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adminJanuary 29, 20212min6670

चुटकियों में क़र्ज़ बाँटने वाले एप्स कुकरमुत्तों की तरह पनप रहे हैं, लेकिन कुछ को छोड़कर बाक़ियों की गतिविधियाँ काफ़ी ख़तरनाक हैं.

हैदराबाद की वी कविता ने कोरोना महामारी के समय एक एप के ज़रिए लोन लिया था. वे इस लोन को तय वक़्त पर नहीं चुका पाईं.

इस एप के कर्मचारियों ने उन्हें लोन चुकाने की आख़िरी तारीख़ के दिन सुबह सात बजे फ़ोन किया. चूंकि, वे दूसरे कामों में व्यस्त थीं, ऐसे में वे फ़ोन चेक नहीं कर पाईं.

अगली कॉल कविता के छोटे भाई की पत्नी की रिश्तेदार को गई. यहाँ तक कि कविता की भी उनके साथ कोई नज़दीकी बातचीत नहीं थी.

जब एप के कर्मचारियों ने उनसे पूछा कि क्या वे कविता को जानती हैं तो उन्होंने बताया कि ‘हाँ, वे उनकी रिश्तेदार हैं.’

इस पर कर्मचारियों ने उनसे कहा कि कविता ने उनकी कंपनी से एक लोन लिया है और उन्होंने ही उनका नंबर उन्हें दिया था. ऐसे में अब उन्हें ही यह लोन चुकाना चाहिए.

लेकिन इस तरह की माँग से वे घबरा गईं और उन्होंने यह पूरा वाक़या अपने परिवार में बता दिया. पूरे परिवार ने कविता से दूरी बना ली.

इसी तरह सिद्दीपेट की कीर्णी मोनिका, जो एक सरकारी कर्मचारी थीं और कृषि विभाग में काम करती थीं. उन्होंने भी अपनी निजी ज़रूरतों के लिए इन एप्स में से एक से लोन ले लिया.

जब वे बक़ाया रक़म का भुगतान करने से चूक गईं, तो लोन एप वालों ने उनकी फ़ोटो को व्हाट्सएप पर उनके सभी कॉन्टैक्ट्स को भेज दिया और उसमें लिखा कि मोनिका ने उनसे एक लोन लिया है और अगर वे उन्हें कहीं दिखाई देती हैं, तो उनसे लोन का भुगतान करने के लिए कहें.

मोनिका के परिवार के अनुसार, वे इस बेइज़्ज़ती को सह नहीं पायीं और उन्होंने ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली.

उनके गुज़रने के बाद एप के कर्मचारियों ने उनके घर फ़ोन किया और जब उन्हें बताया गया कि मोनिका ने आत्महत्या कर ली है तो उन्होंने इस पर कोई ग़ौर नहीं किया.

एप के कर्मचारियों ने मोनिका और उनके परिवार को भद्दी-भद्दी गालियाँ दीं और लोन ना चुकाने के लिए ज़िम्मेदार ठहराया.

रामगुंडम में काम करने वाले संतोष ने भी इन्हीं एप्स की प्रताड़ना और अपमान से तंग आकर आत्महत्या कर ली.

एक वीडियो में उन्होंने अपनी इस व्यथा का ज़िक्र किया. उन्होंने कीड़े मारने की दवाई खाकर जान दे दी.

इससे पहले राजेंद्र नगर में एक और शख़्स ने इन्हीं लोन एप्स की कारगुज़ारियों से परेशान होकर आत्महत्या कर ली थी.

 

लोन एप्स

 

लोगों की ज़िंदगी छीन रहे मोबाइल एप्स

इन लोन एप्स के ज़रिए भारी-भरकम ब्याज पर पैसा उधार लेने वालों से अगर क़र्ज़ चुकाने में ज़रा भी देरी हो जाती है तो उन्हें अक्सर धमकियों और भद्दी-भद्दी गालियों का सामना करना पड़ता है.

यह पूरी परिस्थिति इस तरह के क़र्ज़दारों के लिए एक प्रताड़ना बन गई है.

ये लोन कंपनियाँ बिना किसी अंडरराइटिंग के आकस्मिक परिस्थितियों में काम चलाने के लिए तुरत-फुरत पैसा देती हैं. बाद में ये उधार लेने वाले से मोटा पैसा वसूलती हैं.

ऊपर दिये गए मामले इन कंपनियों द्वारा अपनायी जा रही अनियंत्रित ग़लत गतिविधियों के चंद वाक़ये भर हैं.

आमतौर पर लोग बैंकों से या अपने परिचितों से पैसे उधार लेना पसंद करते हैं. मोबाइल फ़ोन आने के बाद कुछ लोगों ने इनके ज़रिए ब्याज पर पैसे उठाना शुरू कर दिया है.

अगर आप अपना ब्यौरा मोबाइल एप में डालते हैं तो वे आपको लोन देते हैं. इस क़र्ज़ को आपको बाद में वापस करना होता है. जब तक आप तय वक़्त पर पैसे चुकाते हैं, तब तक सब कुछ अच्छा रहता है. चीजें तब बिगड़ती हैं जब आप लोन की रक़म चुकाने में देरी करते हैं.

दूसरी बात, ये लोन लेना जितना आसान है इन्हें चुकाना उतना ही मुश्किल होता है. कई लोगों के लिए ये लोन एक मानसिक प्रताड़ना के दौर के रूप में सामने आते हैं.

सिर्फ़ ऊपर दिये गए मामले ही इन एप आधारित लोन के चलते मुसीबत में पड़ने वाले लोगों के उदाहरण नहीं हैं. ऐसे तमाम लोग हैं जिन्हें इन लोन्स के चलते गंभीर प्रताड़ना का सामना करना पड़ा है.

जो लोग थोड़े बहुत पढ़े लिखे हैं और फ़ोन का इस्तेमाल करना जानते हैं, वे कई दफ़ा अपनी ज़रूरतों के लिए इन एप्स से लोन ले लेते हैं, लेकिन जब इन्हें चुकाने में देरी होती है तो उन्हें भयंकर मुश्किलों और तनाव से जूझना पड़ता है.

 

एप से क़र्ज़ लेने में दिक़्क़त क्या है?

आमतौर पर जब बैंक या किसी दूसरी वित्तीय संस्था से लोन लिया जाता है तो ब्याज दर एक से डेढ़ फ़ीसद प्रतिमाह होती है. लेकिन, इन एप आधारित क़र्ज़ों में ब्याज की कोई ऊपरी सीमा नहीं है. इनमें कोई काग़ज़ नहीं होता है.

इन क़र्ज़ों में ब्याज पर ब्याज चढ़ता है. दिनों के आधार पर ब्याज तय होता है. हफ्ते के आधार पर ब्याज तय किया जाता है.

लोन चुकाने में देरी होने पर मूलधन पर पेनाल्टी लगती है. साथ ही ब्याज पर भी पेनाल्टी वसूली जाती है.

आमतौर पर कहीं भी महीने के आधार पर ब्याज का आकलन नहीं किया जाता, लेकिन इन एप्स में यह आकलन दिन, हफ्ते और महीने के आधार पर किया जाता है.

 

प्रोसेसिंग फ़ीस

बैंक और दूसरे ग़ैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थान (एनबीएफ़सी) किसी को लोन देते हैं तो वो उसके लिए एक प्रोसेसिंग फ़ीस लेते हैं.

यह फ़ीस लोन की मात्रा पर आधारित होती है. यह प्रोसेसिंग फ़ीस आमतौर पर लोन की रक़म के एक फ़ीसद से भी कम होती है. इसका मतलब है कि अगर आप पाँच लाख रुपये का लोन लेते हैं, तो प्रोसेसिंग फ़ीस के तौर पर आपको 5,000 रुपये से भी कम देने होते हैं.

लेकिन, एप आधारित लोन ऐसे नहीं चलते. ये महज़ पाँच हज़ार रुपये के लोन के लिए चार हज़ार रुपये प्रोसेसिंग फ़ीस के लेते हैं.

ऐसे में सवाल उठता है कि लोग आख़िर ये लोन लेते क्यों हैं?
इसकी वजह ये है कि ये एप्स आपसे आपकी आमदनी का कोई प्रमाण नहीं माँगते. ये आपका सिबिल स्कोर नहीं देखते. जबकि कोई भी बैंकिंग संस्थान या एनबीएफ़सी आपका सिबिल स्कोर चेक किए बग़ैर आपको लोन नहीं देता.

सिबिल एक ऐसा स्कोर होता है जिससे आपकी किसी लोन को चुकाने की हैसियत का पता चलता है.

इससे यह भी पता चलता है कि आपने कहीं अपने पिछले लोन चुकाने में कोई देरी या डिफ़ॉल्ट तो नहीं किया.

इन्हीं के आधार पर आपका स्कोर तय किया जाता है और बैंक लोन देते वक़्त इस स्कोर का इस्तेमाल आपकी लोन चुकाने की क़ाबिलियत का अंदाज़ा लगाने में करते हैं. जितना ऊंचा सिबिल स्कोर होता है आपकी लोन चुकाने की संभावना उतनी ही मज़बूत होती है.

कुछ एप्स आमदनी के प्रमाण और सिबिल स्कोर को वेरिफ़ाई करते हैं और अपने दिये गए क़र्ज़ों को एक प्रक्रिया के तहत वसूलते हैं. लेकिन, ऐसे एप्स चुनिंदा ही हैं.

जबकि ऐसे एप्स की भारी तादाद है जो लोन देने के नाम पर लूट मचा रहे हैं. इस तरह के एप्स लोगों की पैसों की आकस्मिक ज़रूरतों और तुरत-फुरत लोन मिल जाने की सहूलियत का फ़ायदा उठा रहे हैं.

 

जीएसटी के नाम पर

आमतौर पर हम हर तरह की सर्विस के लिए सरकार को जीएसटी का भुगतान करते हैं. लेकिन, ये एप्स जीएसटी के तहत रजिस्टर्ड नहीं हैं. ये एप्स उनसे क़र्ज़ लेने वालों से जीएसटी वसूलते हैं, लेकिन यह पैसा सरकार को नहीं चुकाया जाता है.

इसका मतलब यह है कि जीएसटी के दायरे में आये बग़ैर ये जीएसटी का पैसा भी अपने ग्राहकों से वसूलते हैं.

अगर जीएसटी लिया जाता है तो उस संस्थान का जीएसटी नंबर भी दिया जाना चाहिए. लेकिन, ये एप्स ऐसा कोई ख़ुलासा नहीं करते हैं.

 

फ़र्ज़ी क़ानूनी नोटिस

अगर रीपेमेंट में देरी होती है तो फ़र्ज़ी क़ानूनी नोटिस फ़ोन पर भेजे जाते हैं. इनमें लिखा होता है कि चूंकि आप अपने लिए गए लोन को चुकाने में डिफॉल्ट कर गए हैं ऐसे में हम आप आपके ख़िलाफ़ एक्शन ले रहे हैं या एक्शन लेने जा रहे हैं. इनमें कहा जाता कि आप कोर्ट में उपस्थित रहने के लिए तैयार रहें.

लेकिन, ये नोटिस फ़र्ज़ी होते हैं. ये एप्स इसी तरह के नोटिस क़र्ज़दार के रिश्तेदारों और दोस्तों को भी भेजते हैं. जिन लोगों को इस सब के बारे में जानकारी नहीं होती है वे इस नोटिस को देखकर डर जाते हैं.

 

लोन वसूली के लिए बेइज़्ज़ती करना

इन एप्स से लोन लेने के बाद हमें इन्हें तय समयसीमा के भीतर चुकाना होता है. ऐसा नहीं होने पर लोन चुकाने की डेडलाइन के दिन सुबह सात बजे ही ये एप्स आपको लगातार फ़ोन कॉल्स करने लगते हैं. ये दर्जनों बार आपको फ़ोन करते हैं. और इनकी भाषा धमकाने वाली होती है.

अगर किसी भी वजह से आप डेडलाइन से एक दिन भी चूक गए तो बस आपकी मुसीबत शुरू हो जाती है.

