय तक जमे रहने पर मछली की मांसपेशियों में कई तरह के रसायनिक परिवर्तन होने लगते हैं. जो उसके स्वाद को नष्ट कर देते हैं. लेकिन आज तकनीक का दौर है, तो इसे भी तकनीक की मदद से लंबे समय के लिए संरक्षित रखा जा सकता है.

वर्तमान में दुनिया जिस दौर से गुज़र रही है वो एक मुश्किल दौर है. फिर भी ज़िंदगी चल रही है.

अगर कभी भविष्य में ऐसी ही स्थिति पैदा हो जाए और ताज़ा खाने की आपूर्ति पूरी तरह बंद हो जाए तो घर में रखा सूखा खाना या किसी भी सुपरमार्केट से पैक्ड फूड लेकर पेट भरा जा सकता है. भले ही वो लंबे समय से रखा हो.


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adminNovember 23, 20201min4840

हर इंसान का एक लक्ष्य होता है और उसी को ध्यान में रखकर आगे बढ़ता है. लेकिन लक्ष्य का चुनाव करना थोड़ा मुश्किल काम है. निजी जिंदगी हो या फिर निवेश का रास्ता, सही लक्ष्य से ही मंजिल मिलती है. अगर आप निवेश करने के बारे में सोच रहे हैं तो फिर ये खबर आपके लिए बेहद जरूरी है. खासकर नए निवेशक इन पांच बिंदुओं को ध्यान में रखकर अगर निवेश का पहला कदम उठाएंगे तो राह आसान हो जाएगी.

 

1. निवेश का लक्ष्य तय हो

नए निवेशक को सबसे पहले आमदनी और खर्च के बीच के संतुलन को समझना होगा. महीने में कितनी कमाई है, उसका सही से ब्योरा होना चाहिए. उसके बाद फिर खर्च को उसमें अलग करने की जरूरत होगी. आमदनी से खर्च को हटाने के बाद बाकी रकम का एक संतुलित हिस्सा निवेश के लिए रखना चाहिए. ऐसा नहीं कि एक महीने में बहुत बड़ी राशि निवेश कर दें, और फिर दूसरे महीने निवेश के लिए सोचने पड़े. इसलिए निवेश का लक्ष्य तय होना सबसे जरूरी है, यानी आपका गोल क्या है?

 

2. लक्ष्य को लेकर समझ साफ हो

कहा जाता है कि दूसरे को देखकर पैसे बचाना सीखें. लेकिन निवेश हमेशा अपने बजट के मुताबिक करना चाहिए. किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए उससे जुड़े तमाम पहलुओं को लेकर समझ साफ होना चाहिए. उदाहरण के तौर पर आप कहां निवेश कर रहे हैं? कितने साल के लिए कर रहे हैं? और जो रिटर्न मिल रहा है वो लक्ष्य हासिल होगा या नहीं. साल-दर-साल आमदनी में बढ़ोतरी होगी फिर उसको कहां निवेश करें.

 

3. लक्ष्य ऐसा हो जो हासिल हो सके

लक्ष्य को तभी हासिल किया जा सकता है, जब निवेश से पहले उसका रोडमैप तैयार हो, यानी अगर आपको साल के अंत में एक लाख रुपये चाहिए तो फिर सालभर तक उस तरह की फाइनेंसियल रणनीति अपनानी होगी जिससे लक्ष्य हासिल हो. उदाहरण के तौर पर एक साल के लिए इक्विटी में निवेश बेहतर कदम नहीं होता है. ऐसे में उन रास्तों को अपनाने की जरूरत होगी जो आपको लक्ष्य के करीब ले जाए और साल में अंत में लक्ष्य हासिल हो. अगर 10 साल बाद एक करोड़ रुपये का लक्ष्य हो फिर निवेश के लिए ऐसे फंड्स को चुनने की जरूरत होगी जो लक्ष्य को दिलाए. केवल लक्ष्य तय करने से उस तक नहीं पहुंचा जा सकता.

