जानें बोहरा समुदाय को, जो खुद को बाकी मुस्लिमों से अलग मानता है

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार को मध्य प्रदेश के इंदौर में बोहरा समुदाय के वआज (प्रवचन) में हिस्सा लेने जा रहे हैं. बोहरा समाज के इतिहास में ऐसा पहली बार होगा, जब कोई पीएम उनके धार्मिक कार्यक्रम में शामिल होगा. आइए जानते हैं आखिर बोहरा कौन हैं.

 

जानें: बोहरा समुदाय को, जो खुद को बाकी मुस्लिमों से अलग मानता है
 
 
मुस्लिमों को मुख्य रूप से दो हिस्सों में बांटा जाता है. मगर शिया और सुन्नियों के अलावा इस्लाम को मानने वाले लोग 72 फिरकों में बंटे हुए हैं. इन्हीं में से एक हैं बोहरा मुस्लिम. बोहरा शिया और सुन्नी दोनों होते हैं. सुन्नी बोहरा हनफी इस्लामिक कानून को मानते हैं. वहीं दाऊदी बोहरा मान्यताओं में शियाओं के करीब होते हैं.
 
 
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बोहरा समुदाय की भारत में लाखों की आबादी है. ये खुद को कई मामलों में देश के बाकी मुस्लिमों से अलग मानते हैं. दाऊदी बोहरा समुदाय की पहचान काफी समृद्ध, संभ्रांत और पढ़ा-लिखे समुदाय के तौर पर होती है. बोहरा समुदाय के ज्यादातर लोग व्यापारी हैं. दाऊदी बोहरा मुख्यत: गुजरात के सूरत, अहमदाबाद, जामनगर, राजकोट, दाहोद, और महाराष्ट्र के मुंबई, पुणे व नागपुर, राजस्थान के उदयपुर व भीलवाड़ा और मध्य प्रदेश के उज्जैन, इन्दौर, शाजापुर, जैसे शहरों और कोलकाता व चैन्नै में बसते हैं. पाकिस्तान के सिंध प्रांत के अलावा ब्रिटेन, अमेरिका, दुबई, ईराक, यमन व सऊदी अरब में भी उनकी अच्छी तादाद है. मुंबई में इनका पहला आगमन करीब ढाई सौ वर्ष पहले हुआ.
 
 
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कारोबारी बोहरा समुदाय पीएम मोदी को अपना समर्थन देता रहा है. मोदी ने गुजरात में व्यापारियों की सुविधा के हिसाब से नीतियां बनाईं जो बोहरा समुदाय के उनके साथ आने की बड़ी वजह बनीं. नरेंद्र मोदी का बार-बार बोहरा समुदाय के सैयदना से मिलना भी इस समुदाय को मोदी और बीजेपी के करीब लाया.

‘बोहरा’ गुजराती शब्द ‘वहौराउ’, अर्थात ‘व्यापार’ का अपभ्रंश है. वे मुस्ताली मत का हिस्सा हैं जो 11वीं शताब्दी में उत्तरी मिस्र से धर्म प्रचारकों के माध्यम से भारत में आया था. 1539 के बाद जब भारतीय समुदाय बड़ा हो गया तब यह मत अपना मुख्यालय यमन से भारत में सिद्धपुर ले आया. 1588 में दाऊद बिन कुतब शाह और सुलेमान के अनुयायियों के बीच विभाजन हो गया. आज सुलेमानियों के प्रमुख यमन में रहते हैं, जबकि सबसे अधिक संख्या में होने के कारण दाऊदी बोहराओं का मुख्यालय मुंबई में है. भारत में बोहरों की आबादी 20 लाख से ज्यादा बताई जाती है. इनमें 15 लाख दाऊदी बोहरा हैं.

दाऊद और सुलेमान के अनुयायियों में बंटे होने के बावजूद बोहरों के धार्मिक सिद्धांतों में खास सैद्धांतिक फर्क नहीं है. बोहरे सूफियों और मजारों पर खास विश्वास रखते हैं. सुन्नी बोहरा हनफ़ी इस्लामिक कानून पर अमल करते हैं, जबकि दाऊदी बोहरा समुदाय इस्माइली शिया समुदाय का उप-समुदाय है. दाई-अल-मुतलक दाऊदी बोहरों का सर्वोच्च आध्यात्मिक गुरु पद होता है. समाज के तमाम ट्रस्टों का सोल ट्रस्टी नाते उसका बड़ी कारोबारी व अन्य संपत्ति पर नियंत्रण होता हैं.

दाऊदी बोहरा इमामों को मानते हैं. उनके 21वें और अंतिम इमाम तैयब अबुल कासिम थे जिसके बाद 1132 से आध्यात्मिक गुरुओं की परंपरा शुरू हो गई जो दाई-अल- मुतलक कहलाते हैं. 52वें दाई-अल-मुतलक डॉ. सैयदना मोहम्मद बुरहानुद्दीन थे. उनके निधन के बाद जनवरी 2014 से बेटे सैयदना डॉ. मुफद्दल सैफुद्दीन ने उनके उत्तराधिकारी के तौर पर 53वें दाई-अल-मुतलक के रूप में जिम्मेदारी संभाली है.