एप्स के कर्मचारी इस तरह के आदेश से शुरुआत करते हैं, “भीख मांगो, लेकिन पैसे वापस करो.”

यह इनकी पहले चरण की कार्रवाई होती है.

अगले चरण में ये आपके रिश्तेदारों को फ़ोन करना शुरू कर देते हैं. ये उन्हें कहते हैं कि आपने उनका रेफ़रेंस दिया है. ये आपके रिश्तेदारों से कहते हैं कि अब आपको यह लोन चुकाना होगा.

इसके साथ ही लोन लेने वाले और उसके रिश्तेदारों के बीच संबंध या तो ख़त्म हो जाते हैं या फिर ख़राब हो जाते हैं. ये एप्स आपके कई रिश्तेदारों को इस तरह से फ़ोन करते हैं.

अंतिम चरण में ये लोन लेते वक़्त आपकी दी गई तस्वीरों का इस्तेमाल करने लगते हैं. ये व्हॉट्सएप ग्रुप्स पर आपकी तस्वीरें डालने लगते हैं.

ये उधार लेने वाले के दोस्तों और रिश्तेदारों का एक ग्रुप बनाते हैं और उसमें उधार लेने वाले की फ़ोटो डालते हैं और उसका कैप्शन देते हैं, “फ़लां शख्स धोखेबाज़ है.” या “ये शख्स पैसे चुकाने से बच रहा है.”

यह प्रताड़ना यहीं ख़त्म नहीं होती है. इनमें कहा जाता है कि आप सब सौ-सौ रुपये इकट्ठे कीजिए और इनका लोन चुकाइए. ये सब बेहद बुरे अंदाज में कहा जाता है.

कविता कहती हैं, “हम ये नहीं कह रहे कि हम लोन नहीं चुकाएंगे. मैं एक छोटा कारोबार चलाती हूं. मुझे कोरोना के वक़्त पर पैसे उधार लेने पड़ गए. लेकिन, वे किसी भी बात को नहीं सुनना चाहते. यहां कि मैं ये भी कहूं कि मुझे बैंक जाने के लिए कम से कम एक घंटे का वक़्त दे दीजिए.”

वे चीख़ने लगते हैं, “आप एक महिला नहीं हैं? आपके बच्चे नहीं हैं? ऐसा कोई नहीं है जो बैंक में पैसे जमा कर सके?”

कविता कहती हैं, “वे बेहद गंदी गालियां देने लगते हैं.”

 

इन्हें नंबर कहां से मिलते हैं?

हर स्मार्टफ़ोन में अगर हम कोई नया एप इंस्टॉल करते हैं तो हमसे कुछ मंज़ूरियां मांगी जाती हैं. आमतौर पर एप इंस्टॉल करते वक़्त हम इन मंज़ूरियों का ब्योरा पढ़े बग़ैर ओके पर क्लिक कर देते हैं और सभी तरह की मंज़ूरियों के लिए हामी भर देते हैं.

इन मंज़ूरियों को देने का मतलब यह है कि एप आपकी सभी फ़ोटोज़ और कॉन्टैक्ट नंबरों तक पहुँच सकता है और उनका मनचाहा इस्तेमाल कर सकता है.

इन एप्स से लोन वाले एक बटन को दबाते हैं और इसके साथ ही एप को उनके सभी कॉन्टैक्ट नंबर निकालने की ताक़त मिल जाती है.

ओके बटन के दबने के साथ ही उधार लेने वाले के सभी कॉन्टैक्ट्स एप्स चलाने वालों के पास पहुँच जाते हैं.

उधार लेने वाले को यह पता भी नहीं चलता है कि लोन लेने पर उसके फ़ोन के सभी संपर्क एप्स वालों के हाथ चले जाएंगे.

कविता बताती हैं, “जब मेरे रिश्तेदारों को फ़ोन गए तो मैं हैरान रह गई. लेकिन, जब मैंने इस पर विचार किया तो मुझे पता चला कि एप को इंस्टॉल करते वक़्त उन्होंने ये सारे नंबर ले लिए थे. अब पूरे परिवार ने मुझसे दूरी बना ली है.”

यहां तक कि अब पुलिस भी इस बात की जाँच कर रही है कि इन एप्स के पास लोगों को बांटने के लिए इतना पैसा कहां से आता है.

लेकिन, अभी तक पुलिस केवल ऐसे लोगों का पता कर पाई है जो कि कॉल सेंटरों से लोगों को फ़ोन करते हैं और धमकाते हैं. इस मामले में आगे की जाँच जारी है.

क्या क़र्ज़ चुकाना ग़लत है?

जब हम कोई क़र्ज़ लेते हैं तो हमें वह पैसा चुकाना पड़ता है. लेकिन, इस भुगतान का एक तरीक़ा होता है, इसमें सरकार के तय किए गए नियमों को मानना होता है. इस तरह के क़र्ज़ों में ब्याज की दरें तार्किक होनी चाहिए.

इन क़र्ज़ देने वालों को बताना होता है कि वे किस चीज़ के लिए कितना चार्ज ले रहे हैं. ये चार्ज एक दायरे में होने चाहिए.

इन संस्थानों को लोगों को पैसे चुकाने के लिए वक़्त देना चाहिए. लेकिन, ये संस्थान इस तरह के किसी रेगुलेशन को नहीं मानते हैं. यही असली समस्या है.

इन एप्स का एक दूसरा पहलू भी है. गुज़रे वक़्त में ऐसा हुआ है कि कुछ लोगों ने इन एप्स से पैसे उधार लिए और क्रेडिट कार्ड की ब्याज दर के मुताबिक़ पैसे लौटा दिए.

इन एप्स से पैसे उधार ले चुके एक शख्स ने बताया कि उन्होंने इतने बुरे तरीक़े से बर्ताव नहीं किया था.

सैकड़ों की संख्या में मौजूद क़र्ज़ देने वाली एजेंसियों में ऐसी चुनिंदा ही हैं जो कि रेगुलेशंस के मुताबिक़ चल रही हैं. एक पुलिस अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि बाक़ी की एजेंसियां लोगों को प्रताड़ित करती हैं और उनका मक़सद लोगों को लूटना होता है.

क़ानून क्या कहता है?
भारत में बैंकों को रेगुलेट करने वाले रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने भी इन एप्स के लिए कोई रेगुलेशंस नहीं बनाए हैं.

ऐसे में पुलिस पहले से मौजूद क़ानूनों के आधार पर इन एप्स के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने की कोशिश कर रही है. इन क़ानूनों में बैंकिंग रेगुलेशंस, आईपीसी, आईटी क़ानून शामिल हैं.

तेलंगाना की साइबराबाद पुलिस इसकी जाँच कर रही है. अब तक वे दर्जनों लोगों की पूछताछ कर चुके हैं.

पुलिस ने आंध्र प्रदेश में भी मामले दर्ज किए हैं. आंध्र प्रदेश की पुलिस ने एक स्पेशल एनओसी भी जारी की है.

चीन की भूमिका
इस बारे में चीज़ें स्पष्ट होना अभी बाक़ी है कि इन एप्स में चीनी संस्थानों की क्या भूमिका है.

कुछ लोगों का कहना है कि लोग चीन में मौजूद सर्वर्स का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन कुछ लोगों का यहां तक कहना है कि इन एप्स में पैसा भी चीनी वित्तीय संस्थान लगा रहे हैं.

पुलिस इसकी जाँच कर रही है. 25 दिसंबर को साइबराबाद पुलिस ने एक चीनी नागरिक समेत चार लोगों को लोन देने वाले एप्स के ख़िलाफ़ मामले में गिरफ़्तार किया है.

साइबराबाद पुलिस ने जानकारी दी है कि उन्होंने क्यूबवो टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड के हेड को अरेस्ट किया है जो कि एक चीनी नागरिक है. इसके अलावा तीन अन्य लोगों को भी अरेस्ट किया गया है.

इस ऑर्गनाइजेशन को दिल्ली में हेड ऑफ़िस के तौर पर रजिस्टर्ड किया गया है और इसका नाम स्काईलाइन इनोवेशंस टेक्नोलॉजीज रखा गया था.

इस कंपनी में जिक्सिया झेंग, उमापति (अजय) डायरेक्टर के तौर पर काम कर रहे थे.

इस कंपनी ने 11 लोन एप्स डिवेलप किए हैं. यह कंपनी बड़े पैमाने पर पैसे वसूल रही है और इसके काम करने के तरीक़ों में धमकियां देना शामिल रहा है. मौजूदा वक़्त में कंपनी के प्रतिनिधि पुलिस कस्टडी में हैं.


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adminJanuary 29, 20213min6200

सैन्य ताक़त में असाधारण बढ़ोतरी से लेकर ख़ुद को एक संपन्न देश बनाने और दुनिया का मैन्युफ़ैक्चरिंग हब बनने तक का सफ़र चीन ने रॉकेट की रफ्तार से तय किया है. 1979 में अर्थव्यवस्था को विदेशी निवेश के लिए खोलने और आर्थिक सुधार लागू करने के महज़ 40 सालों में चीन के आर्थिक और सैन्य सुपरपावर बनने के सफ़र को पूरी दुनिया ने हैरत भरी नज़रों से देखा है.

साल 2019 के आख़िर में चीन ने दुनिया को तब फिर चौंका दिया जब उसके एक शहर वुहान से ख़तरनाक कोरोना वायरस फैलना शुरू हो गया.

जब तक कोई समझ पाता कोविड-19 वायरस पूरी दुनिया में पैर पसार चुका था. इस एक वायरस ने पूरी दुनिया को लाचार और पंगु बना दिया और अगला पूरा एक साल इस महामारी से जंग में कटा. अभी भी यह लड़ाई जारी है.

इस दौरान आम लोगों से लेकर पश्चिमी दुनिया के दिग्गज देशों तक सब की आमदनी और अर्थव्यवस्थाएं धराशायी हो गईं. अभी भी दुनिया इस महामारी के असर से अपनी अर्थव्यवस्थाओं को उबारने की कोशिशों में लगी हुई हैं.

हालांकि, इस मामले में भी चीन ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है. जब पूरी दुनिया की ज्यादातर अर्थव्यवस्थाएं नकारात्मक ग्रोथ या कॉन्ट्रैक्शन (अर्थव्यवस्थाओं का संकुचन या सिकुड़ना) का सामना कर रही हैं या फिर मामूली ग्रोथ के लिए भी संघर्ष कर रही हैं, उस वक्त पर चीन ने ग्रोथ के बढ़िया आंकड़ों से दुनिया को हैरत में डाल दिया है.

चीन की इकनॉमी जिस रफ्तार से बढ़ रही है वह कोरोना से जूझ रहे दूसरे देशों के लिए कल्पना से भी ज्यादा है.

क्रिसिल के चीफ़ इकनॉमिस्ट डी के जोशी मानते हैं कि कोरोना पर जल्द कंट्रोल पाने की वजह से चीन अपनी आर्थिक ग्रोथ को रिकवर करने में सफल रहा है.

डी के जोशी कहते हैं, “सबसे पहले महामारी चीन में शुरू हुई और उन्होंने ही सबसे जल्दी इस पर क़ाबू पा लिया. पूरी समस्या की जड़ ही कोविड-19 है. ऐसे में अगर आप कोविड-19 पर कंट्रोल कर सकते हैं तो आप आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ा सकते हैं. इसी वजह से केवल एक तिमाही में ही चीन की ग्रोथ नेगेटिव हुई और उसके बाद इसमें धीरे-धीरे तेजी आने लगी.”

 

आईएमएफ़ का अनुमान, 2021 में 7.9 फ़ीसद रफ़्तार से बढ़ेगा चीन

 

चीन

 

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) ने 2021 के लिए चीन की ग्रोथ का पूर्वानुमान घटाकर 7.9 फ़ीसद कर दिया है.

 

पहले आईएमएफ़ का अनुमान था कि 2021 में चीन की अर्थव्यवस्था 8.2 फ़ीसद की रफ्तार से आगे बढ़ेगी.

