सक्सेस स्टोरी

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adminDecember 2, 20201min3710

फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस हो या 3 इड‍ियट्स, लीड रोल में भले ही संजय दत्त और आमिर खान नजर आए लेक‍िन इनमें जो एक्टर दिल जीत गया वो थे बोमन ईरानी. 2 दिसंबर को बोमन अपना 61वां जन्मदिन मना रहे हैं. इस खास मौके पर आइए बोमन के बारे में जानें कुछ दिलचस्प बातें.

बोमन को बचपन से ही फिल्मों का शौक रहा है. वे स्कूल के बाद फिल्म देखने जाया करते थे, लेक‍िन कभी सोचा नहीं था कि वे खुद ही सिनेमा जगत के स्टार बन जाएंगे. जन्म से पहले ही बोमन के पिता चल बसे थे. उनकी मां ने उन्हें पाल-पोषकर बड़ा किया. बोमन ने एक समय पर घर की बेकरी शॉप में भी काम संभाला है.

एक ईरानी जोरास्ट्र‍ियन पर‍िवार में जन्में बोमन ने सेंट मैरी स्कूल से अपनी स्कूलिंग की थी. इसके बाद उन्होंने मुंबई स्थ‍ित मीठीबाई कॉलेज से वेटर का पॉलिटेक्न‍िक डिप्लोमा कोर्स किया. कोर्स पूरा करने के बाद बोमन ने ताज महल पैलेस एंड टावर में एक वेटर के तौर पर काम करना शुरू किया.

यहां बोमन ने दो साल तक वेटर और रूम सर्व‍िस का काम संभाला. काम के प्रति उनकी लगन और ईमानदारी देख उन्हें प्रमोशन दिया गया. इसके बाद उन्होंने फ्रेंच रेस्टॉरेंट Rendezvous में भी वेटर का काम किया.

ताज पैलेस में काम करने के दौरान बोमन कस्टमर्स द्वारा दिए गए ट‍िप्स इकट्ठे करते रहते थे. इन पैसों से उन्होंने कैमरा लिया और स्कूल के क्रिकेट-फुटबॉल मैच की फोटोज लिया करते थे. वे इन फोटोज को 20-30 रुपये में बेचते थे. सात साल की कमाई जमा कर बोमन ने फैमिली वेकेशन का ट्र‍िप भी प्लान किया. वे अपने पर‍िवार को ऊटी लेकर गए थे, लेक‍िन कम पैसों की वजह से उन्हें छोटे-मोटे होटल में कमरा मिला.

वेटर का काम और फोटोग्राफी करने के बाद बोमन ने साल 2000 में फिल्मों की ओर रुख किया. उन्होंने फिल्म डरना मना है में छोटा सा रोल निभाया. इस फिल्म में बोमन को बहुत ही कम स्क्रीन स्पेस मिला लेक‍िन उनके काम को नोट‍िस किया गया और फिर बोमन के अच्छे दिन शुरू हो गए.

डरना मना है से पहले बोमन ईरानी, एवरीबडी सेज आई एम फाइन और लेट्स टॉक में नजर आए थे. इसके बाद 2003 में बूम में वे दोबारा दिखे. बूम के बाद बोमन को फिल्म मुन्नाभाई एमबीबीएस में डॉ. जेसी अस्थाना का रोल मिला. इस रोल में बोमन ने दर्शकों का दिल जीत लिया.

उन्हें इस फिल्म के लिए स्क्रीन वीकली में अवॉर्ड फॉर बेस्ट परफॉर्मेंस इन कॉम‍िक रोल से नवाजा गया. तीन साल बाद 2006 में आई लगे रहो मुन्नाभाई में भी बोमन नजर आए, जिसके लिए उन्हें फिल्मफेयर का बेस्ट विलेन अवॉर्ड दिया गया.

2009 में आई फिल्म 3 इड‍ियट्स में भी बोमन का काम बेहद सराहा गया था. इस फिल्म में उन्होंने वीरु सहस्त्रबुद्धे उर्फ ‘वायरस’ का बेहतरीन किरदार निभाया था. इस रोल के लिए आज भी बोमन को याद किया जाता है. 3 इड‍ियट्स के लिए बोमन को 3 अवॉर्ड मिले. उन्हें स्टार स्क्रीन अवॉर्ड फॉर बेस्ट विलेन, फिल्मफेयर अवॉर्ड फॉर बेस्ट सपोर्ट‍िंग एक्टर और आईफा अवॉर्ड फॉर बेस्ट परफॉर्मेंस इन निगेट‍िव रोल से नवाजा गया.

बोमन कई हिट फिल्मों का हिस्सा रहे हैं. इनमे मैं हूं ना, लक्ष्य, वीर-जारा, पेज-3, वक्त-द रेस अगेन्स्ट टाइम, नो एंट्री, ब्लफमास्टर, डॉन, हनीमून ट्रैवल्स, हे बेबी, दोस्ताना आद‍ि शामिल है.

 


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adminNovember 19, 20201min3520

आयुष बैद द्वारा 2018 में लॉन्च किया गया, Ellementry एक लाइफस्टाइल ब्रांड है, जो हैंडीक्राफ्ट प्रोडक्ट्स की ऑनलाइन बिक्री करता है। यह आयुष के पिता द्वारा संचालित दिलीप इंडस्ट्रीज का रिटेल ऑफशूट ब्रांड है। यहां बताया गया है कि इसका बिजनेस मॉडल कैसे काम करता है।

जयपुर स्थित इंडियन हैंडीक्राफ्ट्स एक्सपोर्टर दिलीप बैद के पुत्र 24 वर्षीय आयुष बैद के लिए हैंडीक्राफ्ट्स में दिलचस्पी लेना स्वाभाविक था।

अपने पिता को, जो दिलीप इंडस्ट्रीज चलाते हैं, 175 करोड़ रुपये के टर्नओवर का कारोबार चलाते हुए देखते हुए, आयुष ने तीन दशकों तक भारतीय संस्कृति और कला के सार को समझा, जिसने हैंडीक्राफ्ट्स में कब्जा कर लिया था।

इसने उन्हें मुख्य रूप से 2018 में हैंडीक्राफ्ट प्रोडक्ट्स की ऑनलाइन बिक्री करने वाले एक लाइफस्टाइल ब्रांड एलिमेंट्री (Ellementry) शुरू करने के लिए प्रेरित किया। जयपुर स्थित कंपनी हाथ से बने घरेलू उत्पादों जैसे कि बरतन और परोसने के बर्तन बनाने के लिए कारीगरों को नियुक्त करती है।

बी 2 सी ब्रांड अब दिलीप इंडस्ट्रीज का रिटेल ऑफशूट ब्रांड बन गया है। ब्रांड ने 2019-20 में बिक्री में 12 करोड़ रुपये दर्ज करने का दावा किया है।

 

कैसा रहा सफर

आयुष का आंत्रप्रेन्योरशिप में प्रवेश तब शुरू हुआ जब उन्होंने अपने बी 2 बी को हैंडीक्राफ्ट एक्सपोर्ट के बिजनेस को बढ़ावा देने में मदद करना शुरू किया।

एक बार गर्मियों में, जब वह अपने पिता के बिजनेस के आंकड़ों का एनालिसिस कर रहे थे, तब आयुष को एक बिजनेस आइडिया आया। उन्होंने देखा कि इंडियन हैंडीक्राफ्ट्स को विदेशों में पहचाना और सराहा गया है।

लेकिन हैंडमेड होम प्रोडक्ट्स के लिए घरेलू बाजार अभी भी अनछुआ था, विशेष रूप से संगमरमर-कांच और टेराकोटा-लकड़ी के बरतन की आला श्रेणी में।

आयुष ने इन प्रोडक्ट्स को भारतीय उपभोक्ताओं के लिए भी उपलब्ध कराने की आवश्यकता महसूस की। आखिरकार, वे भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के प्रतिनिधि थे। आयुष ने सोचा कि अगर सही खुदरा रणनीति अपनाई गई तो ये प्रोडक्ट भारत को मिल जाएंगे।

जल्द ही, उन्होंने उपभोक्ता जरूरतों पर रिसर्च करना शुरू कर दिया और ब्रांडेड हैंडीक्राफ्ट प्रोडक्ट्स की मांग का पता लगाने के लिए स्थानीय कारीगरों से मुलाकात की।

वे कहते हैं, “मैं फैमेली बिजनेस वाले परिवार में पला-बढ़ा, मैं नए बिजनेस आइडियाज के लिए हमेशा से ग्रहणशील था। मैंने यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (UCL) में अध्ययन किया, और मैंने सीखा कि ईकॉमर्स और डेटा एनालिटिक्स कैसे काम करता है।”

आयुष कहते हैं, “मैंने बाजार का गहन विश्लेषण किया और आवश्यक जमीनी कार्य किया। मैं अपने पिता के हैंडीक्राफ्ट प्रोडक्ट्स को एक ई-कॉमर्स वेबसाइट के माध्यम से रिटेल करने के विचार के साथ आया था।“

 

एलिमेंट्री ब्रांड

जब आयुष ने एलिमेंट्री को शुरू किया, तो उसकी खास बात यह थी कि वह सबसे अच्छे हैंडीक्राफ्ट प्रोडक्ट्स के अलावा कुछ भी नहीं बेचेंगे। हालांकि, इस तरह के विचार को एग्जीक्यूट करने के लिए बड़ी मात्रा में फंडिंग की आवश्यकता होती है।

वह कहते हैं, “हमने Bennett, Coleman and Company Limited (BCCL) को आइडिया दिया। हम बाजार के गहन शोध और समझ के साथ तैयार हुए। BCCL ने इस अवधारणा को पसंद किया और ब्रांड कैपिटल सौदे के रूप में 250 करोड़ रुपये का निवेश किया। बाकी आर्थिक सहायता हमारे परिवार की थी।”

आयुष का दावा है कि एलिमेंट्री एक प्रत्यक्ष, निर्माता-से-उपभोक्ता संबंध स्थापित करने वाले पहले भारतीय हैंडीक्राफ्ट ब्रांड्स में से एक है। यह भारतीय हैंडीक्राफ्ट इंडस्ट्री में मानक के रूप में ऐजेंट्स का उपयोग नहीं करता है, ताकि प्रोडक्ट्स को बाजार में स्थानांतरित किया जा सके।