 

4. लक्ष्य समय से पूरा हो

स्मार्ट निवेशक उसे माना जाता है, जो सही समय पर अपने लक्ष्य को हासिल कर ले. अगर दो साल बाद किसी को शादी के लिए 10 लाख रुपये की जरूरत होगी. ऐसे में यहां समय 2 साल का फिक्स है, जिसे आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है. लेकिन अगर महीने में केवल 10 हजार रुपये निवेशक के द्वारा लगाया जा रहा है तो फिर ये लक्ष्य समय में पूरा नहीं हो सकता. ऐसे में लक्ष्य तो जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि लक्ष्य को समय के साथ हासिल करना.

 

5. मौजूदा आर्थिक स्थिति का रखें ख्याल

हमेशा हर किसी को निवेश के वक्त मौजूदा आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखकर चलना चाहिए. क्योंकि अगर पूरी जमा पूंजी को निवेश में झोंक देंगे तो फिर मौजूदा आर्थिक स्थिति बिगड़ सकती है. ऐसे में निवेश को बीच में रोकना भी पड़ सकता है, जिससे लक्ष्य कभी पूरा नहीं हो पाएगा. इसलिए जेब को ध्यान में रखकर निवेश करना चाहिए. ये जरूरी है कि भविष्य के लिए हर दिन के हिसाब से निवेश करना चाहिए. लेकिन वर्तमान से समझौता कर भविष्य को खुशहाल नहीं किया जा सकता है.

 


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adminNovember 6, 20201min5160

सर्दियों के मौसम को खाने-पीने का मौसम माना जाता है. इस मौसम में एक चीज है जो लोग बढ़े चाव से खाते हैं और वो है मूंगफली. मूंगफली वो सारे पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो बादाम में होते हैं. इसलिए इसे सस्ता बादाम भी कहा जाता है. मूंगफली में सेहत का खजाना छिपा हुआ होता है. आइए जानते हैं कि सर्दियों में मूंगफली क्यों खानी चाहिए.

 

प्रोटीन से भरपूर-

मूंगफली में पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है, जो शारीरिक वृद्धि के लिए बहुत जरूरी है. अगर आप किसी भी कारण से दूध नहीं पी पाते हैं तो मूंगफली का सेवन एक बेहतर विकल्प है.

 

वजन कम करे

 

वजन कम करे-

मूंगफली वजन कम करने में बेहद मददगार है. मूंगफली खाने के बाद लंबे समय तक भूख का एहसास नहीं होता है. इस कारण आप ज्यादा खाते नहीं हैं, जिस वजह से आपको वजन कम करने में आसानी होती है.

 

दिल की बीमारी करे दूर-

मूंगफली एंटीऑक्सीडेंट्स और मिनरल्स से भरपूर होती है. ये स्ट्रोक और दिल संबंधी समस्याओं के खतरे को कम करती है. मूंगफली में मौजूद ट्रिप्टोफैन डिप्रेशन की समस्या को भी दूर करने में मददगार साबित होते हैं.

 

कैंसर का खतरा कम-

मूंगफली में अधिक मात्रा में फाइटोस्टेरॉल मौजूद होता है, जिसे बीटा-सीटोस्टेरोल कहते हैं. ये फाइटोस्टेरॉल कैंसर से सुरक्षित रखने में कारगर साबित होता है. यूएस में हुई एक स्टडी की रिपोर्ट के मुताबिक, जो महिलाएं और पुरुष कम से कम हफ्ते में 2 बार मूंगफली का सेवन करते हैं, ऐसी महिलाओं में कोलोन कैंसर होने का खतरा 58 फीसदी और पुरुषों में 27 फीसदी कम होता है.

 

डायबिटीज से बचाती है-

मूंगफली में मैंगनीज के साथ-साथ मिनरल्स भी पाए जाते हैं. ये मिनरल्स फैट, कार्बोहाइड्रेट, मेटाबॉलिज्म, कैल्शियम अब्सॉर्प्शन और ब्लड शुगर को रेगुलेट करते हैं. कई स्टडी की रिपोर्ट में बताया गया है कि मूंगफली के सेवन से डायबिटीज का खतरा 21 फीसदी तक कम होता है. अगर आपको डायबिटीज है तो अपने डॉक्टर की सलाह लेकर मूंगफली खा सकते हैं.