ग्रोथ फोरकास्ट को घटाने के बावजूद 7.9 फ़ीसद का आंकड़ा ऐसा है जिसे हासिल करना शायद दुनिया के दूसरे किसी भी देश के लिए मुमकिन नहीं है.

 

क्या हैं चीन के आंकड़ें?

पिछले साल चीन की अर्थव्यवस्था 2.3 फ़ीसद की रफ्तार से बढ़ी है. 2020 की शुरुआत में कोविड-19 के शटडाउन की वजह से पैदा हुई सुस्ती के बावजूद चीन ग्रोथ करने में कामयाब रहा है.

अंतरराष्ट्रीय आर्थिक विकास, व्यापार, निवेश और टेक्नोलॉजी में विशेषज्ञता रखने वाले नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक रिसर्च एंड इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर डिवेलपिंग कंट्रीज (आरआईएस) के प्रोफ़ेसर डॉ. प्रबीर डे कहते हैं कि अगर कोविड के दौर को देखें तो पिछले साल फ़रवरी से इस साल जनवरी तक के दौर में चीन ही दुनिया की एकमात्र ऐसी बड़ी इकनॉमी है जो लगातार पॉज़िटिव ग्रोथ से बढ़ रही है.

हालांकि, चीन की अर्थव्यवस्था पिछले चार दशकों में पहली बार 2020 में सबसे सुस्त रफ्तार से बढ़ी है.

लेकिन, डॉ. डे कहते हैं, “चीन की जीडीपी का साइज़ मौजूदा प्राइस के हिसाब से क़रीब 10 लाख करोड़ डॉलर का है. ऐसे में इसमें अगर 1 फ़ीसदी की भी बढ़ोतरी होती है तो इससे भी एक बड़ा असर पैदा होता है.”

2020 की आख़िरी तिमाही यानी अक्तूबर से दिसंबर के बीच चीन की ग्रोथ 6.5 फ़ीसद रही है जो कि एक ज़बरदस्त आंकड़ा है.

इकनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट के प्रिंसिपल इकनॉमिस्ट यू सु के मुताबिक़, “जीडीपी आंकड़ों से पता चलता है कि अर्थव्यवस्था तकरीबन सामान्य हो चुकी है. यह रफ्तार जारी रहेगी, हालांकि उत्तरी चीन के कुछ प्रांतों में कोविड-19 के मौजूदा मामलों के चलते अस्थाई रूप से इसमें उतार-चढ़ाव आ सकता है.”

जुलाई से सितंबर के क्वॉर्टर में चीन की ग्रोथ पिछले साल की इसी तिमाही के मुकाबले 4.9 फ़ीसद रही थी.

2020 के पहले तीन महीनों में पूरे देश में फ़ैक्टरियों और मैन्युफैक्चरिंग प्लांट्स के शटडाउन के चलते चीन की ग्रोथ नेगेटिव 6.8 फ़ीसद रही थी.

दूसरी तिमाही में चीन की ग्रोथ 3.2 फ़ीसद रही और इस तिमाही से ही चीन रिकवरी की राह पर चल पड़ा.

ग़ौर करने वाली बात यह भी है कि चीन ने यह ग्रोथ एक ऐसे वक़्त में हासिल की है जबकि पूरी दुनिया में कोरोना वायरस फैलने को लेकर चीन को लेकर ग़ुस्सा था और चीन के साथ कारोबार न करने के मंसूबे दुनियाभर में बनाए जा जा रहे थे.

 

क्या हैं वजहें?

वरिष्ठ अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसर अरुण कुमार कहते हैं कि चीन की अर्थव्यवस्था के दोबारा खड़े होने के पीछे दो-तीन वजहें हैं.

वे कहते हैं, “पहला तो चीन ने महामारी को बड़ी तेज़ी से कंट्रोल कर लिया. इसके बाद उन्होंने अर्थव्यवस्था को जल्दी ही खोल दिया. महामारी को कंट्रोल कर लेने के चलते चीन को दूसरे देशों जैसी दिक़्क़तों का सामना नहीं करना पड़ा.”

प्रो. कुमार कहते हैं कि चीन ने कोरोना वायरस को अपने यहां दूसरे इलाक़ों में फैलने नहीं दिया. उन्होंने इसे हुवेई प्रांत में ही कंट्रोल कर लिया. इस वजह से चीन अर्थव्यवस्था दोबारा खड़ी करने में सफल रहा.

 

एक्सपोर्ट और मैन्युफैक्चरिंग में रफ्तार

चीन का एक्सपोर्ट सेक्टर दिसंबर 2020 में भी तेज़ रफ्तार से बढ़ा है. दिसंबर में चीन का ट्रेड सरप्लस रिकॉर्ड पर पहुँच गया.

पूरी दुनिया में हेल्थकेयर उपकरणों और वर्क फ्रॉम होम की तकनीकों की माँग ने चीन के एक्सपोर्ट को बरक़रार रखा है.

प्रो. अरुण कुमार कहते हैं, “ऐसा लग रहा था कि महामारी के चलते चीन का एक्सपोर्ट में बड़ी गिरावट आएगी, वैसा नहीं हुआ.”

“सोचा ये जा रहा था कि कोविड-19 फैलने के चलते बाक़ी देशों में माँग कमज़ोर होगी, लेकिन उल्टा ये हुआ कि दुनियाभर के देश चीन से सामान ख़रीदने लगे.”

वे कहते हैं कि लग रहा था कि चीन से नाराज़गी के चलते दूसरे देश वहां से सामान नहीं ख़रीदेंगे, लेकिन, ऐसा नहीं हुआ.

दिसंबर में चीन का निर्यात 18.1 फीसदी की रफ्तार से बढ़ा है. जबकि नवंबर में ये ग्रोथ 21.1 फ़ीसद थी.

क्रिसिल के डी के जोशी कहते हैं, “चीन की ग्रोथ बड़े तौर पर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर से आ रही है. चीन का एक्सपोर्ट भी दमदार बना हुआ है. इसके अलावा, चीन की सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी बड़ा पैसा लगा रही है.”

अमरीका को एक्सपोर्ट भी दिसंबर में एक साल पहले के मुक़ाबले 34.5 फ़ीसद बढ़ा है. दूसरी ओर, अमरीकी सामानों का चीन में आयात भी 47.7 फ़ीसद बढ़ा है जो कि जनवरी 2013 के बाद सबसे ज्यादा है.

पूरे साल के लिए चीन का अमरीका से ट्रेड सरप्लस 317 अरब डॉलर रहा है जो कि 2019 के मुक़ाबले सात फ़ीसदी ज्यादा है.

पिछले साल सितंबर में चीन के एक्सपोर्ट के आंकड़ों से ही मज़बूत रिकवरी के संकेत मिलने लगे थे.

इस दौरान चीन का एक्सपोर्ट 2019 के सितंबर महीने के मुक़ाबले 9.9 फ़ीसद की रफ्तार से बढ़ा, जबकि आयात में 13.2 फ़ीसद की ग्रोथ दर्ज की गई.

फ़िलहाल ऐसा दिख रहा है कि चीन का मैन्युफ़ैक्चरिंग सेक्टर रिकवर हो चुका है. इंडस्ट्रियल आउटपुट में 7.3 फ़ीसद की ग्रोथ दिखाई दी है.

प्रो. डे कहते हैं कि चीन का अभी भी ज्यादातर देशों के साथ ट्रेड सरप्लस बना हुआ है. चीन ने अपने यहां बड़े पैमाने पर रिफॉर्म किए हैं और कारोबारी माहौल को अनुकूल बनाया है.

 

नक़दी डालना

साल 2020 की शुरुआत में चीन के केंद्रीय बैंक ने ग्रोथ और रोज़गार को सपोर्ट करने के क़दम उठाने शुरू कर दिए.

पीपुल्स बैंक ऑफ़ चाइना ने पिछले साल फ़रवरी में रिवर्स रेपो के ज़रिए अर्थव्यवस्था में कुल 1.7 लाख करोड़ युआन (242.74 अरब डॉलर) की पूंजी डाली थी.

साल के अंत में यानी दिसंबर में चीन के केंद्रीय बैंक ने 950 अरब युआन (145 अरब डॉलर) मीडियम-टर्म लेंडिंग फ़ैसिलिटी के जरिए लगाए हैं.

दिसंबर ऐसा लगातार पाँचवां महीना था जबकि चीन ने इस टूल का इस्तेमाल करते हुए अर्थव्यवस्था में नकदी डाली है. साथ ही केंद्रीय बैंक ने क़र्ज़ पर ब्याज दरों को भी 2.95 फ़ीसद पर स्थिर रखा है.

पिछले एक साल में चीन में 2.44 लाख करोड़ युआन के नए लोन बांटे गए हैं. ख़ासतौर पर ये लोन छोटी कंपनियों को दिए गए हैं.

 

ट्रैवल बूम और घरेलू खपत पर ज़ोर

 

चीन

हालांकि, कोरोना के चलते अंतरराष्ट्रीय ट्रैवल पर भले ही प्रतिबंध हों, लेकिन चीन में घरेलू ट्रैवल ने अर्थव्यवस्था में फिर से जान फूंकने का काम किया है.

अक्तूबर में चीन में मनाए जाने वाले गोल्डन वीक में लाखों की संख्या में चीनी लोगों ने ट्रैवल किया. गोल्डन वीक के दौरान हर साल छुट्टियां होती हैं.

आठ दिन की इन छुट्टियों के दौरान चीन में 63.7 करोड़ ट्रिप्स हुईं और इनसे करीब 69.6 अरब डॉलर का रेवेन्यू पैदा हुआ.

चीन की अर्थव्यवस्था मूल रूप में निवेश और मैन्युफैक्चरिंग पर आधारित है. लेकिन, चीन इसे खपत और सर्विसेज आधारित बनाने पर फोकस कर रहा है.

प्रो. डे कहते हैं कि चीन ने अपने यहां इंफ्रास्ट्रक्चर समेत दूसरे सेक्टरों में भारी निवेश किया है और इसके चलते डिमांड पैदा की है.

डे कहते हैं कि 2009 ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस के बाद चीन ने इससे सबक लिया और अपनी इकनॉमी को एक्सपोर्ट और मैन्युफैक्चरिंग आधारित से घरेलू खपत और सर्विसेज मार्केट आधारित इकनॉमी पर शिफ्ट करना शुरू कर दिया.

हालांकि, डी के जोशी कहते हैं कि चीन में घरेलू खपत ज्यादा नहीं बढ़ी है और चीन पहले की तरह से इंफ्रास्ट्रक्चर को बूस्ट करने के जरिए इसे बढ़ा रहा है. पहले चीन की खपत ज्यादा थी जिसमें अभी तक रिकवरी नहीं हुई थी.

चीन में घरेलू बचत दर पिछले 10 साल के ऐतिहासिक स्तर से भी ऊपर चल रही है. जोशी के मुताबिक, ऐसे में ग्रोथ की वजह चीन में खपत में बढ़ोतरी नहीं है.

प्रो. अरुण कुमार कहते हैं कि चीन ने महामारी के दौरान अपने यहां खपत पर काफी फोकस किया है. वे कहते हैं, “दूसरे देशों में बेरोजगारी बढ़ने से खपत भी कम हो गई. ऐसे में चीन ने जो नीतियां अपनाईं, उससे चीन को तेजी से उबरने में मदद मिली.”

 

चीन को अलग-थलग करने की मुहिम फीकी पड़ी

कोविड-19 के चरम के वक्त दुनियाभर में चीन को लेकर जो ग़ुस्सा था वो भी अब दिखाई नहीं देता और हर देश चीन से सामान मंगा रहा है. फार्मा, मेडिकल और दूसरी सभी डिमांड चीन के पास जा रही है.

प्रो. डे कहते हैं चीन के आइसोलेशन की बातें बेमानी साबित हुई हैं. इसके अलावा, ऐसा भी हल्ला खूब मचा था कि कंपनियां चीन छोड़कर जाना चाहती हैं, लेकिन 30-35 कंपनियों को छोड़कर सारी कंपनियां वहीं रुकी हुई हैं. इसकी वजह यह है कि चीन निवेश करने वालों को हर मुमकिन सुविधा और सुरक्षा देता है.