ब्रांड केवल भारतीय बाजार को पूरा करता है, जबकि दिलीप इंडस्ट्रीज सीधे रिटेल खरीदारों के साथ काम करके अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बेचती है।

फर्म ने पहले ईकॉमर्स ब्रांड के रूप में शुरुआत की और पहले साल में बाजार से उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिली। 2019-20 में, एलिमेंट्री ने बिक्री में 12 करोड़ रुपये दर्ज किए, और इसने ब्रांड को आठ फिजिकल स्टोर खोलने और दिल्ली, जयपुर, मुंबई, बेंगलुरु और हैदराबाद में अपनी पहुंच का विस्तार करने के लिए प्रेरित किया।

कंपनी के अनुसार, पहले से मौजूद चुनौती को हल करने के लिए ऑफलाइन उपस्थिति महत्वपूर्ण थी। हैंडमेड होम प्रोडक्ट्स की ऑनलाइन मांग की पहचान करने के बावजूद, ग्राहकों द्वारा किए गए खरीद निर्णय में स्पर्श और महसूस पहलू ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुछ संभावित ग्राहक भी अपनी गुणवत्ता का कोई आश्वासन नहीं होने पर हर दिन उपयोग होने वाले हैंडीक्राफ्ट प्रोडक्ट्स को खरीदने के लिए तैयार नहीं थे।

आयुष कहते हैं, “हमें ग्राहकों को अपने प्रोडक्ट्स और उनकी क्वालिटी पर विश्वास करना था। भले ही हम रोजमर्रा के सामान जैसे बरतन बेच रहे थे, लोग उन्हें ऑनलाइन खरीदने के बारे में आशंकित थे। वे अब भी उन्हें खरीदने से पहले प्रोडक्ट्स को छूना और महसूस करना चाहते थे।”

टच-एंड-फील और क्वालिटी आश्वासन की चुनौती को दूर करने के लिए कुछ फिजिकल स्टोर खोलने के अलावा, BCCL के स्वामित्व वाले ‘The Times of India’ में विज्ञापन देकर एलिमेंट्री की वृद्धि को गति दी गई।

आयुष कहते हैं, “2020 में, हमने अब तक 6.5 करोड़ रुपये कमाए हैं।“

 

बिजनेस मॉडल

एलिमेंट्री एक बी 2 सी मॉडल को फॉलो करती है, और अपने प्रोडक्ट्स को अपनी वेबसाइट के माध्यम से और साथ ही Amazon, Myntra, Tata Cliq आदि पर बेचती है। यह ब्रांड पूरे भारत में हाई-एंड बुटीक स्टोर्स को सप्लाई करता है, और इसमें Foodhall, Project Eve, और Shoppers’ Stop के साथ शॉप-इन-शॉप एसोसिएशन है।

अंतिम उपभोक्ताओं के लिए ब्रांड के मूल्य प्रस्ताव के बारे में बताते हुए, आयुष कहते हैं, “हमने इस बात की खोज की है कि मुख्य रूप से बरतन और कुकवेयर सेगमेंट में सुंदर और उपयोगी प्रोडक्ट्स के लिए भारतीय बाजार खाली था। हमने अपने प्रोडक्ट्स को हाई रैंक और कार्यक्षमता में सुनिश्चित किया। जैसा कि हम दिलीप इंडस्ट्रीज के ऑफशूट हैं, हम अंतरराष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा और गुणवत्ता मानकों को सुनिश्चित करने में सक्षम हैं।”

हैंडीक्राफ्ट्स मैन्युफैक्चरिंग के अपने वाइब्रेंट इकोसिस्टम के लिए जाना जाने वाला, एलिमेंट्री, दिलीप इंडस्ट्रीज के समान प्रोडक्शन लाइन का उपयोग करता है। एक बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन असेंबली लाइन पर बने प्रोडक्ट्स की तुलना में हैंडमेड प्रोडक्ट्स को कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

आयुष कहते हैं, “यह दृष्टिकोण बहुत सारे रोजगार भी पैदा करता है। कुल मिलाकर, हमारे पास हमारे साथ काम करने वाले 4,000 से अधिक भारतीय कारीगर हैं।“

उनका मानना ​​है कि एलीमेंट्री की निर्माण क्षमताएं इसे प्रोडक्ट्स को प्रतिस्पर्धी रूप से कीमत देने, क्वालिटी कंट्रोल बनाए रखने और प्रोडक्शन में कम बदलाव का समय सुनिश्चित करने की अनुमति देती हैं।

आयुष बताते हैं, “हमें अनसोल्ड इन्वेंट्री से निपटने की ज़रूरत नहीं है। बाहर से प्रोडक्ट्स की खरीद के बजाय, हम उन्हें घर में मांग के अनुसार बनाते हैं। उदाहरण के लिए, इस महामारी के दौरान, घर से काम करना नया आदर्श बन गया। लोगों को घर के फर्नीचर, किचन प्रोडक्ट्स और होम प्रोडक्ट्स से अधिक काम की आवश्यकता होती है। हम इस आवश्यकता को जल्दी से समझने और पूरा करने में सक्षम थे। हम जल्द ही वर्क-फ्रोम-होम कलेक्शन शुरू करने जा रहे हैं।“

हालांकि, हैंडमेड प्रोडक्ट्स का निर्माण करने के लिए कारीगरों को रोजगार देने का मतलब है कि एलिमेंट्री के प्रोडक्ट्स थोड़े महंगे हैं। कारीगरों को पूरी निर्माण प्रक्रिया अपने हाथों से पूरी करनी होती है, जिसमें समय लगता है।

आयुष कहते हैं, “मशीनें हमारी कलाकार नहीं हैं – लोग हैं। हमारी प्रोडक्ट रेंज लगभग 290 रुपये से शुरू होती है।”

 

भविष्य की योजनाएं

लॉकडाउन के दौरान, रेस्टोरेंट्स का बंद होना एलिमेंट्री के लिए आशीर्वाद के रूप में आया। कई लोगों के लिए घर का खाना बनाना एक शौक बन गया है, आयुष ने देखा कि आकर्षक दिखने वाले बरतन की मांग बढ़ रही है।

वे कहते हैं, “हमारे इंस्टाग्राम पेज और ऑनलाइन मार्केटिंग के साथ, हम इन उपभोक्ताओं को अपने मौजूदा ग्राहकों के साथ टैप कर रहे हैं। घर के पके हुए भोजन की ओर यह बदलाव हमारे बरतन की मांग और परोसे जाने वाले प्रोडक्ट्स में काफी वृद्धि कर रहा है।”

आगे जाकर, एलिमेंटरी की योजना फ्रैंचाइज़ी मॉडल के तहत कुछ स्टोर खोलने की है। इसने लखनऊ, कोचीन, गुरुग्राम और बेंगलुरु में फ्रेंचाइजी के लिए योजना बनाई है।

विदेशों में एलिमेंट्री के प्रोडक्ट्स की बढ़ती मांग को देखते हुए, आयुष ने अपने प्रोडक्ट्स को संयुक्त राज्य अमेरिका और जापान में बेचने की भी योजना बनाई है। ब्रांड SKUs की संख्या में वृद्धि करना चाहता है, और घर के सामान और डिजाइनर हार्डवेयर में वेंचर करता है।

आयुष कहते हैं, “इस तरह के पैमाने के विस्तार और विकास को डेटा और क्रिएटिविटी को इंटीग्रेट करने पर ध्यान देने की आवश्यकता है। हमारे मौजूदा सामग्रियों के साथ प्रयोग करने के बाद, भविष्य के शोध cane/bamboo के साथ मजबूत प्रोडक्ट बनाने पर होंगे।”


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adminOctober 31, 20201min4910

औरंगाबाद के बरौली गांव के रहने वाले अभिषेक कुमार मुंबई में एक मल्टीनेशनल कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर थे। अच्छी-खासी सैलरी थी। सबकुछ ठीक चल रहा था, लेकिन अचानक उन्होंने शहर से गांव लौटकर खेती करने का प्लान बनाया। 2011 में गांव लौट आए। आज वो 20 एकड़ जमीन पर खेती कर रहे हैं। धान, गेहूं, लेमन ग्रास और सब्जियों की खेती कर रहे हैं। दो लाख से ज्यादा किसान देशभर में उनसे जुड़े हैं। सालाना 25 लाख रुपए का टर्नओवर है।

33 साल के अभिषेक की पढ़ाई नेतरहाट स्कूल से हुई। उसके बाद उन्होंने पुणे से एमबीए किया। 2007 में HDFC बैंक में नौकरी लग गई। यहां उन्होंने 2 साल काम किया। इसके बाद वे मुंबई चले गए। वहां उन्होंने एक टूरिज्म कंपनी में 11 लाख के पैकेज पर बतौर प्रोजेक्ट मैनेजर ज्वाइन किया। करीब एक साल तक यहां भी काम किया।

 

2016 में पीएम मोदी ने अभिषेक को कृषि रत्न सम्मान से नवाजा था।
2016 में पीएम मोदी ने अभिषेक को कृषि रत्न सम्मान से नवाजा था।

 

अभिषेक कहते हैं, ‘मुंबई में काम करने के दौरान मैं वहां की कंपनियों में तैनात सिक्योरिटी गार्ड से मिलता था। वे अच्छे घर से थे, उनके पास जमीन भी थी, लेकिन रोजगार के लिए गांव से सैकड़ों किमी दूर वे यहां जैसे-तैसे गुजारा कर रहे थे। उनकी हालत देखकर अक्सर मैं सोचता था कि कुछ करूं ताकि ऐसे लोगों को गांव से पलायन नहीं करना पड़े।

वो कहते हैं, ‘2011 में मैं गांव आ गया। पहले तो परिवार की तरफ से मेरे फैसले का विरोध हुआ। घरवालों का कहना था कि अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर गांव लौटना ठीक नहीं है। गांव के लोगों ने मजाक उड़ाया कि पढ़-लिखकर खेती करने आया है, लेकिन मैं तय कर चुका था। मैंने पिता जी से कहा कि एक मौका तो दीजिए, फिर उसके बाद जो होगा वो मेरी जिम्मेदारी होगी।’

