दुनिया के सबसे अमीर जेफ़ और भारत के सबसे अमीर मुकेश, आमने-सामने क्यूं हैं?

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अगर अर्थ जगत की इस हफ़्ते की सबसे बड़ी ख़बर की बात की जाये तो वो होगी, ‘रिलायंस-फ़्यूचर-अमेज़न विवाद’ वाली ख़बर. जिसका लेटेस्ट स्टेटस ये है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज और फ्यूचर ग्रुप की डील पर सिंगापुर के आर्बिट्रेशन पैनल ने अस्थाई रोक लगाई है.

अब इस खबर के मायने क्या हैं और क्या है रिलायंस-फ़्यूचर-अमेज़न विवाद, आइए आसान भाषा में समझते हैं.

 

# कहानी पूरी फ़िल्मी है-

‘दिल तो पागल है’, ‘कुछ-कुछ होता है’, ‘हम दिल दे चुके सनम’ या ‘जब वी मेट’ जैसी कोई भी प्रेम-त्रिकोण (लव-ट्राएंगल) वाली स्टोरी उठा लीजिए. जिसमें दो पुरुष एक ही स्त्री को या दो स्त्रियां एक ही पुरुष को प्रेम करती हैं. और अंत-अंत तक नहीं पता होता कि कौन किसे मिलेगा या मिलेगी.

ऐसा ही कुछ लव ट्राएंगल वाला एंगल हमारी इस स्टोरी में भी है. जहां फ़्यूचर ग्रुप के साथ सबसे पहले प्रेम का इज़हार किया तो अमेज़न ने था. लेकिन अब फ़्यूचर ग्रुप का विवाह होने जा रहा है रिलायंस से. लेकिन यहीं मूवी ख़त्म नहीं हुई. अब ‘माय बेस्ट फ्रेंड्स वेडिंग’ की तर्ज़ पर ऐन शादी पर आ गया है अमेज़न.

 

हमारी उम्र में ज़्यादा समय नहीं लगता, एक नज़र में पता लग जाता है. (सांकेतिक इमेज)

 

ये है पूरा किस्सा आसान भाषा में. अब आइए समझते हैं रियल में क्या हुआ है.

 

# वो साल दूसरा था-

बात दिसंबर, 2019 की है. ‘अमेज़न‘ ने ‘फ़्यूचर कूपन प्राइवेट लिमिटेड’ नाम की कंपनी के 49% शेयर्स ख़रीदे. लगभग 2,000 करोड़ रुपए में.

‘फ़्यूचर कूपन प्राइवेट लिमिटेड’ उन्हीं की कंपनी है, जिनकी ‘फ़्यूचर रिटेल’ है. यानी किशोर बियानी की. ‘फ़्यूचर रिटेल’ को नहीं जानते तो समझ लीजिए ‘बिग बाज़ार’ वाली कंपनी.

तो इस तरह हमें समझ में आता है कि ‘फ़्यूचर कूपन प्राइवेट लिमिटेड’ और ‘फ़्यूचर रिटेल’ दोनों अलग-अलग कंपनियां बेशक हैं लेकिन इनके मालिक, या यूं कहें प्रमोटर्स, एक ही हैं. साथ ही ‘फ़्यूचर कूपन प्राइवेट लिमिटेड’ के ‘फ़्यूचर रिटेल’ में दस प्रतिशत के क़रीब शेयर हैं.

यूं सीधा गणित है कि जैसे ही जेफ़ बेजोस की कंपनी अमेज़न ने ‘फ़्यूचर कूपन प्राइवेट लिमिटेड’ के 49% शेयर ख़रीदे, वैसे ही उनके पास ‘फ़्यूचर रिटेल’ के भी लगभग पांच प्रतिशत शेयर आ गए. मतलब अमेज़न अब ‘बिग बाज़ार’ वाली कंपनी, यानी फ़्यूचर ग्रुप, की भी पांच प्रतिशत की हिस्सेदार बन गई थी.

साथ ही जब अमेज़न ने ‘फ़्यूचर कूपन प्राइवेट लिमिटेड’ के शेयर्स ख़रीदे, तब डील में कई ऐसी चीज़ें थी जिनको अगर ‘गड़े मुर्दे’ कहा जाए तो आज वही उखड़कर आ रहे हैं.

 

जेफ़ बेजोस. अमेज़न के मालिक. जब दिल्ली आए थे, जनवरी में. (तस्वीर: PTI)

 

चलिए स्टोरी को नॉन लीनियर फ़ॉर्मेट में पढ़ते हैं और लौटते हैं, ‘बैक टू दी फ़्यूचर’.