प्रो. अरुण कुमार कहते हैं, “चीन से सप्लाई पर कुछ प्रतिबंध लगाने के चलते भारत में ऑटोमोबाइल सेक्टर में दिक्कतें आ रही हैं. इसका नुकसान हमें ही हो रहा है.”

कंपनियों का अचानक चीन छोड़कर जाना आसान काम भी नहीं है. सप्लाई चेन जैसी चीजों को एक दिन में बदला नहीं जा सकता है. चीन की सप्लाई चेन बेहद मजबूत है और अगर कोई डायवर्सिफाई करना भी चाहता है तो उसमें वक्त भी लगता है और उसका खर्च भी बैठता है.

विदेशी कंपनियों के चीन छोड़कर जाने के सवाल पर क्रिसिल के चीफ इकनॉमिस्ट डी के जोशी कहते हैं, “ऐसा पहले से हो रहा है. चीन से लेबर इंटेंसिव कारोबार पहले से दूसरे देशों में जा रहे हैं. मसलन, टेक्सटाइल का कामकाज बांग्लादेश शिफ्ट हो चुका है. महामारी के वक्त इस तरह के कम मार्जिन वाले कामों के चीन से दूसरे देशों में शिफ्ट होने में तेजी आ गई है.”

वे कहते हैं, “चीन अब महंगे इलेक्ट्रॉनिक्स आइटमों जैसे सेक्टरों पर ही फोकस कर रहा है.”

 

चीन का आरसीईपी की अगुवाई करना

चीन समेत एशिया-प्रशांत महासागर क्षेत्र के 15 देशों ने नवंबर 2020 में ‘दुनिया की सबसे बड़ी व्यापार संधि’ पर दस्तख़त किए हैं.

जो देश इस व्यापारिक संधि में शामिल हुए हैं, वो वैश्विक अर्थव्यवस्था में क़रीब एक-तिहाई के हिस्सेदार हैं.

‘द रीजनल कॉम्प्रीहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप’ यानी आरसीईपी में दस दक्षिण-पूर्व एशिया के देश हैं. इनके अलावा दक्षिण कोरिया, चीन, जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड भी इसमें शामिल हुए हैं.

प्रो. डे कहते हैं कि इस एग्रीमेंट के लिए 12 साल से बातचीत चल रही थी. इसमें चीन का एक ही इंटरेस्ट है- कारोबार और ट्रेडिंग. ये एग्रीमेंट इसी रणनीति का हिस्सा है. आरसीईपी में चीन को छोड़कर जो 14 देश हैं उन सब के साथ चीन का ट्रेड सरप्लस है.

 

ईयू के साथ कारोबारी समझौता

इसके अलावा यूरोपीय यूनियन और चीन के बीच एक बड़ी इनवेस्टमेंट डील पर भी सहमति बन गई है. अमरीका के नए बनने वाले राष्ट्रपति जो बाइडन के ईयू को इस डील पर जल्दबाज़ी न करने की सलाह देने के बावजूद ईयू और चीन इस समझौते पर सैद्धांतिक रूप से राज़ी हो गए हैं.

इस डील को कॉम्प्रिहैंसिव एग्रीमेंट ऑन इनवेस्टमेंट (सीएआई) का नाम दिया गया है और इसके शुरुआती ड्राफ्ट को दोनों पक्षों की मंज़ूरी दिसंबर के आख़िर में मिल चुकी है.

डी के जोशी कहते हैं, “चीन के यूरोपीय यूनियन के साथ इनवेस्टमेंट डील और आरसीईपी समझौते ये दिखाते हैं कि महामारी का चीन के ऊपर कोई ख़ास असर नहीं हुआ है. यहां तक कि ईयू के साथ समझौते में तो चीन कई तरह की रियायतें और शर्तों को मानने के लिए भी राज़ी हो गया है.”

इस एग्रीमेंट के तहत यूरोपीय कंपनियों को चीन के बाज़ार में दाख़िल होने के ज्यादा मौक़े मिलेंगे और वे इलेक्ट्रिक कारों, निजी अस्पतालों, रियल एस्टेट, टेलीकाॉम क्लाउड सर्विसेज समेत कई सेक्टरों में निवेश कर पाएंगी.

चीन विदेशी कंपनियों से टेक्नोलाॉजी ट्रांसफ़र की ज़रूरत को भी ख़त्म करेगा और अपने यहां पारदर्शिता बढ़ाएगा.

माना जा रहा है कि इस डील के ज़रिए चीन यूरोपीय देशों का बड़ा निवेश अपने यहां हासिल करने में सफल रहेगा.

प्रो. डे कहते हैं कि यूरोप में भी चीन का तगड़ा निवेश है और हर तरह का सामान चीन मुहैया करा रहा है.

 

अमरीका, भारत और दूसरी अर्थव्यवस्थाएं क्यों पिछड़ीं?

बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भारत उन देशों में शामिल है जहां इकनॉमी को सबसे बड़ा झटका लगा है. इसके अलावा, अमरीका और दूसरे देश भी पहले से सुस्ती के दौर में बने हुए थे और कोविड-19 ने इन हालातों को और बुरा बना दिया.

प्रो. कुमार कहते हैं, “चीन के मुक़ाबले भारत को देखा जाए तो मेरे हिसाब से इस साल देश की इकनॉमी क़रीब 25 फ़ीसद संकुचित होगी. हमारे यहां असंगठित क्षेत्र को ग्रोथ के आंकड़ों में शामिल ही नहीं किया जाता. इस वजह से सही आंकड़े नज़र नहीं आते.”

प्रो. कुमार कहते हैं, “अमरीका में लोगों ने कोरोना को लेकर ज्यादा सतर्कता नहीं दिखाई. इन वजहों से वहां बार-बार लॉकडाउन लगाना पड़ा. इसके चलते यूएस में इकनॉमी रिकवर नहीं पाई. दूसरी ओर, चीन ने अपने यहां इसे सख्ती से कंट्रोल कर लिया, जबकि जिस तरह से चीन से यह वायरस फैलना शुरू हुआ था वहां सबसे ज्यादा मौतें होनी चाहिए थीं. लेकिन, चीन इसे रोकने में सफल रहा. अपनी अर्थव्यवस्था को दोबारा पटरी पर लाने में उन्हें इससे मदद मिली.”

हालांकि, क्रिसिल के चीफ़ इकनॉमिस्ट डी के जोशी कहते हैं कि ग्रोथ के लिहाज़ से भारत की तुलना चीन से नहीं की जा सकती है. चीन एक अलग उदाहरण है. कोरोना को रोकने में भारत ने दूसरे देशों के मुक़ाबले अच्छा काम किया है.

जोशी कहते हैं कि शुरुआत में भारत की ग्रोथ तेज़ी से गिरी, लेकिन बाद में इसमें उम्मीद से तेज़ रिकवरी भी हुई है.

 

पिछले 2-3 दशकों में चीन की ग्रोथ

चीन ने क़रीब 40 साल पहले आर्थिक सुधारों और कारोबारी उदारीकरण की नीतियां लागू कीं. उस वक़्त तक चीन एक बेहद ग़रीब, एक जगह रुका हुआ, केंद्रीय रूप से नियंत्रित और वैश्विक अर्थव्यवस्था से कटा हुआ देश था.

1979 में चीन ने अपने बाज़ारों को खोलने और विदेशी व्यापार को इजाज़त देने का फ़ैसला किया. इसके बाद देखते ही देखते चीन दुनिया की सबसे तेज़ी से आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में शुमार हो गया.

2018 तक चीन की वास्तविक जीडीपी ग्रोथ 9.5 फ़ीसदी के औसत से आगे बढ़ी है. विश्व बैंक ने इसे “इतिहास में किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था का सबसे तेज़ रफ्तार से टिकाऊ विस्तार” क़रार दिया था.

हालांकि, चीन की अर्थव्यवस्था की ग्रोथ कमज़ोर पड़ी है और यह 2007 में 14.2 फ़ीसद की रफ्तार से 2018 में घटकर 6.6 फ़ीसद पर आ गई है.

पिछले दो दशकों में चीन की औसत आर्थिक ग्रोथ क़रीब नौ फ़ीसद रही है. ऐतिहासिक तौर पर चीन एक मज़बूत ग्रोथ रेट के साथ आगे बढ़ा है. 21वीं सदी के पहले दशक में चीन की ग्रोथ दहाई के अंक में रही है.


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adminJanuary 29, 20211min5330

1 फरवरी को मोदी सरकार संसद में साल 2021-22 का आम बजट पेश करेगी. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन का तीसरा बजट होगा. पिछले कई सालों से परंपरा चल रही है कि बजट भाषण लोकसभा में ही होता है, इस बार भी ऐसा ही होगा. परंपरा ये भी है कि आम बजट से एक दिन पहले आर्थिक सर्वे पेश किया जाता है. और इस हिसाब से 31 जनवरी को आर्थिक सर्वे पेश होना चाहिए था लेकिन उस दिन रविवार है और संसद नहीं चलेगी. तो कल यानी शुक्रवार को ही आर्थिक सर्वे सदन के पटल पर रख दिया जाएगा. तो हर साल हम बजट के वक्त आर्थिक सर्वे का बार बार नाम सुनते हैं. क्या होता है ये आर्थिक सर्वे, कौन तैयार करता है और क्यों तैयार किया जाता है? और इस बार के आर्थिक सर्वे में क्या खास होगा, इस पर बात करते हैं.

आर्थिक सर्वे वित्त मंत्रालय एक अहम सालाना दस्तावेज होता है जिसे वित्त मंत्री लोकसभा और राज्यसभा के पटल पर रखती हैं. वित्त मंत्रालय के डिपार्टमेंट ऑफ इकनॉमिक अफेयर्स की इकनॉमिक्स डिवीज़न, आर्थिक सर्वे तैयार करती है. और ये सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार की देखरेख में तैयार होता है. कौन हैं अभी मुख्य आर्थिक सलाहकार – कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यम.

 

तो आर्थिक सर्वे में होता क्या है?

दो तरह की बातें होती हैं – पहली तो ये कि पिछले एक साल में देश की अर्थव्यवस्था कैसी रही. सरकार का पैसा किस सेक्टर में कितना गया, देश में उद्योगों की हालत कैसी रही, रोज़गार कितना रहा, कृषि क्षेत्र का हाल क्या है, कितना हमने आयात-निर्यात किया. इन सब विषयों का डेटा होता है. दूसरा, आर्थिक सर्वे में अगले साल की अर्थव्यवस्था का अनुमान दिया जाता है. ये बताया जाता है कि किस सेक्टर में कितनी ग्रोथ हो सकती है, और उसकी वजह बताई जाती हैं. यानी नए वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था तेज़ी से दौड़ेगी तो क्यों दौड़ेगी उसकी वजह बताई जाती है, या खराब रहेगी तो क्यों रहेगी, ये वजह बताई जाती है. एक तरह से आर्थिक सर्वे बजट का आधार तय करता है. बजट में सरकार ने किस सेक्टर को कितना फंड अलोकेट किया है, इसका तर्क आर्थिक सर्वे के आंकड़ों में खोजा जाता है.

पिछले साल यानी 2020-21 के आर्थिक सर्वे में देश की जीडीपी ग्रोथ रेट 6 से 6.5 फीसदी रहने का अनुमान जताया गया था. इसके अलावा इस सर्वे में वित्त वर्ष 2019-20 में कृषि क्षेत्र में ग्रोथ 2.8 फीसदी बताई गई थी, इंडस्ट्रियल ग्रोथ 2.5 फीसदी बताई थी. सर्विस सेक्टर में 6.9 फीसदी की ग्रोथ रेट बताई थी. लेकिन ज़्यादातर अनुमान गड़बड़ा गए. क्यों? कोरोना और लॉकडाउन की वजह से. मौजूदा वित्त वर्ष अप्रैल 2020 से शुरू हुआ था और तब देश में सबसे सख्त लॉकडाउन था. सब कुछ बंद था और ऐसा अगले कई महीनों तक रहा. याद होगा आपको जब वित्त मंत्री ने अर्थव्यवस्था में कोरोना की वजह से नुकसान को ‘एक्ट ऑफ गॉड’ बताया था. इसीलिए पिछले साल जो अनुमान लगाए गए थे उनके मुताबिक कुछ नहीं हुआ. जितनी राजस्व आय की उम्मीद थी उतनी नहीं हुई, सरकारी घाटा बढ़ गया, अनुमान के मुताबिक इंवेस्टमेंट नहीं हुआ. पहली दो तिमाही के आंकड़े माइनस में रहे हैं और पूरे साल ही ग्रोथ रेट माइनस में रहने का अनुमान है.