अभिषेक का फैमिली बैकग्राउंड खेती रहा है। उनके दादा और पिता खेती करते थे। खेती की बेसिक चीजें उन्हें पहले से पता थीं। कुछ जानकारी उन्होंने फार्मिंग से जुड़े लोगों से और कुछ गूगल की मदद से जुटाई। उन्होंने एक एकड़ जमीन से खेती की शुरुआत की।

पहली बार एक लाख की लागत से जरबेरा फूल लगाया। इससे पहले ही साल चार लाख की कमाई हुई। इसके बाद उन्होंने लेमन ग्रास, रजनीगंधा, मशरूम, सब्जियां, गेहूं जैसी दर्जनों फसलों की खेती शुरू की।

 

अभिषेक ने 2011 में खेती शुरू की। उनके साथ देश के 2 लाख से ज्यादा किसान जुड़े हैं।
अभिषेक ने 2011 में खेती शुरू की। उनके साथ देश के 2 लाख से ज्यादा किसान जुड़े हैं।

 

आज अभिषेक 20 एकड़ जमीन पर खेती करते हैं। 500 से ज्यादा लोगों को उन्होंने रोजगार दिया है। 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें सम्मानित कर चुके हैं। बिहार सरकार की तरफ से भी उन्हें सम्मानित किया जा चुका है। उन्होंने तेतर नाम से एक ग्रीन टी की किस्म तैयार की है। जिसका पेटेंट उनके नाम पर है। इस चाय की काफी डिमांड है। पूरे भारत में इसके ग्राहक हैं।

अभिषेक के लिए यह सफर आसान नहीं रहा है, उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। 2011 में ही वो सड़क हादसे का शिकार हो गए थे। इसके बाद बैसाखी के सहारे कई महीनों तक उन्हें चलना पड़ा था। वो कहते हैं- खेती को लाभ का जरिया बनाया जा सकता है। इसके लिए बेहतर प्लानिंग और अप्रोच की जरूरत है।

जो टमाटर सीजन में 2 रुपए किलो बिक रहा है, उसे ऑफ सीजन में बेचा जाए तो 50 रुपए से ज्यादा के भाव से बिकेगा। इतना ही नहीं अगर उसे प्रोसेसिंग करके स्टोर कर लिया जाए तो अच्छी कीमत पर ऑफ सीजन में बेचा जा सकता है।

वो बताते हैं कि रजनीगंधा की खेती काफी फायदेमंद है। रजनीगंधा की पूरे देशभर में काफी डिमांड है। एक हेक्टेयर में रजनीगंधा फूल की खेती करने में लागत करीब डेढ़ लाख रुपए आएगी। इससे एक साल में पांच लाख तक की आमदनी हो सकती है।

 

अभिषेक कहते हैं कि खेती को लाभ का जरिया बनाया जा सकता है। इसके लिए बेहतर प्लानिंग और अप्रोच की जरूरत है।
अभिषेक कहते हैं कि खेती को लाभ का जरिया बनाया जा सकता है। इसके लिए बेहतर प्लानिंग और अप्रोच की जरूरत है।

 

अच्छी खेती के लिए जरूरी स्टेप्स

1. क्लाइमेट कंडीशन : हम जहां भी खेती शुरू करने जा रहे हैं, वहां के मौसम के बारे में अध्ययन करना चाहिए। उस जमीन पर कौन-कौन सी फसलें हो सकती हैं, इसके बारे में जानकारी जुटानी चाहिए।

2. स्टोरेज : प्रोडक्ट तैयार होने के बाद हमें उसे स्टोर करने की व्यवस्था करनी होगी ताकि ऑफ सीजन के लिए हम उसे सुरक्षित रख सकें।

3. मार्केटिंग और पैकेजिंग : यह सबसे अहम स्टेप हैं। प्रोडक्ट तैयार करने के बाद हम उसे कहां, बेचेंगे, उसकी जगह के बारे में जानकारी जरूरी है। इसके लिए सबसे बेहतर तरीका है, वहां की लोकल मंडियों में जाना, लोगों से बात करना और डिमांड के हिसाब से समय पर प्रोडक्ट पहुंचना। इसके अलावा सोशल मीडिया भी मार्केटिंग में अहम रोल प्ले करता है।


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adminOctober 26, 20201min3190

कई उद्यमी तकनीकी क्रियाओं के बारे में भ्रमित हो जाते हैं और इसलिए हमने यहां उनके शुरुआती चरण के लिए इसे सरल बनाने की कोशिश की है। इस आर्टिकल में, हमने सीड फंडिंग बढ़ाने के तरीकों के बारे में बाताया और यह भी बताया कि बाकी फंडिंग राउंड से यह कैसे अलग होता है।

आपने सीड फंडिंग, अर्ली-स्टेज फंडिंग, लेट-स्टेज फंडिंग आदि शब्द सुने होंगे। लेकिन शायद इन शब्दों को लेकर आपके दिमाग में थोड़ा भ्रम होगा। हम इन शब्दों को लेकर ये भ्रम दूर करेंगे और इसी कड़ी में आज का मुख्य विषय है सीड-फंडिंग।

 

क्या होती है सीड-फंडिंग

साधारण: बिजनेस शुरू करने के लिए फंड्स जुटाने को ही सीड-फंडिंग कहा जाता है। बिजनेस के शुरूआती चरण में उठाया गया फंड (ज्यादातर जब बिजनेस मॉडल में लाभप्रदता नहीं होती है) अर्ली-स्टेज फंड कहलाता है। और आप जिस फंड को बढ़ाते हैं, उसे लेट-स्टेज फंडिंग कहा जाता है।

यदि आप उन बिजनेस करने का इरादा रखते हैं और एक ऐसे व्यक्ति हैं जिसके पास एक यूनिक बिजनेस आइडिया है, लेकिन उस पर काम करने के लिए पर्याप्त फंड्स नहीं है, तो सीड-फंडिंग निश्चित रूप से आपके लिए है। हालांकि, यह उतना सरल नहीं है जितना दिखता है। सीड फंडिंग में भी कुछ पूंजी लगती है, जिसे प्री-सीड फंडिंग कहा जाता है। अब, प्री-सीड फंड क्या है? हम इसे सरल उदाहरण से समझेंगे।

 

सीड-फंडिंग के लिये कैसे करें तैयारी

मान लीजिए कि आप बी 2 बी फूड वेंडर सर्विसेज ऐप लॉन्च करने जा रहे हैं। आपके पास एक बेहद अच्छा आइडिया है, सही बिजनेस मॉडल और यहां तक ​​कि मुनाफा कमाने की योजना भी है। लेकिन आप किसी इनवेस्टर को अपना आइडिया कैसे बताएंगे? क्या एक अनुभवी और व्यस्त इनवेस्टर के सामने कहानी सुनाना ज्यादा काम करेगा, या आपको पहले एक प्रोटोटाइप और पिच-डेक का निर्माण करना चाहिए? ठीक है, प्रोटोटाइप बनाने से आपको अपने बिजनेस मॉडल के प्रैक्टिकल पॉइट्ंस को इनवेस्टर को दिखाने में मदद मिलेगी।

ऐसा करने के लिए, आपको एक बड़ी टीम, ऑफिस बनाने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन इसके लिए आपको समय की आवश्यकता होगी, कम से कम एक सीटीओ, एक डेटा ऐनालिसिस सिस्टम, और इसके रिकॉर्ड ताकि आप इनवेस्टर के सामने अपना बेस्ट दे सकें।

इन चीजों के लिए कुछ अमाउंट की आवश्यकता होगी जो आप या तो अपनी बचत से निवेश कर सकते हैं या अपने भरोसेमंद इनवेस्टर्स जैसे दोस्तों, परिवार, सहकर्मियों से पैसे उधार लेकर कर सकते हैं। इसलिए, एक बार जब आप इस प्री-सीड फंडिंग को प्राप्त कर लेते हैं, तो आप प्रोटोटाइप पर काम करने में सक्षम होंगे और सीड फंडर को प्रोटोटाइप दिखा सकते हैं।

अब जब, आपने पहले ही प्रोटोटाइप बना लिया है, तो आप सीधे प्रोडक्ट को अंतिम रूप क्यों नहीं देते हैं और इसे बाजार में लॉन्च क्यों नहीं करते हैं? अब इस सीड फंडिंग का उद्देश्य क्या है? वे सभी सॉर्स क्या हैं? आइए जानते हैं क्यों।

चूंकि आपने अभी एक कच्चा प्रोडक्ट बनाया है, यह एंड-यूज़र की सभी आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है। आपको प्रोपर मार्केटिंग प्लान की आवश्यकता होगी। आपको क्लाइंट सेटिस्फेक्शन यूनिट बनानी होगी। आपको बिजनेस की कानूनी शर्तों से निपटना होगा। और, विस्तार के लिए एक बड़ी टीम की आवश्यकता होगी क्योंकि एक ही व्यक्ति सभी डिपार्टमेंट्स को बहुत लंबे समय तक नहीं संभाल सकता है।

इसलिए हमें उम्मीद है कि अब तक आप सीड-फंडिंग की आवश्यकता को समझ गए होंगे। अब सवाल यह है कि इनवेस्ट कौन करेगा?