 

बैड कोलेस्ट्रॉल-

मूंगफली में भरपूर मात्रा में मोनोसैचुरेटेड और पॉलीअनसैचुरेटेड फैट्स मौजूद होते हैं. मूंगफली में पाया जाने वाला ओलेक एसिड ब्लड में बैड कोलेस्ट्रॉल (Cholesterol)को कम करता है और गुड कोलेस्ट्रॉल के स्तर को बढ़ाता है. ये शरीर में कोलेस्ट्रॉल के स्तर को बैलेंस भी करता है और साथ ही कोरोनरी आर्टरी डिजीज से शरीर को सुरक्षित रखता है.

 

फर्टिलिटी को बनाए बेहतर-

मूंगफली में भारी मात्रा में फोलिक एसिड मौजूद होता है, जो महिलाओं में फर्टिलिटी को बेहतर बनाता है. ये गर्भ में पल रहे बच्चे के सेहत को भी बेहतर करता है. अगर आप प्रेग्नेंसी के शुरुआती दिनों में है, तो आज से ही मूंगफली खाना शुरू कर दें. इससे बच्चे की सेहत अच्छी बनी रहेगी. मूंगफली के सेवन से होने वाले बच्चे में अस्थमा होने का खतरा भी कम होता है.

 

चेहरे पर आती है चमक-

मूंगफली सेहत के साथ-साथ स्किन के लिए भी बहुत फायदेमंद होती है. मूंगफली में मौजूद मोनोसैचुरेटेड एसिड स्किन को हाइड्रेट रखने के साथ-ासथ स्किन में ग्लो भी लाता है.

 

इम्युनिटी बनाए मजबूत-

मूंगफली में विटामिन C भी पाया जाता है, जो सर्दियों में होने वाले जुकाम और खांसी जैसी समस्याओं से बचाता है. रोज मूंगफली खाने से इम्यून सिस्टम मजबूत रहता है और शरीर को अंदर से एनर्जी मिलती है.


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adminOctober 26, 20201min6630

सर्दियों के मौसम में लोगों को खांसी, जुकाम, गले में खराश और बुखार की बहुत ज्यादा शिकायत रहती है. मौसम के अचानक करवट बदलते ही कई तरह की बीमारियों हमें घेरने लगती हैं. हेल्थ एक्सपर्ट कहते हैं कि इस मौसम में अगर बीमारियों से बचने के लिए दवाओं की बजाए अपनी डाइट में मुनक्का शामिल कर लें तो बेहतर होगा. ये चमत्कारी चीज ना सिर्फ आपको बीमारियों से राहत देगी, बल्कि वजन और स्किन से जुड़ी तकलीफ भी दूर करेगी.

हेल्थ एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि रात के वक्त दूध में 4-5 मुनक्का उबालकर पीने से सर्दी-जुकाम से राहत मिल सकती है. टाइफॉयड के बुखार में भी मुनक्का बेहद फायदेमंद होता है. इसके लगातार सेवन से टाइफॉयड की समस्या से हमेशा के लिए छुटकारा मिल सकता है.

बढ़ते वजन को घटाने के लिए लोग महंगी से महंगी डाइट फॉलो करते हैं. इसके बाद भी उनका वजन कम नहीं होता. मुनक्का शरीर में मौजूद फैट सेल्स को काटकर तेजी से वजन घटाने में कारगर है. ये ना सिर्फ वजन घटाता है, बल्कि इसमें मौजूद ग्लूकोज के कारण बॉडी को ज्याद एनर्जी भी मिलती है.

फ्री रेडिकल जब हमारे शरीर में इलेक्ट्रॉन के साथ जुड़ता है तो इससे कई सेल्स, प्रोटीन और डीएनए डैमेज होते हैं. मुनक्का में पाए जाने वाला कैटेचिन इस दिक्कत का जड़ से सफाया करता है और शरीर के अंगों को दुरुस्त रखता है. दूध में मौजूद लैक्टस हड्डियों को मजबूत करता है. लेकिन दूध को देखकर ही बहुत से लोगों की नाक सिकुड़ने लगती है. ऐसे लोग मुनक्का का सेवन करें. इसमें मौजूद कैल्शियम आपकी हड्डियों को मजबूत करेगा.