National Statistical Office के मुताबिक वित्त वर्ष 2020-21 की चारों तिमाही को मिलाकर अर्थव्यवस्था में 7.7 फीसदी का कॉन्ट्रैक्शन रहेगा यानी संकुचन रहेगा. संकुचन का मतलब ये कि 2019-20 में जो जीडीपी थी, 2020-21 की जीडीपी उससे 7.7 फीसदी कम रहेगी. जीडीपी आप जानते ही हैं – देश में सभी उत्पादों और सेवाओं को मिलाकर बनने वाला आंकड़ा. एक तरह से पूरे देश का सैलरी अकाउंट. वित्त वर्ष 2020-2021 में कृषि सेक्टर में 3.2 फीसदी की ग्रोथ का अनुमान है. माइनिंग सेक्टर माइनस 12.4 फीसदी रहेगा. मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर माइनस 9.4 फीसदी रहने का अनुमान है. कंस्ट्रक्शन सेक्टर माइनस 12.6 फीसदी रह सकता है.

इनके अलावा भी अर्थव्यवस्था के कई और इंडिकेटर्स होते हैं- जैसे बेरोज़गारी दर. कोरोना की वजह से नौकरियां गईं, लाखों लोगों का रोज़गार छिन गया. जब पिछला दशक शुरू हुआ था तो देश में बेरोज़गारी दर करीब 2 फीसदी थी. अभी देश में करीब 9 फीसदी बेरोज़गारी दर है. तो आर्थिक सर्वे में इस हालत से बाहर निकलने पर फोकस हो सकता है. 2019 में सरकार ने अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा था, लेकिन अभी चुनौती ये है कि नकारात्मक ग्रोथ से अर्थव्यवस्था को वापस ट्रैक पर लाया जाए. आर्थिक सर्वे और बजट में सरकार की ये ही कोशिश दिखने का अनुमान है. आर्थिक सर्वे पेश होने के बाद फिर हम आंकड़ों पर बात करेंगे.


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adminJanuary 27, 20211min4850

गूगल ने धमकी दी है कि अगर न्यूज़ पब्लिशर्स के साथ उसके रिश्तों को तय करने वाले नए क़ानूनों पर ऑस्ट्रेलियाई सरकार आगे बढ़ती है तो वह वहां के बाज़ार को छोड़कर चली जाएगी.

ऐसे में लोग यह जानना चाहते हैं आखिर यह पूरा मसला क्या है?

 

गूगल ऑस्ट्रेलिया को क्यों छोड़ना चाहती है?

सरकार एक नया क़ानून ला रही है जिसमें लंबे वक्त से उठ रहे इस मसले को हल करने की कोशिश की गई है कि क्या टेक्नोलॉजी सेक्टर की दिग्गज कंपनियों को सर्च रिजल्ट या उनके प्लेटफॉर्म्स पर साझा की जाने वाली ख़बरों के लिए पैसे चुकाने चाहिए या नहीं?

प्रस्तावित कानून में यह अनिवार्य कर दिया गया है कि गूगल का सभी न्यूज़ ऑर्गेनाइजेशंस के साथ एक कर्मशियल एग्रीमेंट हो या फिर उसे जबरदस्ती इस तरह के आर्बिट्रेशन में दाखिल किया जाए. गूगल का कहना है कि यह चीज लागू किए जाने योग्य नहीं है.

सीधे तौर पर कहा जाए तो गूगल को अपने सर्च पर दिखने वाली ख़बरों के लिए न्यूज ऑर्गनाइजेशंस को पैसे चुकाने होंगे.

गूगल के रीजनल डायरेक्टर मेल सिल्वा के मुताबिक, “अगर इन प्रस्तावों को क़ानून बनाया गया तो हमारे पास ऑस्ट्रेलिया में गूगल सर्च को बंद करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा.”

ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने गूगल की प्रतिक्रिया पर कहा है, “हम धमकियों पर टिप्पणी नहीं करते.”

 

ऑस्ट्रेलिया गूगल से किस चीज़ के लिए पैसे चुकाने को कह रहा है?

अभी तक यह तय नहीं है कि इस मसले के पीछे कितने पैसों का सवाल है.

प्रस्तावित क़ानून में सौदेबाजी और आर्बिट्रेशन का जिक्र है. इस तरह से इसमें गुंजाइश का विकल्प है. अगर गूगल किसी न्यूज संस्थान के साथ एग्रीमेंट नहीं कर पाती है तो कोई जज एक उचित सौदे को तय करेगा.

लेकिन, सरकार का कहना है कि वह चाहती है कि न्यूज संस्थानों को एक उचित भुगतान मिले.

पिछले 15 वर्षों में ऑस्ट्रेलिया में प्रिंट संस्थानों की विज्ञापन से होने वाली कमाई तीन-चौथाई से ज्यादा घटी है.

इसके उलट, इतने ही वक्त में गूगल और फेसबुक जैसे बड़े प्लेटफॉर्म्स की डिजिटल एडवर्टाइजिंग में भारी इजाफा हुआ है.

 

क्या विकल्प मौजूद हैं?

बाकी की दुनिया की तरह से ही ऑस्ट्रेलिया के सर्च इंजन मार्केट में भी गूगल की हिस्सेदारी करीब 90-95 फ़ीसद है.

सर्च के लिए माइक्रोसॉफ्ट बिंग और याहू के विकल्प भी मौजूद हैं. इसके अलावा, प्राइवेसी पर फोकस करने वाले डकडकगो जैसे सर्च इंजन भी मार्केट में हैं.

हालांकि, साइट एनालिसिस करने वाली कंपनी एलेक्सा की रैंकिंग में गूगल इंटरनेट पर सबसे ज्यादा विजिट की जाने वाली साइट है. याहू इस कतार में 11वें नंबर पर और बिंग 33वें पायदान पर है.

 

गूगल के जाने से लोगों पर वाकई कोई फर्क पड़ेगा?

2019 में वायर्ड मैगजीन के लिए एक लेखक ने तीन महीने केवल बिंग का इस्तेमाल करके देखा. इस लेखक का निष्कर्ष यह था कि तकरीबन हर बार बिंग ने अच्छा काम किया.

लेकिन, बेहद खास मामलों में, मसलन, पुराने आर्टिकल्स ढूंढने में उसे दिक्कत हुई क्योंकि गूगल का इस्तेमाल करके सर्च करने की जो तकनीक उन्होंने सीखी थी, वह बिंग पर कारगर साबित नहीं हुई.

गूगल महज एक सर्च इंजन नहीं है- इसकी सर्च टेक्नोलॉजी जीमेल, गूगल मैप्स और यूट्यूब समेत कई तरह की सर्विसेज भी देती है.

फिलहाल यह नहीं कहा जा सकता कि अगर गूगल ऑस्ट्रेलियाई बाजार से निकल जाती है तो इसका लोगों पर क्या असर पड़ेगा.

इसके विकल्प जरूर मौजूद हैं, लेकिन इनका बेहद कम इस्तेमाल होता है और बड़े पैमाने पर लोग गूगल ऐप्स को जरूरी समझते हैं.

अमेरिकी रेगुलेटर्स के साथ रस्साकसी के बीच जब ख्वावे फोनों पर गूगल सर्विसेज मिलनी बंद हो गईं तो ख्वावे के लिए पश्चिमी देशों में अपने फोन्स बेचने में खासी दिक्कत होने लगी थी.

 

क्या यह कानून पूरी दुनिया में एक मिसाल बनेगा?

ऑस्ट्रेलियाई सीनेटर रेक्स पैट्रिक ने गूगल से कहा, “ऐसा पूरी दुनिया में होने वाला है. क्या आप सभी बाज़ारों से निकल जाएंगे?”

लेकिन, गूगल और इस कानून से प्रभावित होने वाली फेसबुक जैसी कंपनियां अमरीका में स्थित हैं.

और अमेरिकी सरकार – कम से कम इसके पिछले ट्रंप प्रशासन- ने ऑस्ट्रेलिया से अनुरोध किया है कि वे नए क़ानून लाने में जल्दबाजी न करें. उन्होंने चेताया है कि यह असाधारण है और इसके दूरगामी नकारात्मक परिणाम हो सकते हैं.

हालांकि, इस तरह का अभी तक कोई उदाहरण नहीं है जबकि स्थानीय कानूनों के चलते गूगल ने किसी देश को छोड़ा हो.

कथित चीनी हैकिंग के 2010 के विवाद के बाद से गूगल बड़े तौर पर मेनलैंड चीन में उपलब्ध नहीं है. तब इसने चीनी यूजर्स के लिए सर्च रिजल्ट्स को सेंसर करना बंद कर दिया था.

इससे थोड़ा सा अलग विवाद यूरोप में भी चल रहा है.

कॉपीराइट को लेकर यूरोपीय यूनियन का एक नया विवादित नियम कहता है कि सर्च इंजनों और न्यूज़ एग्रीगेटरों को लिंक्स के लिए न्यूज़ साइट्स को पैसे देने चाहिए.

फ्रांस में इस हफ्ते पब्लिशर्स ने इसे लागू करने के तरीकों पर गूगल के साथ एक डील पर सहमति जताई है.

लेकिन, इस तरह की चुनिंदा डील्स ही हो पाई हैं. और इस तरह से यह ऑस्ट्रेलिया के व्यापक पैमाने पर और ज्यादा सख्ती वाले कानूनों से काफी अलग है.

 

गूगल के लिए ऑस्ट्रेलिया कितना अहम है?

चीन के मुकाबले ऑस्ट्रेलिया कहीं कम संभावनाओं वाला मार्केट है.

गूगल ऑस्ट्रेलिया ने 2019 में 3.7 अरब डॉलर का रेवेन्यू हासिल किया था. इसका ज्यादातर हिस्सा विज्ञापनों से होने वाली कमाई थी. लेकिन, सारे खर्च निकालकर भी गूगल ऑस्ट्रेलिया को 2019 में 13.4 करोड़ ऑस्ट्रेलियाई डॉलर का मुनाफा हुआ था.

गूगल की पेरेंट कंपनी अल्फाबेट के पास 100 अरब डॉलर से ज्यादा की पूंजी है जिसके जरिए वह आमदनी में होने वाली किसी भी कमी की भरपाई कर सकती है.

लेकिन, मसला पैसे का नहीं है.

बड़ा मसला यह है कि क्या गूगल चाहती है कि एक आधुनिक पश्चिमी देश यह करके दिखाए कि कैसे गूगल के बिना उसके प्रतिस्पर्धियों के सहारे काम चलाया जा सकता है.

 

क्या ऑस्ट्रेलियाई लोग यूएस गूगल का इस्तेमाल नहीं कर सकते?

यह मुमकिन है कि गूगल ऑस्ट्रेलियाई लोगों को यूएस या किसी अन्य देश के गूगल के वर्जन पर भेज दे.

इससे लोकलाइज्ड सर्च रिजल्ट्स मिलने बंद हो सकते हैं, लेकिन गूगल की सर्विसेज चलती रहेंगी.

लेकिन, गूगल भौगोलिक लोकेशन (आईपी एड्रेस के जरिए) के आधार पर ऑस्ट्रेलियाई यूजर्स को ब्लॉक भी कर सकती है.

इसका एक आसान तरीका वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क या वीपीएन का इस्तेमाल हो सकता है. इसके जरिए यह लगेगा कि आपका कंप्यूटर कहीं और है. कई दफा तकनीकी जानकार दूसरे देशों में स्ट्रीमिंग सर्विसेज हासिल करने के लिए ऐसा करते हैं.