 

कैसे मिलेंगे इनवेस्टर

हमारे पहले इनवेस्टर हमारे परिचित व्यक्ति थे, और इसलिए उन्हें आपके और आपके प्रोडक्ट में कम ब्याज पर अधिक भरोसा होना चाहिए, और इसीलिए उन्होंने इसमें इनवेस्ट किया।

लेकिन अब, आपको उन व्यक्तियों से निपटना होगा जो आपके बारे में नहीं जानते हैं, जो यहां पैसा लगाने के लिए हैं, केवल अच्छे रिटर्न की उम्मीद करते हैं। उन्हें समझाना इतना कठिन है कि आप सैकड़ों सर्वे में पाएंगे कि कुल मिलाकर 99% स्टार्टअप अपने फंड फंडिंग राउंड में इनवेस्ट बढ़ाने में असफल रहते हैं।

तो फंड-रेज़र्स के उस 1% के बीच होने के लिए, आपको अब प्रजेंटेशन स्टेज पास करनी होगी। आगे हम बता रहे हैं कि इसे कैसे पास करना है।

 

प्रजेंटेशन स्टेज

शॉर्ट पिच-डेक बनाना हमेशा एक बड़ी फ़ाइल बनाने की तुलना में सबसे अच्छा विचार है जो प्रजेंटेशन के समय इनवेस्टर द्वारा पढ़ा नहीं जा रहा है। आपका पिच-डेक एक ही समय में जानकारीपूर्ण और संक्षिप्त होना चाहिए। इसमें आपका बिजनेस मॉडल, आपको अलग दिखाने वाली बातें, आपका मार्केट कैप और निश्चित रूप से वर्तमान और साथ ही आवश्यक टीम का विवरण शामिल होना चाहिए। इसके बाद, सभी जानकारी के टुकड़े, इनवेस्टर के सवालों के जवाब देने के लिए तैयार रहें।

वे शायद वे डिटेल्स 2-3 बार पूछ सकते हैं और फिर बहुत ही मूल लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न पूछते हैं जैसे कि केवल आप ही क्यों, और वे यह सुनिश्चित करेंगे कि आपने वास्तविक समस्या का समाधान प्रस्तुत किया है और न कि केवल कमाने का एक काल्पनिक तरीका।

यदि आप उन्हें जवाब देने में सक्षम होते हैं, तो आपने स्टार्टअप के सबसे महत्वपूर्ण चरण को पार कर लिया है।

 

कैसे काम करती है सीड-फंडिंग

सीड-फंडिंग मुख्य रूप से इक्विटी सौदे पर काम करती है। इनवेस्टर आपके बिजनेस में एक निश्चित प्रतिशत इक्विटी लेते हैं, और इसलिए जब आपका बिजनेस बढ़ता है, तो वे अधिक लाभ के लिए अपना हिस्सा बेच सकते हैं। यह प्रक्रिया आपको ब्रांड का मूल्यांकन करने में भी मदद करती है।

उदाहरण के लिए, यदि इनवेस्टर एक करोड़ रुपये के निवेश के बदले में आपके ब्रांड के 10% शेयर लेता है, तो आपके ब्रांड को अंततः दस करोड़ मूल्य की कंपनी की वैल्यू मिलती है। हालांकि, वास्तविक दस करोड़ आपके पास नहीं हैं, इसलिए वैल्युएशन और रियल कैपिटल दो अलग-अलग शब्द हैं। सीड फंडिंग को क्राउडफंडिंग इवेंट्स, वेंचर कैपिटलिस्ट्स द्वारा, एंजेल इनवेस्टर्स द्वारा, और उन व्यवसायियों को पिच डेक भेजकर भी उठाया जा सकता है, जिनके बारे में आपको लगता है कि आपके बिजनेस मॉडल में दिलचस्पी हो सकती है।

यह भी सुनिश्चित करें कि आप ईमेल पर स्पैमिंग शुरू नहीं करें क्योंकि यह आपकी इमेज लोंग-टर्म के लिये खराब कर सकता है।

हमें आशा है कि हम आपके साथ फंडिंग सिस्टम पर कुछ जानकारीपूर्ण बिंदुओं को साझा करने में सक्षम हुए…. तो बस अपने सपनों का बिजनेस शुरू करने के लिए तैयार हो जाएं!


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adminOctober 17, 20201min4450

आईआईएफएल वेल्थ और हुरुन इंडिया ने हाल ही में 40 और उससे कम उम्र वाले सेल्फ मेड अमीरों की लिस्ट को जारी की। इस लिस्ट में एकमात्र महिला हैं 39 साल की देविता सराफ। वह इस सूची में 16वें स्थान पर हैं। देविता वीयू ग्रुप की सीईओ और चेयरपर्सन हैं। उनका नाम फॉर्च्यून इंडिया (2019) की भारत की सबसे ताकतवर 50 महिलाओं में भी आ चुका है। इंडिया टुडे ने 2018 में बिजनेस वर्ल्ड में 8 सबसे ताकतवर महिलाओं में देविता सराफ को जगह दी थी। उनकी कुल दौलत करीब 1200 करोड़ रुपए है।

देविता सराफ ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है। वो जेनिथ कंप्यूटर्स के मालिक राजकुमार सराफ की बेटी हैं। हालांकि, वो हमेशा से कुछ अलग करना चाहती थीं। इसलिए फैमिली बिजनेस नहीं संभाला। 2006 में जब टेक्नोलॉजी में तेजी से बदलाव हो रहा था और अमेरिका में गूगल और एपल जैसी कंपनियां मोबाइल और कम्प्यूटर के बीच के गैप को खत्म करने की जद्दोजहद में थीं, उस समय देविता ने कुछ नया करने की ठानी। इसके लिए उन्होंने टीवी कारोबार को चुना। उन्होंने VU टीवी की शुरुआत की। जो टीवी और सीपीयू का मिलाजुला रूप था।

उनकी कंपनी लेटेस्ट तकनीक में अच्छा काम कर रही है। देविता की कंपनी एडवांस TV बनाती है। इस टीवी पर यू-ट्यूब और हॉट स्टार जैसे ऐप को भी आसानी से चलाया जा सकता है। मतलब ये टीवी कम कंप्यूटर होते हैं। इनके जरिए आप मल्टी टास्किंग कर सकते हैं। साथ ही कंपनी एंड्रॉयड पर चलने वाले हाई डेफिनेशन टीवी भी बनाती है। बड़ी स्क्रीन के साथ कंपनी के पास कॉरपोरेट यूज की भी टीवी है।

देविता ने जब कंपनी शुरू की थी तब उनकी उम्र महज 24 साल ही थी। शुरुआत में उन्हें दिक्कत आईं, लेकिन करीब 6 साल बाद 2012 में उनकी कंपनी प्रॉफिट में आ गई। 2017 में कंपनी का टर्नओवर करीब 540 करोड़ पहुंच गया था। उसके बाद से लगातार यह बढ़ता ही गया। आज देविता के पास पूरे भारत में करीब 10 लाख से ज्यादा कस्टमर्स हैं। कंपनी दुनिया के 60 देशों में अपनी टीवी बेचती है।

 

लड़की समझ कर सीरियसली नहीं लेते थे लोग

देविता के लिए कंपनी को इस मुकाम तक पहुंचाना आसान नहीं था। एक इंटरव्यू में देविता ने कहा था कि जब वो बिजनेस के सिलसिले में किसी डीलर या मैन्युफैक्चरर से मिलती थीं, तो लोग उन्हें लड़की समझकर सीरियसली नहीं लेते थे। कुछ लोगों को लगता था कि ये लड़की है और इतना बड़ा बिजनेस संभाल कैसे सकती है। देविता के मुताबिक, जब आपको आगे बढ़ाना होता है तो ऐसी चीजों के बारे में ध्यान नहीं देते हैं। हालांकि उनका मानना है कि अब लोगों की सोच बदल रही है। उन्हें देखकर बहुत से लोगों को लगता है कि उनकी बेटियां भी अपना बिजनेस खड़ा कर सकती हैं।

 

पीएम मोदी भी कर चुके हैं तारीफ

 

साल 2017 में पीएम मोदी ने अपने भाषण में देविता के आइडिया का जिक्र भी किया था।
साल 2017 में पीएम मोदी ने अपने भाषण में देविता के आइडिया का जिक्र भी किया था।

 

साल 2017 में देविता ने यंग सीईओ के साथ पीएम मोदी की हुई बैठक में हिस्सा लिया था। इसमें न्यू इंडिया के लिए इन सीईओज से अपने आइडिया देने को कहा गया था। देविता ने इस कार्यक्रम में मेक इन इंडिया पर अपने विचार रखे। बाद में पीएम मोदी ने अपने भाषण में उनके आइडिया का जिक्र भी किया।

 

हार्डवर्किंग ही सफलता का मूलमंत्र

एक इंटरव्यू में देविता सराफ ने कहा कि वह हार्डवर्किंग और युवा महिलाओं का भी प्रतिनिधित्व कर रही हैं। वह देश की तमाम युवा महिलाओं को प्रोत्साहित करने का काम कर रही हैं। वह कहती हैं कि उन्हें अब इस बात का भरोसा हो गया है कंपनियों के सीईओ भी किसी सेलेब्रिटी से कम नहीं हैं। देविता कहती है कि महिलाओं को सिर्फ उनकी सुंदरता के लिए नहीं, बल्कि उनके टैलेंट के लिए भी सराहा जाना चाहिए।


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adminOctober 5, 20201min4980

गुजरात की गरबा राजधानी राजकोट में, असलम सोलंकी वह कर रहे हैं जो सबसे अधिक भारतीय उद्यमियों का उद्देश्य है: स्थानीय सोच के साथ वैश्विक चीजें बनाना। डिजिटल डिजाइनरों द्वारा सामना किए जाने वाले मुद्दों को हल करने की दृष्टि के साथ, चाहे वह फोटोग्राफर, एल्बम डिजाइनर और ग्राफिक डिजाइनर हो, असलम ने स्वचालित डिजाइन समाधान तैयार किए हैं।

पेरेंट कंपनी InsideLogic Software के प्रोडक्ट में Album Sense, Visual Sense और जल्द ही लॉन्च होने वाली Photo Sense शामिल हैं।

Industry Arc के अनुसार, ग्लोबल फोटो एडिटिंग सॉफ्टवेयर मार्केट की साइज 2025 तक $ 372.5 मिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है। 2020 और 2025 के बीच बाजार 3.7 प्रतिशत के सीएजीआर से बढ़ने का अनुमान है। फोटो एडिटिंग सॉफ्टवेयर मार्केट को लीड Adobe Photoshop द्वारा किया जाता है जिसके बाद Zoner, Serif, MacPhun, और Corel सहित अन्य सॉफ्टवेयर काम में आते हैं।

 

असलम का दावा है,

“हमारा प्रोडक्ट एडोब फोटोशॉप का अप्रत्यक्ष प्रतियोगी हैं। और यह फास्ट हैं, बेहतर और सस्ता हैं।“

 

कैसे हुई शुरूआत

असलम भाई, जैसा कि आमतौर पर लोग उन्हें संबोधित करते हैं, को अपने परिवार की आर्थिक तंगी के कारण कक्षा 9 में स्कूल से बाहर कर दिया गया।