कई हेल्थ बेनेफिट देने वाला मुनक्का मानसिक तनाव (स्ट्रेस) से मुक्ति दिला सकता है. इसमें मौजूद अर्जीनाइन का नियमित रूप से सेवन करने से आपका स्ट्रेस लेवल धीरे-धीरे कम होने लगेगा. मॉर्निंग डाइट में इसे खाने के साथ थोड़ा मेडिटेशन करने से आपको और ज्यादा फायदे होंगे.

डीप फ्राई या जंक फूड खाने से हमारी स्किन पर काफी बुरा असर पड़ता है. एक्सपर्ट कहते हैं कि अगर अपनी डाइट में अच्छी चीजों को शामिल करेंगे तो आपकी त्वचा लंबे समय तक दमकती रहेगी. मुनक्का आपकी स्किन के ओवरऑल टेक्सचर और इलास्टिसिटी को इम्प्रूव करता है. अगर आप बाल झड़ने की समस्या से परेशान है, तब भी मुनक्का आपको फायदा दे सकता है.

खराब जीवनशैली और खान-पान में दोष की वजह से लोगों को हाई ब्लड प्रेशर की समस्या भी काफी होने लगी है. इस बीमारी की वजह से हर साल लाखों लोगों की मौत होती है. मौजूदा समय में तो कम उम्र के लोग भी हाई ब्लड प्रेशर का शिकार होने लगे हैं. मुनक्का बॉडी में ब्लड सर्कुलेशन को कंट्रोल कर हाइपरटेंशन की बीमारी से आपको दूर रख सकता है.


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adminOctober 17, 20202min5700

साल 2010 में इंटरनेशनल जर्नल ऑफ नर्सिंग स्टडीज में पब्लिश एक रिसर्च के मुताबिक, पांच सप्ताह के एक्यूप्रेशर ट्रीटमेंट के बाद ही इंसोम्निया (नींद से जुड़ा रोग) से परेशान मरीजों की हालत में सुधार पाया गया। यह रिसर्च 25 मरीजों पर की गई। ऐसे ही वर्ष 2011 में मेनोपॉज जर्नल में पब्लिश रिसर्च में पाया गया कि पोस्ट मेनोपॉज स्थिति वाली 45 महिलाओं में जिन्हें नींद न आने की शिकायत भी थी, उन्हें एक्यूप्रेशर ट्रीटमेंट देने के बाद नींद में सुधार हुआ।

साल 2010 में इंटरनेशनल जर्नल ऑफ नर्सिंग स्टडीज में पब्लिश एक रिसर्च के मुताबिक, पांच सप्ताह के एक्यूप्रेशर ट्रीटमेंट के बाद ही इंसोम्निया (नींद से जुड़ा रोग) से परेशान मरीजों की हालत में सुधार पाया गया। यह रिसर्च 25 मरीजों पर की गई। ऐसे ही वर्ष 2011 में मेनोपॉज जर्नल में पब्लिश रिसर्च में पाया गया कि पोस्ट मेनोपॉज स्थिति वाली 45 महिलाओं में जिन्हें नींद न आने की शिकायत भी थी, उन्हें एक्यूप्रेशर ट्रीटमेंट देने के बाद नींद में सुधार हुआ।

 

स्पिरिट गेट

 

1. स्पिरिट गेट

ऐसे प्रेशर डालें

  • यह पॉइंट हाथ की छोटी उंगली की लाइन में कलाई के उलटी तरफ होता है।
  • छोटे गोले की कल्पना करते हुए उस पर हल्के हाथों से ऊपर से नीचे की तरफ अथवा गोलाई में दबाव डालें।
  • दो से तीन मिनट तक इसे करें। कुछ सेकंड के लिए इस पॉइंट को दबा कर रखें।
  • ऐसे अब दूसरे हाथ में भी करें।

 

थ्री यिन इंटरसेक्शन

 

2. थ्री यिन इंटरसेक्शन

ऐसे प्रेशर डालें

  • थ्री यिन इंटरसेक्शन पॉइंट पैर में अंदर की तरफ एंकल के थोड़ा ऊपर स्थित होता है।
  • एंकल से चार उंगली ऊपर एक बड़ा गोला बनाएं।
  • अब इसमें थोड़ा गहरा दबाव डालें। इसे भी गोलाकर अथवा ऊपर से नीचे की तरफ से 4 से 5 सेकंड तक दबाएं।
  • गर्भवती महिलाएं इस पॉइंट को न दबाएं।