लेकिन, यह स्लो होती है और अच्छे प्रोवाइडर्स इसके लिए सब्सक्रिप्शन मांगते हैं. यह एक ऐसी दिक्कत है जिसमें एक मामूली का सर्च रिजल्ट हासिल करने के लिए कोई उलझना नहीं चाहेगा.

 

क्या पब्लिशर्स को इससे वाकई में फायदा होगा?

ऑस्ट्रेलिया में एक समृद्ध न्यूज इंडस्ट्री रही है. मीडिया मुगल रूपर्ट मर्डोक यहीं पैदा हुए थे.

मर्डोक के न्यूज कॉर्प को इससे फायदा होगा. इसके अलावा, एबीसी न्यूज़ को भी फायदा होगा.

2014 से ही एबीसी की फंडिंग में करोड़ों डॉलरों की कटौती हुई है और इसके चलते इसे अपनी सेवाओं को कम करना पड़ा है.

स्थानीय अखबारों को भी विज्ञापन घटने से नुकसान हुआ है.

125 से ज्यादा न्यूज कॉर्प के मालिकाना हक वाले स्थानीय अख़बारों ने इस साल की शुरुआत में पूरी तरह से ऑनलाइन होने का फैसला किया है. इससे सैकड़ों की तदाद में नौकरियां खत्म हो रही हैं.


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adminJanuary 27, 20216min6100

26 जनवरी 2021 को देश 72वां गणतंत्र दिवस मना रहा है. इससे एक दिन पहले यानी 25 जनवरी को इस बार के पद्म पुरस्कारों का ऐलान किया गया. कुल 119 लोगों को इस बार पद्म सम्मान मिल रहा है. सात लोगों को पद्म विभूषण, 10 लोगों को पद्म भूषण और 102 लोगों को पद्मश्री. इनके बारे में जानते हैं.

 

पद्म विभूषण

 

#1 कौन हैं – शिंजो आबे

कहां से हैं – जापान

किस क्षेत्र में काम – पब्लिक सर्विस

जापान के पूर्व प्रधानमंत्री हैं. तबीयत नासाज़ रहने की वजह से पिछले साल पद से इस्तीफा दे दिया था. उनके कार्यकाल में भारत-जापान के संबंध बेहतर हुए. आबे जापान के सबसे लंबे कार्यकाल वाले पीएम रहे.

शिंजो आबे (फाइल फोटो- PTI)

 

#2 कौन हैं – एसपी बालासुब्रमण्यम (मरणोपरांत)

कहां से हैं – तमिलनाडु

किस क्षेत्र में काम – कला

मशहूर सिंगर-कंपोज़र. हिंदी, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालय भाषाओं में करीब 40 हज़ार गाने गाए. 40 से ज़्यादा फिल्मों में म्यूज़िक कंपोज़र रहे. 2001 में पद्मश्री और 2011 में पद्मभूषण भी प्राप्त कर चुके हैं.

बालासुब्रमण्यम. (फाइल फोटो- PTI)

 

#3 कौन हैं – डॉ. बेल्ले मोनप्पा हेगड़े

कहां से हैं – तमिलनाडु

किस क्षेत्र में काम – हेल्थ

हृदय रोग विशेषज्ञ, शिक्षाविद, मोटिवेशनल स्पीकर और लेखक. डॉ. बेल्ले मोनप्पा हेगड़े ने मेडिकल प्रैक्टिस पर कई किताबें भी लिखी हैं. 2010 में वे पद्म भूषण पुरस्कार से भी नवाज़े जा चुके हैं.

2010 में तत्कालीन राष्ट्रपति से पद्म पुरस्कार लेते बेल्ले मोनप्पा.

 

#4 कौन हैं – नरिंदर सिंह कपानी

कहां से हैं – अमेरिका

किस क्षेत्र में काम – साइंस एंड आईटी

नरिंदर सिंह कपानी भौतिक विज्ञान के क्षेत्र से जुड़े हैं. भारतीय मूल के अमेरिकी वैज्ञानिक हैं. फोर्ब्स मैग्ज़ीन ने उन्हें बिज़नेसमैन ऑफ द सेंचुरी एडिशन में नॉमिनेट किया था. ‘फाइबर ऑप्टिक्स’ शब्द ईजाद किया था.

नरिंदर कपानी. (फाइल फोटो- sikhfoundation.org)

 

#5 कौन हैं – बीबी लाल

कहां से हैं – दिल्ली

किस क्षेत्र में काम – पुरातत्व

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक रह चुके हैं. ‘राम, उनकी ऐतिहासिकता, मंदिर और सेतु: साहित्य, पुरातत्व और अन्य विज्ञान’ नाम की किताब भी लिखी है. इसी किताब में अयोध्या के विवादित ढांचे के नीचे मंदिर होने की बात कही गई थी. पद्म भूषण भी दिया जा चुका है.

बीबी लाल (दाएं) (फाइल फोटो- PIB)

 

#6 कौन हैं – मौलाना वहीदुद्दीन खान

कहां से हैं – दिल्ली

किस क्षेत्र में काम – आध्यात्मिकता

प्रसिद्ध इस्लामिक विद्वान और पीस एक्टिविस्ट. विघटन से पहले रशिया जब सोवियत संघ हुआ करता था, उस दौर में वहां के राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव ने मौलाना खान को डेमिर्गुस पीस इंटरनेशनल अवॉर्ड से सम्मानित किया था. 2000 में उन्हें पद्म भूषण सम्मान भी मिल चुका है.

 

#7 कौन हैं – सुदर्शन साहू

कहां से हैं –ओडिशा

किस क्षेत्र में काम – आर्ट

ओडिशा के प्रसिद्ध मूर्तिकार. सुदर्शन साहू पौराणिक कथाओं को, किरदारों को रेत की मदद से खूबसूरत मूर्तियों की शक्ल में ढालने में माहिर हैं. पद्म श्री से भी सम्मानित किए जा चुके हैं.

सुदर्शन साहू. (फाइल फोटो- odishabulletin.com)

पद्म भूषण

#1 कौन हैं – कृष्णन नायर शांताकुमारी

कहां से हैं – केरल

किस क्षेत्र में काम – आर्ट्स

कृष्णन नायर शांताकुमारी मशहूर गायिका और म्यूज़ीशियन हैं. उन्होंने करीब 25 हज़ार गाने रिकॉर्ड किए हैं. वो भी 10 से ज़्यादा भारतीय भाषाओं में और पांच से ज़्यादा विदेशी भाषाओं में. छह बार नेशनल फिल्म अवॉर्ड, आठ बार फिल्मफेयर-साउथ मिल चुका है.

 

 

#2 कौन हैं – तरुण गोगोई (मरणोपरांत)

कहां से हैं – असम

किस क्षेत्र में काम – पब्लिक अफेयर

तीन बार असम के मुख्यमंत्री रहे, छह बार सांसद रहे कांग्रेस नेता तरुण गोगोई का नवंबर-2020 में निधन हो गया. मुख्यमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल को राज्य की राजकोषीय स्थिति सुधारने, उग्रवाद को कम करने के लिए याद किया जाता है.

 

तरुण गोगोई. (फाइल फोटो)

 

 

कौन हैं – चंद्रशेखर कंबारा

कहां से हैं – कर्नाटक

किस क्षेत्र में काम –शिक्षा

प्रसिद्ध कन्नड़ लेखक हैं. साहित्य अकादमी के अध्यक्ष रहे चंद्रशेखर कंबारा ने शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में काफी काम किया है. ज्ञानपीठ पुरस्कार भी जीत चुके हैं.

 

 

कौन हैं – सुमित्रा महाजन

कहां से हैं – मध्य प्रदेश

किस क्षेत्र में काम –पब्लिक अफेयर

लोकसभा स्पीकर की कुर्सी पर बैठने वाली देश की दूसरी महिला. पहली मीरा कुमार थीं. सुमित्रा महाजन को लोग ‘ताई’ कहकर सम्मानित करते हैं. 2014 से 2019 तक लोकसभा स्पीकर रहीं. इंदौर से लगातार आठ बार सांसद भी रही हैं.

सुमित्रा महाजन. (फोटो- PTI)

 

 

कौन हैं – नृपेंद्र मिश्रा

कहां से हैं – उत्तर प्रदेश

किस क्षेत्र में काम – सिविल सर्विसेज़

नृपेंद्र मिश्रा 1967 बैच के रिटायर्ड आईएएस अधिकारी (उत्तर प्रदेश कैडर) हैं. मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान नृपेंद्र मिश्रा को पीएम मोदी के प्रिंसिपल सेक्रेटरी नियुक्त किया गया था. तब इस पर काफी बवाल हुआ था. 2019 में उन्हें फिर ये ज़िम्मेदारी दी गई.

PM मोदी के साथ नृपेंद्र मिश्रा. (फाइल फोटो)

 

कौन हैं – रामविलास पासवान (मरणोपरांत)

कहां से हैं – बिहार

किस क्षेत्र में काम – पब्लिक सर्विस

बिहार के बड़े नेताओं में शुमार, लोक जनशक्ति पार्टी के संस्थापक राम विलास पासवान नौ बार लोकसभा और दो बार राज्य सभा सांसद रहे. पासवान के नाम एक अनूठा रिकॉर्ड भी है- छह प्रधानमंत्रियों के साथ काम करने का. मोदी सरकार में भी मंत्री रहे.

राम विलास पासवान. (फाइल फोटो)

 

कौन हैं – केशुभाई पटेल (मरणोपरांत)

कहां से हैं – गुजरात

किस क्षेत्र में काम – पब्लिक सर्विस

मार्च 1995 से अक्टूबर 1995 तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहे. प्रदेश में भाजपा के बड़े नेताओं में शुमार रहे. 2012 में भाजपा से इस्तीफा देकर अपनी नई पार्टी गुजरात परिवर्तन पार्टी बनाई. हालांकि बाद में पार्टी का भाजपा में विलय कर दिया. इमरजेंसी के वक्त जेल भी गए थे.

 

केशुभाई पटेल. (फाइल फोटो)

 

कौन हैं –कल्बे सादिक

कहां से हैं – उत्तर प्रदेश

किस क्षेत्र में काम – धर्म

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) के उपाध्यक्ष रहे कल्बे सादिक का नवंबर-2020 में निधन हो गया था. अपनी प्रोग्रेसिव सोच और शांति के लिए किए गए कामों के लिए कल्बे सादिक को याद किया जाता है. मुस्लिम आरक्षण तक का उन्होंने विरोध कर दिया था.

 

कल्बे सादिक. (फाइल फोटो)

 

 

कौन हैं – रजनीकांत देवीदास

कहां से हैं –महाराष्ट्र

किस क्षेत्र में काम – ट्रेड एंड इंडस्ट्री

1969 में गुजरात के वापी शहर में यूनाइटेड फॉस्फोरस लिमिटेड (UPL) नाम की कंपनी स्थापित की थी. रजनीकांत ने यहां न सिर्फ फैक्ट्री लगाई, बल्कि शहर की बसाहट में भी योगदान दिया. वापी की गिनती अब गुजरात के अच्छे शहरों में होती है.

 

कौन हैं – तरलोचन सिंह

कहां से हैं – हरियाणा

किस क्षेत्र में काम – पब्लिक सर्विस

2004 से 2010 तक हरियाणा से राज्‍यसभा सदस्‍य रहे. राजनीति से इतर सिख धर्म की शिक्षाओं को फैलाने के लिए भी काम किया. 1983 से 1987 तक तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के प्रेस सचिव भी रहे. 2003 से 2006 तक राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन रहे.

 

तरलोचन सिंह. (फाइल फोटो)

इसके अलावा जिन 102 लोगों को पद्मश्री सम्मान मिला है, उनमें ये नाम शामिल हैं – स्पेन में लिट्रेचर-एजुकेशन के लिए काम करने वाले फादर वॉल्स (मरणोपरांत), इसी क्षेत्र में मध्य प्रदेश में काम करने वाले कपिल तिवारी, बिहार से मृदुला सिन्हा, असम से इमरान शाह, मेडिसिन के क्षेत्र में अशोक कुमार साहू, धनंजय दिवाकर, कला के क्षेत्र में पूर्णमासी जानी.