 

# नाइंटीज़ का नॉस्टेल्ज़िया और प्रेजेंट का ‘फ़्यूचर’-

किशोर बियानी. नब्बे के दशक में रिटेल के किंग कहे जाते थे. क्यूं कहे जाते थे? ‘बिग बाज़ार’ नाम के फ़िनॉमिना के चलते. बिग बाज़ार. एक रिटेल चेन. जिसने अपने शुरुआती दिनों में ही कई पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए थे और कई नए बना लिए थे. एक शुरुआती सेल के दौरान बिग बाज़ार के कोलकाता वाले शॉपिंग मार्ट में इतनी बिक्री हो गई थी कि नज़दीक की SBI बैंक की शाखा ने उन पैसों को अपने पास रखने से मना कर दिया. क्यूं? क्यूंकि SBI के पास इतने सारे पैसों को रखने की कोई व्यवस्था नहीं थी. दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया जैसे अख़बार के पहले पन्ने में किसी सेल की सुपर सफलता की खबर (विज्ञापन नहीं) आना भी शायद पहली बार था.

तो किशोर और उनके फ़्यूचर ग्रुप का सालों तक भौकाल रहा. इस कदर कि बिग बाज़ार की गणतंत्र दिवस वाली सेल के दिन इनके स्टोर्स में दंगों सा माहौल बन जाता था. मोबाइल फोन और लैपटॉप जैसे महंगे गेजेट्स भी शेल्फ से ऐसे ग़ायब होते थे, मानो आलू-गोभी हों.

हालांकि 2008 में वैश्विक मंदी की मार इनके बिज़नेस पर भी पड़ी, लेकिन ये और इनका फ़्यूचर ग्रुप फिर से उठ खड़ा हुआ. बाद में, यानी 2012 में बयानी ने अपने सबसे पहले बिज़नेस ‘पैंटलून’ बिरला ग्रुप को बेच दिया. रीज़न वही था, जो अब है. पैसों की कमी.

फिर आया साल 2020. जब इन्होंने स्वीकार किया कि ओवर-डाइवर्सीफ़िकेशन इन्हें ले डूबा. डाइवर्सीफ़िकेशन मतलब, एक से ज़्यादा क्षेत्रों में अपना हाथ आज़माना. और ओवर-डाइवर्सीफ़िकेशन मतलब चादर से लंबे पांव पसार लेना. फिर इन्होंने क़र्ज़ वापस लौटाने में भी डिफ़ॉल्ट किया. क्यूंकि पैसा था नहीं. और फिर आया कोविड 19. मतलब ‘फ़्यूचर ग्रुप’ के लिए ये ‘करेला वो भी नीम चढ़ा’ वाली स्थिति हो गई. लॉक-डाउन के चलते इनके सारे स्टोर्स बंद रहे. और घाटा बढ़ता गया. क्यूंकि रोज़मर्रा के खर्चे तो हो ही रहे थे. सैलरी से लेकर, स्टोर्स का किराया तक.

अब इन्हें पड़ी ज़ल्दी. किस बात की? क़र्ज़ मुक्त होने की. तो आप कैसे हों क़र्ज़मुक्त? ऑफ़-कोर्स अपना बिज़नेस बेचकर. पर इतना भारी ताम-झाम ख़रीदे कौन? रेस्क्यू में आए मुकेश अंबानी. बोले मैं ख़रीदता हूं. उन्हें भी प्रॉफ़िट था. उनका रिलायंस स्टोर दुगना बड़ा हो रहा था. यूं सौदा तय हो गया. 24,700 करोड़ रुपये में.

 

किशोर बियानी. जो ‘It Happened In India’ नाम की किताब के लेखक भी हैं.

 

सब कुछ अच्छा चल रहा था. लेकिन फिर पिक्चर में आया ‘अमेज़न’ और लेकर आया पिछले साल के…

 

# गड़े मुर्दे-

अमेज़न ने जब पिछले साल ‘फ़्यूचर कूपन प्राइवेट लिमिटेड’ के शेयर्स ख़रीदे तो न केवल उसे फ़्यूचर रिटेल में पांच प्रतिशत के क़रीब की हिस्सेदारी मिली, बल्कि कुछ ‘एक्सकल्यूज़िव’ अधिकार भी मिले. क्या थे वो अधिकार? उससे पहले ये समझना ज़रूरी होगा कि, अमेज़न ने फ़्यूचर कूपन के शेयर लिए क्यूं?