 

 

3. बब्लिंग स्प्रिंग

ऐसे डालें प्रेशर

  • यह पॉइंट पैर के तलवे पर होता है। पैर के अंगूठे को अंदर की तरफ मोड़ने पर तलवे में बनने वाले गड्‌ढे की आकृति के पास यह स्थित होता है।
  • पीठ के बल लेट जाएं। घुटनों को मोड़ लें।
  • अंगूठे और उंगलियों को मोड़ें।
  • अब गड्‌ढे वाले स्थान पर कुछ मिनट के लिए गोलाई में अथवा ऊपर-नीचे की तरफ दबाव डालें।

 

 

4. इनर फ्रंटियर गेट

ऐसे डालें प्रेशर

  • यह पॉइंट कलाई के पास अंदर की तरफ दोनों मुख्य नशों के बीच में होता है।
  • हाथ को सीधा करें जिसमें गदेली ऊपर की तरफ हो।
  • कलाई से लगभग तीन उंगली नीचे दोनों नसों के बीच में पॉइंट निर्धारित करें।
  • अब इस बिंदु पर गोलाई में अथवा ऊपर और नीचे की तरफ दबाव डालें।

 

 

5. विंड पूल

ऐसे डालें प्रेशर

  • विंडपूल पॉइंट्स गर्दन के ठीक पीछे गर्दन की मांसपेशियों को खोपड़ी से जोड़ने वाले स्ट्रक्चर पर स्थित होते हैं।
  • हाथों की उंगलियों को मोड़कर अंगूठे को बाहर निकालकर कप शेप बना लें।
  • अब अंगूठों द्वारा चिह्नित पॉइंट्स पर गोलाकार अथवा ऊपर-नीचे की ओर 4 से 5 सेकंड तक दबाव डालें। इससे नींद में सुधार होगा।

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adminOctober 16, 20202min3690

यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.

निधि की बेटी तीन साल की हो गई थी. पर वो अपनी उम्र के बाकी बच्चों से थोड़ी अलग थी. जैसे वो निधि या अपने पापा से आंख नहीं मिलाती थी. जब कोई उसका नाम पुकारता तो वो रिस्पॉन्ड नहीं करती थी. अमूमन बच्चे अपना नाम सुनकर थोड़ी हरकत करते हैं. पर निधि की बेटी ऐसा नहीं करती थी. इसके अलावा रोशनी, आवाज़ और टच से वो बहुत भागती थी. धीरे-धीरे निधि ने नोटिस किया कि उसकी बेटी एक ही चीज़ बहुत देर तक करती रहती थी. जैसे कूदना शुरू करती थी तो कूदती ही रहती थी. हाथ हिलाना, झूलना. ये सब शुरू करती तो रुकती नहीं. एकदम से बहुत हाइपर हो जाती थी. तब उसे संभालना मुश्किल हो जाता.

 

(सांकेतिक तस्वीर)

 

निधि के दोस्तों ने उसको डॉक्टर से मिलने की सलाह दी. निधि को ये बात अच्छी नहीं लगी. पर किसी तरह वो तैयार हुई. अपनी बेटी को दिखाया. पता चला वो ऑटिस्टिक है. यानी उसे ऑटिज़्म है. अब ये ऑटिज़्म क्या होता है और क्यों होता है. ये पेरेंट्स के लिए जानना ज़रूरी है. तो पहले वो जान लेते हैं.

 

क्या होता है ऑटिज़्म?