असलम ने बताया,

“मुझे आगे बढ़के जो करना था, उसके लिये ग्रेजुएशन करना बेमतलब था।”

नौ से पांच की नौकरी करना कभी भी असलम की योजना नहीं थी। वह अपना खुद का उद्यम बनाना चाहते थे। स्कूल से बाहर निकलकर, कुछ दूसरे काम करने के बाद, असलम को मार्केटिंग में दिलचस्पी हुई। उन्होंने कुछ बी-स्कूल की पाठ्यपुस्तकें उठाईं, खुद को क्या करना चाहिए और क्या नहीं से रूबरू कराया और मार्केटिंग की नौकरी की तलाश में चले गए।

90 के दशक के अंत में, असलम ने इंडिविजुअल डिजिटल बैकग्राउंड डिजाइनर्स के लिए काम किया, जिससे उन्हें राजकोट में स्टूडियो को अपनी सीडी बेचने में मदद मिली। इस तरह की एक सेल्स मीटिंग के दौरान, एक एल्बम डिजाइनर ने कहा: “मनुष्य चाँद पर पहुँच गया है लेकिन अभी भी डिजाइनिंग में कोई ऑटोमैशन नहीं है।”

इस बात ने असलम को सोचने पर मजबूर कर दिया।

2000 में, उन्होंने एक ऑटोमैटेड एल्बम डिजाइनिंग सॉफ्टवेयर बनाने का काम शुरू किया। 2016 में, उन्होंने InsideLogic Software को इनकॉर्पोरेट किया और सॉफ्टवेयर Album Sense लॉन्च किया।

बाद में, असलम इंडस्ट्री के एक्सपर्ट्स के साथ इस 15-सदस्यीय स्टार्टअप का हिस्सा बनने के लिए दौड़ पड़े। राजू जयानी बिजनेस डेवलपमेंट का प्रबंधन करते हैं, हिरेन जोशी बिजनेस एंड चैनल डेवलपमेंट के लिए ज़िम्मेदार है, योगेश वच्छानी टेक हेड हैं, मुंजाल सोलंकी सेल्स टीम के प्रमुख हैं और सरफ़राज़ मुंशी रिटेल सेल्स एंड फ़ाइनेंस का प्रबंधन करते हैं।

 

मैन्यूअल प्रोसेस को ऑटोमेट करना

एल्बम डिजाइनिंग एक बोझिल प्रक्रिया है। एक औसत फोटो एल्बम में लगभग 300 तस्वीरें होती हैं जो 60 पेज तक फिट होती हैं। पूरी प्रक्रिया में फोटोग्राफर या एल्बम डिजाइनरों को दो दिनों का समय लग जाता है, अगर वे अत्यधिक कुशल हैं, और अगर वे इसमें नए हैं तो समय ज्यादा लग सकता है।

असलम ने आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस-बेस्ड एल्बम डिजाइनिंग पोर्टल, Album Sense बनाया है, जो लगभग तुरंत एल्बम बनाता है। इसके अतिरिक्त, यह स्वचालित रूप से चित्रों को सही करता है और स्मार्ट कटिंग टूल के साथ आता है।

असलम कहते हैं,

“एल्बम सेंस पूरी प्रक्रिया को स्वचालित करके लाखों लोगों का समय बचाने में मदद करता है।”

इनसाइडलॉजिक सॉफ्टवेयर का दूसरा प्रोडक्ट, Visual Sense उन एसएमबी को लक्षित कर रहा है जो अपने ब्रांड का निर्माण ऑनलाइन करना चाहते हैं। विजुअल सेंस AI-बेस्ड स्वचालित ब्रांडिंग और सोशल मीडिया डिज़ाइन टूल है। यह रेडी-टू-यूज़ डिज़ाइन प्रदान करता है। व्यवसायों को केवल अपने लोगो, कलर स्कीम स्पेशिफिकेशन और अन्य प्रमुख विवरणों को जोड़ना होगा। सॉफ्टवेयर इन सभी विवरणों को याद रखता है और इन विशिष्टताओं के आधार पर ब्रांडिंग और मार्केटिंग डिजाइन बनाने में मदद करता है।

तीसरा प्रोडक्ट, Photo Sense, जिसे टीम ने अक्टूबर के अंत तक लॉन्च करने की योजना बनाई है, एक AI-बेस्ड इमेज एडिटिंग और डिजाइनिंग सॉफ्टवेयर है जो 112 फीचर्स से भरा हुआ है।

 

द नंबर्स गेम

सिंगल यूजर के लिए, Album Sense 5000 रुपये की एक बार की लागत के लिए उपलब्ध है। मल्टिपल-यूजर्स के उपयोग के लिए, लागत 7500 रुपये है। एल्बम सेंस 10,000 से अधिक पेड यूजर्स का दावा करता है।

असलम कहते हैं, “हम देश भर में आयोजित होने वाले व्यापार मेलों में भाग लेकर खुद को बढ़ावा दे रहे हैं। यह वह जगह है जहाँ हमने अपने पहले ग्राहकों का अधिग्रहण किया।”

Visual Sense तीन साल के असीमित डिजाइन डाउनलोड के लिए 1499 रुपये में उपलब्ध है। इसके लॉन्च के बाद, Photo Sense पहले तीन वर्षों के लिए मुफ्त उपलब्ध होगा। यदि वे एडवांस्ड डिज़ाइनिंग टेम्प्लेट का उपयोग करना चाहते हैं, तो यूजर्स को इन-ऐप खरीदारी करने की आवश्यकता होती है। हालांकि, ऑटोमैटिक एल्बम डिजाइनिंग पोर्टल के बिना, एडवांस्ड फीचर्स, अब तक उपयोग करने के लिए फ्री होंगी।

असलम बताते हैं, “समान सुविधाओं के साथ बाजार में उपलब्ध उत्पादों की कीमत कम से कम 1500 रुपये प्रति माह है।” पहले तीन वर्षों के बाद, SaaS मॉडल में फोटो सेंस उपलब्ध होगा; टीम वार्षिक सदस्यता शुल्क 786 रुपये रखने की योजना बना रही है।

बूटस्ट्रैप्ड कंपनी के अनुसार, कस्टमर बेस साल दर साल 20 प्रतिशत बढ़ रहा है। इनसाइडलॉजिक के लिए पिछले साल का रेवेन्यू 20 लाख रुपये था। यह 2022 तक 2 करोड़ रुपये तक बढ़ने की उम्मीद कर रहा है।

फाउंडर कहते हैं, “हमने कंपनी की ग्रोथ के लिये रेवेन्यू का 50 प्रतिशत फिर से निवेश किया है।”

आगे जाकर, InsideLogic Software ने वैश्विक बाजार में विस्तार करने के लिए धन जुटाने की योजना बनाई है। असलम कहते हैं, ”हम इमेज एडिटिंग और डिजाइनिंग में भारतीय प्रोडक्ट को विश्व में अग्रणी बनाना चाहते हैं।”

 


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adminOctober 1, 20201min5380

देश में उद्यमियों के बाद नए आइडिया तो हैं, लेकिन पूंजी की कमी उन इरादों को आगे बढ़ने में बड़ी बढ़ा साबित होती है। फिर भी कुछ उदाहरण ऐसे भी हैं जिन्होने 20 हज़ार रुपये से भी कम निवेश के साथ अपना व्यवसाय शुरू करते हुए करोड़ों की कंपनी खड़ी की।]

भारत देश में उद्यमियों के पास नए आइडिया की कमी नहीं है, हालांकि पूंजी की कमी जरूर इनके रास्ते में बड़ी बाधा के रूप में खड़ी रहती

फंड तक पहुंच भारत में उद्यमिता की सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है। D&B इंडिया के शोध से पता चलता है कि केवल चार प्रतिशत छोटे उद्यमियों और उद्यमों के पास ही वित्त के एक औपचारिक स्रोत तक पहुंच है, इसके अलावा उद्यमियों की बैंक क्रेडिट भी घट रही है।’

उद्यमियों को पहली बार अपना व्यवसाय शुरू करने के लिए परिवार और दोस्तों, व्यक्तिगत बचत या ऋण पर निर्भर रहना पड़ता है। कई मामलों में ये उद्यमी 20,000 रुपये से अधिक नहीं जुटा पा रहे हैं।

पूंजी भले ही छोटी हो सकती है, लेकिन उद्यमियों के सपने बड़े हैं, इसी के साथ सफल होने की उनकी इच्छा और भी बड़ी है।

नीच हम ऐसे ही पाँच उद्यमियों के बारे में आपको बता रहे हैं, जिन्होने 20 हज़ार या उससे भी कम पूंजी के साथ अपना व्यवसाय शुरू किया और आज करोड़ों रुपये मूल्य की कंपनी की स्थापना कर चुके हैं।

 

राहुल जैन – eCraftIndia.com राहुल जैन,

संस्थापक और बिजनेस हेड, eCraftIndia राजस्थान के जयपुर में जन्मे और पले-बढ़े होने के चलते हस्तशिल्पियों ने हमेशा ही राहुल जैन को मंत्रमुग्ध किया, लेकिन जब राहुल ने मुंबई के एक मॉल में कदम रखा तो वह हैरान रह गए कि राजस्थान के हस्तशिल्प की कीमत वहाँ इतनी अधिक थी।

इसी अनुभव ने राहुल को कारीगरों और शिल्पकारों के साथ सहयोग करने और बिचौलियों को काटकर किफायती उत्पाद बेचने के लिए अपनी खुद की ईकॉमर्स कंपनी खोलने के लिए प्रेरित किया। 2014 में, राहुल, अंकित अग्रवाल और पवन गोयल ने eCraftIndia.com की स्थापना मात्र 20,000 रुपये की पूंजी के साथ की थी।

शुरुयात एक छोटे से ऑनलाइन हैंडीक्राफ्ट स्टोर के रूप में हुई और इसका पहला उत्पाद लकड़ी का हाथी था, जिसकी कीमत 250 रुपये थी। कुछ वर्षों में इसका विस्तार हुआ और गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के कलाकार भी इसके साथ जुड़े। फिलहाल eCraftIndia.com ने अपनी विनिर्माण इकाई भी खोल ली है।