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adminJanuary 27, 20211min4530

केंद्र सरकार ने मई 2016 में पुराने वाहनों को सड़क से हटाने के लिए  Voluntary Vehicle Fleet Modernisation Programme का मसौदा रखा था. सरकार का अनुमान हैकि इस नीति के सबके लिए आने से सड़कों से 15 साल पुराने करीब 2.8 करोड़ वाहन हटाने में मदद मिलेगी.

हाल में सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने सरकारी वाहनों के लिए 15 साल पुराने वाहनों को कबाड़ (स्क्रैप करने) में भेजने की नीति को मंजूर कर दिया. मंत्रालय के इस फैसले से केंद्र, राज्य सरकारों और पब्लिक सेक्टर की कंपनियों में इस्तेमाल होने वाले 15 साल पुराने वाहनों को हटाना होगा. हालांकि इस नीति का पालन अप्रैल 2022 से होना है. लेकिन वाहन क्षेत्र इसे लेकर काफी उत्साहित है, ऐसे में संभावना है कि बजट में इस नीति पर बात हो और जल्द इसे सबके लिए लागू करने को लेकर कोई घोषणा हो.

कोरोना काल के बाद भारत सरकार का जोर ‘आत्मनिर्भर भारत’ बनाने पर है. इसलिए सरकार मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर ध्यान दे रही है. वाहन, इलेक्ट्रिक समेत कई क्षेत्रों में विनिर्माण बढ़ावा देने के लिए सरकार ने हाल में PLI योजना शुरू की है. ऐसे में यदि पुराने वाहनों को कबाड़ में भेजने की नीति सबके लिए लाई जाती है, तो नए वाहनों की मांग बढ़ेगी और कंपनियों का उत्पादन भी बढ़ेगा.

सरकार ने 2030 तक देश को पूरी तरह से ई-मोबिलिटी पर शिफ्ट करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है. इसका मकसद देश के कच्चा तेल आयात बिल को कम करना है. आयात बिल घटने से सरकार की राजकोषीय हालत भी बेहतर होगी और सरकार अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए ई-मोबिलिटी इन्फ्रास्ट्रक्चर बढ़ाने पर जोर दे सकेगी. (फाइल फोटो)

सर्दियों में दिल्ली समेत उत्तर भारत के कई शहर भीषण प्रदूषण की चपेट में रहते हैं. बच्चों के स्कूल तक बंद करने पड़ते हैं. कई लोगों को दमा और अन्य सांस की बीमारियों का सामना करना पड़ता है. आईआईटी बॉम्बे के एक अध्ययन के मुताबिक कुल वायु प्रदूषण में लगभग 70 प्रतिशत हिस्सेदारी वाहनों से होने वाले प्रदूषण की है. ऐसे में पुराने वाहनों को कबाड़ में भेजने पर वायु प्रदूषण को कम करने में मदद मिलेगी.

पुराने वाहन को स्क्रैप करने की नीति से अन्य सेक्टर को भी फायदा होगा, क्योंकि नए वाहनों की मांग और उत्पादन बढ़ने के लिए कच्चे माल की जरूरत होगी. ऐसे में स्टील, एल्युमीनियम और रबर सेक्टर को लाभ होगा. इस क्षेत्र में भी नए रोजगार का विकास होगा और अंतत: अर्थव्यवस्था का चक्का तेजी से घूमने लगेगा.

कोरोना काल से पहले भी देश की अर्थव्यवस्था में नरमी का रुख देखा जा रहा था. कोरोना महामारी के दौरान अप्रैल-जून अवधि में देश की जीडीपी लगभग 24 प्रतिशत तक गिर गई. ऐसे में सरकार के ऊपर अर्थव्यवस्था गति देने, राजकोषीय, रोजगार की स्थिति को बेहतर करने का दबाव है. साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आने वाले पांच वर्षों को देश की अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखा है. ऐसे में वाहन क्षेत्र ज्यादा लोगों को रोजगार, विनिर्माण में योगदान और सरकार के लिए एकजुट राजस्व जुटाने का माध्यम है. पुराने वाहनों को हटाने से जो नए वाहनों की मांग बढ़ेगी, उससे रोजगार और लोगों की आय बेहतर होगी साथ ही कंपनियों का उत्पादन बढ़ने से सरकार का जीएसटी संग्रह भी बढ़ेगा.


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adminJanuary 6, 20211min6070

जाइल्स फुक्स अपने ए-लेवल के नतीजों में फेल हो गए थे और पहले की तरह ही उस रात उनका पूरा परिवार खाने की मेज़ पर डिनर कर रहा था.

खाने के दौरान उनके पिता ने उनसे कुछ नहीं कहा. जब प्लेटें हटा ली गईं तो उन्होंने अपने बेटे से कहा, ‘जाइल्स, मैं उम्मीद करता हूं कि तुम मेहनत कर सकते हो.’

ख़राब नतीजों के बाद भी अगले दिन मिस्टर फुक्स ने नॉर्थैम्पटनशायर की सबसे बड़ी एस्टेट एजेंट चेन का दरवाज़ा नौकरी मांगने के लिए खटखटाया.

उस किशोर ने मैनेजर से कहा, ‘मैं सबसे बढ़िया मोल-तोल करूंगा.’ जवाब मिला, ‘तुम सोमवार से आ सकते हो?’

52 साल के जाइल्स फुक्स अब अरबपति हैं. वह ‘ऑफिस स्पेस इन टाउन’ (ओसिट) के सह-संस्थापक और बॉस हैं. वह बताते हैं कि ईस्ट मिडलैंड्स में एस्टेट एजेंसी में तीन साल के काम से उन्हें बेशकीमती अनुभव मिला.

 

सालाना राजस्व 166 करोड़ रुपये

वह बताते हैं, ‘मैंने सीखा कि लोगों से कैसे बात करनी है और कैसे बेचना है.’

1987 में जाइल्स 21 साल के थे, जब उन्होंने एक दोस्त के साथ एस्टेट एजेंट्स की अपनी कंपनी शुरू की.

उनका बिजनेस कामयाब रहा. इसके बाद उन्होंने मुनाफ़ा देने वाले कई काम शुरू किए, जिनमें एक डिज़ास्टर रिकवरी कंपनी भी शामिल थी.

फिर 2010 आया, जब उन्होंने अपनी बहन निकी के साथ मिलकर ‘ओसिट’ कंपनी शुरू की. सिर्फ सात साल में ओसिट का सालाना राजस्व 20 मिलियन पाउंड्स यानी 166 करोड़ रुपये है.

उनकी कंपनी की कीमत 1665 करोड़ रुपये (200 मिलियन पाउंड्स) से ज़्यादा आंकी गई है. लंदन में उनकी छह और बाकी ब्रिटेन में चार इमारतें हैं.

 

मां के नक्श-ए-क़दम पर

जाइल्स फुक्स और उनकी बहन का ओसिट शुरू करने का फैसला अपने परिवार की परंपरा के नक्शे-कदम पर चलने जैसा ही था. 1979 में उनकी मां ने ब्रिटेन में ऐसा पहला बिजनेस शुरू किया था. बाद में उसे निकी चलाने लगी थीं और फिर जाइल्स फुक्स भी उनके साथ आ गए थे. लेकिन 2005 में आख़िर कंपनी बेच दी गई.

भीड़ से अलग दिखने के लिए ओसिट की हर इमारत को अलग तरीके से डिज़ाइन किया गया है. जाइल्स कहते हैं, ‘इससे हर इमारत को अनूठा किरदार और व्यक्तित्व मिल गया है.’

चूंकि ये मलिकाना हक़ वाली इमारतें हैं, इसलिए ओसिट के लिए बाल काटने का सैलून, जिम, कैफ़े, बार जैसी अतिरिक्त सुविधाएं जोड़ना भी आसान हो गया.

 

आज मां-पिता ख़ुश हैं

जाइल्स ब्रेग्ज़िट के पक्के समर्थक हैं और मानते हैं कि ब्रिटेन काफ़ी अच्छा कर रहा है. वह कहते हैं, ‘लंदन में इस वक़्त पैसों की दीवार पहुंच रही है.’

ओसिट में जाइल्स चीफ़ एग्जीक्यूटिव हैं और उनकी बहन मैनेजिंग डायरेक्टर हैं.

काम का बंटवारा बताते हुए वह कहते हैं, ‘निकी रोज़ाना के बिजनेस चलाने का काम-काज देखती है. मैं फाइनेंस जुटाने, इमारतें खोजने और नीति बनाने का काम करता हूं.’

भले ही जाइल्स फुक्स ए लेवल की परीक्षाओं में अच्छा नहीं कर पाए, लेकिन आज उनके पिता उनसे बहुत ख़ुश हैं. वह बताते हैं, ‘हमारे माता-पिता हम पर बहुत गर्व करते हैं.’


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adminJanuary 6, 20212min6550

जहां कोरोना महामारी के दौर में कई लोगों के कारोबार घाटे में चले गए वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें ये महामारी पहले से भी ज़्यादा अमीर बना गई.

ये साल कई लोगों के लिए मुश्किलों भरा रहा है.

दुनिया भर में कोरोना के कारण 16 लाख लोगों की मौत हो चुकी है और आर्थिक संकट के चलते कई कारोबार बंद हो गए और लाखों नौकरियां चली गईं.

लेकिन, कई अमीरों के लिए हालात इतने बुरे भी नहीं रहे हैं.

दुनिया के 60 प्रतिशत से ज़्यादा अरबपति साल 2020 में और अमीर हो गए हैं और इनमें से पांच वो लोग हैं जिनकी कुल दौलत 310.5 अरब डॉलर हो गई है. आपको बताते हैं कि ये लोग कौन हैं-

 

एलन मस्क, टेस्ला के सह-संस्थापक और सीईओ

स्पेस एक्स के संस्थापक और टेस्ला के सीईओ एलन मस्क की संपत्ति में साल 2020 में 140 अरब डॉलर और जुड़ गए हैं. ब्लूमबर्ग के मुताबिक पिछले सोमवार को उनकी कुल संपत्ति 167,000 मिलियन डॉलर (1 खरब 67 अरब डॉलर) तक पहुंच गई है.

इसके साथ ही एलन मस्क अरबतियों की सूची में कई पायदान ऊपर चढ़ गए हैं और नवंबर में बिल गेट्स को पीछे छोड़ दूसरे स्थान पर आ गए हैं. उनसे ऊपर पहले पायदान पर अमेज़न के संस्थापक जेफ़ बेज़ोस का नाम है.

फोर्ब्स के मुताबिक जब से पत्रिका ने दुनिया के अमीर लोगों की सूची बनानी शुरू की है तब से लेकर अब तक किसी अरबपति की एक साल में की गई ये सबसे ज़्यादा कमाई है.

एलन मस्क की कंपनी टेस्ला एक इलैक्ट्रिक कार निर्माता कंपनी है. इस साल कंपनी में कारों की रिकॉर्ड बिक्री हुई है. वहीं, मस्क की दूसरी कंपनी स्पेस एक्स ने भी इस साल तरक्की की है और वो अंतरिक्ष में एस्ट्रोनॉट लॉन्च करने वाली पहली निजी कंपनी बनी है.

 

 

जेफ़ बेज़ोस, अमेज़न के संस्थापक और सीईओ

जेफ़ बेज़ोस वो शख़्सियत हैं जिन्होंने साल 2020 की शुरुआत दुनिया के सबसे अमीर शख़्स बनकर की थी और उसका अंत भी इसी तरह किया है.

जेफ़ बेज़ोस सिर्फ़ ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म अमेज़न के संस्थापक ही नहीं है बल्कि इसके अलावा वो अमेरिकी अख़बार ‘द वॉशिगटन पोस्ट’ के मालिक भी है.