डॉक्टर अखिल अगरवाल, मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट, मानश हॉस्पिटल, कोटा

 

-ऑटिज़्म पैदा होने के समय या ठीक बाद शुरू होने वाला एक डिसऑर्डर है

-ये ज़िंदगी भर रहता है

-ऑटिज़्म में बच्चे को कुछ भी सीखने में तकलीफ़ होती है

-आसपास के वातावरण में सहज होने में परेशानी होती है

-लोगों से संपर्क बनाने में परेशानी होती है

 

कारण:

-जेनेटिक फैक्टर

-प्रीनेटल फेज़. अगर मां को प्रेग्नेंसी के पहले ट्राईमेस्टर में ब्लीडिंग हो गई या बच्चे ने गर्भ में एमनियोटिक फ्लूइड ले लिया

-मां के अंदर एंटीबॉडी बनने लगीं

-शरीर में कुछ तरह के केमिकल ज़्यादा बनने से भी ऑटिज्म होता है

ऑटिज़्म क्या होता है, ये तो आपका पता चल गया. अब इसके क्या लक्षण हैं, ये जान लीजिए. क्योंकि जितना जल्दी आप अपने बच्चे को समझ जाएं, उतना अच्छा है. साथ ही ऑटिज़्म का क्या कोई इलाज है?

 

डॉक्टर राक़िब अली, क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट, बीएलके हॉस्पिटल, दिल्ली

 

लक्षण:

-ऑटिज़्म दिमाग से संबंधित और विकास की अवधि के दौरान होने वाला विकार है

-तीन प्रमुख लक्षण देखे जाते हैं

-सामाजिक व्यवहार न कर पाना

-संपर्क न कर पाना

-कुछ क्रियाओं को बार-बार दोहराना

-तीन साल से पहले इस विकार को हम पहचान सकते हैं

-पहचानने के कई तरीके हैं. आंखों से आंखें न मिला पाना प्रमुख लक्षण बन जाता है

 

ऑटिज़्म पैदा होने के समय या ठीक बाद शुरू होने वाला एक डिसऑर्डर है

 

-दूसरे बच्चों से मेलजोल न कर पाना

-आवाजों से डर जाना

-टच से डर जाना

-बैलेंस नहीं कर पाना

 

इलाज:

-ऑटिज़्म का इलाज पूरी तरह संभव नहीं हो पाया है. पूरे जीवन रहने वाली अवस्था है

-कई तरह की थैरेपी से अच्छा असर देखने को मिलता है

-व्यवहार की प्रॉब्लम आती है तो बिहेवियर थैरेपी है

-पढ़ाई के लिए स्पेशल एजुकेशन है

-इन्द्रियों की परेशानी से बचाने के लिए भी थैरेपी है

-संपर्क की प्रॉब्लम से डील करने के लिए स्पीच थैरेपी है

-असर के लिए जल्दी से जल्दी लक्षणों को पहचानना ज़रूरी है

मां-बाप के लिए ज़रूरी है कि वो अपने बच्चे के बर्ताव को इग्नोर न करें. कई बार आप मानने के लिए तैयार नहीं होते कि आपके बच्चे को थोड़ी मदद की ज़रूरत है. ऐसा न करके आप उसकी दिक्कतें और बढ़ा रहे हैं. जो आपके बच्चे के साथ ज्यादती है. उसे दूसरे बच्चों की तरह बनने, बिहेव करने के लिए फ़ोर्स मत करिए. और उस चक्कर में अपने बच्चों की ज़रूरतों को इग्नोर मत करिए. इसलिए अगर आपको अपने बच्चे में ऑटिज़्म के कोई लक्षण दिखें, तो प्रोफेशनल हेल्प ज़रूर लीजिए.


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adminOctober 15, 20201min5120

हर साल 15 अक्टूबर को ग्लोबल हैंडवॉशिंग डे मनाया जाता है. इसका मकसद लोगों को हैंड हाइजीन के प्रति जागरूक करना है. कोरोना वायरस की वजह से लोग हाथों की सफाई को लेकर पहले से ज्यादा जागरूक हुए हैं. लोगों को बार-बार हाथ धोने और हैंड सैनिटाइज करने की सलाह दी जा रही है. हालांकि महामारी के वजह से हाथ धोने की बजाय सैनिटाइजर का इस्तेमाल ज्यादा बढ़ा है. वहीं एक्सपर्ट कहते हैं कि हाथ की सफाई के लिए सैनिटाइजर से बेहतर हमेशा साबुन होता है. आइए जानते हैं क्यों.