आज राहुल की कंपनी के संग्रह में 9,000 से अधिक स्टॉक कीपिंग यूनिट हैं और आज यह भारत के सबसे बड़े हस्तशिल्प ई-स्टोरों में से एक है, जो कि 12 करोड़ रुपये सालाना कारोबार करता है।

आरएस शानबाग – वैल्यूपॉइंट सिस्टम

उद्यमी बनने से पहले, आरएस शानबाग एक छोटे से गाँव से निकले हुए एक इंजीनियर थे। साल 1991 में उनकी जेब में 10,000 रुपये थे और उन्होंने एक छोटी-सी कंपनी शुरू करने के लिए इसका इस्तेमाल किया।

‘वैल्यूपॉइंट सिस्टम्स’ नाम का यह व्यवसाय ग्रामीण लोगों को नौकरी देने के लिए शुरू किया गया था, ताकि उन्हें हरियाली वाले चरागाहों की तलाश में भटकना न पड़े।

उन्होंने इसे बेंगलुरु में शुरू किया, लेकिन जल्द ही इसके तहत छोटे टाउन और कस्बों से स्नातकों को हायर कर उन्हे टेक्नालजी और सेवाओं की ट्रेनिंग देना शुरू कर दिया गया।

जल्द ही कंपनी ने आईटी क्षेत्र की तरफ रुख कर लिया और बड़ी कंपनियों की इन्फ्रास्ट्रक्चर जरूरतों को पूरा करने लगी। आज वैल्यूपॉइंट दक्षिण एशिया की प्रमुख आईटी इन्फ्रास्ट्रक्चर सेवा कंपनी है। कंपनी का बिजनेस जल्द ही 600 करोड़ पार करने वाला है।

 

पुनीत कंसल – रोल्स मेनिया

साल 2009 में 18 वर्षीय पुनीत कंसल ने पुणे में रोल्स मेनिया की शुरुआत की। उन्होंने 20,000 रुपये की पूंजी के साथ काठी रोल व्यवसाय शुरू किया। ये पैसे उन्होंने एक दोस्त से उधार लिए थे। शुरुआती समय में मागरपट्टा शहर के एक रेस्तरां के बाहर एक मेज के आकार का स्टॉल चलाया गया, जहां सिर्फ एक ही शेफ था।

इस दौरान पुनीत ने कुछ ग्राहकों गगन सियाल और सुखप्रीत सियाल से दोस्ती की जो रेस्तरां क्षेत्र में उद्यमी थे। जब उन्होंने पुनीत के व्यवसाय में क्षमता को पहचाना, तो वे रोल्स मेनिया को पंजीकृत करने और 2010 में दूसरा आउटलेट खोलने के लिए पुनीत के साथ आए।

उन्होंने धीरे-धीरे इसकी स्केलिंग शुरू कर दी और ऐसे मौके पर जब डिलीवरी पार्टनर्स न होने पर उन तीनों ने व्यक्तिगत रूप से खाना डिलीवर किया। रोल्स मेनिया कुछ ही वर्षों में चर्चित हो गया। पुनीत ने फ्रैंचाइज़ी मॉडल के लिए दरवाजे खोले और कंपनी का विस्तार 30 शहरों में किया गया।

आज, पुनीत की कंपनी के देश भर में 100 से अधिक आउटलेट हैं, जहां प्रत्येक दिन लगभग 12,000 रोल बेंचे जाते हैं। यह कंपनी 35 करोड़ रुपये का सालाना कारोबार कर रही है।

 

नितिन कपूर – इंडियन ब्यूटीफुल आर्ट

हाथ मिलाने से पहले नितिन कपूर ने एक निजी बैंक में काम कर रहे थे और अमित कपूर ईबे के साथ काम कर रहे थे, इसके बाद दोनों ने मिलकर कुछ नया करने का निश्चय किया। उन्होंने परिधान उद्योग द्वारा बड़े पैमाने पर उत्पन्न कचरे पर ध्यान दिया, साथ ही उन्होंने उद्योग में पानी जैसे बहुमूल्य संसाधनों की बरबादी पर भी ध्यान दिया।

इसने उन्हें 10,000 रुपये के निवेश के साथ एक ईकॉमर्स कंपनी शुरू करने के लिए प्रेरित किया, जो ‘जस्ट इन टाइम’ इन्वेंट्री प्रबंधन पद्धति का पालन करती थी। उनकी कंपनी, इंडियन ब्यूटीफुल आर्ट ने सुनिश्चित किया कि ग्राहक द्वारा ऑर्डर देने के बाद ही कपड़ों का निर्माण किया जाए। नितिन ने यह देखा कि मुद्रण से उत्पाद को भेजने तक की प्रक्रिया 48 घंटों के भीतर पूरी हो और इसमें प्रकृतिक संसाधन बिलकुल भी बरबाद न हो।

उन्होंने अमेरिका और यूके सहित अन्य देशों में बेचने के लिए खंबात, अहमदाबाद, जयपुर, मेरठ, कोलकाता, खुर्जा, मुरादाबाद, लुधियाना, अमृतसर, मुंबई, नई दिल्ली, हैदराबाद और लखनऊ में स्थित निर्माताओं से उत्पाद मंगवाए।

आज, इंडियन ब्यूटीफुल आर्ट वैश्विक स्तर पर भारतीय उत्पादों के ई-कॉमर्स क्षेत्र में सबसे बड़े ऑनलाइन विक्रेताओं में से एक है। कंपनी 30 करोड़ रुपये का सालाना कारोबार करती है।

 

जुबैर रहमान – द फैशन फैक्ट्री

2014 में इलेक्ट्रिकल इंजीनियर जुबैर रहमान तमिलनाडु के तिरुपुर में एक सीसीटीवी ऑपरेटर के तौर पर काम कर रहे थे, लेकिन 21 वर्षीय रहमान ने अपना खुद का व्यवसाय शुरू करने का सपना देख रखा था। इसी बीच एक दिन, उन्हें एक ईकॉमर्स कंपनी के कार्यालय में सीसीटीवी लगाने का अनुरोध मिला।

उन्होंने वहाँ के मैनेजर से बात की और समझा कि कैसे कंपनी ऑनलाइन सोर्सिंग और आइटम बेचकर पैसा कमा रही है। ई-कॉमर्स जुबैर के लिए सही था, क्योंकि उन्हे निर्माण में भारी निवेश नहीं करना था।

इससे प्रेरित होकर उन्होंने सिर्फ 10,000 रुपये के निवेश के साथ अपने घर से एक ईकॉमर्स कंपनी ‘द फैशन फैक्टरी’ शुरू की। उन्होंने तिरुपुर से कपड़ा मंगवाया और इसे फ्लिपकार्ट और अमेज़ॅन पर कॉम्बो पैक तरीके से लिस्ट करना शुरू कर दिया। कॉम्बो पैक में बिकने से कपड़े सस्ते हो गए।

जुबैर ने प्रति बिक्री कम लाभ देखा, लेकिन उनकी प्रति-यूनिट की कम कीमतों ने लोगों ध्यान आकर्षित किया और इसी के साथ उनके पास बड़ी संख्या में ऑर्डर आना शुरू हो गए। जुबैर की रणनीति ने इतनी अच्छी तरह से काम किया कि ‘द फैशन फैक्टरी’ को अब प्रति दिन 200 से 300 ऑर्डर मिलते हैं। उन्होंने अमेज़न पर इन्हे बेचने के लिए एक विशेष सौदे पर भी हस्ताक्षर भी किए हैं। फैशन फैक्ट्री सालाना 6.5 करोड़ रुपये का राजस्व उठा रही है और अगले वर्ष 12 करोड़ रुपये के राजस्व का लक्ष्य निर्धारित है।


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adminSeptember 26, 20201min5030

हम ऐसी दुनिया में रहते हैं, जहां फर्स्ट इंप्रेशन काफी मायने रखता है। पहली मुलाकात के बाद सामने वाला शख्स हमारे बारे में जो राय बनाता है, उसी पर काफी हद तक हमारे रिश्ते का भविष्य टिका होता है। अगर पहली मुलाकात में ही किसी को प्रभावित करना हो तो कपड़ों का रोल काफी अहम हो जाता है। कई बार लोगों कपड़ों के आधार पर ही सामने वाले को जज करते हैं।

चाहे महिलाएं हों, पुरुष हों या फिर बच्चे हों, हर किसी को साफ-सुथरे कपड़े पहनना पसंद होता है। हालांकि, सभी को कभी न कभी अपने धोबी से शिकायत हो जाती है। कई बार दाग सही से साफ न करने को लेकर धोबी से बहस बन जाती है तो कभी कपड़ों का नुकसान इसकी वजह बनता है। संध्या नांबियार ने आम आदमी को इन्हीं परेशानियों से छुटकारा दिलाने के लिए 2017 में इस्तरीपेटी की नींव रखी थी। यहां कपड़ों को ग्राहकों के दिशानिर्देश के मुताबिक काफी सावधानी से धोया जाता है। इस्तरी करते समय भी कपड़ों का खास ख्याल रखा जाता है।

तमिल में इस्तरी पेटी का मतलब एक लोहे का प्रेस होता है, जिसमें कोयला भरकर गर्म करके कपड़ों पर इस्तरी की जाती है। संध्या की इस्तरीपेटी एक प्रोफेशनल आयरनिंग और लॉन्ड्रिंग बिजनेस है। यह बी2बी (बिजनेस टू बिजनेस) और बी2सी (बिजनेस टू कंज्यूमर) दोनों तरह के क्लाइंट्स को सर्विस देता है।

 

संध्या बताती हैं,

‘हम अपने सभी ग्राहकों को सुगंधित इस्तरी किए हुए कड़क और करीने से सजे कपड़े देना चाहते हैं, ताकि उनसे बिल्कुल नए कपड़ों जैसी महक आए। भारत में लॉन्ड्री बड़े पैमाने पर असंगठित क्षेत्र है। हम इस्तरीपेटी के साथ इस काम को आसान बनाना चाहते हैं, जिससे ग्राहक की खुशी और संतुष्टि मिले।’