बोहरा समुदाय अपनी पहचान प्रोग्रेसिव के तौर पर करता है. बोहरा समुदाय के पुरुष और महिलाएं के कई तौर-तरीकों से देश के बाकी मुसलमानों से खुद को अलग मानते हैं बोहरा समुदाय की महिलाएं काले रंग के बुर्के की जगह अक्सर गुलाबी रंग के बुर्के में दिखती हैं, इन्हें लाल, हरे या नीले रंग के बुर्के भी पहने हुए देखा जा सकता है. इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों का कहना है कि दाऊदी बोहरा महिलाओं का पारंपरिक परिधान रिदा है जो इन्हें देश के बाकी मुस्लिमों से अलग दिखाता है.

बोहरा समुदाय के एक शख्स कहते हैं, आप बोहरा को देश की बाकी मुस्लिम आबादी के साथ नहीं जोड़कर देख सकते हैं. बोहरा समुदाय ने अपनी अलग पहचान के लिए काफी मेहनत की है. बोहरा ने खुद की पहचान पढ़े-लिखे, समृद्ध, विश्वप्रेमी के तौर पर बनाने की कोशिश की है. मुंबई में बोहरा समुदाय की महिलाओं को स्किनी जींस, टैंक टॉप पहने हुए देखा जा सकता है.

बोहरा महिलाएं रिदा पहनती हैं जिसमें महिलाओं का चेहरा नहीं ढका होता है जबकि पुरुष थ्री पीस वाइट आउटफिट और सफेद रंग की टोपी जिसमें सुनहरे रंग से एम्ब्रायडरी होती है, पहनते हैं. समाजशास्त्रियों का कहना है कि बोहरा समुदाय के लोगों में गैर-मुस्लिमों या हिंदुओं के सामने यह छवि बनाने की कोशिश रहती है कि वे बाकी मुस्लिमों से अलग हैं और इसलिए उन्हें निशाना ना बनाया जाए.  बोहरा समुदाय की एक खास बात है उनकी एकता. वे जमीन पर बैठकर एक बड़ी सी थाल में एक साथ खाते हैं. बिना पूछे कोई नया शख्स उनकी थाली में उनके साथ खा सकता है

बोहरा भले ही सार्वजनिक तौर पर समुदाय के बाहरी लोगों से मिलते-जुलते हों लेकिन समुदाय में कड़े नियम बनाए गए हैं कि उनके निजी और धार्मिक दुनिया में किसी बाहरी का प्रवेश ना हो सके. उदाहरण के तौर पर, जिसके पास बोहरा समुदाय का आईडी कार्ड नहीं है, उन्हें उनकी मस्जिदों में प्रवेश की अनुमति नहीं है. बोहरा दिन में बहुत बार नमाज अदा करते हैं. पुरुषों को दाढ़ी रखना और सिर पर टोपी पहनना अनिवार्य है.

हालांकि बोहरा समुदाय के भीतर एक धड़ा ऐसा है जो सैयदना पर तानाशाह होने का आरोप लगाता है और सुधार की मांग करता है. सुधारवादियों का तर्क है कि समुदाय पर उनका इतना ज्यादा नियंत्रण है कि हर सदस्य को बिजनेस चलाने से लेकर चैरिटेबल ट्रस्ट खोलने तक उनकी अनुमति लेनी पड़ती है. सुधारवादी असगर अली इंजीनियर कहते हैं, यहां धार्मिक ही नहीं बल्कि निजी मामलों में भी सैयदना का नियंत्रण है. वह हंसते हुए कहते हैं, शादी से लेकर दफन तक के लिए मुझे उनकी अनुमति चाहिए.

अगर बोहरा समुदाय के लोग सार्वजनिक तौर पर सैयदना पर सवाल खड़े करते हैं या फिर समुदाय के कड़े नियमों को मानने से इनकार करते हैं तो उसका बहिष्कार कर दिया जाता है. फिर उसकी शादी टूट जाती है और वह बोहरा मस्जिदों में प्रवेश नहीं कर सकता है. बोहरा समुदाय की एक महिला ने बताती है, आप पूरी सफेद टोपी नहीं पहन सकते हैं क्योंकि फिर आपको सुधारवादी समझ लिया जाएगा. हालांकि बोहरा की मुख्यधारा के लोगों का कहना है कि जिन लोगों को सैयदना और उनके नियमों से दिक्कत है, वे समुदाय छोड़ सकते हैं. समुदाय एक क्लब की तरह है जिसमें प्रवेश करने के लिए उसके नियमों को मानना ही पड़ेगा.

 

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