अमेरिका के सीमन्स यूनिवर्सिटी के होम एंड कम्युनिटी हाइजीन प्रोफेसर एलिजाबेथ स्कॉट कहती हैं, ‘साबुन और पानी से हाथ धोने के बाद एक साफ तौलिये से सुखाना ही गोल्ड स्टैंडर्ड माना जाता है. साबुन हाथ से बैक्टीरिया और वायरस को नष्ट करता है.’ साबुन से हाथ धोने के बाद त्वचा रूखी हो जाती है और इससे हाथों पर कीटाणु नहीं लगते हैं और बीमार पड़ने की संभावना कम हो जाती है.

 

साबुन से हाथ धोने के फायदे-

साबुन कीटाणुओं को तुरंत मारने का काम करता है. बार सोप की बजाय लिक्विड सोप से हाथ धोना ज्यादा बेहतर होता है. खांसने और छींकने से ड्रॉपलेट्स किसी भी सतह या सामान पर कई घंटों तक रहते हैं और हाथ के जरिए ये हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं. साबुन इन रोगाणुओं की परत को खत्म करने में मदद करता है जिससे इनके संक्रमित करने की क्षमता कम हो जाती है.

साबुन में एम्फीफाइल्स पदार्थ पाया जाता है जो वायरस को निष्क्रिय करते हैं. हेल्थ एक्सपर्ट का कहना है कि बार साबुन का इस्तेमाल सार्वजनिक स्थानों पर नहीं करना चाहिए. साबुन को केवल घर के इस्तेमाल के लिए रखना चाहिए और स्किन इंफेक्शन वालों को अलग साबुन का इस्तेमाल करना चाहिए.

सैनिटाइजर का इस्तेमाल- हेल्थ एक्सपर्ट कहते हैं कि सैनिटाइजर का इस्तेमाल तभी करना चाहिए जब आपके पास सिंक की सुविधा उपलब्ध ना हो. 62 फीसदी अल्कोहल वाला सैनिटाइजर लिपिड मेम्ब्रेन को नष्ट करता है लेकिन ये नोरोवायरस और राइनोवायरस जैसे नॉन एनवलप्ड वायरस पर प्रभावी नहीं होते हैं और ये साबुन की तरह वायरस को नष्ट भी नहीं करते हैं.

हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि हैंड सैनिटाइजर में तीन चीजें जरूर होनी चाहिए, ये तभी प्रभावी माना जाता है. इसमें अल्कोहल की मात्रा ज्यादा हो और वो आपके हाथों और पूरी उंगलियों में अच्छे से लगा हो. 60 फीसदी से ज्यादा वाला अल्कोहल हाथ में लगाने से जलन महसूस होना स्वाभाविक है. सैनिटाइजर तभी लगाएं जब आपके पास हाथ धोने की सुविधा उपलब्ध ना हो.

कोलंबिया विश्वविद्यालय के एपिडेमियोलॉजिस्ट सैंड्रा अल्ब्रेक्ट ने का कहना है कि हैंड सैनिटाइज के लिए बस सैनिटाइजर चाहिए होता है जबकि साबुन से हाथ साफ करने के लिए पानी भी चाहिए होता है. जब आप घर से बाहर होते हैं तो पानी का विकल्प नहीं होता है. सैनिटाइजर तुरंत और सुविधाजनक होने की वजह से ज्यादा लोकप्रिय होते हैं.’

 

हाथ धोने का सही तरीका-

सीडीसी के अनुसार, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप गर्म या ठंडे पानी का उपयोग करते हैं. सिर्फ पानी की तुलना में साबुन से हाथ धोना ज्यादा प्रभावी होता है क्योंकि ये स्किन से रोगाणुओं को नष्ट करने का काम करता है. हाथ में साबुन लगाने के बाद उसे 20 सेकेंड के लिए मलें फिर अच्छे से हाथ धोकर तौलिए से सुखा लें.


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adminOctober 12, 20203min5650

किडनी हमारे शरीर को डिटॉक्सीफाई (kidney detoxify) करने का काम करती है. ये अपशिष्ट, जहरीले और अतिरिक्त तरल पदार्थों को यूरीन के रास्ते शरीर से बाहर निकालती है. शरीर में खून को प्योरीफाई (Blood purify) करने वाली किडनी की अगर को साफ ना रखा जाए तो यूरीनरी डिसॉर्डर समेत पेट दर्द, बुखार, जी मिचलाना और उल्टी जैसी गंभीर समस्याएं बढ़ सकती हैं.