इस्तरीपेटी का चेन्नई में स्थित है। यह स्टार्टअप कपड़ों को घर, ऑफिस या ग्राहकों की सुविधा के हिसाब से कहीं भी लाता है और फिर उनकी बताई जगह पर डिलीवर कर देता है। इसका मतलब है कि आपको रोजाना अपने धोबी से कपड़ों के धब्बे, बदबू, नकद लेन-देन या समय को लेकर बहस नहीं करनी पड़ेगी।

 

इस्तरीपेटी की शुरुआत की कहानी

हर घर में लोगों को कपड़े धोने और आयरन करने से दिक्कत होती है। हम भारतीयों को परेशानी इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि हम अलग-अलग और नाजुक वेरायटी वाले कपड़ों का इस्तेमाल करते हैं।

 

संध्या बताती हैं,

‘मैं एक वर्किंग प्रोफेशनल थी। मैं भी इस काम से नफरत करती थी। मुझे अक्सर दाग या कपड़े गायब होने को लेकर धोबी से बहस करनी पड़ती थी। इन सबने मुझे सोचने पर मजबूर किया कि हर घर में कपड़े धोने की जरूरत पड़ती है, फिर भी इस काम को पुराने ढंग से चलाया जा रहा है।’

 

संध्या अपने बिजनेस आइडिया के बारे में बताते हुए कहती हैं,

‘हम पहले पड़ोस की किराना दुकानों पर फोन करके समान मंगाते थे। फिर उसमें थोड़ा बदलाव करके एप्लिकेशन का रूप दे दिया गया। मैंने इस आइडिया को कपड़े धोने के कारोबार में भी आजमाने का फैसला किया।’

संध्या एक एचआर प्रोफेशनल्स रह चुकी हैं। उन्होंने लॉन्ड्री सेगमेंट पर रिसर्च करते समय महसूस किया कि यह महत्वपूर्ण सेगमेंट असंगठित है, जिस पर पेशेवर नजरिए से ध्यान नहीं दिया गया है। उन्हें लगा कि अभी इस क्षेत्र में काफी कुछ करने की गुंजाइश है। संध्या ने फिर अपनी तरह के सोच वाले दोस्तों के साथ इस आइडिया पर काम करना शुरू किया।

इस तरह उनके दिमाग की उपज से इस्तरीपेटी का जन्म हुआ। इसे जनवरी 2018 में चेन्नई के नुंगमबक्कम में एक माइक्रो-साइज स्टीम आयरनिंग यूनिट के रूप में शुरू किया गया था। अब यह स्टार्टअप शहर के पल्लीकरनई में स्थापित एक छोटी फैक्ट्री बन गया है। यहां कपड़े धोने और स्टीम आयरन जैसी सुविधाएं मिलती हैं। यह हॉस्पिटैलिटी सेक्टर और रिटेल ग्राहकों को सर्विस देता है। इस्तरीपेटी को सबसे बड़ी कामयाबी तब मिली, जब इसने ओयो और कंपास के साथ कारोबारी समझौता किया।

 

संध्या बताती हैं,

‘हम पूरे शहर में OYO को सर्विस देते हैं। हमें कंपास के जरिए फोर्ड और शेल जैसी मल्टीनेशनल कंपनियों का काम मिला। यह इस्तरीपेटी जैसे स्टार्टअप के लिए काफी शानदार अनुभव है।’

 

कारोबारी चुनौतियां

इस्तरीपेटी को कारोबार जमाने की राह में कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उन्हें लोगों को समझाना पड़ा कि स्टीम आयरनिंग किस तरह से आम आयरनिंग से अलग है। स्टार्टअप के सामने कपड़ों की सुरक्षा और क्वॉलिटी बरकरार रखने का भरोसा देने की चुनौती भी थी। भारत में लोग कीमतों को लेकर काफी संवेदनशील होते हैं। इसलिए इस्तरीपेटी की सर्विस को मध्यम-वर्गीय परिवारों और कामकाजी पेशवरों के लिए किफायती बनाने का चैलेंज भी था। हालांकि, संध्या इन सब चुनौतियों से निपटते हुए अपने स्टार्टअप को अलग पहचान दिलाने में सफल रहीं। हालांकि, संध्या का कहना है कि वह मार्केट को लेकर आशावादी हैं।

 

वह बताती हैं,

‘हमें बी2बी और बी2सी दोनों सेगमेंट में काफी संभावनाएं नजर आती हैं। पिछले कुछ वर्षों में हॉस्पिटैलिटी और अकोमोडेशन (आवास) इंडस्ट्री ने काफी ग्रोथ की है। इसके अलावा आईटी पार्क, इंस्टीट्यूशंस और मेडिकल फैसिलिटीज में बढ़ोतरी से भी बी2बी और बी2सी सेगमेंट में लॉन्ड्री बिजनेस के लिए ग्रोथ के दरवाजे खुले हैं।’

स्टैटिस्टा के मुताबिक, 2019 में लॉन्ड्री केयर सेगमेंट का कारोबार तकरीबन 3.96 अरब डॉलर का है। इसके 2023 तक सालाना 3.7 प्रतिशत बढ़ने की संभावना है। संध्या की इस्तरीपेटी लॉन्ड्री मार्केट में पिकमायलॉन्ड्री, अर्बन धोबी, टूलर जैसे स्टार्टअप के साथ मुकाबला कर रही है। हालांकि, संध्या का कहना है कि इस्तरीपेटी की सर्विस की क्वॉलिटी, डिलीवरी टाइम और डिस्काउंट इसे दूसर स्टार्टअप से अलग करते हैं।

 

और ऐसे बढ़ते गए नंबर

इस्तरीपेटी ने 2018 में सिर्फ दो कर्मचारियों के साथ कारोबार शुरू किया था। फिलहाल, स्टार्टअप के साथ 15 कर्मचारी काम करते हैं। इसके पास अभी 350 से अधिक ग्राहक हैं। यह 3 किलो कपड़ों की धुलाई के लिए 200 रुपये लेता है। वहीं, 3 किलो कपड़ों की धुलाई और इस्तरी का चार्ज 300 रुपये है। इस्तरीपेटी में एक फैमिली पैकेज भी है। इसमें 15 किलो कपड़ों की धुलाई 900 रुपये में होती है।

 

संध्या निवेश के बारे में बात करते हुए कहती हैं,

‘इस्तरीपेटी की शुरुआत 2 लाख रुपये के निवेश के साथ हुई थी। उस वक्त हम सिर्फ स्टीम आयरनिंग सर्विस देते थे। हालांकि, हमें बाद में लगा कि कपड़े धोने जैसी सेवाओं की मांग बढ़ रही है तो हमने उसे भी शुरू किया। हम एक एंजेल (फरिश्ता) इनवेस्टर की मदद से वॉशिंग इक्विपमेंट खरीदने के लिए 11 लाख रुपये जुटाने में कामयाब रहे। हम शहर के भीतर और बाहर कारोबार बढ़ाने के लिए निवेशक तलाश रहे हैं।’

इस्तरीपेटी ने 2017 में 4.2 लाख रुपये का कारोबार किया था। अब यह हर महीने औसतन 4 लाख रुपये कमाती है। यह अपनी मौजूदा सुविधाएं के साथ औसत मासिक बिक्री को 5 लाख रुपये करने का लक्ष्य लेकर चल रही है। संध्या कहती हैं कि हमें अपने स्टार्टअप को लेकर लोगों से शानदार रिस्पॉन्स मिल रहा है। इसलिए इस्तरीपेटी अगले साल तक शहर के मुख्य स्थानों पर कुछ और रिटेल यूनिट खोलने की योजना बना रही है।

 

संध्या ने अपनी बात खत्म करते हुए कहा,

‘हम लॉन्ग टर्म विजन के तौर पर कारोबार में शारीरिक या मानसिक रूप से कमजोर लोगों को भी रोजगार देकर उनके लिए फ्रेंचाइजी बनाना चाहते हैं। इससे न केवल उन लोगों को रोजगार के मौके मिलेंगे, बल्कि यह समाज में उन्हें स्वीकार करने की दिशा में एक बड़ी पहल होगी।’


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adminSeptember 22, 20201min5060

गीता सिंह ने नई दिल्ली में 10×10 फीट के छोटे से कमरे से महज 50,000 रुपये में TYC कम्युनिकेशन की स्थापना की। आज, वह विभिन्न डोमेन से 200 से अधिक क्लाइंट्स को सेवा देती है।

अपने परिवार के अधिकांश सदस्यों के सेना में या सरकारी नौकरियों में काम करने के चलते गीता सिंह अधिकांश पहलुओं में एक बाहरी व्यक्ति बन गईं।

जैसा कि वह हमेशा अपने सपनों का पीछा करते हुए कुछ अलग करना चाहती थी, मेरठ की इस 33 वर्षीय उद्यमी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में मास्टर की पढ़ाई पूरी करने के बाद JIMMC, नोएडा से मास कम्युनिकेशन एंड जर्नलिज्म में डिप्लोमा किया।

इसके बाद उन्होंने प्रतिष्ठित मीडिया हाउस, पीआर एजेंसियों, विज्ञापन, क्रिएटिव और ब्रांडिंग एजेंसियों के साथ काम किया, जिनका मानना ​​है कि उन्होंने उनके पारस्परिक कौशल और संचार को बढ़ाने में मदद की।

वह याद करते हुए बताती हैं, “इन कंपनियों के साथ काम करते हुए, मैंने संचार उद्योग के बारे में बहुत कुछ सीखा, और इसने मुझे अपनी कंपनी शुरू करने के लिए एक नींव दी। इसने मुझे रणनीतियों, क्रिएटिविटी, इवेंट मैनेजमेंट, ब्रांड मैनेजमेंट और किसी भी संगठन की आवश्यकताओं के बारे में जानने में मदद की। इसके अलावा, विभिन्न समुदायों और लोगों के साथ मेरे शुरुआती अनुभव ने मुझे एक अच्छा नेटवर्क स्थापित करने में मदद की है।”

गीता ने महज 50,000 रुपये के साथ छोटे से कमरे से वर्ष 2011 में ट्रांसलेशन और कंटेंट डेवलपमेंट के क्षेत्र में एक प्रोपराइटरशिप फर्म के रूप में TYC कम्युनिकेशन की शुरुआत की।

 

क्या काम करती है कंपनी?