उन्होंने इस साल अपनी संपत्ति में 72 अरब डॉलर और जोड़े हैं. इसकी वजह है कोरोना महामारी के दौरान ऑनलाइन खरीदारी का बढ़ना. लॉकडाउन में दुकाने बंद होने के कारण लोगों ने बढ़-चढ़कर ऑनलाइन खरीदारी की है.

कुछ महीनों पहले जेफ़ बेज़ोस की कुल संपत्ति 200 अरब डॉलर का आंकड़ा पार कर गई थी. हालांकि, फिलहाल उनकी संपत्ति 187 अरब डॉलर है.

जेफ़ बेज़ोस सामाजिक कार्यों में भी अपना योगदान देते रहते हैं. फरवरी में उन्होंने 10 अरब डॉलर जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए दान दिए थे. नवंबर में 80 करोड़ डॉलर उन्होंने पर्यावरण पर काम करने वालीं संस्थाओं को दिए थे.

उनकी पूर्व पत्नी मैकेंज़ी स्कॉट ने इस साल कम से कम 5.8 अरब डॉलर गैर-सरकारी संस्थाओं को दान किए थे.

ज़ोंग शनशन, नों फू स्प्रिंग के संस्थापक

ब्लूमबर्ग के मुताबिक ज़ोंग शनशन की कुल संपत्ति 62.6 अरब डॉलर तक बढ़ गई है (मौजूदा 69 डॉलर).

जोंग सितंबर में चीन के सबसे ज़्यादा अमीर शख़्स बन गए थे. उनकी बोतलबंद पानी की कंपनी नों फू स्प्रिंग ने शेयर की सार्वजनिक बिक्री शुरू करने के बाद 1.1 अरब डॉलर से ज़्यादा की कमाई की थी.

नों फू स्प्रिंग की स्थापना 1996 में हुई थी जो एशिया में बोतलबंद पानी के बाज़ार के पांचवे हिस्से को नियंत्रित करती है. उनकी कंपनी का मूल्य 70 अरब डॉलर है.

66 साल के ज़ोंग कंपनी के 84 प्रतिशत से अधिक हिस्से के मालिक हैं, जिसकी शेयर वैल्यू लगभग 60 अरब डॉलर है.

इसके कारण ज़ोंग शनशन टेनसेंट्स के पोनी मा और अलीबाब के जैक मा जैसे अरबपतियों से आगे निकल गए हैं. वो हाल के महीनों में चीन के सबसे अमीर आदमी बन गए हैं. वह वैक्सीन निर्माता बीजिंग वॉन्टा बायोलॉजिकल फार्मेसी का स्वामित्व रखते हैं.

ये कंपनी कोविड-19 के लिए नाक से लिया जाने वाला स्प्रे बना रही है जो नवंबर में दूसरे फेज़ का ट्रायल कर रही थी.

बर्नार्ड आरनॉल्ट, एलवीएमएच ग्रुप के मालिक

फ्रांस के बर्नार्ड आरनॉल्ट अपने देश के सबसे अमीर व्यक्ति हैं और फोर्ब्स ने उन्हें अमीर लोगों की सूची में दूसरे नंबर पर रखा था. ब्लूमबर्ग ने उन्हें रैंकिंग में चौथे नंबर पर रखा था.

लग्ज़री सामानों की कंपनी एलवीएमएच के मालिक आरनॉल्ट की कुल संपत्ति इस साल के अंत तक 146.3 अरब डॉलर हो गई है. उनके लिए ये मुश्किल साल होने के बावजूद भी साल 2020 में आरनॉल्ट की संपत्ति 30 प्रतिशत तक बढ़ी है.

कोरोना महामारी के कारण एलवीएमएच ने टिफनी एंड कंपनी का अधिग्रहण करने की योजना अस्थायी तौर पर रोक दी थी. लेकिन, अक्टूबर में उन्होंने 15.8 अरब डॉलर में कंपनी के अधिग्रहण का समझौता किया जो कि इसके मूल प्रस्ताव से 40 करोड़ डॉलर कम है.

लग्ज़री उत्पादों की बिक्री में लगातार कमी आ रही है लेकिन एलवीएमएच ने इस मामले में सबको हैरान किया है. दक्षिण कोरिया और चीन में उनके कुछ उत्पादों की बढ़े स्तर पर बिक्री हुई है.

 

 

डैन गिलबर्ट, रॉकेट कंपनीज़ के अध्यक्ष

58 साल के गिलबर्ट एनबीए क्लीवलैंड कैवेलियर्स के मालिक हैं और ऑनलाइन मॉर्टेज कंपनी क्विकन लोन्स के सह-संस्थापक हैं. ब्लूमबर्ग के आंकड़ों के मुताबिक 2020 में उनकी कुल संपत्ति 28.1 अरब डॉलर तक बढ़ गई है. अब उनकी कुल संपत्ति 35.3 अरब डॉलर है.

इसकी वजह ये है कि क्विकन लोन्स की मूल कंपनी रॉकेट कंपनीज़ ने अगस्त में शेयर और अन्य वित्तीय साधनों की सार्वजनिक बिक्री शुरू की थी. गिलबर्ट के पास रॉकटे कंपनीज़ का 80 प्रतिशत से ज़्यादा मालिकाना हक है जिसका कुल मूल्य 31 अरब डॉलर से ज़्यादा है.

गिलबर्ट की कुल संपत्ति एक साल में छह गुना बढ़ी है जिसकी वजह है क्विकन लोंस का आईपीओ.


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adminJanuary 6, 20211min4960

2021 एक सही नोट पर शुरू हुआ है. कम से कम कपिल शर्मा के फैंस के लिए तो. कपिल अपना डिजिटल डेब्यू करने जा रहे हैं. और वो भी नेटफ्लिक्स के साथ. कपिल ने खुद इसकी जानकारी अपने ट्विटर पर दी. अपनी इस कौलेबोरेशन का एक छोटा सा प्रोमो शेयर किया.

कैप्शन में लिखा,

रूमर्स पर भरोसा मत कीजिए, सिर्फ मुझपे कीजिए. मैं आ रहा हूं जल्द ही नेटफ्लिक्स पर. ये शुभ समाचार है.

1 मिनट 8 सेकंड का वीडियो कपिल से शुरू होता है. जहां वो अपने अंदाज़ में अंग्रेज़ी शब्द ‘auspicious’ बोलने की कोशिश कर रहे हैं. अंग्रेज़ी में बोलने लगते हैं पर इस शब्द पर आकर अटक जाते हैं. फिर अपनी बात हिंदी में कहना शुरू करते हैं. कहते हैं कि नेटफ्लिक्स खुद देसी है तो अपने को क्या ज़रूरत है इंग्लिश बोलने की.

 

 

कपिल ने अपने डिजिटल डेब्यू पर एक स्टेट्मेंट भी रिलीज़ किया. कहा,

नेटफ्लिक्स के साथ पहली बार काम करने को लेकर मैं बहुत खुश हूं. 2020 सबके लिए उथल-पुथल भरा रहा है. मेरा मोटिव यही है कि लोग अपने दुख और परेशानियों को भूल जाएं. इस नए साल का स्वागत प्यार, हंसी और पॉज़ीटिविटी के साथ करें. मैं हमेशा से नेटफ्लिक्स पर आना चाहता था पर मेरे पास इनका नंबर नहीं था. ये प्रोजेक्ट मेरे दिल के बेहद करीब है और मैं इससे जुड़ी जानकारी शेयर करने के लिए बेताब हूं.

कपिल ने कल भी एक ट्वीट किया था. पूछा था कि शुभ समाचार को इंग्लिश में क्या कहते हैं?

 

 

बता दें कि प्रोजेक्ट को लेकर अभी कोई भी बात बाहर नहीं आई है. ये एक सीरीज़ है या स्टैंड अप स्पेशल, इसपर भी कुछ नहीं कहा गया. उनकी ‘दी कपिल शर्मा शो’ की टीम का कोई सदस्य इसका हिस्सा होगा या नहीं, ये भी अभी साफ नहीं. कपिल पिछले कुछ महीनों से अपने शो पर एक वेब प्रोजेक्ट का ज़िक्र करते रहे हैं. शायद इसी प्रोजेक्ट की बात कर रहे थे. जब तक कोई ऑफिशियल अनाउंसमेंट नहीं आ जाता, कुछ भी बता पाना मुश्किल है.


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adminJanuary 6, 20211min5040

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने अपना भारत दौरा रद्द कर दिया है. इस साल गणतंत्र दिवस के अवसर पर बोरिस जॉनसन मुख्य अतिथि थे. बोरिस ने कोरोना के नए स्ट्रेन के चलते भारत दौरा रद्द किया है. बोरिस के इस फैसले के बाद जानकारी मिली है कि इस बार के गणतंत्र दिवस समारोह में किसी भी मुख्य अतिथि को नहीं बुलाया जाएगा.

यह चौथा ऐसा मौका होगा जब भारतीय गणतंत्र दिवस समारोह में कोई भी चीफ गेस्ट नहीं होगा. इससे पहले 1952, 1953 और 1966 में ऐसा हो चुका है. वहीं, कई बार ऐसे मौके भी आए जब देश के गणतंत्र दिवस समारोह में दो-दो अतिथि भी शामिल हुए. साल 1956, 1968 और 1974 में दो-दो मुख्य अतिथि शामिल हुए.

 

जब 10 देश हुए शामिल

साल 2018 में 10 एशियाई देशों के प्रमुख गेस्ट के रूप में भारतीय गणतंत्र दिवस समारोह में शामिल हुए थे. यह पहला मौका था जब इतने देशों के मुखिया 26 जनवरी के परेड में शामिल हुए थे.

बोरिस ने अपने फैसले पर खेद भी जताया है. उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी से बात की और भारत नहीं आ पाने के लिए खेद व्यक्त किया. पीएम से बात करते हुए जॉनसन ने कहा कि जिस गति से ब्रिटेन में नया कोरोना वायरस फैल रहा है, उनके लिए ब्रिटेन में रहना महत्वपूर्ण है, ताकि वह वायरस की घरेलू प्रतिक्रिया पर ध्यान केंद्रित कर सकें.

 

हालात सुधरने पर करेंगे भारत का दौरा

26 जनवरी को भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन को बतौर मुख्य अतिथि शामिल होना था, लेकिन उनका कार्यक्रम अब रद्द हो गया है. दरअसल कोरोना के नए स्ट्रेन के कहर के चलते ब्रिटेन में फिर से टोटल लॉकडाउन लगा दिया गया है. बोरिस जॉनसन ने उम्मीद जताई है कि हालात सुधरने पर वो इसी साल भारत का दौरा करेंगे.

ब्रिटिश पीएम बोरिस जॉनसन को भारत सरकार ने 26 जनवरी के मौके पर बतौर मुख्य अतिथि शामिल होने का न्यौता दिया था. इस पर ब्रिटेन के विदेश मंत्रालय ने अपनी सहमति भी जता दी थी, लेकिन अचानक बदले हालात के मद्देनजर उन्हें अपना भारत दौरा रद्द करना पड़ा है. पीएम मोदी ने भी ब्रिटेन में कोरोना संक्रमण के हालात पर चिंता जताते हुए उम्मीद जताई है कि स्थिति जल्द सुधरेगी.

 

सादगी और कोरोना प्रोटोकॉल के साथ होगा समारोह

आजतक को सूत्रों से जानकारी मिली है कि बदली हुई परिस्थितियों में गणतंत्र दिवस के मौके पर कोई विदेशी चीफ गेस्ट नहीं बुलाया जाएगा. कोरोना संक्रमण को देखते हुए 26 जनवरी का कार्यक्रम भी सादगी और कोरोना प्रोटोकॉल के साथ ही मनाया जाएगा.

कोरोना का नया स्ट्रेन भारत में भी चिंता बढ़ा रहा है. लेकिन ब्रिटेन में स्थिति बहुत गंभीर हो चली है. रोजाना संक्रमण के आंकड़े और मौत की संख्या पिछले रिकॉर्ड से काफी ऊपर निकल चुकी है. यही वजह है वैक्सीनेशन शुरू होने के बावजूद ब्रिटेन में तीसरी बार लॉकडाउन लगाना पड़ा है.



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