‘कर लो दुनिया मुट्ठी में’ नारे वाली अंबानी की कंपनी दिवालिया होने तक कैसे पहुंची

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अनिल अंबानी दिवालिया होने की कगार पर हैं. उनकी रिलायंस कम्युनिकेशंस RCoM ने दिवालिया कानून के तहत नेशनल कंपनी लॉ ट्राइब्यूनल NCLT में अर्जी देने का फैसला किया है. NCLT में दिवालिया मामलों की सुनवाई होती है. NCLT में रिलायंस कम्युनिकेशंस की अर्जी मंजूर हो जाने पर अनिल अंबानी को कर्ज चुकाने के लिए करीब 9 महीने का वक्त मिल जाएगा. RCOM पर अलग-अलग बैंकों का करीब 38,000 करोड़ रुपए का कर्ज है. अनिल अंबानी की कंपनी पर स्वीडन की टेलीकॉम कंपनी एरिक्सन का भी करीब 550 करोड़ रुपए बकाया है. एरिक्सन से विवाद के चलते अनिल अंबानी की मुश्किलें और बढ़ गईं. क्या है ये पूरा मामला और अनिल अंबानी इस हाल में कैसे पहुंच गए? आइए जानते हैं.

 

कैसे हुई संकट की शुरुआत?
रिलायंस कम्युनिकेशंस ने स्वीडन की एक कंपनी एरिक्सन से साल 2013 में एक समझौता किया. ये समझौता रिलायंस कम्युनिकेशंस को तकनीकी सुविधाएं मुहैया कराने के लिए हुआ. समझौते के मुताबिक एरिक्सन को रिलायंस के मोबाइल फोन टावर, फिक्स्ड टेलीफोन लाइन, ब्रॉडबैंड, वायरलेस वॉयस और डेटा आदि काम संभालने थे. समझौता 7 साल के लिए हुआ. लेकिन इसी बीच RCOM बुरी तरह घाटे में आ गई. बड़े भाई मुकेश अंबानी की रिलायंस जियो ने पूरे बाजार का गणित बिगाड़ दिया. अनिल अंबानी को साल 2017 तक अपना वायरलेस बिजनेस बंद करना पड़ा. फिर मई, 2018 में NCLT ने एरिक्सन की RCom के खिलाफ दायर तीन दिवालिया याचिकाएं मंजूर कर लीं. एरिक्सन ने आरोप लगाया कि आरकॉम ने उससे काम करा लिया. और इसके बदले उसके 1100 करोड़ रुपए नहीं दे रही है. इस पर आरकॉम ने एरिक्सन के खिलाफ नेशनल कंपनी लॉ अपीलिएट ट्राइब्यूनल में अपील की. ऑरकॉम ने दिवालिया प्रक्रिया का विरोध किया. और कहा कि उसकी रिलायंस जियो और ब्रुकफील्ड के साथ असेट्स बेचने की बात चल रही है. वो पैसे चुका देगी. इस पर दोनों कंपनियों के बीच सेटलमेंट हो गया. RCOM ने एरिक्सन को 550 करोड़ रुपए देने का वादा किया. मगर ये रकम अनिल अंबानी ने अब तक नहीं चुकाई है. अनिल को ये रकम 30 सितंबर, 2018 तक चुकानी थी.

 

क्यों नहीं चुका पा रहे हैं पैसा?
एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अनिल अंबानी ने भाई मुकेश अंबानी की कंपनी जियो को RCOM का वायरलेस और कनाडा की कंपनी ब्रुकफील्ड को जमीन बेचने का फैसला लिया था. इस डील के जरिए अनिल ने 18,000 करोड़ रुपए जुटाने का प्लान बनाया था. मगर अनिल की कंपनी स्पेक्ट्रम को लेकर सरकार की भी कर्जदार थी. इस वजह से संचार मंत्रालय ने इस डील को परमीशन नहीं दी. इससे सौदा लटक गया. कंपनी पर इस वक्त करीब 38 हजार करोड़ रुपए का कर्ज है. इसमें से 19,800 करोड़ रुपए का कर्ज भारतीय बैंकों का है. बाकी 18,200 करोड़ रुपए विदेशी बैंकों का है. इस कर्ज को निपटाने के लिए अनिल अंबानी ने दिसंबर, 2017 में कर्ज के नवीनीकरण का ऐलान किया. मगर कानूनी विवादों की वजह से ये प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई. अब RCOM नेशनल कंपनी लॉ ट्राइब्यूनल में नए दिवालिया नियमों के तहत समस्या का समाधान चाहती है. इन नियमों से RCOM को 9 महीने का वक्त मिल सकता है. इस दौरान अनिल की कंपनी अपने कर्जों का निपटारा करेगी. RCOM के मुताबिक ये फैसला सभी शेयरधारकों के हित में है.