2014 में, TYC कम्युनिकेशन एक बड़े संचार और ब्रांड इमेज परसेप्शन के साथ प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में विकसित हुई, ऑफ़लाइन और ऑनलाइन परिदृश्य में।

गीता कहती हैं, “मैंने दोस्तों और परिवार से 50 हजार रुपये एकत्र किए और ऑफिस के लिए 8×10 फीट का एक कमरा था। शुरुआत काफी धमाकेदार थी और मेरे अलावा, केवल एक अन्य कर्मचारी था, और हमारे पास केवल एक क्लाइंट था। तब हमारा काम फैलने लगा और हमें और अधिक ग्राहक मिलने लगे और व्यवसाय फलने-फूलने लगा।”

गीता ने काम के बोझ को संभालने के लिए अधिक कर्मचारियों को काम पर रखा और चीजें ठीक हो रही थीं फिर अंदर से किसी ने कंपनी को धोखा देने का फैसला किया।

गीता बताती हैं, “फिर उन्होंने कंपनी छोड़ दी और अपने साथ अधिकांश कर्मचारियों को दूर ले गए। यह एक बड़ा झटका था, लेकिन हम दृढ़ और समृद्ध रहे। लेकिन मुझे अब कोई शिकायत नहीं है; उसके लिए जीवन बहुत छोटा है मैं केवल उस घटना को यात्रा के एक हिस्से के रूप में देखती हूं और अगर कुछ भी हो, तो इसने मुझे और भी मजबूत बना दिया है।”

 

अलग-अलग डोमेन में सेवाएं देना

शुरूआती असफलता के बावजूद, TYC कम्युनिकेशन तेजी से बढ़ा है और विभिन्न डोमेन से 200 से अधिक ब्रांडों की सेवा की है। 50 लोगों की एक टीम के नेतृत्व में, TYC कम्युनिकेशन मीडिया मैनेजमेंट, कंटेंट रिसर्च एंड क्रिएशन, मीडिया ट्रेनिंग, क्लाइंट सर्विसिंग और क्राइसिस मैनेजमेंट सहित सेवाओं की सरगम ​​प्रदान करता है।

गीता का कहना है कि प्रत्येक ग्राहक का औसत कार्यकाल चार साल का रहा है और इस सूची में मोबाइल डॉट कॉम, पतंजलि योगपीठ, आईआईआईटी दिल्ली, ज़ेबिया अकादमी ग्लोबल, मित्सुबिशी इलेक्ट्रिक इंडिया, पायनियर इंडिया, द जज ग्रुप, पीयरसन ग्रुप, FENA, Acreaty, Steelbird International, Aks क्लोदिंग, PayMe India, आदि जैसे बड़े नाम शामिल हैं।

वह कहती हैं, “इनमें से कुछ स्टार्टअप पहले ही दिन से हमारे साथ हैं और हम उनकी ओर से मीडिया मैसेजिंग को प्रभावी ढंग से संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं – यही कारण है कि वे इतने लंबे समय से हमारे साथ बने हुए हैं। उन्हें हमारी आंखों के सामने बढ़ता हुआ देखना और उनकी सफलता में योगदान देना बहुत ही सुखद अनुभव है।”

 

एक अलग मुकाम

हालांकि COVID-19 ने वास्तव में संचार उद्योग को उतना नहीं बदला हैं, लेकिन संचालन ने अब एक अलग मोड़ ले लिया है।

वह कहती हैं, “लॉकडाउन लागू होने के बाद, हमने घर से काम का मॉडल अपनाया। मार्केटिंग के संदर्भ में, लॉकडाउन के दौरान प्रचार सामग्री की मांग कम हो गई है और मूल्य-आधारित सामग्री के लिए आसमान छू गया है। हम अपने ग्राहकों के साथ परामर्श कर रहे हैं और इस अवसर का लाभ उठाने के लिए रणनीति बना रहे हैं। लोगों के लिए कठिन समय हैं और उन्हें मूल्यवान सामग्री प्रदान करके, हम विश्वास और सद्भावना पैदा कर सकते हैं, जो एक सफल व्यवसाय चलाने के लिए महत्वपूर्ण हैं।”

व्यवसाय चलाना अपने आप में चुनौतियों का सेट है, और गीता अलग नहीं थी।

वह बताती हैं, “सबसे पहले, अगर आपके पास व्यावसायिक पृष्ठभूमि नहीं है, तो भारत में व्यवसाय चलाना बहुत मुश्किल है। दूसरा, यदि आप एक महिला हैं और व्यक्तिगत रूप से चीजों को संभाल रही हैं, तो कभी-कभी लोग आपको गंभीरता से नहीं लेते हैं। संगठन में अच्छे कर्मचारियों को बनाए रखने के लिए एक अच्छे उम्मीदवार को काम पर रखने से; और इसी तरह, उन ग्राहकों को बनाए रखने के लिए एक अच्छा ग्राहक प्राप्त करना, हमें बड़ी एजेंसियों की तुलना में 200 प्रतिशत में रखना होगा। उद्योग में सात साल के बाद भी, हमें अस्वीकार कर दिया जाता है क्योंकि हम नए हैं और कोई और सौदा करता है क्योंकि वे एक एमएनसी हैं।”

भविष्य की योजनाओं के लिए, गीता एस्टोनिया में अपनी पहली विदेशी परियोजना के बारे में आशावादी है। “मेरा दीर्घकालिक लक्ष्य TYC कम्युनिकेशन को दुनिया की शीर्ष पांच डिजिटल और पीआर एजेंसियों में से एक बनाना है, और मुझे कोई संदेह नहीं है कि हम इसे पूरा करेंगे।”

 


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adminSeptember 19, 20201min6780

हमारे सामने कारोबार के बहुत सारे ऑप्शन होते हैं, मगर अकसर हम उन पर ध्यान नहीं देते या कम मुनाफे वाला समझ कर छोड़ देते हैं। पर ऐसे बहुत से बिजनेस आइडिया हैं जो आपको लाखों रु का मुनाफा करवा सकते हैं। इन्हीं में एक है दूध का कारोबार। कोरोना संकट के दौरान रोजगार संकट नौकरीपेशा और बिजनेस करने वाले दोनों वर्गों के लोगों के सामने आया है। ऐसे में अगर आप कोई नई शुरुआत करना चाहते हैं तो हम आपको बताएंगे दूध के कारोबार के बारे में। दूसरे ये भी बताएंगे कि कैसे दूध के कारोबार से एक महिला साल में 1 करोड़ रु से ज्यादा की इनकम कर रही है।

 

ये महिला कमा रही सालाना 1 करोड़ रु से ज्यादा

ये कहानी है बनासकांठा जिला (गुजरात) की वडगाम तहसील के नगाणा गांव की एक महिला की। ये महिला दूध के कारोबार से हर महीने 9 लाख रु की इनकम हासिल कर रही है। यानी साल में 1.08 करोड़ रु। इस महिला का नाम है नवलबेन चौधरी। सबसे बड़ी बात ये है कि नवलबेन ने मैनेजमेंट या बिजनेस की कोई पढ़ाई नहीं की है। बल्कि वे अपनी समझ और समय के साथ हासिल किए तजुर्बे से रोज 750 लीटर बेचती हैं। उनके पास दूध देने वाले 195 पशु हैं, जो उनके बिजनेस की रीढ़ हैं।

 

भारी संख्या में हैं गाय और भैंस

नवलबेन के पास पशुओं की जो तादाद है उनमें 150 भैंस और 45 गाय हैं। अपने प्रोफिट के साथ-साथ नवलबेन ने 10 लोगों को रोजगार भी दे रखा है। उन्हें वे हर महीने 10-10 हजार रु सैलेरी देती हैं। खास बात ये है कि नवलबेन की चर्चा पूरे राज्य में दूर-दूर तक है। अब उन्हें देख कर और भी महिलाएं इसी कारोबार में हाथ आजमा रही हैं। नवलबेन अब इस बिजनेस में अकेली नहीं रहीं। बल्कि उनके 4 बेटे भी उनका हाथ बंटाते हैं। उनके बेटे शिक्षित हैं, मगर बावजूद इसके वे अपनी मां के साथ बिजनेस में लगे हुए हैं। अब ये उनका पारिवारिक कारोबार बन गया है।

 

1 साल में कितने दूध का कारोबार

नवलबेन रोजाना 750 लीटर दूध सप्लाई करती हैं। यानी वे 1 साल में करीब 2.21 लाख टन दूध का कारोबार करती हैं। एक लोटल पोर्टल के मुताबिक नवलबेन गुजरात को-ऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन लिमिटेड के अंतर्गत बनासकांठा जिले में चलने वाली बनास डेयरी को दूध बेचती हैं। इस डेयरी की तरफ से उन्हें दूध बिजनेस से कमाई के मामले में पहल स्थान मिला है।

 

कैसे हुई कारोबार की शुरुआत

नवलबेन की रोज की कमाई 30,000 रु है, जो 1 साल में 1.08 करोड़ रु बनती है। इस भारी इनकम के बावजूद नवलबेन के अनुसार वे आत्मनिर्भर भारत में योगदान दे रही हैं। गौरतलब है कि उन्होंने अपने इस कारोबार की शुरुआत 15-20 पशुओं से थी। ये पशु उनके अपने नहीं बल्कि उनके ससुराल के थे। मगर नवलबेन ने अपनी मेहनत और समझ से कारोबार को बढ़ाया। अब ये कारोबार उनके परिवार की पहचान बन गया है। अब वहां और भी महिलाएं इस कारोबार से जुड़ रही हैं।

 

आप कैसें करें ये कारोबार

अगर आप दूध का कारोबार करना चाहते हैं तो बता दें कि सरकार पशु किसान क्रेडिट कार्ड देती है। इस कार्ड के जरिए आपको पशु खरीदने के लिए लोन मिलेगा। लोन पर आपको काफी कम ब्याज देना होगा, क्योंकि सरकार इस कार्ड से लिए गए लोन पर ब्याज सब्सिडी देती है। कार्ड पर ब्याज दर 7 फीसदी है, मगर इसमें 3 फीसदी ब्याज पर सब्सिडी मिलती है। इसलिए आपको सिर्फ 4 फीसदी ब्याज देना होगा।

 

 



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