 

 

किडनी कैसे बन सकती है मौत का कारण?

 

इतना ही नहीं, किडनी में जमा जहरीले पदार्थ ब्लड प्योरीफिकेशन में बाधा पैदा कर इंसान की मौत का कारण तक बन सकते हैं. अगर आप खाने में सावधानी बरतने के साथ डाइट में तीन बेहतरीन चीजों को शामिल कर लें तो बड़ी आसानी से किडनी की सफाई हो सकती है. इन चीजों को आप कुकिंग या ड्रिंक किसी भी रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं.

 

धनिया

 

 

आमतौर पर हर रसोई में धनिये का इस्तेमाल खाने का जायका बढ़ाने के लिए किया जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि धनिये में मौजूद डिटॉक्सीफिकेशन के गुण शरीर से अपशिष्ट और जहरीले पदार्थों को बाहर करने में मददगार हैं. आप डिनर डाइट या जूस में इसका इस्तेमाल कर सकते हैं.

 

जीरा

 

दाल आदि में छोंक या तड़के के लिए इस्तेमाल होने वाला जीरा भी किडनी की सफाई में बड़ा फायदेमंद है. नींबू के 4-5 स्लाइड के साथ जीरा और धनिया मिलाकर घर में एक डिटॉक्सीफाई ड्रिंक तैयार किया जा सकता है. किडनी की तेजी से सफाई करने के लिए ये ड्रिंक बेहद कारगर है.

 

धनिये और जीरे का ड्रिंक

 

एक लीटर पानी को हल्की आंच पर उबालें. इसके बाद धनिये की कुछ पत्तियों को धोकर पानी में डालें और 10 मिनट तक उबलने दें. अब उबले हुए पानी में नींबू के कटे हुए स्लाइस और एक चम्मच जीरा मिलाएं. तीनों चीजों को पांच मिनट तक उबलने दें और फिर छानकर पीएं. इस ड्रिंक को रोजाना पीने से आपकी किडनी एकदम साफ हो जाएगी. साथ ही इससे पेट के कई बड़े रोग भी कटेंगे.

 

भुट्टे के बाल

 

अक्सर आपने लोगों को मक्का यानी भुट्टे के दाने खाते देखा होगा. लेकिन क्या आप जानते हैं भुट्टे के दानों पर नजर आने वाले गोल्डन कलर के रेशे आपकी किडनी को डिटॉक्सीफाई कर सकते हैं. ये किडनी और ब्लैडर को डिटॉक्सीफाई करने के साथ ब्लुड शगर को रेगुलेट और इम्यूनिटी को बूस्ट करने में भी कारगर है.

 

कैसे बनाएं ड्रिंक?

 

भुट्टे के बाल का ड्रिंक बनाने के लिए दो ग्लास पानी अच्छी तरह उबालें. इसके बाद पानी में एक कटोरी भुट्टे के बाल डालें और हल्की आंच पर उबालें. इस पानी में नींबू के दो कटे हुए हिस्सों को निचोड़ें और तब तक उबालें जब तक पानी एक ग्लास ना रह जाए. इस ड्रिंक को रोजाना सुबह-शाम पीने से जल्द ही आपको फायदे दिखने शुरू हो जाएंगे. जिन लोगों को पथरी की शिकायत रहती है, उनके लिए भी ये ड्रिंक बड़ा फायदेमंद है.

 

कब खराब होती है इंसान की किडनी?

 

एक्सपर्ट की मानें तो जब इंसान की किडनी शरीर में पर्याप्त खून को फिल्टर करना बंद कर दे तो इसे किडनी फेलियर कहते हैं. हाई ब्लड प्रेशर (डायबिटीज), ग्लोमेरुलोनेफ्राइटिस (ब्लड को फिल्ट करने वाले हिस्से का डैमेज होना) या किडनी स्टोन यानी पथरी (kidney stone) होने पर इंसान की किडनी खराब हो सकती है.



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