ये समझ लीजिए जिस वजह से फ़ेसबुक ने जियो के शेयर्स लिए, ऐसी ही किसी वजह के चलते. मतलब फ़्यूचर ग्रुप और अमेज़न, लगभग एक ही तरह के बिज़नेस में थे. एक ऑनलाइन रिटेल स्टोर, एक ऑफ़लाइन रिटेल स्टोर. अमेज़न का मानना था कि भारत में रिटेल बिज़नेस में अपना पांव पसारने के लिए ये डील ‘एक और एक ग्यारह’ साबित होगी. जिसमें फ़्यूचर ग्रुप अपने प्रोडक्ट अमेज़न स्टोर्स में रख पाएगा और अमेज़न को ये सुविधा मिलेगी कि वो बिग बाज़ार के चलते रोज़मर्रा के सामान, 2 घंटे के भीतर, घर-घर डिलीवर कर पाए. वो जैसे बिग बास्केट करता है, चुनिंदा जगहों पर.

तो अमेज़न के ‘एक्सकल्यूज़िव’ अधिकारों में दो बातें शामिल थीं, जिनके चलते सारा मुद्दा, ‘विवादित’ बन गया है.

# पहली बात, अगर फ़्यूचर ग्रुप 2019 वाली डील के 3 से 10 साल के दौरान कुछ बेचे तो, अमेज़न को उसे ख़रीदने का सबसे पहला अधिकार मिलेगा. हालांकि 3 साल होते, न होते, फ़्यूचर ग्रुप पहले ही बिक गया या बिकने की ओर बढ़ गया.

# दूसरी, अगर फ़्यूचर ग्रुप अमेज़न ने बदले कहीं और बिकेगा तो ऐसा अमेज़न के ‘न’ कहने पर ही संभव हो सकेगा. ये क्लॉज़ था, ‘राईट ऑफ़ फ़र्स्ट रिफ़्यूजल’. मतलब सबसे पहले मना करने का अधिकार.

 

 

Last but not least, हमारी कहानी के तीसरे मुख्य किरदार, रिलायंस के मालिक, मुकेश अंबानी. तस्वीर इसी साल 4 फ़रवरी की है. (PTI)

 

# किसी का प्यार लेके तुम, नया जहां बसाओगे-

तो जब अंबानी-बयानी वाली हालिया डील चल रही थी, तब तो अमेज़न चुप रहा. शायद ‘लोहा गर्म होने पर चोट’ करने की सोच रहा था. और यूं जब डील फ़ाइनल हो गई, और सिर्फ़ रेगुलेटरी अथॉरिटीज़ से ओके आना बाकी रह गया, तब अमेज़न अपने ‘राईट ऑफ़ फ़र्स्ट रिफ़्यूजल’ वाले अधिकार को लेकर सिंगापुर चला गया. कि ये डील इल्लीगल है. अवैध है.

सिंगापुर में इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन सेंटर है. अमेज़न अपना केस लेकर वहां पहुंच गई. आर्बिट्रेशन का शाब्दिक अर्थ मध्यस्थता होता है. यूं जहां अमेज़न गई है, वो कोई कोर्ट नहीं है. साथ ही इस आर्बिट्रेशन सेंटर का कोई फ़ैसला भारत में लागू नहीं होगा. यहां तो भारत का क़ानून ही चलेगा. लेकिन फिर भी अमेज़न का इस इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन सेंटर में जाना तीन कंपनियों के बीच के विवाद की एक शुरुआत तो है ही.

तो अब आर्बिट्रेशन सेंटर का फ़ैसला आया है. उसने रिलायंस इंडस्ट्रीज और फ्यूचर ग्रुप की डील पर अस्थाई रोक लगा दी है. अस्थाई इसलिए, क्यूंकि स्थाई फ़ैसला 90 दिनों के भीतर आएगा. और जैसा कि आपको बताया, ये कोई कोर्ट तो है नहीं, इसलिए जो फ़ैसला लेंगे, वो जज नहीं तीन सदस्य समिति होगी. इस समिति में एक सदस्य फ़्यूचर ग्रुप से एक अमेज़न से और एक तटस्थ होगा.

अब चूंकि इस आर्बिट्रेशन सेंटर का फ़ैसला भी काफ़ी हद तक अनौपचारिक ही होगा, इसलिए देखना है कि फ़ैसला आने के बाद अमेज़न क्या भारतीय कोर्ट का भी दरवाज़ा खटखटाएगी?

उधर मुकेश अंबानी की रिलायंस का कहना है कि ये रिलायंस-फ़्यूचर की ये डील पूरी तरह भारतीय क़ानूनों का पालन करती है और हम जल्द से जल्द ये डील पूरी करना चाहते हैं.




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