 

RCOM को क्या फायदा होगा?
इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक RCOM को उसके कई कर्जदाता बैंक एनओसी नहीं दे रहे थे. ये एनओसी कर्ज के नवीनीकरण के लिए जरूरी है. इसी वजह से कंपनी NCLT गई है. अब  अनिल की कंपनी को सिर्फ 66 फीसदी बैंकों की मंजूरी चाहिए होगी. कंपनी एनसीएलटी में अपना प्रपोजल रखेगी. माना जा रहा है कि कंपनी यहां भी स्पेट्रम और कुछ प्रॉपर्टी बेचने का प्रस्ताव रख सकती है. कंपनी ने ग्लोबल क्लाउड एक्सचेंज जैसे अन्य बिजनेस, इंटरनेट डेटा सेंटर और इंडियन एंटरप्राइज बिजनेस को भी बेचना चाहती है. अनिल अंबानी, धीरूभाई अंबानी नॉलेज सिटी कॉम्प्लेक्स में 3 करोड़ वर्ग फुट स्पेस और दूसरी प्रॉपर्टी को भी बेचने की तैयारी में हैं. जियो को वायरलेस बिजनेस और ब्रुकफील्ड को प्रॉपर्टी बेचने का प्लान है. इन सारे प्रस्ताव को एनसीएलटी में दिया जा सकता है.

 

इस हाल में कैसे पहुंच गए अनिल?
1-साल, 2006 में रिलायंस ग्रुप का बंटवारा हुआ था. उस वक्त मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी की संपत्तियों में कोई खास अंतर नहीं था.
2-बंटवारे में अनिल अंबानी के हिस्से में रिलायंस इन्फोकॉम, रिलायंस एनर्जी और रिलायंस कैपिटल जैसी कंपनियां आईं. मुकेश के पास मूल कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज और आईपीसीएल थीं.
3-फोर्ब्स मैगजीन के मुताबिक अक्टूबर, 2018 में मुकेश की नेटवर्थ 47.3 अरब डॉलर. करीब 3,30,321 करोड़ रुपए थी. वहीं अनिल की नेटवर्थ 2.44 अरब डॉलर यानी कोई 14,680 करोड़ रुपए थी.
4-फोर्ब्स के मुताबिक साल 2007 में अनिल अंबानी की संपत्ति 45 अरब डॉलर यानी करीब 2,97,000 करोड़ रुपए और मुकेश की नेटवर्थ 49 अरब डॉलर यानी 3,23,000 करोड़ रुपए थी.
5-बंटवारे के वक्त अनिल की कंपनियों के कारोबार में भविष्य की संभावनाएं देखी गई थीं. मगर आज दोनों भाइयों की दौलत में जमीन-आसमान का फर्क आ चुका है.
6-ब्लूमबर्ग के मुताबिक, बंटवारे के बाद 10 साल में मुकेश की रिलायंस इंडस्ट्रीज ने 17.8 फीसदी का रिटर्न दिया. जबकि अनिल के समूह के लिए की रिटर्न दर -1.7 फीसदी.
7-2007 में RCom 17 पर्सेंट मार्केट शेयर के साथ टेलिकॉम सेक्टर की दूसरी बड़ी कंपनी थी. 2016 में बाजार में इसकी हिस्सेदारी 10 फीसदी से कम रह गई.
8-बाजार में हिस्सेदारी कम होने के साथ RCOM का कर्ज बढ़ता गया. 2009-10 में 25 हजार करोड़ रुपए का कर्ज बढ़कर अब 38 हजार करोड़ रुपए तक पहुंच गया है.
9-इस वक्त अनिल अंबानी की कंपनियों का बाजार पूंजीकरण 4 अरब डॉलर से कम है. रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिडेट का बाजार पूंजीकरण 98.7 अरब डॉलर है.

 

और कितनी मुश्किलें हैं छोटे अंबानी के सामने?
1-ब्लूमबर्ग के मुताबिक अनिल की रिलायंस नेवल एंड इंजीनियरिंग लिमिटेड पर करीब 5,300 करोड़ रुपए का कर्ज है. इस कंपनी को अनिल अंबानी ने साल 2015 में खरीदा था.
2-डिफेंस कंपनी दसॉ-रिलायंस एयरोस्पेस लिमिटेड यानी डीआरएएल फ्रांस से किए गए रफाएल सौदे को लेकर विवादों में है.
3-मुंबई की पहली मेट्रो लाइन तैयार करने वाली अनिल की कंपनी रिलायंस इन्फ्रा अगस्त महीने में बॉन्ड पेमेंट से चूक गई. कंपनी ने पावर ट्रांसमिशन असेट्स गौतम अडानी की अ़डानी ट्रांसमिशन लिमिटेड को बेच दिए हैं. ये सौदा करीब 18,800 करोड़ रुपए में हुआ है.
4-अनिल अंबानी की अगुवाई वाली कंपनी रिलायंस पावर लिमिटेड अपने एक प्रोजेक्ट में 713 करोड़ रुपए में हिस्सेदारी बेच चुकी है.
5-रिलायंस कैपिटल लिमिटेड कर्ज से राहत पाने के लिए गैर-वित्तीय बिजनेस से बाहर आने की कोशिश में है. रिलायंस कैपिटल असेट मैनेजमेंट, इक्विटी एंड कमोडिटी ब्रोकिंग, इंश्योरेंस, होम फाइनेंस के बिजनेस में हैं.
6-अनिल अंबानी ने RCOM का 1 लाख 78 हजार किलोमीटर का फाइबर-ऑप्टिक नेटवर्क भाई मुकेश की कंपनी जियो को बेच दिया है. अनिल मोबाइल फोन बिजनेस से पूरी तरह अलग होने की तैयारी में हैं.


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